Friday, May 8, 2026

वेद मीमांसा

हम हैं तो सनातनी लेकिन कभी सोचा कि हम वेद को कितना जानते हैं? और यदि नहीं जानते तो इनकी साधना कैसे करेंगे!

वेद ⤵️

संहिता

ब्राह्मण

आरण्यक 

उपनिषद् 

ऋग्वेद

01

02

02

10

यजुर्वेद

06

04

02

51

सामवेद

03

04

01

16

अथर्ववेद

02

01

00

31

योग >

12

11

05

108

वेद की प्रमुख संहिता को ही वह वेद कहते हैं , अलग से कोई वेद ग्रन्थ नहीं होता जैसे ऋग्वेद की एक शाकल संहिता है जिसे ऋग्वेद कहते हैं , अलग से कोई ऋग्वेद ग्रन्थ नहीं है। । संहिताएं मूल मंत्रों के संग्रह को कहते हैं। संहिता शब्द संग्रह शब्द से बना हुआ है।वेदों की प्रमुख संहिताओं को निम्न टेबल में देखें जिनसे वे वेद जाने जाते हैं ⤵️


वेद

संहिता

मंत्र सं.

प्रमुख मंत्र

ऋग्वेद 

शाकल 

लगभग 10,552 

*1.1.1 

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥

शुक्ल

यजुर्वेद

माध्यंदिन वाजसनेयी संहिता

1975

1.1

ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे

कृष्ण

यजुर्वेद

तैत्तिरीय

4,593 से 4,649

1.1

ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे ।

सामवेद

कौथुम

1,875

इनमें 1771

ऋग्वेद की हैं

1.1

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये ।

अथर्ववेद 

शौनकीय

5977

1.1.1

ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः ।वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥

चार वेद हैं और हर वेद के चार - चार अंग हैं , जैसा ऊपर स्लाइड में दिखाया गया है। हर वेद अंग के अपने - अपने विषय हैं जिन्हें ऊपर संक्षेप में देख सकते हैं। वेदांग वेद साधना के चरण हैं जिनका क्रम निम्न प्रकार है >>>

1.संहिता ( मूल मंत्रों का संग्रह ) : मूल मंत्रों के सही उच्चारण की साधना , संबंधित वेद साधना का पहला चरण है। संहिता के मंत्रों के उच्चारण की सिद्धि मिलने पर ..

2. ब्राह्मण (वैदिक कर्म और यज्ञ की विधियाँ) ग्रंथों की साधना प्रारंभ होती हैं। जब यह दूसरा चरण सिद्ध होता है तब  ..

3.तीसरे चरण आरण्यक (स्वाध्याय) की साधना प्रारंभ होती हैं। आरण्यक साधना सिद्धि मिलते ही 

4. चौथे चरण उपनिषद (तत्त्व ज्ञान से कैवल्य मुखी) साधना में प्रवेश मिल जाता है । उपनिषद् की साधना सिद्धि पर कैवल्य मिलता है। कैवल्य अर्थात पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और त्रिगुणों का प्रतिप्रसव हो जाना । 

~~ ॐ ~~

Thursday, April 23, 2026

दशोपनिषद् से 10 मूल मंत्र


दशोपनिषद् से 10 मूल मंत्र 

आदि शंकराचार्य के प्रिय 10 निम्न उपनिषदों के 1460 मंत्रों में से यहां 10 ऐसे मंत्रों से परिचय कराया जा रहा है जिनका सीधा संबंध ब्रह्म और ब्रह्म की अनुभूति से है।

 दशोपनिषद् (दस प्रमुख उपनिषद्, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा) के ऐसे मूल मंत्र या मंत्रांश नीचे दिए जा रहे हैं जो ईश्वर की सर्वव्यापकता,आत्मा-ब्रह्म की एकता तथा ज्ञान के सूक्ष्म अवधारणा से संबंद्धित हैं। आइए ! इन मूल मंत्रों की ऊर्जा में डूबते हैं ..

1.ऐतरेयोपनिषद् ( ऋग्वेद )

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 33 

प्रस्तुत मूल मंत्र: 1.1.1

आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । 

नान्यत् किञ्चन मिषत् । 

स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥

आरंभ में केवल एक ही आत्मा था , इसके अतिरिक्त और कुछ न  था । उसने सोचा — “मैं लोकों की सृष्टि करूँ।”

मंत्र का सार : ब्रह्मांड की सभी सूचनाओं का कारण ,आत्मा है।


2.केनोपनिषद् (सामवेद)

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 35 

प्रस्तुत मूल मंत्र : खण्ड 1, मंत्र 5

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

जिसे मन से मनन नहीं किया जा सकता, जिसकी शक्ति से मन को विचार प्राप्त होता है — उसी को ब्रह्म जानो। ब्रह्म वह नहीं जिसकी लोग (सगुण रूपों की) उपासना करते हैं।

मंत्र का सार : ब्रह्म मन-इन्द्रियों के अधीन नहीं उनका अधिष्ठाता (enabler) है और वह निर्गुण - निराकार है।


3.छांदोग्योपनिषद् : (सामवेद)

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 627 

यहां इस उपनिषद् के दो परम मंत्रों को लिया जा रहा है …

1.प्रस्तुत पहला मूल मंत्र

 (6.8.7: उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद)

तत् त्वम् असि 

वह (ब्रह्म) तू ही है ।

मंत्र का सार : माया - ब्रह्म संयोग से हम सब हैं। माया मोहित , ब्रह्म की अनुभूति नहीं कर सकता।

2.प्रस्तुत दूसरा मूल मंत्र 

तृतीय अध्याय (प्रपाठक 3),खंड - 14 का पहला मंत्र (3.14.1)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।

अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा-क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति । स क्रतुं कुर्वीत ॥

सब कुछ निश्चय ब्रह्म ही है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)।

यह जगत् ब्रह्म से उत्पन्न है, ब्रह्म में स्थित है और ब्रह्म में ही लीन हो जाता है (तज्जलान्) — इस प्रकार शान्त भाव से इसकी उपासना करनी चाहिए।

मनुष्य की इच्छा (क्रतु) जैसी होती है, इस लोक में वह वैसा ही बन जाता है, और मृत्यु के बाद भी वैसा ही होता है इसलिए मनुष्य को शुभ संकल्प (क्रतु) करना चाहिए।

(ऊपर व्यक्त 04 मंत्रों का सार

 “ आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं और ब्रह्म से ब्रह्म में ब्रह्मांड एवं उसकी सभी सूचनाएं हैं)


4.बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेद)

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 434 

 प्रस्तुत मूल मंत्र :1.4.10

अहं ब्रह्मास्मि 

मैं ब्रह्म हूँ ।

यह उपनिषद् ऋषि याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद पर आधारित है। इसमें भी अन्य उपनिषदों की भांति नेति-नेति ( नहीं , नहीं) आधार पर  जीव - ब्रह्म एकत्व का गहरा ज्ञान उपलब्ध है।

मंत्र का सार : यहां मैं शब्द का संबंध उस सनातन , निर्गुण सर्व व्याप्त ऊर्जा से है जिससे और जिसमें ब्रह्मांड की सभी सूचनाएं आ - जा रही हैं।


5.ईशावास्योपनिषद्  (शुक्ल यजुर्वेद)

उपनिषद् में  मंत्रों की संख्या : लगभग 18 

प्रस्तुत मूल मंत्र : शुक्ल यजुर्वेद : 40.1

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥1।।

आदिशंकराचार्य इस मंत्र को सार्वभौम उपदेश रूप में देखते हैं।

इस संसार में जो कुछ भी चल-अचल है, वह सब ईश्वर (ईश) से व्याप्त है इसलिए उन्हें अपना न समझते हुए त्याग की भावना से भोग करो, किसी के धन प्राप्ति की लालसा मत करो। 

मंत्र का भावार्थ : इस मंत्र से प्रवृत्ति परक कर्म और निवृत्ति परक कर्म के संबंध की ओर  संकेत किया गया है । इस मंत्र के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक: 18.49 , 18.50 को देखिए …

“आसक्ति मुक्त जो  कर्म होता हैं उससे नैष्कर्म्य की सिद्धि मिलती है जो ज्ञानयोग की परा निष्ठा है “ और ज्ञानयोग में ब्रह्म से एकत्व स्थापित होता है।

मंत्र सार : प्रवृत्ति परक कर्म में जब आसक्ति अनुपस्थित होती है तब वह कर्म निवृत्ति परक हों जाता है और निवृत्ति परक कर्म ही कर्मयोग है जो ज्ञानयोग में पहुंचाता है। ज्ञानयोग सिद्धि ब्रह्मवित् बनाती है।


6.कठोपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद) 

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या: लगभग 119 

प्रस्तुत मूल मंत्र 2.3.17 : द्वितीय अध्याय, तृतीय वल्ली (उपसंहार और महावाक्य)

 मंत्र 17

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम् ॥

यह आत्मा प्रवचन, बुद्धि या बहुत श्रवण से नहीं मिलता। जिस पर आत्मा स्वयं कृपा  करता है ,उसी को वह अपना स्वरूप प्रकट करता है।

मंत्र सार :आत्मज्ञान ईश्वर कृपा और शुद्ध अन्तःकरण पर निर्भर है, न कि केवल बौद्धिक प्रयास पर।


7.तैत्तिरीयोपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद) 

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : 50 

मूल मंत्र : 2.1.1

ब्रह्मानन्दवल्ली का मंत्र

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म 

सत्य, ज्ञान और अनन्त , ब्रह्म है।

मंत्र का सार : इस मंत्र का संबंध पंच कोष (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय) साधना से है जहां ब्रह्म की अनुभूति इन पञ्च कोषों की साधना से होती है। इस मंत्र माध्यम से उपनिषद् के ऋषि ब्रह्म की ओर इशारा करते हुए कह रहे हैं – ब्रह्म सत्य है , शुद्ध ज्ञान का श्रोत है और शुद्ध आनंद की अनुभूति है।


8.प्रश्नोपनिषद् (अथर्ववेद) 

उपनिषद् में मंत्रों की  संख्या : लगभग 67 

मंत्र : पञ्चम प्रश्न

ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं

भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव

यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥

1-‘ॐ’ - एक अक्षर ही समस्त विश्व है।

 2- भूत, भविष्य और वर्तमान — सब ॐकार ही हैं। 

3- ॐ तीन कालों से परे है अर्थात समयाधीन नहीं है।

मंत्र का सार : यह मंत्र ॐ को परब्रह्म का सीधा संबोधन बताता है। प्रश्नोपनिषद में कुल 06 प्रश्न हैं जिनमें पञ्चम प्रश्न में ऋषि पिप्पलाद कहते हैं ,ॐ ही अपर ब्रह्म और पर ब्रह्म दोनों है। पूर्ण ॐ की उपासना से मनुष्य परम ब्रह्म को प्राप्त करता है। परमपद ही अपर ब्रह्म है।


 9.मुण्डकोपनिषद्  (अथर्ववेद) 

उपनिषद् मंत्र संख्या : लगभग 65 

यह मंत्र वेदांत दर्शन में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है , क्यों ? 

इस प्रश्न का उत्तर मंत्र व्याख्या के अंत में देखें ..

सर्वश्रेष्ठ मंत्र में उतरने से पूर्व अथर्ववेद के वेदांगों को देख लेना चाहिए। अथर्ववेद में शौनकीय +पैप्पलद , दो संहिताएं हैं ,  01 गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ है , आरण्यक ग्रन्थ कोई नहीं हैं। इस वेद की कुल 31 उपनिषद् बताएं जाते हैं जिनमें से प्रश्न , मुण्डक , मांडुक्य दशोपनिषद् में हैं। नीचे दिया जा रहा मंत्र मुण्डक उपनिषद् के तृतीय मुण्डक, द्वितीय खण्ड का 9वाँ मंत्र है .

मंत्र 

स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।

नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।

तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥

जो इस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है (ब्रह्मैव भवति)। उसके कुल में कोई भी अब्रह्मविद् (ब्रह्म को न जानने वाला) नहीं जन्म लेता। ब्रह्म ज्ञानी शोक मुक्त हो जाता है और पुण्य-पाप बंधन से भी मुक्त हो जाता है। हृदय की गुफा में स्थित अज्ञान की ग्रंथि (कर्म-वासना की गाँठ) से मुक्त होकर अमर (मुक्त) हो जाता है।

यह मंत्र सर्वश्रेष्ठ माना जाता है , क्यों ?

यह अद्वैत वेदांत का चरम सिद्धांत व्यक्त करता है: ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति — ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही बन जाता है (क्योंकि आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं)।

आदि शंकराचार्य के भाष्य में इसे बहुत महत्व दिया गया है। वे कहते हैं कि ज्ञान से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं और साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। यह उपनिषद् का उपसंहारात्मक मंत्र है। 

यहां ज्ञान को यथार्थ रूप को समझना भी आवश्यक है। श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 13.2 ने प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं : क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो: , ज्ञानं अर्थात प्रकृति - पुरुष या कहे , माया - ब्रह्म की यथार्थ रूप में देखना ,ज्ञान है। ज्ञान दो प्रकार का है ; परोक्ष और प्रत्यक्ष ज्ञान। जो किसी माध्यम से मिलता है अर्थात जो ज्ञान उधार का होता है उसे परोक्ष ज्ञान कहते हैं। जो ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है,उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। साधना प्रारंभ के लिए परोक्ष ज्ञान सीढ़ी का कार्य कर सकता है और प्रत्यक्ष ज्ञान के करीब पहुंचा सकता है लेकिन अंततः गुणातीत अवस्था में कर्म बंधन मुक्त रहते हुए जो अनुभव मिलता है , वही प्रत्यक्ष ज्ञान होता है।


10.माण्डूक्योपनिषद्  (अथर्ववेद) 

उपनिषद् में मंत्रों की संख्या लगभग 12 

 मंत्र 1.2

ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।

यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥

‘ॐ’ यह अक्षर ही समस्त विश्व है। भूत, भविष्य, वर्तमान — सब ॐकार है। तीन कालों से परे भी ॐ ही है।

शिक्षा : ॐ ब्रह्म का संबोधन है 

ऊपर क्रम संख्या : 6 - 10  के मंत्रों का सार

आत्मा की अनुभूति स्वप्रयासों से नहीं , प्रभु कृपा।से मिलती है ।

सत्य , ज्ञान और अनंत , ब्रह्म है । ॐ  ब्रह्म का संबोधन है।ब्रह्मवित स्वयं ब्रह्म होता है।

~~ ॐ ~~

Thursday, April 2, 2026

पतंजलि योग दर्शन में अष्टांगयोग का अंग ध्यान


ध्यान क्या है?

पतंजलि योगसूत्र में ध्यान क्या है ?


सांख्य दर्शन और पतंजलियोगसूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं - सांख्य दर्शन के बिना , पतंजलि योगसूत्र दर्शन का होना संभव नहीं और पतंजलि योग दर्शन के बिना सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना भी संभव नहीं।

सांख्य सिद्धांत देता है कि प्रकृति और पुरुष संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति है। प्रकृति त्रिगुणी ,सनातन,प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व है और पुरुष निर्गुणी,सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व है। प्रकृति - पुरुष संयोग के फलस्वरूप 23 त्रिगुणी तत्त्वों की निष्पति होती है जिसमें बुद्धि,अहंकार और 5 तन्मात्र कारण एवं कार्य दोनों तत्त्व हैं, 11 इंद्रियां एवं 5 तन्मात्र केवल कार्य तत्त्व हैं। जो तत्त्व किसी और तत्त्व की उत्पत्ति करता है , उसे कारण कहते हैं और उत्पन्न होनेवाला तत्व उस कारण तत्त्वंका कार्य तत्त्व होता है। प्रकृति कारण तत्त्व है लेकिन पुरुष न कारण तत्त्व है और न ही कार्य तत्त्व है । 

ऊपर व्यक्त सांख्य तत्त्वज्ञान सार की अनुभूति के लिए पतंजलि योगसूत्र दर्शन देते हैं जो समाधि ,साधन,विभूति और कैवल्य पादों में विभक्त है । समाधिपाद में महर्षि पतंजलि समाधि के प्रति जिज्ञासा उठते हैं क्योंकि समाधि सिद्धि से स्वबोध रूप में प्रकृति - पुरुष का तत्त्व से बोध होता है। समाधि प्राप्ति के लिए साधनपाद में अष्टांगयोग के 8 अंगों में से प्रारंभिक 5 अंगों - यम , नियम , आसान , प्राणायाम और प्रत्याहार को स्पष्ट करते हैं । इन अंगों को बहुत अंग कहते हैं। अपने तीसरे विभूतिपाद के प्रारंभ में अष्टांगयोग के शेष तीन अंगों - धारणा , ध्यान और समाधि को स्पष्ट करते हैं । इन्हीं अंगोंको आंतरिक अंग कहते हैं। विभूतिपाद में आगे यह भी कहते हैं कि अष्टांगयोग सिद्धि से सिद्धियां मिलती हैं जो योगाभ्यास को खंडित कर सकती हैं अतः इनके सम्मोहन में न आ कर , निरंतर योगाभ्यास करते रहना चाहिए । इस प्रकार निरंतर धारणा , ध्यान और समाधि के अभ्यास से धर्ममेघ समाधि मिलती है जो कैवल्य जा द्वार खोलती है। कैवल्य प्राप्ति के आवागमन चक्र के मुक्ति मिल जाती है ।

अब ध्यान की विशेष यात्रा पर निकलते हैं। ध्यान मैंनोरवेश करने के पहले अष्टांगयोग के आखिरी चरण आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को भी समझ लेना चाहिए क्योंकि इनकी सिद्धि के साथ ध्यान में प्रवेश मिलता है।

पतंजलि कहते हैं , “ स्थिर सुखं आसनम् " - साधनपाद सूत्र - 46 । शरीर के जिस मुद्रा में स्थित होने से स्थित दुख मिलता हो , उस मुद्रा को आसान कहते हैं। स्थिर सुख क्या है ? जब देश - काल से अछूता रहना , स्थित सुख की स्थित होती है। आगे पतंजलि प्राणायाम को परिभाषित निम्न प्रकार करते हैं।

“तस्मिन् सति श्वास प्रश्वास गति विच्छेद प्राणायाम”

 ~ साधनपाद सूत्र : 49 । आसन की सिद्धि में स्वास एवं प्रश्वास का स्वयं रुक जाना, प्राणायाम है । अब पतंजलि प्रत्याहार की परिभाषा को भी देखें , “स्व विषय असंप्रयोगे चित्त स्वरूप अनुकार इव इन्द्रियाणाम् प्रत्याहार: “ ~ साधनपाद सूत्र : 54 । जब इंद्रियां अपने - अपने विषयों के प्रति आकर्षित न रहकर चित्त मुखी हो जाती है तब उस अवस्था को प्रत्याहार कहते हैं । आसन एवं प्राणायाम सिद्धि मिलने पर इंद्रियां विषय मुखी न  रह कर चित्त मुखी हो जाती हैं अर्थात इंद्रियों का रुख उल्टा हो जाता है जिसे कबीर दास कहते हैं कि अपनें पुतलियों को उल्टा कर दो । आसन ,प्राणायाम और प्रत्याहार की सिद्धि मिल जाने पर चित्त राजस एवं तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त हो कर सात्त्विक गुण की वृत्तियों से परिपूर्ण रहने लगता है और तब धारणा , ध्यान और समाधि किंयोग साधना - यात्रा प्रारंभ होती है।

धारणा (विभूति पाद सूत्र : 1 )

<> देश बंध: चित्तस्य , धारणा <>

किसी सात्त्विक आलंबन से चित्त को बाध कर रखने का अभ्यास , धारणा है ।

ध्यान (विभूति पाद सूत्र : 2 )

<> तत्र , प्रत्यय , एकतानता , ध्यानम् <>

धारणा का लंबे समय तक बने रहना , ध्यान कहलाता है ।

समाधि  (विभूति पाद सूत्र : 3 )

<> तत् एव अर्थ मात्र निर्भासं स्वरुपशून्यम् इव समाधि < >

ध्यान में जब आलंबन का स्वरूप क्रमशः सूक्ष्म होते - होते लगभग शून्य हो जाता है और केवल अर्थ मात्र निर्भासित रहता है , तब इस अस्वस्थ को संप्रज्ञात या सविकल्प समाधि कहते हैं । 

धारणा , ध्यान और समाधि जब एक साथ घटित होने लगे तो उस अवस्था को संयम कहते हैं। संयम सिद्धि से सिद्धियां मिलती हैं जो योग को उच्च भूमियों में पहुंचने में अवरोध पैदा करती हैं अतः सिद्धियों से सावधान रहना चाहिए।  

अब ध्यान संबंधित कुछ और बातों को भी समझते हैं।

महर्षि पतंजलि साधनपाद  सूत्र : 11 में कहते हैं, 

ध्यान हेयात् तत् वृत्तयः अर्थात ध्यान से क्लेशों की वृत्तियों का क्षय होता है । अब यहां इस सूत्र के संदर्भ में समझना होगा कि क्लेश क्या हैं ? क्लेश के लिए पतंजलि साधनपाद सूत्र > 3 - 14 ,25 को देखना होगा जिनका सार निम्न प्रकार है ….

अविद्या ,अस्मिता , राग - द्वेष और अभिनिवेष , ये 05 क्लेश हैं ( साधनपाद -  3 )। 

अविद्या शेष चार क्लेशों की जननी है।

 सत् को असत् और असत् को सत् समझना अविद्या है।  

मैं और मेरा का अहं भाव , अस्मिता है । इंद्रिय सुख की लालसा , राग है । भोग के कड़वे अनुभव से द्वेष की ऊर्जा बनती है। मृत्यु भय को अभिनिवेश कहते हैं ।

पांच क्लेश मानसिक और आध्यात्मिक बाधाओं की उत्पत्ति के कारण हैं । क्लेश, कर्माशय ( चित्त ) की मूल हैं

 (साधनपाद सूत्र - 12) । क्लेश  त्रिगुणी बंधन तत्त्व हैं जो शुद्ध निर्गुणी चेतन पुरुष को त्रिगुणी जड़ प्रकृति से जुड़ने के बाद उसे अपने मूल स्वरूप में तबतक नहीं लौटने देते जबतक उसे कैवल्य नहीं मिल जाता । क्लेश दुखों की जननी हैं। जबतक क्लेष निर्मूल नही होते , आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती (साधनपाद सूत्र - 13) ।

~~ ॐ ~~