उपासना क्या है ?
' सत्गुरु की संगति ,उपासना है, संगति करता,उपासक होता है और सत्गुरु उस उपासना का उपास्य होता है । उपासक के अंदर बह रही सत् ऊर्जा की आवृत्ति जब सत्गुरु के अंदर बह रही सत् ऊर्जा की आवृत्ति के बराबर हो जाती है तब उस अवधि में वह साधक अपने साध्य (सत्गुरु ) में लीन हो गया होता है जिसे पतंजलि संप्रज्ञात समाधि कहते हैं। समाधि टूटते ही उपासक की स्थिति कस्तूरी मृग जैसी हो जाती है '
स्थाई रूप से उपासक,उपासना और उपास्य का एक हो जाना ही कैवल्य है। उपासना एक यात्रा है जिसका यात्री उपासक होता है और उसकी यात्रा का लक्ष्य उपास्य कहलाता है। उपासक , उपासना और उपास्य को जुड़े रहने की ऊर्जा का श्रोत सत्पुरुष या सत्गुरु होते हैं। सत् पुरुष को अपनी अनुभूति को यथार्थ रूपेण व्यक्त करने के लिए शब्दों का निर्माण भी करना पड़ता है। सत्पुरुष वे हैं जिनका ज्ञान अनंत और ज्ञेय शून्य होता है । वे त्रिगुणी प्रकृति ( माया ) के दृष्टा होते हैं और त्रिकाल दर्शी होते हैं।
सत् पुरुषों के मुख से निकले शब्द,मायामोहित व्यक्तियों के कानों को स्पर्श करते ही अपनी निर्मलता खो देते हैं;उनमें वह ऊर्जा नहीं रह पाती जो ऊर्जा उनमें उस समय हुआ करती है जब वे सत्पुरुष द्वारा बोले गए थे। उपासना शब्द भी किसी सत्पुरुष निर्मित शब्द है। संभवतः यह शब्द उपनिषद् के ऋषियों में से किसी एक के द्वारा निर्मित हो।
सत्पुरुष के समीप बैठ कर उन की वाणी या कृत्य पर पूरी श्रद्धा और समर्पण भाव में अपने मन को केंद्रित बनाए रखना, उपासना है।
आसन से उपासन (उप+आसन) ,उपासन से उपासना और उपासना से उपास्य है। यहां आसन प्रमुख शब्द है जिससे उपासना, उपासक और उपास्य की निष्पति होती है अतः पहले आसन शब्द को समझना चाहिए।
महर्षि पतंजलि अपनें योगसूत्र दर्शन के साधनपाद सूत्र - 46 में आसन शब्द को परिभाषित करते हुए कहते हैं …
'स्थिर सुखम् आसनम् '
' जिस शारीरिक अवस्था में तन - मन को स्थिर सुख मिले , उसे योग में आसन कहते हैं '
महर्षि पतंजलि अष्टांगयोग के 08 अंगों में तीसरा अंग आसान है ⤵️
ऊपर व्यक्त पतंजलि अष्टांगयोग में प्रथम 05 बाह्य अंग और धारणा , ध्यान एवं संप्रज्ञात समाधि को अंत:अंग कहते हैं। आसन की सिद्धि मिलने के साथ अष्टांगयोग के चौथे अंग प्राणायाम में प्रवेश मिलता है और इस क्रम से अष्टांगयोग साधना की यात्रा यम से प्रारंभ हो कर संप्रज्ञात समाधि तक पहुंचती है। संप्रज्ञात समाधि को सविकल्प या साकार समाधि भी कहते है जो किसी सात्त्विक आलंबन केंद्रित होती है। निरंतर बिना किसी रुकावट अष्टांगयोग अभ्यास करते रहने वाले उपासक के अंदर धारणा , ध्यान और समाधि का एक साथ घटित होने शुरू हो हो जाता है जो एक शुभ लक्षण है और इसे पतंजलि संयम (देखे विभूतिपाद सूत्र : 04> त्रयं एकत्र संयम:) कहते हैं।
संयम सिद्धि से सिद्धियां (देखें पतंजलि विभूतिपाद सूत्र 16- 49) मिलती हैं। सिद्धियां योग साधना में रुकावट पैदा करती हैं और साधना को खंडित भी कर देती हैं अतः सिद्धियों से अप्रभावित रहते हुए साधना निरंतर करते रहना चाहिए। सिद्धियां से अप्रभावित रहने वाला योगी को आगे निर्विकल्प या असंप्रज्ञात समाधि मिलती है। असंप्रज्ञात समाधि प्राप्त योगी निरंतर साधना में डूबे रहते हुए धर्ममेघ समाधि में पहुंच कर कैवल्य प्राप्त करता है। त्रिगुणों का प्रतिप्रसव हो जाना अर्थात मायसमुक्त हो जाना तथा पुरुषार्थ का शून्य हो जाना , कैवल्य है। अब लौटते हैं , अपनें मूल विषय उपासना पर।
प्रारंभ में दी गई एक फोटो को देखिए जिसमें दो हैं ; एक कुछ ऊंचाई पर स्थित सत्पुरुष हैं , दूसरा उनके सामने कुछ नीचे उप आसान पर बैठा शिष्य है और तीसरी ऊर्जा की किरणे हैं जो सत्पुरुषकी ओर से शिष्य पर पड़ती दिख रही हैं। यहां उपासक सत्पुरुष के ज्ञान ऊर्जा की तरंगों को ग्रहण कर रहा है। इस ग्रहण करने को उपासना कहते है। निरंतर इस प्रकार उपासना करते रहने से वह उपासक स्वयं सत्पुरुष बन जाता है। उपासना में उपास्य वह प्रत्यक्ष ज्ञान है जिससे प्रकृति - पुरुष या माया - ब्रह्म एवं इन दोनों के संयोग के रहस्य से पर्दा उठ जाता है। ऐसे ज्ञानी ब्रह्मवित् कहलाते हैं जिन्हें यहां सत्पुरुष शब्द से अभी तक संबोधित किया जा रहा था।
यह उपासना की परंपरा , उपनिषद् युग की परम्परा है।
~~~ॐ~~~