दशोपनिषद् से 10 मूल मंत्र
आदि शंकराचार्य के प्रिय 10 निम्न उपनिषदों के 1460 मंत्रों में से यहां 10 ऐसे मंत्रों से परिचय कराया जा रहा है जिनका सीधा संबंध ब्रह्म और ब्रह्म की अनुभूति से है।
दशोपनिषद् (दस प्रमुख उपनिषद्, जिन पर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा) के ऐसे मूल मंत्र या मंत्रांश नीचे दिए जा रहे हैं जो ईश्वर की सर्वव्यापकता,आत्मा-ब्रह्म की एकता तथा ज्ञान के सूक्ष्म अवधारणा से संबंद्धित हैं। आइए ! इन मूल मंत्रों की ऊर्जा में डूबते हैं ..
1.ऐतरेयोपनिषद् ( ऋग्वेद )
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 33
प्रस्तुत मूल मंत्र: 1.1.1
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ।
नान्यत् किञ्चन मिषत् ।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥
आरंभ में केवल एक ही आत्मा था , इसके अतिरिक्त और कुछ न था । उसने सोचा — “मैं लोकों की सृष्टि करूँ।”
मंत्र का सार : ब्रह्मांड की सभी सूचनाओं का कारण ,आत्मा है।
2.केनोपनिषद् (सामवेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 35
प्रस्तुत मूल मंत्र : खण्ड 1, मंत्र 5
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
जिसे मन से मनन नहीं किया जा सकता, जिसकी शक्ति से मन को विचार प्राप्त होता है — उसी को ब्रह्म जानो। ब्रह्म वह नहीं जिसकी लोग (सगुण रूपों की) उपासना करते हैं।
मंत्र का सार : ब्रह्म मन-इन्द्रियों के अधीन नहीं उनका अधिष्ठाता (enabler) है और वह निर्गुण - निराकार है।
3.छांदोग्योपनिषद् : (सामवेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 627
यहां इस उपनिषद् के दो परम मंत्रों को लिया जा रहा है …
1.प्रस्तुत पहला मूल मंत्र
(6.8.7: उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद)
तत् त्वम् असि
वह (ब्रह्म) तू ही है ।
मंत्र का सार : माया - ब्रह्म संयोग से हम सब हैं। माया मोहित , ब्रह्म की अनुभूति नहीं कर सकता।
2.प्रस्तुत दूसरा मूल मंत्र
तृतीय अध्याय (प्रपाठक 3),खंड - 14 का पहला मंत्र (3.14.1)
सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथा-क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति । स क्रतुं कुर्वीत ॥
सब कुछ निश्चय ब्रह्म ही है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)।
यह जगत् ब्रह्म से उत्पन्न है, ब्रह्म में स्थित है और ब्रह्म में ही लीन हो जाता है (तज्जलान्) — इस प्रकार शान्त भाव से इसकी उपासना करनी चाहिए।
मनुष्य की इच्छा (क्रतु) जैसी होती है, इस लोक में वह वैसा ही बन जाता है, और मृत्यु के बाद भी वैसा ही होता है इसलिए मनुष्य को शुभ संकल्प (क्रतु) करना चाहिए।
(ऊपर व्यक्त 04 मंत्रों का सार
“ आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं और ब्रह्म से ब्रह्म में ब्रह्मांड एवं उसकी सभी सूचनाएं हैं)
4.बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 434
प्रस्तुत मूल मंत्र :1.4.10
अहं ब्रह्मास्मि
मैं ब्रह्म हूँ ।
यह उपनिषद् ऋषि याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद पर आधारित है। इसमें भी अन्य उपनिषदों की भांति नेति-नेति ( नहीं , नहीं) आधार पर जीव - ब्रह्म एकत्व का गहरा ज्ञान उपलब्ध है।
मंत्र का सार : यहां मैं शब्द का संबंध उस सनातन , निर्गुण सर्व व्याप्त ऊर्जा से है जिससे और जिसमें ब्रह्मांड की सभी सूचनाएं आ - जा रही हैं।
5.ईशावास्योपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 18
प्रस्तुत मूल मंत्र : शुक्ल यजुर्वेद : 40.1
ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥1।।
आदिशंकराचार्य इस मंत्र को सार्वभौम उपदेश रूप में देखते हैं।
इस संसार में जो कुछ भी चल-अचल है, वह सब ईश्वर (ईश) से व्याप्त है इसलिए उन्हें अपना न समझते हुए त्याग की भावना से भोग करो, किसी के धन प्राप्ति की लालसा मत करो।
मंत्र का भावार्थ : इस मंत्र से प्रवृत्ति परक कर्म और निवृत्ति परक कर्म के संबंध की ओर संकेत किया गया है । इस मंत्र के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक: 18.49 , 18.50 को देखिए …
“आसक्ति मुक्त जो कर्म होता हैं उससे नैष्कर्म्य की सिद्धि मिलती है जो ज्ञानयोग की परा निष्ठा है “ और ज्ञानयोग में ब्रह्म से एकत्व स्थापित होता है।
मंत्र सार : प्रवृत्ति परक कर्म में जब आसक्ति अनुपस्थित होती है तब वह कर्म निवृत्ति परक हों जाता है और निवृत्ति परक कर्म ही कर्मयोग है जो ज्ञानयोग में पहुंचाता है। ज्ञानयोग सिद्धि ब्रह्मवित् बनाती है।
6.कठोपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या: लगभग 119
प्रस्तुत मूल मंत्र 2.3.17 : द्वितीय अध्याय, तृतीय वल्ली (उपसंहार और महावाक्य)
मंत्र 17
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम् ॥
यह आत्मा प्रवचन, बुद्धि या बहुत श्रवण से नहीं मिलता। जिस पर आत्मा स्वयं कृपा करता है ,उसी को वह अपना स्वरूप प्रकट करता है।
मंत्र सार :आत्मज्ञान ईश्वर कृपा और शुद्ध अन्तःकरण पर निर्भर है, न कि केवल बौद्धिक प्रयास पर।
7.तैत्तिरीयोपनिषद् (कृष्ण यजुर्वेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : 50
मूल मंत्र : 2.1.1
ब्रह्मानन्दवल्ली का मंत्र
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म
सत्य, ज्ञान और अनन्त , ब्रह्म है।
मंत्र का सार : इस मंत्र का संबंध पंच कोष (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय) साधना से है जहां ब्रह्म की अनुभूति इन पञ्च कोषों की साधना से होती है। इस मंत्र माध्यम से उपनिषद् के ऋषि ब्रह्म की ओर इशारा करते हुए कह रहे हैं – ब्रह्म सत्य है , शुद्ध ज्ञान का श्रोत है और शुद्ध आनंद की अनुभूति है।
8.प्रश्नोपनिषद् (अथर्ववेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या : लगभग 67
मंत्र : पञ्चम प्रश्न
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं
भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव
यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥
1-‘ॐ’ - एक अक्षर ही समस्त विश्व है।
2- भूत, भविष्य और वर्तमान — सब ॐकार ही हैं।
3- ॐ तीन कालों से परे है अर्थात समयाधीन नहीं है।
मंत्र का सार : यह मंत्र ॐ को परब्रह्म का सीधा संबोधन बताता है। प्रश्नोपनिषद में कुल 06 प्रश्न हैं जिनमें पञ्चम प्रश्न में ऋषि पिप्पलाद कहते हैं ,ॐ ही अपर ब्रह्म और पर ब्रह्म दोनों है। पूर्ण ॐ की उपासना से मनुष्य परम ब्रह्म को प्राप्त करता है। परमपद ही अपर ब्रह्म है।
9.मुण्डकोपनिषद् (अथर्ववेद)
उपनिषद् मंत्र संख्या : लगभग 65
यह मंत्र वेदांत दर्शन में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है , क्यों ?
इस प्रश्न का उत्तर मंत्र व्याख्या के अंत में देखें ..
सर्वश्रेष्ठ मंत्र में उतरने से पूर्व अथर्ववेद के वेदांगों को देख लेना चाहिए। अथर्ववेद में शौनकीय +पैप्पलद , दो संहिताएं हैं , 01 गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थ है , आरण्यक ग्रन्थ कोई नहीं हैं। इस वेद की कुल 31 उपनिषद् बताएं जाते हैं जिनमें से प्रश्न , मुण्डक , मांडुक्य दशोपनिषद् में हैं। नीचे दिया जा रहा मंत्र मुण्डक उपनिषद् के तृतीय मुण्डक, द्वितीय खण्ड का 9वाँ मंत्र है .
मंत्र
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥
जो इस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है (ब्रह्मैव भवति)। उसके कुल में कोई भी अब्रह्मविद् (ब्रह्म को न जानने वाला) नहीं जन्म लेता। ब्रह्म ज्ञानी शोक मुक्त हो जाता है और पुण्य-पाप बंधन से भी मुक्त हो जाता है। हृदय की गुफा में स्थित अज्ञान की ग्रंथि (कर्म-वासना की गाँठ) से मुक्त होकर अमर (मुक्त) हो जाता है।
यह मंत्र सर्वश्रेष्ठ माना जाता है , क्यों ?
यह अद्वैत वेदांत का चरम सिद्धांत व्यक्त करता है: ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति — ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही बन जाता है (क्योंकि आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं)।
आदि शंकराचार्य के भाष्य में इसे बहुत महत्व दिया गया है। वे कहते हैं कि ज्ञान से सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं और साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। यह उपनिषद् का उपसंहारात्मक मंत्र है।
यहां ज्ञान को यथार्थ रूप को समझना भी आवश्यक है। श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक : 13.2 ने प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं : क्षेत्रक्षेत्रज्ञयो: , ज्ञानं अर्थात प्रकृति - पुरुष या कहे , माया - ब्रह्म की यथार्थ रूप में देखना ,ज्ञान है। ज्ञान दो प्रकार का है ; परोक्ष और प्रत्यक्ष ज्ञान। जो किसी माध्यम से मिलता है अर्थात जो ज्ञान उधार का होता है उसे परोक्ष ज्ञान कहते हैं। जो ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है,उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं। साधना प्रारंभ के लिए परोक्ष ज्ञान सीढ़ी का कार्य कर सकता है और प्रत्यक्ष ज्ञान के करीब पहुंचा सकता है लेकिन अंततः गुणातीत अवस्था में कर्म बंधन मुक्त रहते हुए जो अनुभव मिलता है , वही प्रत्यक्ष ज्ञान होता है।
10.माण्डूक्योपनिषद् (अथर्ववेद)
उपनिषद् में मंत्रों की संख्या लगभग 12
मंत्र 1.2
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।
यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥
‘ॐ’ यह अक्षर ही समस्त विश्व है। भूत, भविष्य, वर्तमान — सब ॐकार है। तीन कालों से परे भी ॐ ही है।
शिक्षा : ॐ ब्रह्म का संबोधन है
ऊपर क्रम संख्या : 6 - 10 के मंत्रों का सार
आत्मा की अनुभूति स्वप्रयासों से नहीं , प्रभु कृपा।से मिलती है ।
सत्य , ज्ञान और अनंत , ब्रह्म है । ॐ ब्रह्म का संबोधन है।ब्रह्मवित स्वयं ब्रह्म होता है।
~~ ॐ ~~