सांख्ययोग - पतंजलियोगसूत्र में…
चित्त क्या है?
मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) , शुद्ध चेतन , निर्गुणी पुरुष संयोग के फलस्वरूप विकृत प्रकृति से बुद्धि , बुद्धि से अहंकार और सात्त्विक अहंकार से मन की उत्पत्ति है। बुद्धि,अहंकार और मन के समूह को अंतःकरण या चित्त कहते हैं। के तीन करण भूतकाल , वर्तमान काल एवं भविष्य काल के विषयों को जानते हैं।
मन,बुद्धि और अहंकार परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय से अपनीं - अपनीं वृत्तियों को जानते हैं( कारिका 31) ।
बुद्धि का कार्य सही निर्णय लेना, अहंकार का कार्य अभिमान और मन का कार्य संकल्प-विकल्प है।
प्रकृति का कार्य , चित्त है अतः यह भी त्रिगुणी एवं जड़ है । जड़ होने के कारण यह स्वयं को भी नहीं जानता लेकिन पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में यह एवं शेष प्रकृति के 20 तत्त्व
(10 इंद्रियां + 05 तन्मात्र एवं 05 महाभूत) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं। इनमें 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं जो केवल वर्तमान विषयों को समझते हैं। त्रिगुणी , जड़ एवं प्रसवधर्मी सनातन प्रकृति के ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों से नाना प्रकार की सृष्टियों की उत्पत्ति हुई है जिसमें मनुष्य भी है।
प्रकृति - पुरुष संयोग क्यों होता है ?
सांख्य कारिका - 21
पुरुषस्य दर्शनार्थ कैवल्य अर्थ तथा प्रधानस्य ।
पड्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ।।
पुरुष , प्रकृति दर्शनार्थ प्रकृति से जुड़ता है और प्रकृति , पुरुष - कैवल्यार्थ पुरुष से जुड़ती हैं ।
पुरुष - प्रकृति संयोग ऐसे होता है जैसे एक पंगु (लंगड़े ) और एक अंधे का संयोग होता है । यहां पंगु पुरुष है और प्रकृति अंधी है ।
पुरुष शुद्ध चेतन एवं निर्गुणी है,उसे त्रिगुणी पदार्थों के भोग और भोग से मिलने वाले सुख - दुख का अनुभव नहीं। इस अनुभव के लिए वह प्रकृति से जुड़ता है।
त्रिगुणी पदार्थों के भोग तथा भोग के फल स्वरूप मिलने वाले सुख - दुःख के गहरे अनुभव के बाद पुरुष को वैराग्य हो जाता हैं। वैराग्य में उसे स्व बोध होता है। स्व बोध से वह अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है । इस अवस्थामें पुरुष का प्रकृति से कोई प्रयोजन नहीं रहता। पुरुष की यही अवस्था कैवल्य है।पुरुष कैवल्य के साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है।
देह में चित्त केंद्रित पुरुष , संसार को वैसा देखता है जैसा संसार का प्रतिबिंब चित्त पर बनता है अर्थात पुरुष वस्तुओं को चित्त के अनुसार देखता है।
स्थूल देह में चित्त केंद्रित चेतन पुरुष स्वयं को चित्त समझने लगता है और त्रिगुणी पदार्थों का भोक्ता होता है। पुरुष को संसार के अनुभव प्राप्त करने में प्रकृति अपने 23 तत्त्वों से सहयोग करती है। जबतक पुरुष का प्रयोजन पूरा नहीं होता , प्रकृति आवागमन करती रहती है। यह आवागमन लिंग या सूक्ष्म शरीर के माध्यम से होता है। प्रकृति के ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों में से 18 तत्त्वों ( बुद्धि, अहंकार, मन,10 इंद्रियां , 05 तन्मात्र ) को लिंग शरीर कहते हैं।
देह में स्थित पुरुष के पुरुषार्थ का शून्य हो जाना , तीन गुणों का प्रतिप्रसव हो जाना , कैवल्य है।
चित्त से भोग ,योग , वैराग्य और कैवल्य मिलता है ।
सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है और पतंजलियोग सूत्र सांख्य के सिद्धांतों की अनुभूति करने की योग विधियों का आविष्कार करता है।
अब चित को पतंजलि योगसूत्र के कुछ सूत्रों के आधार पर समझते हैं ।
महर्षि पतंजलि अपनें पतंजलियोगसूत्र दर्शन के पहले पाद समाधिपाद के प्रारंभ में कहते हैं - योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (पतंजलि योगसूत्र समाधिपाद सूत्र - 2) अर्थात चित्त वृत्ति निरोध , योग है । महर्षि आगे इसी पाद के सूत्र 3+4 के माध्यम से कहते हैं - अपने वृत्तियों के प्रभाव में चित्त वृत्ति स्वरूप होता है {वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र (समाधिपाद सूत्र - 4)} और जब वृत्तियां शांत हो जाती है तब वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है {भतदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् (समाधिपाद सूत्र - 3)}। अब महर्षि अपनें समाधिपाद सूत्र - 12 में कह रहे हैं -
अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध: अर्थात अभ्यास वैराग्यबस चित्त वृत्ति निरोध होता है।
अब प्रश्न उठ सकता है कि चित्त की वृत्तियां वाक्य है ?
चित्त के दो धर्म हैं - व्युत्थान , निरोध (विभूतिपाद सूत्र - 9 )।
व्युत्थान का अर्थ है , बदलते रहना ;कभी ऊपर तो कभी नीचे अर्थात कभी उच्च भूमियों में आर्निकभी नीचे उतरकर नीचे की भूमियों में आ जाना । निरोध का अर्थ है , वृत्तियों का शांत हो जाना। ऊपर बताया गया है कि चित्त वृत्ति निरोध अवस्था में चित केंद्रित पुरुष अपने मूल स्वरूप में होता है और योग लक्ष्य भी यहीं है। महर्षि इसी सूत्र में चित्त के निम्न 3 परिणाम भी बताते हैं।
अभ्यास वैराग्य से चित्त वृत्ति निरोध होता है (समाधिपाद सूत्र - 12),
योगाभ्यास किसी सात्त्विक आलंबन आधारित होता है। सात्त्विक आलंबन पर चित्त एकाग्रता की जब सिद्धि मिल जाती है तब चित्त राजस - तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त रहने हुए केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों वाला बन जाता है। चित्त की इस अवस्था में केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों का आवागमन बना रहता है। निरंतर अभ्यास में संप्रज्ञात समाधि भी लग जाया करती है जिसे सविकल्प या साकार समाधि भी कहते हैं।
चित्तबकी वृत्तियों के संबंध में समाधिपाद सूत्र : 5- 11 को समझना चाहिए। सूत्रों का सार निम्न प्रकार है …
चित्त की 05 वृत्तियां ⤵️
1- प्रमाण वृत्ति
यह तीन प्रकार की होती है ; प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम ( शब्द और आप्त वचन भी कहते हैं )।
पांच ज्ञान इंद्रियों से बिषय बोध का होना , चित्त की प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति कहलाती है । अनुमान प्रमाण वृत्ति में बिषय अनुपस्थित रहता है लेकिन उससे सम्बन्धित चिन्हों से उसे जानते हैं जैसे दूर कहीं धुआं देख कर वहां अग्नि होने का अनुमान लगाना । आगम प्रमाण वृत्ति को आप्त वचन और शब्द भी कहते हैं । प्रमाणित संदर्भों के पढ़ने से जो वृत्ति उत्पन्न होती है , उसे आगम वृत्ति कहते हैं।
2- विपर्यय वृत्ति
विपर्यय का अर्थ है अज्ञान या अविद्या । जो बिषय जैसा है , उसे वैसा न समझ कर उसके विपरीत समझना , विपर्यय है अर्थात सत् को असत् और असत् को सत् समझना,विपर्यय है। अविद्या या अज्ञान, विपर्यय की जननी है।
3- विकल्प वृत्ति
विकल्प के संबंध में समाधि पाद सूत्र : 09 को देखें -
शब्द ज्ञान अनुपाती वस्तु शून्यो विकल्प:
अर्थात वस्तु की अनुपस्थित में उस बिषय के सम्बन्ध में शब्द ज्ञान के आधार पर सोचने से चित्त में विकल्प वृत्ति पैदा होती है । देवता , भूत - प्रेत आदि के सम्बन्ध में जानना मात्र शब्द - ज्ञानसे संभव है । शब्द ज्ञान वह ज्ञान है जो शास्त्र आदि सर्वमान्य ग्रंथों से प्राप्त होता है ।
4- निद्रा वृत्ति
अभाव प्रत्यय आलंबना वृत्ति : निद्रा
निद्रा में बिषय आलंबन का अभाव होता है । कभीं - कभीं हम जब सो कर उठते हैं तब कहते हैं कि आज बहुत प्यारी नींद आयी , समय का पता तक न चला अर्थात उस नींद में भी चित्त की कोई वृत्ति सक्रिय थी जो मीठी नींद की स्मृति को जगने के बाद प्रकट कर रही होती है , वही चित्त की निद्रा वृत्ति है ।
5- स्मृति वृत्ति
पूर्व विषय - अनुभव का समय पर चित्त पटल पर प्रगट हो जाना , स्मृति है ।
चित्त जड़ है अतः उसे न तो स्वयं का ज्ञान होता है और न दूसरों का लेकिन पुरुष ज्ञानवान् है । चित्त स्मृतियों में पुरुष के साक्षित्वमें विषय धारण करता है (कैवल्य पाद सूत्र : 19 +20) ।
चित्तानुसार वस्तु दिखती है (कैवल्य पाद सूत्र -17)।
कर्माशय (चित्त ) में संस्कार संचित रहते हैं (साधनपाद सूत्र - 12)। संस्कार क्या है ?
कर्मों के फलों के सूक्ष्म बीज , संस्कार कहलाते हैं । ध्यानसे निर्मित चित्त संस्कार मुक्त होता है (तत्र ध्यानजम् अनाशयम् - कैवल्यपाद सूत्र - 6 ) ।
अस्मिता से निर्मित चित्त , निर्माण चित्त कहलाता है
(निर्माण चित्तान्यस्मिता मात्रात् ~ कैवल्यपाद सूत्र - 4)
ऊपर सांख्य दर्शन और पतंजलियोगसूत्र दर्शन के माध्यम से व्यक्त चित्त के स्वरूप का सार
विकृत प्रकृति के बुद्धि , अहंकार और मन तत्त्वों के समूह को चित्त कहते हैं। चित्त त्रिगुणी एवं जड़ है। पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में यह चेतन जैसा दिखता है। चित्त में केंद्रित पुरुष, संसार को चित्त से देखता है। चित्त के दो धर्म है – व्युत्थान और निरोध। व्युत्थान धर्म से निरोध धर्म में चित्त को स्थिर बनाए रखने के उपाय , पतंजलि योगसूत्र बताया है। चित्त को कर्माशय भी कहते हैं क्योंकि संस्कार चित्त में संचित रहते हैं। चित्त से भोग, योग और कैवल्य की प्राप्ति होती है।
चित्त के तीन तत्त्व – बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण कहते हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं। चित्त वृत्ति निरोध , अभ्यास वैराग्य से होता है। परा वैराग्यवस्था में कैवल्य मिलता है।
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