Tuesday, October 27, 2026

सांख्य दर्शन और पतंजलियोगसूत्र दर्शन में चित्त का स्वरूप


सांख्ययोग - पतंजलियोगसूत्र में…

 चित्त क्या है?

मूल प्रकृति ( तीन गुणों की साम्यावस्था ) , शुद्ध चेतन , निर्गुणी पुरुष संयोग के फलस्वरूप विकृत प्रकृति से बुद्धि , बुद्धि से अहंकार और सात्त्विक अहंकार से मन की उत्पत्ति है। बुद्धि,अहंकार और मन के समूह को अंतःकरण या चित्त कहते हैं। के तीन करण भूतकाल , वर्तमान काल एवं भविष्य काल के विषयों को जानते हैं। 

मन,बुद्धि और अहंकार परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय से अपनीं - अपनीं वृत्तियों को जानते हैं( कारिका 31) । 

बुद्धि का कार्य सही निर्णय लेना, अहंकार का कार्य अभिमान और मन का कार्य संकल्प-विकल्प है।

प्रकृति का कार्य , चित्त है अतः यह भी त्रिगुणी एवं जड़ है । जड़ होने के कारण यह स्वयं को भी नहीं जानता लेकिन पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में यह एवं शेष प्रकृति के 20 तत्त्व 

(10 इंद्रियां + 05 तन्मात्र एवं 05 महाभूत) भी त्रिगुणी एवं जड़ हैं। इनमें 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं जो केवल वर्तमान विषयों को समझते हैं। त्रिगुणी , जड़ एवं प्रसवधर्मी सनातन प्रकृति के ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों से नाना प्रकार की सृष्टियों की उत्पत्ति हुई है जिसमें मनुष्य भी है।

प्रकृति - पुरुष संयोग क्यों होता है ?

सांख्य कारिका - 21

पुरुषस्य दर्शनार्थ कैवल्य अर्थ तथा प्रधानस्य ।

पड्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्ग: ।।

पुरुष , प्रकृति दर्शनार्थ प्रकृति से जुड़ता है और प्रकृति , पुरुष - कैवल्यार्थ पुरुष से जुड़ती हैं ।

 पुरुष - प्रकृति संयोग ऐसे होता है जैसे एक पंगु (लंगड़े ) और एक अंधे का संयोग होता है । यहां पंगु पुरुष है और प्रकृति अंधी है । 

पुरुष शुद्ध चेतन एवं निर्गुणी है,उसे त्रिगुणी पदार्थों के भोग और भोग से मिलने वाले सुख - दुख का अनुभव नहीं। इस अनुभव के लिए वह प्रकृति से जुड़ता है।

त्रिगुणी पदार्थों के भोग तथा भोग के फल स्वरूप मिलने वाले सुख - दुःख के गहरे अनुभव के बाद पुरुष को वैराग्य हो जाता हैं। वैराग्य में उसे स्व बोध होता है। स्व बोध से वह अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है । इस अवस्थामें पुरुष का प्रकृति से कोई प्रयोजन नहीं रहता। पुरुष की यही अवस्था कैवल्य है।पुरुष कैवल्य के साथ प्रकृति के 23 तत्त्व अपनें - अपनें कारणों में लीन हो जाते हैं और अंततः बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है।

देह में चित्त केंद्रित पुरुष , संसार को वैसा देखता है जैसा संसार का प्रतिबिंब चित्त पर बनता है अर्थात पुरुष वस्तुओं को चित्त के अनुसार देखता है। 

स्थूल देह में चित्त केंद्रित चेतन पुरुष स्वयं को चित्त समझने लगता है और त्रिगुणी पदार्थों का भोक्ता होता है। पुरुष को संसार के अनुभव प्राप्त करने में प्रकृति  अपने 23 तत्त्वों से सहयोग करती है। जबतक पुरुष का प्रयोजन पूरा नहीं होता , प्रकृति आवागमन करती रहती है। यह आवागमन लिंग या सूक्ष्म शरीर के माध्यम से होता है। प्रकृति के ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों में से 18 तत्त्वों ( बुद्धि, अहंकार, मन,10 इंद्रियां , 05 तन्मात्र ) को लिंग शरीर कहते हैं। 

देह में स्थित पुरुष के  पुरुषार्थ का शून्य हो जाना , तीन गुणों का प्रतिप्रसव हो जाना , कैवल्य है। 

चित्त से भोग ,योग , वैराग्य और कैवल्य मिलता है । 

सांख्य दर्शन सिद्धांत देता है और पतंजलियोग सूत्र सांख्य के सिद्धांतों की अनुभूति करने की  योग विधियों का आविष्कार करता है। 

अब चित को पतंजलि योगसूत्र के कुछ सूत्रों के आधार पर समझते हैं ।

महर्षि पतंजलि अपनें पतंजलियोगसूत्र दर्शन के पहले पाद समाधिपाद के प्रारंभ में कहते हैं - योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (पतंजलि योगसूत्र समाधिपाद सूत्र - 2) अर्थात चित्त वृत्ति निरोध , योग है । महर्षि आगे इसी पाद के सूत्र 3+4 के माध्यम से कहते हैं - अपने वृत्तियों के प्रभाव में चित्त वृत्ति स्वरूप होता है {वृत्ति सारूप्यम् इतरत्र (समाधिपाद सूत्र - 4)}  और जब वृत्तियां शांत हो जाती है तब वह अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है {भतदा + द्रष्टु : स्वरुप : अवस्थानम् (समाधिपाद सूत्र - 3)}। अब महर्षि अपनें समाधिपाद सूत्र - 12 में कह रहे हैं - 

अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध: अर्थात अभ्यास वैराग्यबस चित्त वृत्ति निरोध होता है।

अब प्रश्न उठ सकता है कि चित्त की वृत्तियां वाक्य है ?

चित्त के दो धर्म हैं - व्युत्थान , निरोध (विभूतिपाद सूत्र - 9 )।

व्युत्थान का अर्थ है , बदलते रहना ;कभी ऊपर तो कभी नीचे अर्थात कभी उच्च भूमियों में आर्निकभी नीचे उतरकर नीचे की भूमियों में आ जाना । निरोध का अर्थ है , वृत्तियों का शांत हो जाना। ऊपर बताया गया है कि चित्त वृत्ति निरोध अवस्था में चित केंद्रित पुरुष अपने मूल स्वरूप में होता है और योग लक्ष्य भी यहीं है। महर्षि इसी सूत्र में चित्त के निम्न 3 परिणाम भी बताते हैं।

अभ्यास वैराग्य से चित्त वृत्ति निरोध होता है (समाधिपाद सूत्र - 12),

योगाभ्यास किसी सात्त्विक आलंबन आधारित होता है। सात्त्विक आलंबन पर चित्त एकाग्रता की जब सिद्धि मिल जाती है तब चित्त राजस - तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त रहने हुए केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों वाला बन जाता है। चित्त की इस अवस्था में केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों का आवागमन बना रहता है। निरंतर अभ्यास में संप्रज्ञात समाधि भी लग जाया करती है जिसे सविकल्प या साकार समाधि भी कहते हैं।

चित्तबकी वृत्तियों के संबंध में समाधिपाद सूत्र : 5- 11 को समझना चाहिए। सूत्रों का सार निम्न प्रकार है …

 चित्त की 05 वृत्तियां ⤵️ 

1- प्रमाण वृत्ति

यह तीन प्रकार की होती है ; प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम ( शब्द और आप्त वचन भी कहते हैं )।

पांच ज्ञान इंद्रियों से बिषय बोध का होना , चित्त की  प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति कहलाती है । अनुमान प्रमाण वृत्ति में बिषय अनुपस्थित रहता है लेकिन उससे सम्बन्धित चिन्हों से उसे जानते हैं  जैसे दूर कहीं धुआं देख कर वहां अग्नि होने का अनुमान लगाना  । आगम प्रमाण वृत्ति को आप्त वचन और शब्द भी कहते हैं । प्रमाणित संदर्भों के पढ़ने से जो वृत्ति उत्पन्न होती है , उसे आगम वृत्ति कहते हैं।


2- विपर्यय वृत्ति 

विपर्यय का अर्थ है अज्ञान या अविद्या । जो बिषय जैसा है , उसे वैसा न समझ कर उसके विपरीत समझना , विपर्यय है अर्थात सत् को असत् और असत् को सत् समझना,विपर्यय है। अविद्या या अज्ञान, विपर्यय की जननी है।


3- विकल्प वृत्ति 

विकल्प के संबंध में समाधि पाद सूत्र : 09 को देखें - 

शब्द ज्ञान अनुपाती वस्तु शून्यो विकल्प: 

अर्थात  वस्तु की अनुपस्थित में  उस बिषय के सम्बन्ध में शब्द ज्ञान के आधार पर सोचने से चित्त में विकल्प वृत्ति पैदा होती है । देवता , भूत - प्रेत आदि के सम्बन्ध में जानना मात्र शब्द -  ज्ञानसे संभव है । शब्द ज्ञान वह ज्ञान है जो शास्त्र आदि सर्वमान्य ग्रंथों से प्राप्त होता है ।

 

4- निद्रा वृत्ति

अभाव प्रत्यय आलंबना वृत्ति : निद्रा 

निद्रा में बिषय आलंबन का अभाव होता है । कभीं - कभीं हम जब सो कर उठते हैं तब कहते हैं कि आज बहुत प्यारी नींद आयी , समय का पता तक न चला अर्थात उस नींद में भी चित्त की कोई वृत्ति सक्रिय थी जो मीठी नींद की स्मृति को जगने के बाद प्रकट कर रही होती है , वही चित्त की निद्रा वृत्ति है ।


5- स्मृति वृत्ति

पूर्व विषय - अनुभव का समय पर चित्त पटल पर प्रगट हो जाना , स्मृति है । 

चित्त जड़ है अतः उसे न तो स्वयं का ज्ञान होता है और न दूसरों का लेकिन पुरुष ज्ञानवान् है ।  चित्त स्मृतियों में पुरुष के साक्षित्वमें विषय धारण करता है (कैवल्य पाद सूत्र : 19 +20) । 

चित्तानुसार वस्तु दिखती  है (कैवल्य पाद सूत्र -17)। 

कर्माशय (चित्त ) में संस्कार संचित रहते हैं (साधनपाद सूत्र - 12)। संस्कार क्या है ?

कर्मों के फलों के सूक्ष्म बीज , संस्कार कहलाते हैं । ध्यानसे निर्मित चित्त संस्कार मुक्त होता है (तत्र ध्यानजम् अनाशयम् - कैवल्यपाद सूत्र - 6 ) । 

अस्मिता से निर्मित चित्त , निर्माण चित्त कहलाता है 

(निर्माण चित्तान्यस्मिता मात्रात् ~ कैवल्यपाद सूत्र - 4)


ऊपर सांख्य दर्शन और पतंजलियोगसूत्र दर्शन के माध्यम से व्यक्त  चित्त के स्वरूप का सार 


विकृत प्रकृति के बुद्धि , अहंकार और मन तत्त्वों के समूह को चित्त कहते हैं। चित्त त्रिगुणी एवं जड़ है। पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में यह चेतन जैसा दिखता है। चित्त में केंद्रित पुरुष, संसार को  चित्त से देखता है। चित्त के दो धर्म है – व्युत्थान और निरोध। व्युत्थान धर्म से निरोध धर्म में चित्त को स्थिर बनाए रखने के उपाय , पतंजलि योगसूत्र बताया है। चित्त को कर्माशय भी कहते हैं क्योंकि संस्कार चित्त में संचित रहते हैं। चित्त से भोग, योग और कैवल्य की प्राप्ति होती है।

चित्त के तीन तत्त्व – बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण कहते हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं। चित्त वृत्ति निरोध , अभ्यास वैराग्य से होता है। परा वैराग्यवस्था में कैवल्य मिलता है।

~~ ॐ ~~


Tuesday, October 13, 2026

उपासना रहस्य

उपासना क्या है ?

' सत्गुरु की संगति ,उपासना है, संगति करता,उपासक होता है और सत्गुरु उस उपासना का उपास्य होता है । उपासक के अंदर बह रही सत् ऊर्जा की आवृत्ति जब सत्गुरु के अंदर बह रही सत् ऊर्जा की आवृत्ति के बराबर हो जाती है तब उस अवधि में वह साधक अपने साध्य (सत्गुरु ) में लीन हो गया होता है जिसे पतंजलि संप्रज्ञात समाधि कहते हैं। समाधि टूटते ही उपासक की स्थिति कस्तूरी मृग जैसी हो जाती है ' 

स्थाई रूप से उपासक,उपासना और उपास्य का एक हो जाना ही कैवल्य है। उपासना एक यात्रा है जिसका यात्री उपासक होता है और उसकी यात्रा का लक्ष्य उपास्य कहलाता है। उपासक , उपासना और उपास्य को जुड़े रहने की ऊर्जा का श्रोत सत्पुरुष या सत्गुरु होते हैं। सत् पुरुष को अपनी अनुभूति को यथार्थ रूपेण व्यक्त करने के लिए शब्दों का निर्माण भी करना पड़ता है। सत्पुरुष वे हैं जिनका ज्ञान अनंत और ज्ञेय शून्य होता है । वे त्रिगुणी प्रकृति ( माया ) के दृष्टा होते हैं और त्रिकाल दर्शी होते हैं। 

सत् पुरुषों के मुख से निकले शब्द,मायामोहित व्यक्तियों के कानों को स्पर्श करते ही अपनी निर्मलता खो देते हैं;उनमें वह ऊर्जा नहीं रह पाती जो ऊर्जा उनमें उस समय हुआ करती है जब वे सत्पुरुष द्वारा बोले गए थे। उपासना शब्द भी किसी सत्पुरुष निर्मित शब्द है। संभवतः यह शब्द उपनिषद् के ऋषियों में से किसी एक के द्वारा निर्मित हो।

सत्पुरुष के समीप बैठ कर उन की वाणी या कृत्य पर पूरी श्रद्धा और समर्पण भाव में अपने मन को केंद्रित बनाए रखना, उपासना है।

 आसन से उपासन (उप+आसन) ,उपासन से उपासना और उपासना से उपास्य है। यहां आसन प्रमुख शब्द है जिससे उपासना, उपासक और उपास्य की निष्पति होती है अतः पहले आसन शब्द को समझना चाहिए।

महर्षि पतंजलि अपनें योगसूत्र दर्शन के साधनपाद सूत्र - 46 में आसन शब्द को परिभाषित करते हुए कहते हैं …

'स्थिर सुखम् आसनम् ' 

' जिस शारीरिक अवस्था में तन - मन को स्थिर सुख मिले , उसे योग में आसन कहते हैं ' 

महर्षि पतंजलि अष्टांगयोग के 08 अंगों में तीसरा अंग आसान है ⤵️

ऊपर व्यक्त पतंजलि अष्टांगयोग में प्रथम 05 बाह्य अंग और धारणा , ध्यान एवं संप्रज्ञात समाधि को अंत:अंग कहते हैं। आसन की सिद्धि मिलने के साथ अष्टांगयोग के चौथे अंग प्राणायाम में प्रवेश मिलता है और इस क्रम से अष्टांगयोग साधना की यात्रा यम से प्रारंभ हो कर संप्रज्ञात समाधि तक पहुंचती है। संप्रज्ञात समाधि को सविकल्प या साकार समाधि भी कहते है जो किसी सात्त्विक आलंबन केंद्रित होती है। निरंतर बिना किसी रुकावट अष्टांगयोग अभ्यास करते रहने वाले उपासक के अंदर धारणा , ध्यान और समाधि का एक साथ घटित होने शुरू हो हो जाता है जो एक शुभ लक्षण है और इसे पतंजलि संयम (देखे विभूतिपाद सूत्र : 04> त्रयं एकत्र संयम:) कहते हैं।

संयम सिद्धि से सिद्धियां (देखें पतंजलि विभूतिपाद सूत्र 16- 49) मिलती हैं। सिद्धियां योग साधना में रुकावट पैदा करती हैं और साधना को खंडित भी कर देती हैं अतः सिद्धियों से अप्रभावित रहते हुए साधना निरंतर करते रहना चाहिए। सिद्धियां से अप्रभावित रहने वाला योगी को आगे निर्विकल्प या असंप्रज्ञात समाधि मिलती है। असंप्रज्ञात समाधि प्राप्त योगी निरंतर साधना में डूबे रहते हुए धर्ममेघ समाधि में पहुंच कर कैवल्य प्राप्त करता है। त्रिगुणों का प्रतिप्रसव हो जाना अर्थात मायसमुक्त हो जाना तथा पुरुषार्थ का शून्य हो जाना , कैवल्य है। अब लौटते हैं , अपनें मूल विषय उपासना पर। 

प्रारंभ में दी गई एक फोटो को देखिए जिसमें दो हैं ; एक कुछ ऊंचाई पर स्थित सत्पुरुष हैं , दूसरा उनके सामने कुछ नीचे उप आसान पर बैठा शिष्य है और तीसरी ऊर्जा की किरणे हैं जो सत्पुरुषकी ओर से शिष्य पर पड़ती दिख रही हैं। यहां उपासक सत्पुरुष के ज्ञान ऊर्जा की तरंगों को ग्रहण कर रहा है। इस ग्रहण करने को उपासना कहते है। निरंतर इस प्रकार उपासना करते रहने से वह उपासक स्वयं सत्पुरुष बन जाता है। उपासना में उपास्य वह प्रत्यक्ष ज्ञान है जिससे प्रकृति - पुरुष या माया - ब्रह्म एवं इन दोनों के संयोग के रहस्य से पर्दा उठ जाता है। ऐसे ज्ञानी ब्रह्मवित् कहलाते हैं जिन्हें यहां सत्पुरुष शब्द से अभी तक संबोधित किया जा रहा था।

 यह उपासना की परंपरा , उपनिषद् युग की परम्परा है। 

~~~ॐ~~~


Tuesday, October 6, 2026

कोशिकाओं में न्यूक्लियस रहस्य


परमाणु और कोशिकाओं में स्थित न्यूक्लियस रहस्य


परमाणु संरचना में न्यूक्लियस होने की खोज Sir Rutherford द्वारा सन् 1911 में की गई। ठीक 20 साल बाद सन् 1831में वनस्पति विज्ञान के रॉबर्ट ब्राउन की खोज से स्पष्ट हुआ कि cells में भी न्यूक्लियस होते हैं। सन् 1802 में बाउर ने सूक्ष्मदर्शी से ऑर्किड की कोशिकाओं का अवलोकन करते हुए सेल्स में एक अपारदर्शी क्षेत्र देखा था पर इस क्षेत्र का नामकरण नहीं किए थे और इसके बारे में और कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को भी नहीं स्पष्ट किए थे 

 एटम के न्यूक्लियस खोज के अगले 20 साल तक किसी वनस्पति या जीव वैज्ञानिक के अंदर cells में न्यूक्लियस की खोज की जिज्ञासा का न उठना , कुछ अलग सा नहीं दिखता! 

क्या आप जानते हैं कि आपकी परिपक्व लाल रक्त कोशिकाएँ (Mature Red Blood Cells) में न्यूक्लियस नहीं होता ताकि हीमोग्लोबिन के लिए अधिक जगह बने। ठीक इसी तरह उच्च पौधों की परिपक्व छलनी नलिकाएँ (Sieve Tube Elements) भी अपना न्यूक्लियस खो देती हैं।

~~~°°°~~~

Monday, August 10, 2026

गंगोत्री से ऊपर के तीर्थों की तीर्थ यात्रा सार

गंगोत्री से ऊपर स्थित तीर्थों की तीर्थ यात्रा 


हरिद्वार के लगभग 200 km उत्तरकाशी है और उत्तर काशी से लगभग 100 km पर गंगोत्री तीर्थ है। यहां तक कि तीर्थ यात्रा वाहन से की जाती है। गंगोत्री के ऊपर स्थित कठिन चढ़ाई वाले तीर्थ निम्न हैं..

<> गंगोत्री से 15- 18 km पर भोजवासा है जहां रात्रि विश्राम किया जाता है ⛺⛺। यहां से निम्न दो तीर्थ यात्राएं होती हैं।

1- गौमुख , तपोवन , नंदनवन और वासुकी ताल । यह यात्रा लगभग 16-20 km की पैदल 👣 यात्रा है जिसमें तपोवन विश्राम ⛺⛺ किया जाता है। तपोवन से शिवलिंग पर्वत का दर्शन होता है। शिवलिंग पर्वत से आकाश गंगा ( शिव गंगा ) निकलती हैं जो गौमुख ग्लेशियर में लुप्त हो कर भागीरथी से मिलती हैं।

2- भोजवासा से दूसरी अति कठिन लगभग 11- 14 km केदार ताल की तीर्थ यात्रा है। इस यात्रा में केदार खड़क ⛺ विश्राम किया जाता है।केदार ताल से केदार गंगा निकलती हैं जो गंगोत्री के करीब भागीरथी में लीन होती हैं।

जब मां गंगा बुलाएं तनिक भी सोचना नहीं , निकल लेना , इस यात्रा पर । यह यात्रा आपको शिव ऊर्जा में डुबो लेगी और आप वह नहीं रह पाएंगे जो यात्रा प्रारंभ से पहले थे। ध्यान रहे , यह यात्रा किसी भोग कामना की पूर्ति का माध्यम नहीं , पूर्ण वैराग्य की यात्रा है ।

~~ हर हर महादेव ~~


Thursday, July 23, 2026

सांख्य का तत्त्व ज्ञान


सांख्य दर्शन मीमांसा 

सांख्य दर्शन में लिंग - अलिंग तत्त्व ⤵️ 

लिंग अर्थात जिनकी पहचान संभव हो और जिनका लय होता हो , जो समयाधीन हों। अलिंग , जो सनातन हैं जिनके ऊपर समय का कोई प्रभाव नहीं होता और जिसकी सीधे पहचान करना संभव नहीं लेकिन उसके होने का आभास होता रहता है। विकृत प्रकृति के सभी 23 तत्त्व लिंग तत्त्व हैं और विकृत होने से पूर्व की प्रकृति अर्थात मूल प्रकृति अलिंग है। 

सांख्य दर्शन में 25 तत्त्व हैं >  पुरुष,प्रकृति, महत् या बुद्धि,अहंकार(सात्त्विक,राजस,तामस),मन,10इंद्रियां, पञ्च तन्मात्र और पञ्च महाभूत। इन तत्त्वों में मूल प्रकृतिअलिंग तत्त्व हैं जो सनातन हैं। तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। मूल प्रकृति प्रसवधर्मी, त्रिगुणी,जड़ और सनातन है तथा अति सूक्ष्म तत्त्व है। पुरुष निर्गुणी , सनातन , अति सूक्ष्म और शुद्ध चेतन है। पुरुष को तत्त्व नहीं माना जाता , यह लिंग - अलिंग से परे माना गया है ।

सांख्य के 25 तत्त्वों की गणित निम्न प्रकार है…

1- मूल प्रकृति + पुरुष ~> महत् या बुद्धि ~>सात्त्विक अहंकार ~> 11 इंद्रियां और ….

2- तामस अहंकार ~> 05 तन्मात्र , इनसे ~> 05 महाभूत और..

3- राजस अहंकार से किसी भी तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती। यह सात्त्विक और तामस अहंकारों की मदद करता रहता है।

4- मूल प्रकृति , पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में विकृत हो जाती है और महत् ( बुद्धि ) तत्त्व की निष्पति होती है। आगे की घटनाओं को ऊपर क्रम संख्या 1, 2 और 3 में पहले बताया जा चुका है 

5- विकृत प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व होते हैं।

6- ये 23 तत्त्व लिंग तत्त्व हैं। इनमें 16 तत्त्व (11 इंद्रियां + 05 महाभूत ) कार्य हैं और शेष 07 ( बुद्धि +अहंकार + पञ्च तन्मात्र ) कारण एवं कार्य तत्त्व हैं। बुद्धि , अहंकार +मन+10 इंद्रियों को करण भी कहते हैं। करण अर्थात करनेवाला ।

7- ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों पञ्च महाभूतों को छोड़ शेष 18 तत्त्वों के समूह को लिंग शरीर या सुक्ष्म शरीर कहते हैं।

8- कैवल्य प्राप्त करने से पहले जब किसी की मृत्यु होती है तब यही लिंग शरीर पञ्च महाभूतों से निर्मित स्थूल देह को त्याग कर किसी नए शरीर को धारण करने के लिए भ्रमण करता रहता है। 

9- प्रकृति , अपने में स्थित पुरुष को मोक्ष दिलाने हेतु तबतक आवागमन में रहती है जबतक पुरुष अपने मूल स्वरूप में नहीं आ जाता । तीन गुणों का प्रतिप्रसव होना तथा पुरुष का अपने मूल स्वरूप में स्थित होना ही तो कैवल्य है।

10- जब प्रकृति , पुरुष संयोग होता है तब प्रकृति के प्रारंभिक 03 तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) जिनके समूह को चित्त कहते हैं । पुरुष चित्त केंद्रीय होतेभी चित्त  स्वरूपाकार बन जाता है और  त्रिगुणी भोगों का अनुभव प्राप्त करता है। जब भोग से उसे वैराग्य हो जाता है , तब वह प्रकृति से अलग हो कर अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसके फलस्वरूप सभी प्रकृति के 23 तत्त्वों का अपने - अपने कारण तत्त्वों में लय हो जाता है और अंततः बुद्धि मूल प्रकृति में लीन हो जाती है अर्थात विकृत प्रकृति भी अपने मूल स्वरूप अर्थात तीन गुणों की साम्यावस्था में आ जाती है। यही है , सांख्य की मूल मीमांसा।

~~सांख्य दर्शन 01~~

Wednesday, June 3, 2026

जैन और पतंजलियोग दर्शनों में महाव्रत की अवधारणा

पतंजलि योग दर्शन और जैन दर्शन में महाव्रत क्या है ?

1- जैन दर्शन में महाव्रत

 जैन दर्शन में अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को व्रत कहा गया है।

1.अहिंसा > तन , मन एवं वाणी  से किसी को कष्ट न पहुँचाना।

2.सत्य > जो जैसा है , उसे ठीक उसी तरह देखना और समझना । सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना।

3.अस्तेय > चोरी न करने के भाव का न उठना।

4.ब्रह्मचर्य > 11 इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण का होना ।

5 अपरिग्रह > संग्रह की सोच  का न उठना ।

गृहस्थों के लिए अणु व्रत और मुनियों के लिए महाव्रत है। गृहस्थ को अपने दैनिक जीवन में पञ्च व्रतों के पालन करने का अभ्यास करते रहना चाहिए। जब यह अभ्यास स्वभाव में रूपांतरित हो जाता है और जीवन के हर कृत्य में इनकी झलक दिखने लगती है तब यही पञ्च अणु व्रत महाव्रत बन जाते हैं और गृहस्थ मुनि बन जाता है। गृहस्थ माया का गुलाम होता है और मुनि माया का दृष्टा। गृहस्थ के कर्म , कर्म बंधनों आश्रित होते हैं और मुनि के कर्म कर्म बंधन मुक्त होते हैं। आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , आलस्य एवं अहंकार , कर्म बंधन हैं ।

 2- पतंजलियोगसूत्र दर्शन में महाव्रत  

पतंजलियोग दर्शन में अष्टांगयोग साधना से क्लेशों का नाश होता है जो कर्माशय के मूल हैं । जबतक क्लेश हैं , मनुष्य को आवागमन से मुक्ति नहीं मिलती। मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति से आवागमन से मोक्ष मिलता है और स्किबोरॉटिबकस उपाय निम्न अष्टांगयोग अंगों की साधना है।


पतंजलि योग सूत्र दर्शन में अष्टांगयोग के निम्न 23 सूत्र हैं।

1.साधनपाद सूत्र : 30 , 32 , 35 - 46 , 49 - 54 

2.विभूतिपाद के सूत्र : 1 - 3 

ऊपर स्लाइड में अष्टांगयोग अंगों में पहला अंग यम है। जिसे

साधनपाद : 30 , 31 , 35-39 में स्पष्ट किया गया है।

साधनपाद सूत्र 30 में यम के 5 अंगों को निम्न प्रकार बताया गया है …

अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह

इन्हीं यम के 5 तत्त्वों को जैन दर्शन में पञ्च व्रतों के रूप में बताया गया हैं , जिनके बारे में पहले बताया जा चुका है। महर्षि पतंजलि अष्टांगयोग के यम के 5 तत्त्वों को परिभाषित करने से पहले साधनपाद सूत्र : 31 में इन्हीं यम के 5 तत्त्वों को महाव्रत कहते हैं जन ये अभ्यास योग माध्यम से स्वभाव बन जाते हैं। पतंजलि का महाव्रत और जैन दर्शन का महाव्रत में कोई भिन्नता नहीं।

अब साधनपाद सूत्र : 31 को देखते हैं…

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ 

~ पतंजलि स्क्षनपाद सूत्र : 31~

सूत्र के शब्दों का अर्थ

जाति > जन्म/वर्ण/वर्ग

देश > स्थान

 काल > समय (परिस्थिति/अवसर)

  अनवच्छिन्न > अप्रभावित/सीमारहित

 सार्वभौम > सार्वभौमिक/सभी के लिए

महाव्रत > महा +व्रत (व्रतों में श्रेष्ठ, महान)

सूत्र भावार्थ

 अभ्यासयोग माध्यम से यम के 5 तत्त्वों (अहिंसा,सत्य, अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह) की साधना सिद्धि के फलस्वरूप जब ये पञ्च  तत्व साधक के स्वभाव का अंश बन जाते हैं तब जाति, देश और काल से अप्रभावित रहते हुए  ये महाव्रत बन जाते हैं। 

व्रत और महाव्रत के भेद को एक बार पुनः समझ लेते हैं ….

जबतक यम के पञ्च तत्त्वों का अभ्यास किया जाता रहता है और ये तत्त्व साधक के जीवन के आधार नहीं बन गए होते तबतक इन्हें व्रत कहा जाता है और इसके विपरीत जब ये साधक की ऊर्जा बन जाते हैं तब बिना साधना भी उस साधक के दैनिक कृत्यों में इनकी झलक दिखती रहती है , तब यही पञ्च तत्व या व्रत महाव्रत संज्ञा से संबोधित किए जाते हैं।

जैन दर्शन और पतंजलियोग दर्शन दोनों दर्शनों में महाव्रत की एक ही अवधारणा है।

 ~~ ॐ ~~

Saturday, May 30, 2026

भारतीय दर्शन दुःख मुक्ति के उपाय बताते हैं

प्रमुख भारतीय दर्शनों का केंद्र दुःख है

निम्न टेबल में बौद्ध दर्शन , सांख्य दर्शन , पतंजलि योग दर्शन , जैन दर्शन और अद्वैत वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा दर्शन)एन उपलब्ध दुःख के विज्ञान को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। यदि आप इन 05 दर्शनों के दुखी विज्ञान को ध्यान से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि अज्ञान (अविद्या) दुःख की जननी है।


क्र सं 

दर्शन

मूल सिद्धांत

01

बौद्ध 

चार आर्य सत्य (Four Noble Truths) ⤵️

 1.संसार में दुख है

2. दुःख के कारण हैं

3.दुख के निवारण है

4. दुःख निवारण के मार्ग हैं 

दुःख निवारण का मार्ग ⤵️

अष्टांग मार्ग

सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाक्य, कर्म, आजीविका, व्यायाम , स्मृति, समाधि

तीन प्रशिक्षण: प्रज्ञा , शील , समाधि

02

सांख्य


<> तीन प्रकार के दुःख हैं ⤵️

आध्यात्मिक ,आधिभौतिक , आधिदैविक 

<> दुःख मुक्ति का  उपाय : तत्त्व ज्ञान

मूल प्रकृति , इसके 23 तत्त्वों एवं पुरुष का यथार्थ बोध , तत्त्व ज्ञान है ।

03

योग दर्शन


दुख के हेतु पञ्च  क्लेश हैं ⤵️ (अविद्या,अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश )

दुःख मुक्ति के उपाय

अष्टांगयोग

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान,संप्रज्ञात समाधि।

योग सिद्धि का फल ⤵️

कैवल्य प्राप्ति 

तीन गुणों का प्रतिप्रसव होना , पुरुषार्थ का शून्य हो जाना या  चित्त केंद्रित पुरुष का अपने  मूल स्वरूप में स्थित हो जाना  , कैवल्य है। 

जबतक कैवल्य नहीं मिलता , आवागमन में रहना होगा और सुख - दुःख को भोगते रहन होगा।

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जैन


# कर्म बंधन , दुःख के हेतु हैं 

(आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य , अहंकार )

# दुख मुक्ति के उपाय 

<> त्रिरत्न की सिद्धि ⤵️

1.सम्यक दर्शन

2.सम्यक ज्ञान

3.सम्यक चरित्र

बंधनमुक्त कर्म से कैवल्य प्राप्ति । कैवल्य अर्थात आवागमन से मुक्त होना।

<> महाव्रत ⤵️  में स्थिर होना

अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह

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वेदांत

अद्वैत 

दुःख का कारण

ब्रह्म और जीव में भेद का भ्रम (अविद्या)

पूर्ण मुक्ति का उपाय (मोक्ष)

माया - ब्रह्म का यथार्थ बोध ,अविद्या से मुक्त करता है। 

ज्ञान क्या है ⬇️

(ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः)  <। <> ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति

<> अगले अंक में व्रत , अणु व्रत और महाव्रत जो समझा जायेगा <>

~~ प्रज्ञानं ब्रह्म ~~