Saturday, February 14, 2026

उपनिषद की यात्रा भाग -1

उपनिषद् वह दर्पण हैं जिसपर निर्गुण, निराकार,अव्यक्त ब्रह्म की झलक दिखती है….

भाग - 01

प्रारंभ में प्रसव नामक एक वेद था जो समयांतरमें तीन वेदों में विभक्त हो गया और समय के साथ-साथ आगे चल कर चार वेद हो गए जो वर्तमानें भी हैं। वेदों का मूल स्वरूप उनकी संहिताओं में केंद्रित है । वेद ले मूल मंत्रों के संग्रह को उस वेद की संहिता कहते हैं जो एक या एक से अधिक हो सकती है। वेदांगोंकी संख्याओं को एक तालिका में नीचे दिखाया जा रहा है …

संक्षेप में ऊपर दिखाई गए चार वेदांगों को इस प्रकार समझा  जा सकता है ⤵️


संहिता (वेद के मूल मंत्रों का संग्रह को संहिता कहते हैं )

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ब्राह्मण (संबंधित वेद आधारित वैदिक कर्म और यज्ञ की विधियाँ को स्पष्ट करने वाले ग्रन्थ को ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं)

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आरण्यक (गृहस्थ जीवन में ब्राह्मण ग्रंथों के आधार पर जीवन जीने वाले को वैराग्य की हवा लग जाती है और वह एकांकी वानप्रस्थ जीवन जीने के लिए आरण्य बासी हो जाता है जहां स्वाध्याय में डूबा हुआ परस वैराग्य की ऊर्जा में बसेरा बना कर रहता है ) 

     ↓

 उपनिषद (आरण्य एकांकी योगी को जीवात्मा और ब्रह्म के एकत्व की रह - रह कर समाधि माध्यम से मिलने लगती है। यहां इस अवस्था में उस योगी को उपनिषद् ज्ञान माध्यम से कैवल्य मुखी बने रहने में मदद मिलती रहती है।इस प्रकार उपनिषद् उसे कैवल्य / मोक्ष के द्वार को दिखाते हैं)

अब उपनिषद् ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश करते हैं ⤵️

इन 108 उपनिषदों 13 प्रमुख उपनिषद् हैं जिनको निम्न टेबल में दिखाया जा रहा है ⤵️

इन 13 प्रमुख उपनिषदों में 10 उपनिषद् ऐसे हैं जिनका सीधे संबंध अद्वैत वेदांत दर्शन से है।इन 10 उपनिषदों का भाष्य आदिशंकराचार्य जी लिखे हैं और इन्हें दशोपनिषद् कहते हैं। ऊपर टेबल में 🌹चिन्हित उपनिषद् इस श्रेणी में आते हैं जिन्हें विस्तार से नीचे दिया जा रहा है ⤵️

इन 10 उपनिषदों के मूलमंत्रों को निम्न टेबल में दिया जा रहा है। आगे चल कर इन मंत्रों पर भी चर्चा की जायेगी।

उपनिषद् 

वेद

मंत्र संख्या

मूल मंत्र / सार

ऐतरेय

ऋग्वेद

मंत्र:33 

अध्याय

03

प्रज्ञानं ब्रह्म

सृष्टि एवं आत्मा को व्यक्त किया गया है

छान्दोग्य

सामवेद

मंत्र:627 अध्याय

08

तत्त्वमसि

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

इसका उद्गीथ विद्या - उच्च स्वरों के गायन की विद्या प्रमुख है।

यह उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद आधारित है।

केन 

सामवेद

मंत्र:35

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।

 तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥

इसमें इंद्र और ब्रह्म को स्पष्ट किया गया है।

प्रश्न

अथर्ववेद

मंत्र:67

प्रश्न:6

प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्

इसमें प्राण , ओंकार और पुनर्जन्म को स्पष्ट किया गया है।

मुण्डक

अथर्ववेद

मंत्र:65

सत्यमेव जयते नानृतम्

इसमें अपरा - परा ज्ञान को स्पष्ट किया गया है।

मांडूक्य

अथर्ववेद

मंत्र:12

अयमात्मा ब्रह्म

इसमें ओम् के 04 पादों का वर्णन है ।ओंकार और तुरीय अवस्था को स्पष्ट किया गया है।इसके गौडपाद की कारिका (215श्लोक) पर  शंकराचार्य का भाष्य है।

बृहदारण्यक

शुक्ल 

यजुर्वेद

मंत्र:434 

अध्याय:6

अहं ब्रह्मास्मि

यह ऋषि याज्ञवल्क्यऔर पत्नी मैत्रेयी संवाद पर आधारित तत्त्व ज्ञान का संग्रह है।

ईशावास्य / ईश /

ईशोपनिषद्

शुक्ल

 यजुर्वेद

18

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । 

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥

यह शुक्ल यजुर्वेद का 40 वाँ  अध्याय के रूप में है।

 त्याग , ब्रह्म और ईश्वर , इसके मूल विषय हैं


कठ

कृष्ण 

यजुर्वेद

119

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । 

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥

इसके बहु प्रचलित

यम - नचिकेता संवाद के रूप में मृत्यु और आत्मा को स्पष्ट किया गया है।

तैत्तिरीय

कृष्ण

यजुर्वेद

मंत्र : 50 

 और

अनुवाक

31


सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म 

(या ब्रह्मविदाप्नोति परम्)

इस में पंचकोश सिद्धांतको स्पष्ट किया गया है। इसमें

03 वल्ली> शिक्षा, ब्रह्मानन्द और भृगु हैं।

योग >

>

>

1460 - 1470


अगले अंक में दसोपनिषद् के परम मंत्रों की यात्रा होगी

~~ ॐ ~~

Sunday, January 18, 2026

सांख्य दर्शन रहस्य भाग - 01प्रकृति -पुरुष संयोग एवं सत्कार्यवाद

सांख्य दर्शन रहस्य भाग : 01

प्रकृति - पुरुष संयोग एवं सत्कार्यवाद 

संदर्भ > कारिका : 3,22,20,11, 9+15, (06 कारिकायें)

पहले कारिकाओ को समझते है और अंत में इन 06 

कारिकाओं के सार रूप में निष्कर्ष को देखेंगे …

🌹कारिका - 3

मूल प्रकृतिर विकृत्रर्महदाद्या : प्रकृतिविकृतयः सप्त।

षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ।। 3।।

“पुरुष - प्रकाश के प्रभाव में अविकृति मूल प्रकृति (तीन गुणों की साम्यावस्था ) से  07 कार्य - कारण (बुद्धि , अहंकार , 05 तन्मात्र )  और 16 केवल कार्य  ( विकार > 11 इन्द्रियाँ + 05 महाभूत )  उत्पन्न होते हैं अर्थात विकृत प्रकृति से 23 त्रिगुणी - जड़ तत्त्वों की निष्पति होती है ।” 


🌹कारिका : 22 

प्रकृतिर्महास्ततः अहंकारस्त्माद् गुणश्च षोडशकः।

तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पंचभूतानि।।22।।

 प्रकृति - पुरुष संयोग से महत् (बुद्धि ) की उत्पत्ति होती है । महत् से अहँकार की , अहँकार से 11 इंद्रियों की एवं 05 तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है और तन्मात्रों से 05 महाभूतों की उत्पत्ति है ।

(यह कारिका , कारिका - 3 की सहयोगी कारिका है।)


🌹कारिका - 20

तस्मात् तत् संयोगात् अचेतन चेतनावत् इव  लिङ्गं

गुण कर्तृत् इव अपि तथा कर्ता इव भवत् उदासीनः ।।20।।

(उदासीन > तटस्थ रहनेवाला पुरुष)

पुरुष ऊर्जा के कारण अचेतन प्रकृति और उसके विकृत से उत्पन्न अचेतन त्रिगुणी 23 तत्त्व चेतनवत दिखने लगते हैं ।

गुण ही गुण में बरत रहे हैं , पुरुष करता नहीं है उदासीन है लेकिन करता सा भाषने लगता है ।

 💐 लिङ्ग उन्हें कहते हैं जिनका लय होता है अर्थात जो विनाशशील हैं / विकृत प्रकृति के 23 तत्त्वों को लिंग और विकृत प्रकृति की अलिंग कहते हैं। पुरुष न अलिंग है और न ही लिंग है।

 👉 उदासीन पुरुष के गुण ही कर्ता हैं पुरुष केवल कर्ता जैसा प्रतीत होता है  जैसे चोर के साथ पकड़ा गया अचोर चोर ही दिखता है वैसे कर्ता गुणों के साथ संयुक्त होने के कारण उदासीन पुरुष कर्ता की तरह भाषता है।


 🌹कारिका - 11

त्रिगुणम् अविवेकी विषयः सामान्यम्  अचेतनम् प्रसवधर्मि 

व्यक्तं तथा प्रधानम् तत् विपरीतस्तथा च पुमान् ।।11।।

यह कारिका प्रकृति और उसके विकारों (व्यक्त) की समान विशेषताओं का वर्णन करती है तथा उन्हें पुरुष से अलग करती है। प्रकृति , त्रिगुणी ,अचेतन तथा प्रसव धर्मी है। उसके 23 तत्त्व भी अचेतन एवं त्रिगुणी हैं जबकि पुरुष शुद्ध चेतना एवं निर्गुणी है। यह पुरुष-प्रकृति के द्वैत को स्पष्ट करती है, जो सांख्य का मूल सिद्धांत है।

अब कारिका : 9 एवं कारिका : 15 को एक साथ देखते हैं …

कारिका 9+15 सत्कार्यवाद 

🌹कारिका - 9

असदकरणात् उपादान ग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् ।

शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।।9।।

यह कारिका सत्कार्यवाद की स्थापना करती है, जो सांख्य दर्शन का मूल सिद्धांत है। 

सत्कार्यवाद

सत्कार्यवाद कारण और कार्य का सिद्धांत है।किसी तत्त्व से उत्पन्न होने वाला तत्त्व , उस तत्व का कार्य कहलाता है और उत्पन्न करनेवाला तत्त्व कार्य तत्त्व का कारण तत्त्व होता है ।

 कार्य (जैसे घड़ा, कपड़ा आदि) पहले से ही कारण (मिट्टी, धागे आदि) में सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है। उत्पत्ति केवल उसका व्यक्त (प्रकट) होना है, न कि सर्वथा नये का निर्माण।

 सांख्य के अनुसार प्रकृति (मूल कारण) में समस्त विश्व पहले से ही अव्यक्त रूप में मौजूद है और सृष्टि में केवल उसका परिणाम (विकृति) होता है।

कारिका - 15

भेदानां परिमाणात् समानत्वात् च भिन्नत्वात् ।

औत्पत्तिकं च कारणं कार्यस्य सत्कार्यमिति ॥ १5॥

यह कारिका सांख्य के सत्कार्यवाद को और मजबूत करती है। सत्कार्यवाद का अर्थ है कि कार्य कारण में पहले से सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है; सृष्टि में कुछ भी “नया” नहीं बनता, केवल अव्यक्त का व्यक्त होना होता है।

यह विचार असत्कार्यवाद (न्याय-वैशेषिक मत, जिसमें कार्य पहले नहीं रहता) का खंडन करता है।

यह सत्कार्यवादसिद्धांत इस दर्शन की बुनियाद है, क्योंकि इससे प्रकृति को विश्व का एकमात्र उपादान कारण मानने में सहायता मिलती है।

कार्य , कारण में पहले से ही रहता है — यह सीमित भेद, समान गुण, शक्ति के अनुसार उत्पत्ति और कारण-कार्य की एकता से सिद्ध होता है। यही सत्कार्यवाद है।

निष्कर्ष 

1- कारिका : 3 , 22 , 20 और 11 का सार देखते हैं …

प्रकृति और पुरुष , दो तत्त्वों के संयोग से 23 तत्त्वों की निष्पति होती है , जिनमें 07 कार्य -कारण तत्त्व होते हैं और 16 केवल कार्यतत्त्व होते हैं। तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति कहते हैं जो त्रिगुणी , अविवेकी ( जड़ ) , प्रसवधर्मी और सनातन तत्त्व है । मूल प्रकृति को अलिंग और अव्यक्त कहते हैं। पुरुष निर्गुणी , शुद्ध चेतन , सनातन और उदासीन है । यह न लिंग तत्त्व है और न ही अलिंग तत्त्व है। प्रकृति के 23 तत्त्व अविवेकी (जड़ ) एवं त्रिगुणी होते हैं । 

2- कारिका : 9+19 > सत्कार्यवाद

कार्य , कारण में पहले से ही रहता है — यह सीमित भेद, समान गुण, शक्ति के अनुसार उत्पत्ति और कारण-कार्य की एकता से सिद्ध होता है। 

यही सत्कार्यवाद है।यह विचार असत्कार्यवाद (न्याय-वैशेषिक मत, जिसमें कार्य पहले नहीं रहता) का खंडन करता है।

~~ सांख्य दर्शन रहस्य भाग - 01 ~~