Wednesday, June 3, 2026

जैन और पतंजलियोग दर्शनों में महाव्रत की अवधारणा

पतंजलि योग दर्शन और जैन दर्शन में महाव्रत क्या है ?

1- जैन दर्शन में महाव्रत

 जैन दर्शन में अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को व्रत कहा गया है।

1.अहिंसा > तन , मन एवं वाणी  से किसी को कष्ट न पहुँचाना।

2.सत्य > जो जैसा है , उसे ठीक उसी तरह देखना और समझना । सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना।

3.अस्तेय > चोरी न करने के भाव का न उठना।

4.ब्रह्मचर्य > 11 इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण का होना ।

5 अपरिग्रह > संग्रह की सोच  का न उठना ।

गृहस्थों के लिए अणु व्रत और मुनियों के लिए महाव्रत है। गृहस्थ को अपने दैनिक जीवन में पञ्च व्रतों के पालन करने का अभ्यास करते रहना चाहिए। जब यह अभ्यास स्वभाव में रूपांतरित हो जाता है और जीवन के हर कृत्य में इनकी झलक दिखने लगती है तब यही पञ्च अणु व्रत महाव्रत बन जाते हैं और गृहस्थ मुनि बन जाता है। गृहस्थ माया का गुलाम होता है और मुनि माया का दृष्टा। गृहस्थ के कर्म , कर्म बंधनों आश्रित होते हैं और मुनि के कर्म कर्म बंधन मुक्त होते हैं। आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , आलस्य एवं अहंकार , कर्म बंधन हैं ।

 2- पतंजलियोगसूत्र दर्शन में महाव्रत  

पतंजलियोग दर्शन में अष्टांगयोग साधना से क्लेशों का नाश होता है जो कर्माशय के मूल हैं । जबतक क्लेश हैं , मनुष्य को आवागमन से मुक्ति नहीं मिलती। मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति से आवागमन से मोक्ष मिलता है और स्किबोरॉटिबकस उपाय निम्न अष्टांगयोग अंगों की साधना है।


पतंजलि योग सूत्र दर्शन में अष्टांगयोग के निम्न 23 सूत्र हैं।

1.साधनपाद सूत्र : 30 , 32 , 35 - 46 , 49 - 54 

2.विभूतिपाद के सूत्र : 1 - 3 

ऊपर स्लाइड में अष्टांगयोग अंगों में पहला अंग यम है। जिसे

साधनपाद : 30 , 31 , 35-39 में स्पष्ट किया गया है।

साधनपाद सूत्र 30 में यम के 5 अंगों को निम्न प्रकार बताया गया है …

अहिंसा , सत्य , अस्तेय , ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह

इन्हीं यम के 5 तत्त्वों को जैन दर्शन में पञ्च व्रतों के रूप में बताया गया हैं , जिनके बारे में पहले बताया जा चुका है। महर्षि पतंजलि अष्टांगयोग के यम के 5 तत्त्वों को परिभाषित करने से पहले साधनपाद सूत्र : 31 में इन्हीं यम के 5 तत्त्वों को महाव्रत कहते हैं जन ये अभ्यास योग माध्यम से स्वभाव बन जाते हैं। पतंजलि का महाव्रत और जैन दर्शन का महाव्रत में कोई भिन्नता नहीं।

अब साधनपाद सूत्र : 31 को देखते हैं…

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ 

~ पतंजलि स्क्षनपाद सूत्र : 31~

सूत्र के शब्दों का अर्थ

जाति > जन्म/वर्ण/वर्ग

देश > स्थान

 काल > समय (परिस्थिति/अवसर)

  अनवच्छिन्न > अप्रभावित/सीमारहित

 सार्वभौम > सार्वभौमिक/सभी के लिए

महाव्रत > महा +व्रत (व्रतों में श्रेष्ठ, महान)

सूत्र भावार्थ

 अभ्यासयोग माध्यम से यम के 5 तत्त्वों (अहिंसा,सत्य, अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह) की साधना सिद्धि के फलस्वरूप जब ये पञ्च  तत्व साधक के स्वभाव का अंश बन जाते हैं तब जाति, देश और काल से अप्रभावित रहते हुए  ये महाव्रत बन जाते हैं। 

व्रत और महाव्रत के भेद को एक बार पुनः समझ लेते हैं ….

जबतक यम के पञ्च तत्त्वों का अभ्यास किया जाता रहता है और ये तत्त्व साधक के जीवन के आधार नहीं बन गए होते तबतक इन्हें व्रत कहा जाता है और इसके विपरीत जब ये साधक की ऊर्जा बन जाते हैं तब बिना साधना भी उस साधक के दैनिक कृत्यों में इनकी झलक दिखती रहती है , तब यही पञ्च तत्व या व्रत महाव्रत संज्ञा से संबोधित किए जाते हैं।

जैन दर्शन और पतंजलियोग दर्शन दोनों दर्शनों में महाव्रत की एक ही अवधारणा है।

 ~~ ॐ ~~

Saturday, May 30, 2026

भारतीय दर्शन दुःख मुक्ति के उपाय बताते हैं

प्रमुख भारतीय दर्शनों का केंद्र दुःख है

निम्न टेबल में बौद्ध दर्शन , सांख्य दर्शन , पतंजलि योग दर्शन , जैन दर्शन और अद्वैत वेदांत दर्शन (उत्तर मीमांसा दर्शन)एन उपलब्ध दुःख के विज्ञान को स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। यदि आप इन 05 दर्शनों के दुखी विज्ञान को ध्यान से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि अज्ञान (अविद्या) दुःख की जननी है।


क्र सं 

दर्शन

मूल सिद्धांत

01

बौद्ध 

चार आर्य सत्य (Four Noble Truths) ⤵️

 1.संसार में दुख है

2. दुःख के कारण हैं

3.दुख के निवारण है

4. दुःख निवारण के मार्ग हैं 

दुःख निवारण का मार्ग ⤵️

अष्टांग मार्ग

सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाक्य, कर्म, आजीविका, व्यायाम , स्मृति, समाधि

तीन प्रशिक्षण: प्रज्ञा , शील , समाधि

02

सांख्य


<> तीन प्रकार के दुःख हैं ⤵️

आध्यात्मिक ,आधिभौतिक , आधिदैविक 

<> दुःख मुक्ति का  उपाय : तत्त्व ज्ञान

मूल प्रकृति , इसके 23 तत्त्वों एवं पुरुष का यथार्थ बोध , तत्त्व ज्ञान है ।

03

योग दर्शन


दुख के हेतु पञ्च  क्लेश हैं ⤵️ (अविद्या,अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश )

दुःख मुक्ति के उपाय

अष्टांगयोग

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान,संप्रज्ञात समाधि।

योग सिद्धि का फल ⤵️

कैवल्य प्राप्ति 

तीन गुणों का प्रतिप्रसव होना , पुरुषार्थ का शून्य हो जाना या  चित्त केंद्रित पुरुष का अपने  मूल स्वरूप में स्थित हो जाना  , कैवल्य है। 

जबतक कैवल्य नहीं मिलता , आवागमन में रहना होगा और सुख - दुःख को भोगते रहन होगा।

04

जैन


# कर्म बंधन , दुःख के हेतु हैं 

(आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य , अहंकार )

# दुख मुक्ति के उपाय 

<> त्रिरत्न की सिद्धि ⤵️

1.सम्यक दर्शन

2.सम्यक ज्ञान

3.सम्यक चरित्र

बंधनमुक्त कर्म से कैवल्य प्राप्ति । कैवल्य अर्थात आवागमन से मुक्त होना।

<> महाव्रत ⤵️  में स्थिर होना

अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह

05

वेदांत

अद्वैत 

दुःख का कारण

ब्रह्म और जीव में भेद का भ्रम (अविद्या)

पूर्ण मुक्ति का उपाय (मोक्ष)

माया - ब्रह्म का यथार्थ बोध ,अविद्या से मुक्त करता है। 

ज्ञान क्या है ⬇️

(ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः)  <। <> ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति

<> अगले अंक में व्रत , अणु व्रत और महाव्रत जो समझा जायेगा <>

~~ प्रज्ञानं ब्रह्म ~~

Thursday, May 21, 2026

आचार्य ईश्वरकृष्ण संकलित सांख्य कारिका : 1 और 2 का सरल हिंदी भाषान्तर

सांख्य कारिका:1 और कारिका: 2 का सरल हिंदी भाषान्तर

तीन प्रकार के दुखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से मुक्त बने रहने की जिज्ञासा का होना स्वाभाविक है। लौकिक उपाय तो अनेक हैं लेकिन वे अपूर्ण एवं दोषयुक्त हैं।पूर्ण रूप में इन दुखों के स्थाई रूप से मुक्त बने रहने का एक मात्र उपाय व्यक्त , अव्यक्त और पुरुष बोध संबंधित तत्त्व ज्ञान ही है । तीन गुणों की साम्यावस्था को अव्यक्त , इससे उत्पन्न 23 तत्त्वों को व्यक्त कहते हैं । ये 24 तत्त्व त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं । इनके विपरीत गुणों वाला निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष होता है। अब इन कारिकाओं को समझते हैं ….

कारिका : 1 

दुःख त्रय अभिघातात् जिज्ञासा तद् अपघातके हेतौ।

दृष्टे स: अपार्था च — एकान्त अत्यंत अभावत् ।।1।।

सारांश

तीन प्रकार के हैं। इन दुखों से अछूता रहने के उपायों को जानने की जिज्ञासा का होना स्वाभाविक है। दुखों से अछूता रहने के लौकिक उपाय तो अनेक हैं लेकिन वे स्थाई मुक्ति देने में पूर्ण समर्थ नहीं। तीन प्रकार के।दुखों से स्थाई मुक्ति प्राप्त करने का केवल।एक।ही उपाय है - तत्त्व ज्ञान ( प्रकृति - पुरुष को तत्त्व से समझना )

कारिका: 01 के शब्दों का अर्थ

प्रथम पंक्ति

दुःखत्रय>तीन प्रकार के दुःख

अभिघातात्> पीड़ा होने से, आघात होने से, त्रास होने से

जिज्ञासा>जानने की इच्छा, जिज्ञासा

तद्> उस (दुःखत्रय) का

अभिघातके> निवारण करने वाले, दूर करने वाले

हेतौ> हेतु (कारण/उपाय) में

दूसरी पंक्ति:

दृष्टे> प्रत्यक्ष (देखे हुए, लोकिक) उपाय में

स:> वह (जिज्ञासा)

अपार्था> व्यर्थ, निरर्थक

चेत्> यदि

न> नहीं

एकान्तात्> एकान्त (निश्चित, स्थायी) न होने से

अत्यन्ततः>अत्यन्त (सदा के लिए) न होने से

अभावात्> अभाव होने के कारण

पूरी कारिका का हिंदी भावार्थ

तीन प्रकार के दुःखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) के आघात (पीड़ा) से उन दुःखों को दूर करने वाले उपाय को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

यदि कोई कहे कि प्रत्यक्ष (लौकिक) उपायों से ही दुःख दूर हो जाते हैं, तो वह उपाय अपूर्ण है, क्योंकि वे उपाय न तो एकान्त (निश्चित रूप से) काम करते हैं और न ही आत्यन्तिक (सदा के लिए, स्थायी) रूप से दुःखों का नाश करते हैं।

तीन प्रकार के दुःख 

आध्यात्मिक > जिस दुःख का कारण हम स्वयं  होते हैं अर्थात

शरीर और मन से होने वाला दुःख।

आधिभौतिक > अन्य प्राणियों और वस्तुओं से मिलने  वाला दुःख।

आधिदैविक > ( दैव) प्राकृतिक आपदाओं से मिलने वाला दुःख।

कारिका - 2

 द्रष्टवत् अनुश्रविक स ह्य विशुद्धि क्षय अतिशय युक्त

तत् विपरित श्रेयां व्यक्त अव्यक्तज्ञ विज्ञानात् 

कारिका के शब्दों का अर्थ 

पहली पंक्ति

दृष्टवत्> देखे हुए की तरह, प्रत्यक्ष ज्ञान की तरह

आनुश्रविकः> आनुश्रविक (श्रुति शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान )

सः> वह (आनुश्रविक अर्थात लौकिक ज्ञान)

हि> क्योंकि, निश्चय ही

अविशुद्धिः> अशुद्ध, अपवित्र, दोषयुक्त

क्षय> क्षय (नाश, घटना)

अतिशय> अतिशय (अधिकता, उत्कर्ष)

युक्तः> युक्त, सहित, जुड़ा हुआ

दूसरी पंक्ति

तद्विपरीतः> उसका विपरीत (उससे उलटा)

श्रेयान्> श्रेष्ठ, कल्याणकारी, बेहतर

व्यक्त> व्यक्त (प्रकट, विकार रूप जगत्)

अव्यक्त> अव्यक्त (मूल प्रकृति)

ज्ञ> पुरुष

विज्ञानात्> विज्ञान से (विशेष ज्ञान से)

पूरी कारिका का भावार्थ

प्रत्यक्ष और श्रुति शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान अपूर्ण एवं दोषयुक्त होते हैं। इनसे विपरीत अव्यक्त , व्यक्त एवं पुरुष  का बोध ही श्रेष्ठ एवं शुद्ध ज्ञान होता है।तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति या अव्यक्त कहते हैं। इसके 23 तत्त्वों को व्यक्त कहते हैं। ये 24 तत्त्व त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं । इनके विपरीत निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन , पुरुष है।

~~ ॐ ~~

Friday, May 8, 2026

वेद मीमांसा

हम हैं तो सनातनी लेकिन कभी सोचा कि हम वेद को कितना जानते हैं? और यदि नहीं जानते तो इनकी साधना कैसे करेंगे!

वेद ⤵️

संहिता

ब्राह्मण

आरण्यक 

उपनिषद् 

ऋग्वेद

01

02

02

10

यजुर्वेद

06

04

02

51

सामवेद

03

04

01

16

अथर्ववेद

02

01

00

31

योग >

12

11

05

108

वेद की प्रमुख संहिता को ही वह वेद कहते हैं , अलग से कोई वेद ग्रन्थ नहीं होता जैसे ऋग्वेद की एक शाकल संहिता है जिसे ऋग्वेद कहते हैं , अलग से कोई ऋग्वेद ग्रन्थ नहीं है। । संहिताएं मूल मंत्रों के संग्रह को कहते हैं। संहिता शब्द संग्रह शब्द से बना हुआ है।वेदों की प्रमुख संहिताओं को निम्न टेबल में देखें जिनसे वे वेद जाने जाते हैं ⤵️


वेद

संहिता

मंत्र सं.

प्रमुख मंत्र

ऋग्वेद 

शाकल 

लगभग 10,552 

*1.1.1 

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥

शुक्ल

यजुर्वेद

माध्यंदिन वाजसनेयी संहिता

1975

1.1

ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे

कृष्ण

यजुर्वेद

तैत्तिरीय

4,593 से 4,649

1.1

ॐ इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे ।

सामवेद

कौथुम

1,875

इनमें 1771

ऋग्वेद की हैं

1.1

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये ।

अथर्ववेद 

शौनकीय

5977

1.1.1

ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः ।वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥

चार वेद हैं और हर वेद के चार - चार अंग हैं , जैसा ऊपर स्लाइड में दिखाया गया है। हर वेद अंग के अपने - अपने विषय हैं जिन्हें ऊपर संक्षेप में देख सकते हैं। वेदांग वेद साधना के चरण हैं जिनका क्रम निम्न प्रकार है >>>

1.संहिता ( मूल मंत्रों का संग्रह ) : मूल मंत्रों के सही उच्चारण की साधना , संबंधित वेद साधना का पहला चरण है। संहिता के मंत्रों के उच्चारण की सिद्धि मिलने पर ..

2. ब्राह्मण (वैदिक कर्म और यज्ञ की विधियाँ) ग्रंथों की साधना प्रारंभ होती हैं। जब यह दूसरा चरण सिद्ध होता है तब  ..

3.तीसरे चरण आरण्यक (स्वाध्याय) की साधना प्रारंभ होती हैं। आरण्यक साधना सिद्धि मिलते ही 

4. चौथे चरण उपनिषद (तत्त्व ज्ञान से कैवल्य मुखी) साधना में प्रवेश मिल जाता है । उपनिषद् की साधना सिद्धि पर कैवल्य मिलता है। कैवल्य अर्थात पुरुषार्थ का शून्य हो जाना और त्रिगुणों का प्रतिप्रसव हो जाना । 

~~ ॐ ~~