सांख्य कारिका:1 और कारिका: 2 का सरल हिंदी भाषान्तर
तीन प्रकार के दुखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से मुक्त बने रहने की जिज्ञासा का होना स्वाभाविक है। लौकिक उपाय तो अनेक हैं लेकिन वे अपूर्ण एवं दोषयुक्त हैं।पूर्ण रूप में इन दुखों के स्थाई रूप से मुक्त बने रहने का एक मात्र उपाय व्यक्त , अव्यक्त और पुरुष बोध संबंधित तत्त्व ज्ञान ही है । तीन गुणों की साम्यावस्था को अव्यक्त , इससे उत्पन्न 23 तत्त्वों को व्यक्त कहते हैं । ये 24 तत्त्व त्रिगुणी एवं जड़ होते हैं । इनके विपरीत गुणों वाला निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन पुरुष होता है। अब इन कारिकाओं को समझते हैं ….
कारिका : 1
दुःख त्रय अभिघातात् जिज्ञासा तद् अपघातके हेतौ।
दृष्टे स: अपार्था च — एकान्त अत्यंत अभावत् ।।1।।
सारांश
तीन प्रकार के हैं। इन दुखों से अछूता रहने के उपायों को जानने की जिज्ञासा का होना स्वाभाविक है। दुखों से अछूता रहने के लौकिक उपाय तो अनेक हैं लेकिन वे स्थाई मुक्ति देने में पूर्ण समर्थ नहीं। तीन प्रकार के।दुखों से स्थाई मुक्ति प्राप्त करने का केवल।एक।ही उपाय है - तत्त्व ज्ञान ( प्रकृति - पुरुष को तत्त्व से समझना )
कारिका: 01 के शब्दों का अर्थ
प्रथम पंक्ति
दुःखत्रय>तीन प्रकार के दुःख
अभिघातात्> पीड़ा होने से, आघात होने से, त्रास होने से
जिज्ञासा>जानने की इच्छा, जिज्ञासा
तद्> उस (दुःखत्रय) का
अभिघातके> निवारण करने वाले, दूर करने वाले
हेतौ> हेतु (कारण/उपाय) में
दूसरी पंक्ति:
दृष्टे> प्रत्यक्ष (देखे हुए, लोकिक) उपाय में
स:> वह (जिज्ञासा)
अपार्था> व्यर्थ, निरर्थक
चेत्> यदि
न> नहीं
एकान्तात्> एकान्त (निश्चित, स्थायी) न होने से
अत्यन्ततः>अत्यन्त (सदा के लिए) न होने से
अभावात्> अभाव होने के कारण
पूरी कारिका का हिंदी भावार्थ
तीन प्रकार के दुःखों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) के आघात (पीड़ा) से उन दुःखों को दूर करने वाले उपाय को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।
यदि कोई कहे कि प्रत्यक्ष (लौकिक) उपायों से ही दुःख दूर हो जाते हैं, तो वह उपाय अपूर्ण है, क्योंकि वे उपाय न तो एकान्त (निश्चित रूप से) काम करते हैं और न ही आत्यन्तिक (सदा के लिए, स्थायी) रूप से दुःखों का नाश करते हैं।
तीन प्रकार के दुःख
आध्यात्मिक > जिस दुःख का कारण हम स्वयं होते हैं अर्थात
शरीर और मन से होने वाला दुःख।
आधिभौतिक > अन्य प्राणियों और वस्तुओं से मिलने वाला दुःख।
आधिदैविक > ( दैव) प्राकृतिक आपदाओं से मिलने वाला दुःख।
कारिका - 2
द्रष्टवत् अनुश्रविक स ह्य विशुद्धि क्षय अतिशय युक्त
तत् विपरित श्रेयां व्यक्त अव्यक्तज्ञ विज्ञानात्
कारिका के शब्दों का अर्थ
पहली पंक्ति
दृष्टवत्> देखे हुए की तरह, प्रत्यक्ष ज्ञान की तरह
आनुश्रविकः> आनुश्रविक (श्रुति शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान )
सः> वह (आनुश्रविक अर्थात लौकिक ज्ञान)
हि> क्योंकि, निश्चय ही
अविशुद्धिः> अशुद्ध, अपवित्र, दोषयुक्त
क्षय> क्षय (नाश, घटना)
अतिशय> अतिशय (अधिकता, उत्कर्ष)
युक्तः> युक्त, सहित, जुड़ा हुआ
दूसरी पंक्ति
तद्विपरीतः> उसका विपरीत (उससे उलटा)
श्रेयान्> श्रेष्ठ, कल्याणकारी, बेहतर
व्यक्त> व्यक्त (प्रकट, विकार रूप जगत्)
अव्यक्त> अव्यक्त (मूल प्रकृति)
ज्ञ> पुरुष
विज्ञानात्> विज्ञान से (विशेष ज्ञान से)
पूरी कारिका का भावार्थ
प्रत्यक्ष और श्रुति शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान अपूर्ण एवं दोषयुक्त होते हैं। इनसे विपरीत अव्यक्त , व्यक्त एवं पुरुष का बोध ही श्रेष्ठ एवं शुद्ध ज्ञान होता है।तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति या अव्यक्त कहते हैं। इसके 23 तत्त्वों को व्यक्त कहते हैं। ये 24 तत्त्व त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व हैं । इनके विपरीत निर्गुणी एवं शुद्ध चेतन , पुरुष है।
~~ ॐ ~~
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