Friday, March 13, 2026

गंगा दर्शन

गंगा  दर्शन 

ऋग्वेद (लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व) में सरस्वती नदी को "नदीतमा" (नदियों में श्रेष्ठ) कहा गया है, जो प्राचीन सभ्यता का केंद्र थी । लगभग 500 ईसा पूर्व - 500 ईस्वी के मध्य, पौराणिक युग में यही दर्जा गंगा को मिला हुआ हैं।

गंगा अवतरण संदर्भ में पृथ्वी सहित ऊपर के 07 लोकों की स्थिति, ध्रुव जी , 07 द्वीप और 07 सागरो की स्थिति , 07 द्वीपों में जंबू द्वीप की स्थिति और जंबू द्वीप में 09 देशों एवं 09 प्रमुख पहाड़ों की भौगोलिक स्थिति को भी समझना होगा। अतः आगे इन सभी गंगा से संबंधित संदर्भों के सार को भी स्पष्ट किया गया है।

गौमुख , तपोवन , गंगोत्री से आ रही भागीरथी और स्वर्गारोहिणी - सतो पंथ से आ रही अलकनंदा का संगम देवप्रयाग है। देवप्रयाग संगम पर ये दोनों पवित्र नदियां मिल कर गंगा बन जाती हैं। गंगा देवप्रयाग से ऋषिकेश एवं हरिद्वार होते हुए मैदानी भाग में प्रवेश करती हैं और हरिद्वार से इनकी गंगासागर की पौराणिक यात्रा आगे बढ़ती है। 

श्रीमद्भागवत पुराण स्कंध : 5 अध्याय : 16 एवं 17 गंगा रहस्य से संबंधित हैं लेकिन इन दो अध्यायों में गंगा शब्द उस नदी के लिए प्रयोग किया गया है जो ब्रह्मांड से परे से चल कर मेरु पर्वत के उच्चतम शिखर पर स्थित ब्रह्मा की सुवर्णमयी पूरी में उतरती है।यहीं पर गंगा शब्द पूरा हो जाता है और इसके आगे इस गंगा की दक्षिणी अलकनंदा धारा भारत वर्ष में पहुंचती है । इस प्रकार आज हम जिसे गंगा कहते हैं , वह श्रीमद्भागवत पुराण की अलकनंदा है। आगे चल कर इस बिष्ट पर और अधिक गंभीरता के साथ चर्चा होगी।

वैदिक युग में सरस्वती को जो धार्मिक स्थान मिला हुआ था वहीं स्थान आज  गंगा को पौराणिक युग में मिला हुआ है । गंगा नदी को परम पवित्र नदी का दर्जा मिलने के पीछे कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारक हैं, जो वैदिक काल के बाद के आखिरी समय में विकसित हुए। 

 ऋग्वेद (लगभग 1500–1000 ईसा पूर्व) में सरस्वती नदी को "नदीतमा" (नदियों में श्रेष्ठ) कहा गया है, जो प्राचीन सभ्यता की केंद्र थी। जैसे - जैसे सरस्वती लुप्त होने लगी , वैसे-वैसे वैदिक सभ्यता भी लुप्त होने लगी। वैदिक सभ्यता का सूर्यास्त और पौराणिक सभ्यता का सूर्योदय एक ही घटना के दो छोर हैं। 

 जैसे वैदिक युग में वैदिक सभ्यता के लोगों की पवित्रतम नदी सरस्वती थी ठीक उसी तरह पौराणिक युग की पवित्रतम नदी गंगा बन गई। 

जब महाभारत युद्ध की घोषणा हुई , उस समय द्वारका में बलरामजी इस घोषणा से नाखुश होने के कारण  द्वारका से तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। द्वारका से प्रभास क्षेत्र ( भगवत : 10.78) आए और सरस्वती के तट से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। प्रभास क्षेत्र पश्चिमी अरब सागर का तटीय क्षेत्र होता था जहां सरस्वती सागर में लीन होती थी। इसी क्षेत्र में यदुकुल संहार भी हुआ था। बलराम जी प्रभास क्षेत्र से सरस्वती के तटीय तीर्थों में पृथुदक, सुदर्शन , विशाल , ब्रह्मतीर्थ , चक्रतीर्थ होते हुए पूर्ववाहिनी सरस्वती के तटीय तीर्थस्थानों का सेवन करते हुए नैमिषारण्य पहुंचे। यहां से कोशिकी तथा सरयू के तटीय तीर्थो के सेवन के साथ साथ यमुना के तटीय तीर्थो का सेवन किए। 

बलराम जी की इस तीर्थ यात्रा में कहीं भी गंगा के तटीय तीर्थों का संदर्भ नहीं मिलता जबकि कोशिकी , सरयू और यमुना का संदर्भ स्पष्ट रूप से दिखता है। यह विषय शोध का विषय अवश्य है ।

विशेष ज्ञान के लिए श्रीमद्भागवत पुराण में सरस्वती से संबंधित निम्न संदर्भों को देखना चाहिए।

1.7 ,3.21,3.22,4.19,9.4,9.14,10.33,10.52,11.30

सरस्वती नदी के संबंध में ऋग्वेद में सबसे अधिक लगभग 50–80  संदर्भ मिलते हैं, यजुर्वे में सीमित संदर्भ मिलते हैं , सामवेद में बहुत कम या नगण्य संदर्भ हैं और अथर्ववेद में लगभग 35 संदर्भ मिलते हैं।  

गंगा शब्द ऋग्वेद मे 1 बार,यजुर्वेद एवं सामवेद में न के बराबर और अथर्ववेद में अस्पष्ट रूप में 2 जगह मिलता है। ऋग्वेद में यमुना का 3 बार उल्लेख अवश्य मिलता है।

वैदिक युग के बाद पौराणिक युग आया जिसमें गंगा को  वैदिक युग के सरस्वती वाला स्थान मिल गया।

 महाकाव्यों और पुराणों में गंगा की पवित्रता लगभग 500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी के बीच मानी जा सकती है।

महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में गंगा को देवी के रूप में चित्रित किया गया है । भगीरथ द्वारा गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने की कथा ("गंगावतरण") ने इसे पापमोचिनी नदी का दर्जा दिया। गंगा को शिव की जटाओं में बसने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली नदी के रूप में वर्णित किया गया।

  मत्स्य पुराण, पद्म पुराण आदि में गंगा की महिमा को विस्तार से बताया गया, जिसमें इसे "त्रिपथगा" (तीन लोकों में बहने वाली अर्थात भू:, भुवः , स्वः अर्थात पृथ्वी ,अंतरिक्ष , स्वर्गलोक ) कहा गया।

मौर्य और गुप्त साम्राज्य में  गंगा घाटी में शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय हुआ। इन शासकों ने गंगा को राजधानी और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनाया। गंगा के किनारे काशी (बनारस - वाराणसी), हरिद्वार जैसे तीर्थ स्थल विकसित हुए, जहां स्नान और अंत्येष्टि की परंपरा ने गंगा को मोक्षदायिनी बना दिया।

आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) ने चार धाम की यात्रा प्रथा को बढ़ावा दिया, जिसमें गंगा को अध्यात्मिक अक्षयता का प्रतीक माना गया। भक्ति आंदोलन(मध्यकाल) में संतों जैसे कबीर, तुलसीदास ने गंगा की महिमा को जन-जन तक पहुंचाया।

  गंगा का विशाल जलमार्ग और उपजाऊ भूमि ने इसे "जीवनदायिनी" बना दिया। इसके जल को "अमृत" समान माना जाने लगा। सदियों से चली आ रही परंपराएं, जैसे कुंभ मेला, गंगा आरती आदि ने इसकी पवित्रता को और गहरा किया।

श्रीमद्भागवत पुराण 5.16+5.17 आधारित गंगा रहस्य  ….

 श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध (अध्याय 16 और 17) में भुवनकोश और गंगामहिमा का अत्यंत गूढ़ वर्णन है जिसमें दिव्य उद्गम, चार धाराओं में विभाजन, और पृथ्वी पर आगमन को स्पष्ट करता है।
श्रीमद्भागवत पुराण ( स्कंध : 5.16 , 5.17 , 9.9)

राजा बलि प्रहलाद के पौत्र थे। नर्वदा के तट पर स्थित भृगु कच्छ

इनकी यज्ञ शाला थी । यह स्थान  संभवतः आज के माहेश्वर के समीप रहा होगा। जब भृगु कच्छ यज्ञशाला में असुरों के गुरु महर्षि शुक्राचार्य यज्ञ करा रहे थे तब बामन रूप में यज्ञ मूर्ति विष्णु ब्राह्मण रूप में वहां प्रकट होते हैं । राजा बलि ब्राह्मणों की सेवा के लिए जाने जाते थे और ब्राह्मणों को मुंह मांगा दान भी दिया करते थे। ब्राह्मण रूप में प्रभु श्री अपने आश्रम बनाने हेतु तीन कदम भूमि मांगी । राजा बलि गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी ब्राह्मण को भूमि देने को तैयार हो गए। प्रभु श्री जब भूमि मापने केबलिए अपना कदम ऊपर उठाए तब उनका पैर 07 लोकों को पार कर ब्रह्मांड के बाह्य आवरण को छू लिया। प्रभु श्रृंकर उसीकेओसीके अंगूठे के नाखून से ब्रह्मांड के आवरण में एक छिद्र बन गया जिसके फलस्वरूप उस छिद्र से एक निर्मल जल की धारा प्रवाहित हो उठी। प्रभु श्री के चरण स्पर्श करके यह धारा नीचे उतरने लगी जिसे विष्णुपादोद्भवा गङ्गा” कहा गया। यह धारा करोड़ों वर्षों के बाद ध्रुवलोक में पहुंची। आगे गंगा के मार्ग को निम्न स्लाइड में देखें ⤵️


गंगा का मार्ग (ब्रह्मांड के आवरण के छिद्र से पृथ्वी तक)

ब्रह्मांड का आखिरी आवरण के छिद्र से निकल कर गंगा निम्न लोकों से होती हुई पृथ्वी पर जंबू द्वीप के मध्य में स्थित इलावृत के केंद्र में स्थित मेरु पर्वत पर स्थित ब्रह्मा की सुवर्णमयी पूरी में पहुंचती हैं। अब 7 लोको को भी समझ समझते हैं जिनके हो कर गंगा बहती हैं …

पृथ्वी सहित ऊपर के 07 लोकों में पृथ्वी ( भू: ) को मृत्यु लोक भी कहते हैं और यह कर्म भूमि है जहां मनुष्य सहित नाना प्रकार की अन्य सृष्टियां हैं और अपनें - अपनें कर्मों के आधारित अपना - अपना जीवन जी रहे हैं । पृथ्वी के ऊपर का लोक ( भुव: )  अंतरिक्ष लोक कहलाता है को  भूत - प्रेत  लोक है  और इस लोक के ऊपर (स्वः) , स्वर्ग लोक में देवता रहते हैं । महर्लोक ( मह:) में अदृश्य रूप में साधक लोग निवास करते हैं तथा तप लोक में अदृश्य रूप में सिद्ध निवास करते हैं ।  ब्रह्मलोक ( सत्  लोक ) में निष्काम कर्म करने वाले कर्मयोगी पहुंचते हैं । ध्रुव लोक , ध्रुव जी का लोक है । 

अब  ध्रुव जी को भी समझना चाहिए …

ध्रुव जी कौन हैं ? [भागवत स्कंध - 4 आधारित ]

ध्रुव जी पहले मनु के दूसरे पुत्र उत्तान पाद के पुत्र हैं जो 36000 वर्ष राज्य करके बद्रीनाथ में निर्विकल्प समाधि माध्यम से देह त्याग कर ध्रुवलाेक के स्वामी बने हैं । 5 वर्षीय ध्रुव मथुरा में यमुना के तट पर नारद  द्वारा बताए गए पूरक , रेचक और कुंभक प्रणायामों का अभ्यास  5 दिनों तक की और सिद्धि प्राप्ति पर श्री हरि का दर्शन प्राप्त कर ध्रुव पद प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त किए । श्री हरि ध्रुव जी को वापिस घर लौट जाने को कहा । प्रभु आगे कहते हैं , ध्रुव !  तुम जीवन के अंत में बदरी बन में जाकर तप करना और वहीं से तुम अपनें ध्रुव लोक चले जाओगे   (भागवत स्कंध - 4 ) ।

अब जम्मू द्वीप को समझने के लिए  07 द्वीपों एवं 07 सागरो के भूगोल को भी समझते हैं …

ध्रुवलोक जिसे विष्णुपद भी कहते हैं से गंगा अन्य 5 लोकों से होती हुई हजारों युगों बाद पृथ्वी लोक में पहुंचती हैं । जम्बू द्वीप 07 द्वीपों में केंद्र द्वीप है । 07 द्वीप और 07 सागरो को देखें ⤵️


यहां क्षीर सागर की भौगोलिक स्थिति को भी समझें । क्षीर सागर के तट पर कृष्ण अवतार हेतु पुरुषसूक्त माध्यम से अन्य देवताओं के साथ ब्रह्मा जी प्रार्थना किए थे। क्षीर सागर मंथन की पौराणिक कथा बहु प्रचलित कथा भी है। जंबू द्वीप के मध्य स्थित मेरु पर्वत पर गंगा उतरने ही 04 धाराओं में विभक्त हो कर बहने लगती हैं। इन चार धाराओं को यहां देखें …


ऊपर 07 द्विपो और 07 सागरो को दिखाया गया है। द्वीपों में  जंबू द्वीप केंद्र है जहां हम लोग हैं। यह द्वीप बाहर से खारे पानी के सागर से घिरा हुआ है । खारे पानी के सागर के बाहर प्लक्ष द्वीप है जो ईख के रस वाले सागर से घिरा हुआ है । ईख रस वाले सागर के पार शाल्मलि द्वीप है जो चारो तरफ से मदिरा भरे सागर से घिरा हुआ है । मदिरा सागर के आगे कुश द्वीप है जो घी से भरे सागर से गिरा हुआ है । घी से भरे सागर के पार क्रौंच द्वीप है जो दूध से भरे सागर से घिरा हुआ है और इसे ही क्षीर सागर भी कहते हैं जो विष्णु भगवान , मां लक्ष्मी एवं शेष जी का निवास स्थान है । प्रभु और मां लक्ष्मी शेष नाग की शैय्या पर विराज मान हैं । कृष्ण अवतार के लिए ब्रह्मा जी अन्य देवताओं के साथ क्षीर सागर के तट पर पुरुष सूक्त से प्रभु की स्तुति करके प्रभु को प्रसन्न किए और प्रभु उन्हें बताया था कि वे , शेष जी के साथ देवकी के गर्भ से अवतरित हो कर पृथ्वी को क्लेश मुक्त कराएंगे । 

अब आगे बढ़ने से पहले बुद्धि स्तर पर सोचना होगा कि जंबू द्वीप के बाहर खारे पानी के सागर से कौंच द्वीप के  बाहर स्थित क्षीर सागर ( दूध का सागर ) के मध्य कितनी दूरी होगी ? 

क्षीर सागर अर्थात जंबू द्वीप के बाहर खारे पानी के सागर के बाद 03 सागरो एवं 04 द्वीपों के बाद क्षीर सागर आता है। 

यह सागर श्री हरि, मां लक्ष्मी एवं शेष जी का निवास है । इसी सागर का  देव - दानव मिल कर मंथन किए थे और यही वह सागर है जिसके तट पर देवासुर संग्राम भी हुआ था ।

क्षीर सागर के पार शाक द्वीप है जो मट्ठे से भरे हुए सागर से घिरा हुआ है । इस सागर के पार पुष्कर द्वीप है जो मीठे पानी के सागर से घिरा हुआ है। 

श्रीमद्भागवत पुराण: स्कंध 5, अध्याय 17 श्लोक :4- 9 में गंगा की चार धाराओं का वर्णन

श्रीमद्भागवत पुराण के स्कंध 5 के अध्याय 17 में गंगा नदी के अवतरण और उसके मेरु पर्वत पर ब्रह्मा की सुवर्ण पुरी (ब्रह्मपुरी) में चार धाराओं में विभक्त होने का विस्तृत वर्णन है। अध्याय : 17 श्लोक 4 से 9 तक में सुवर्णपुरी में गंगा का 4 धाराओं - सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नामक चार धाराओं में विभक्त हो जाती है, जो क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में बहती हुई संबंधित सागरों में मिल जाती हैं। नीचे प्रासंगिक श्लोकों को देखें …

श्लोक 4 

ततोऽनेकसहस्रकोटिविमानानीकसङ्कुलदेवयानेनावतरन्तीन्दु मण्डलमावार्य ब्रह्मसदने निपतति ।।


वहाँ से गंगा जी करोड़ों विमानों से घिरे हुए आकाश में होकर उतरती हैं और चंद्रमंडल को आप्लावित करती हुई मेरु के उच्चतम शिखर पर स्थित ब्रह्मा की सुवर्णमयीपूरी में उतरती हैं।


श्लोक 5 (चार धाराओं का विभाजन और दिशाओं में बहाव)


तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदी-पतिमेवाभिनिविशति सीतालकनन्दा चक्षुर्भद्रेति ॥


ब्रह्मा की पुरी में उतरते ही गंगा  सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नाम से चार धाराओं में विभक्त हो जाती हैं तथा अलग-अलग चारों दिशाओं में बहती हुई अंत में नद-नदियों के अधीश्वर समुद्र में गिर जाती हैं।

श्लोक 6 (सीता धारा - पूर्व दिशा)

सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरेभ्योऽधोऽधः प्रस्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेण भद्राश्ववर्षं प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्र - मभिप्रविशति ॥ 

इनमें सीता ब्रह्मपुरी से केसराचलों के सर्वोच्च शिखरों में होकर नीचे की ओर बहती, गंधमादन के शिखरों पर गिरती है और भद्राश्ववर्ष को प्लावित कर पूर्व की ओर खारे समुद्र में मिल जाती है।

श्लोक 7 (चक्षु धारा - पश्चिम दिशा):

एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोऽनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षुः प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥

इसी प्रकार चक्षु माल्यवान् के शिखर पर पहुँचकर वहाँ से बेरोकटोक केतुमालवर्ष में बहती, पश्चिम की ओर क्समुद्र में जा मिलती है।

श्लोक 8 (भद्रा धारा - उत्तर दिशा):

भद्रा चोत्तरतो मेरुशिरसो निपतिता गिरिशिखराद्गिरिशिखरमतिहाय शृङ्गवतः शृङ्गादवस्यन्दमाना उत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥ 

भद्रा मेरुपर्वत के शिखर से उत्तर की ओर बहती हुई  एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर बहती हुई अंततः शृंगवान् के शिखर से उत्तरकुरु देश में होकर उत्तर की ओर बहती हुई समुद्र में मिल जाती है।

श्लोक 9 (अलकनन्दा धारा - दक्षिण दिशा):

तथैवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्बहूनि गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्धैमकूटान्यतिरभसतररंहसा लुठयन्ती भारतमभिवर्षं दक्षि-णस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्नानार्थं चागच्छतः पुंसः पदे पदेऽश्वमेधराजसूयादीनां फलं न दुर्लभमिति ॥ 

अलकनन्दा ब्रह्मपुरी से दक्षिण की ओर गिरकर अनेकों गिरिशिखरों को लाँघती हुई हेमकूट पर्वत पर पहुँचती है, वहाँ से अत्यंत तीव्र वेग से हिमालय के शिखरों को चीरती हुई भारतवर्ष में आती है और फिर दक्षिण की ओर समुद्र में जा मिलती है। इसमें स्नान करने के लिए आने वाले पुरुष को पद-पद पर अश्वमेध और राजसूय आदि यज्ञों का फल भी दुर्लभ नहीं है।

मेरु पर्वत के संबंध में विस्तार से देखने के लिए भागवत 

स्कंध : 3 .21 - 3 33 + 4.19 + 5.16 + 12.8 - 12.9 को देख सकते हैं ।


जंबू द्वीप के केंद्र में इलावृत वर्ष (देश ) है । उसके केंद्र में मेरू पर्वत है । इलावृत वर्ष शिव क्षेत्र है जिसमें कोई पुरुष नहीं जा सकता। यदि कोई यहां पहुंच जाय तो वह स्त्री में रूपांतरित हो जाता है जैसे सम्राट सुद्युम्न इला नामक स्त्री बन गए थे । इलावृत के उत्तर में 3 पर्वत और 3 वर्ष हैं। दक्षिण दिशा में भी 3 देश एवं 3 वर्ष हैं। पूर्व दिशा में एक वर्ष एवं एक पर्वत तथा पश्चिम दिशा में भी एक वर्ष एवं एक पर्वत है । उस प्रकार जंबू द्वीप में 09 वर्ष एवं 09 प्रमुख पर्वत हैं। अब हिमालय के भूगोल को भी समझ लेना चाहिए …

हिमालय के उत्तर में 06 वर्ष एवं 06 प्रमुख पर्वत हैं जिनमें हिमालय से सुदूर उत्तर में कुरु वर्ष बताता गया है जो उत्तरी सागर का तटीय वर्ष (देश) है । संभवतः रूस का साइबेरिया उस समय कुरु देश रहा होगा। यदि ऐसा है तो कुरुक्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के बारे में भी सोचना पड़ेगा। 

जैसा ऊपर बताया गया ,जंबू द्वीप के 9 वर्षों में भारत वर्ष मात्र कर्मभूमि है शेष वर्षो में वे लोग रहते हैं जो स्वर्ग से बचे हुए पुण्य को भोगते हैं और इन लोगों की उम्र 10,000 वर्ष होती है । ये लोग देवतुल्य होते हैं । 

भागीरथी नाम को गंगा के साथ जोड़ा गया है अतः इस नाम के पौराणिक श्रोतों को समझना चाहिए …

भागवत में “भागीरथी” शब्द नहीं आता, परंतु यह नाम रामायण (बालकाण्ड, सर्ग 43–44) 

सगरस्यात्मजा राजन् भागीरथप्रयत्नतः ।
स्वर्गात् प्राप्य महीमग्ना गङ्गा तेषामुपायनम्॥”
और महाभारत (वनपर्व, अध्याय 108) में आता है।

ब्रह्मा पुत्र मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि हैं । कश्यप पुत्र विवस्वान (सूर्य ) हैं और सूर्य के पुत्र 7 वे मनु श्राद्ध देव जी है जो वर्तमान के मनु हैं । ब्रह्मा के एक दिन में 14 मनु होते हैं जबकि एक मनु का समय लगभग 0.30857 million years। श्राद्ध देव जी के बड़े पुत्र इक्ष्वाकु हुए । इक्ष्वाकु पुत्र विकुक्षी बंश में सगर हुए जिनके 60,000 पुत्र गंगा सागर में कपिल मुनि द्वारा भस्म कर दिए गए थे । सगर की दूसरी पत्नी के वंश में  अंशुमान के पुत्र दलीप हुए जिनके पुत्र भगीरथ हुए ।  भस्म हुए परिवार जनों की आत्माओं की मुक्ति के लिए गंगा जी को लाने के लिए भगीरथके दादा अंशुमान एवं पिता दलीप दोनों घोर तप किए लेकिन सफल न हो सके । 

भगीरथ की तपस्या जब फलित हुई तब गंगा प्रकट हुई और बोली , भगीरथ ! मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ , बर मांग । भगीरथ गंगा से मृत्युलोक ( पृथ्वी लोक ) में उतरने की प्रार्थना कीगंगा कहती हैं , मैं पृथ्वी पर नहीं उतरना चाहती क्योंकि लोग अपनें - अपनें पाप मुझमें धोएंगे फिर मैं उन पापों से कैसे मुक्त हो पाऊंगी ? भगीरथ कहते हैं , माता ! आप के तट पर सिद्धों का निवास होगा , आप उनके दैनिक जीवन के लिए जल श्रोत होंगी और उनके स्पर्श से आपकी निर्मलता बनी रहेगी अतः आप से अनुरोध है कि आप मेरे संग चलें । 

अब आधुनिक भूगोल के आधार पर गंगा एवं अन्य सहायक नदियों के तंत्र सार की एक झलक यहां देखें ⤵️

आधुनिक भूगोल आधारित गंगा परिवार

( ऊपर अलकनंदा , भागीरथी और अन्य सहायक नदियों के तंत्र को दिखाया गया है जिससे गंगा के रहस्य को समझने में मदद मिल 

सके । भागवत के आधार पर गंगा शब्द उसी समय समाप्त हो जाता है जब गंगा ब्रह्मा पूरी में उतरती है और 04 धाराओं में विभक्त हो कर चार अलग - अलग नामों से बहने लगती हैं जैसा पहले स्पष्ट किया गया है ।। 

~~ ॐ ~~