ध्यान क्या है?
पतंजलि योगसूत्र में ध्यान क्या है ?
सांख्य दर्शन और पतंजलियोगसूत्र दर्शन एक दूसरे के पूरक दर्शन हैं - सांख्य दर्शन के बिना , पतंजलि योगसूत्र दर्शन का होना संभव नहीं और पतंजलि योग दर्शन के बिना सांख्य दर्शन के सिद्धांतों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना भी संभव नहीं।
सांख्य सिद्धांत देता है कि प्रकृति और पुरुष संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति है। प्रकृति त्रिगुणी ,सनातन,प्रसवधर्मी एवं जड़ तत्त्व है और पुरुष निर्गुणी,सनातन एवं शुद्ध चेतन तत्त्व है। प्रकृति - पुरुष संयोग के फलस्वरूप 23 त्रिगुणी तत्त्वों की निष्पति होती है जिसमें बुद्धि,अहंकार और 5 तन्मात्र कारण एवं कार्य दोनों तत्त्व हैं, 11 इंद्रियां एवं 5 तन्मात्र केवल कार्य तत्त्व हैं। जो तत्त्व किसी और तत्त्व की उत्पत्ति करता है , उसे कारण कहते हैं और उत्पन्न होनेवाला तत्व उस कारण तत्त्वंका कार्य तत्त्व होता है। प्रकृति कारण तत्त्व है लेकिन पुरुष न कारण तत्त्व है और न ही कार्य तत्त्व है ।
ऊपर व्यक्त सांख्य तत्त्वज्ञान सार की अनुभूति के लिए पतंजलि योगसूत्र दर्शन देते हैं जो समाधि ,साधन,विभूति और कैवल्य पादों में विभक्त है । समाधिपाद में महर्षि पतंजलि समाधि के प्रति जिज्ञासा उठते हैं क्योंकि समाधि सिद्धि से स्वबोध रूप में प्रकृति - पुरुष का तत्त्व से बोध होता है। समाधि प्राप्ति के लिए साधनपाद में अष्टांगयोग के 8 अंगों में से प्रारंभिक 5 अंगों - यम , नियम , आसान , प्राणायाम और प्रत्याहार को स्पष्ट करते हैं । इन अंगों को बहुत अंग कहते हैं। अपने तीसरे विभूतिपाद के प्रारंभ में अष्टांगयोग के शेष तीन अंगों - धारणा , ध्यान और समाधि को स्पष्ट करते हैं । इन्हीं अंगोंको आंतरिक अंग कहते हैं। विभूतिपाद में आगे यह भी कहते हैं कि अष्टांगयोग सिद्धि से सिद्धियां मिलती हैं जो योगाभ्यास को खंडित कर सकती हैं अतः इनके सम्मोहन में न आ कर , निरंतर योगाभ्यास करते रहना चाहिए । इस प्रकार निरंतर धारणा , ध्यान और समाधि के अभ्यास से धर्ममेघ समाधि मिलती है जो कैवल्य जा द्वार खोलती है। कैवल्य प्राप्ति के आवागमन चक्र के मुक्ति मिल जाती है ।
अब ध्यान की विशेष यात्रा पर निकलते हैं। ध्यान मैंनोरवेश करने के पहले अष्टांगयोग के आखिरी चरण आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को भी समझ लेना चाहिए क्योंकि इनकी सिद्धि के साथ ध्यान में प्रवेश मिलता है।
पतंजलि कहते हैं , “ स्थिर सुखं आसनम् " - साधनपाद सूत्र - 46 । शरीर के जिस मुद्रा में स्थित होने से स्थित दुख मिलता हो , उस मुद्रा को आसान कहते हैं। स्थिर सुख क्या है ? जब देश - काल से अछूता रहना , स्थित सुख की स्थित होती है। आगे पतंजलि प्राणायाम को परिभाषित निम्न प्रकार करते हैं।
“तस्मिन् सति श्वास प्रश्वास गति विच्छेद प्राणायाम”
~ साधनपाद सूत्र : 49 । आसन की सिद्धि में स्वास एवं प्रश्वास का स्वयं रुक जाना, प्राणायाम है । अब पतंजलि प्रत्याहार की परिभाषा को भी देखें , “स्व विषय असंप्रयोगे चित्त स्वरूप अनुकार इव इन्द्रियाणाम् प्रत्याहार: “ ~ साधनपाद सूत्र : 54 । जब इंद्रियां अपने - अपने विषयों के प्रति आकर्षित न रहकर चित्त मुखी हो जाती है तब उस अवस्था को प्रत्याहार कहते हैं । आसन एवं प्राणायाम सिद्धि मिलने पर इंद्रियां विषय मुखी न रह कर चित्त मुखी हो जाती हैं अर्थात इंद्रियों का रुख उल्टा हो जाता है जिसे कबीर दास कहते हैं कि अपनें पुतलियों को उल्टा कर दो । आसन ,प्राणायाम और प्रत्याहार की सिद्धि मिल जाने पर चित्त राजस एवं तामस गुणों की वृत्तियों से मुक्त हो कर सात्त्विक गुण की वृत्तियों से परिपूर्ण रहने लगता है और तब धारणा , ध्यान और समाधि किंयोग साधना - यात्रा प्रारंभ होती है।
धारणा (विभूति पाद सूत्र : 1 )
<> देश बंध: चित्तस्य , धारणा <>
किसी सात्त्विक आलंबन से चित्त को बाध कर रखने का अभ्यास , धारणा है ।
ध्यान (विभूति पाद सूत्र : 2 )
<> तत्र , प्रत्यय , एकतानता , ध्यानम् <>
धारणा का लंबे समय तक बने रहना , ध्यान कहलाता है ।
समाधि (विभूति पाद सूत्र : 3 )
<> तत् एव अर्थ मात्र निर्भासं स्वरुपशून्यम् इव समाधि < >
ध्यान में जब आलंबन का स्वरूप क्रमशः सूक्ष्म होते - होते लगभग शून्य हो जाता है और केवल अर्थ मात्र निर्भासित रहता है , तब इस अस्वस्थ को संप्रज्ञात या सविकल्प समाधि कहते हैं ।
धारणा , ध्यान और समाधि जब एक साथ घटित होने लगे तो उस अवस्था को संयम कहते हैं। संयम सिद्धि से सिद्धियां मिलती हैं जो योग को उच्च भूमियों में पहुंचने में अवरोध पैदा करती हैं अतः सिद्धियों से सावधान रहना चाहिए।
अब ध्यान संबंधित कुछ और बातों को भी समझते हैं।
महर्षि पतंजलि साधनपाद सूत्र : 11 में कहते हैं,
ध्यान हेयात् तत् वृत्तयः अर्थात ध्यान से क्लेशों की वृत्तियों का क्षय होता है । अब यहां इस सूत्र के संदर्भ में समझना होगा कि क्लेश क्या हैं ? क्लेश के लिए पतंजलि साधनपाद सूत्र > 3 - 14 ,25 को देखना होगा जिनका सार निम्न प्रकार है ….
अविद्या ,अस्मिता , राग - द्वेष और अभिनिवेष , ये 05 क्लेश हैं ( साधनपाद - 3 )।
अविद्या शेष चार क्लेशों की जननी है।
सत् को असत् और असत् को सत् समझना अविद्या है।
मैं और मेरा का अहं भाव , अस्मिता है । इंद्रिय सुख की लालसा , राग है । भोग के कड़वे अनुभव से द्वेष की ऊर्जा बनती है। मृत्यु भय को अभिनिवेश कहते हैं ।
पांच क्लेश मानसिक और आध्यात्मिक बाधाओं की उत्पत्ति के कारण हैं । क्लेश, कर्माशय ( चित्त ) की मूल हैं
(साधनपाद सूत्र - 12) । क्लेश त्रिगुणी बंधन तत्त्व हैं जो शुद्ध निर्गुणी चेतन पुरुष को त्रिगुणी जड़ प्रकृति से जुड़ने के बाद उसे अपने मूल स्वरूप में तबतक नहीं लौटने देते जबतक उसे कैवल्य नहीं मिल जाता । क्लेश दुखों की जननी हैं। जबतक क्लेष निर्मूल नही होते , आवागमन से मुक्ति नहीं मिल पाती (साधनपाद सूत्र - 13) ।
~~ ॐ ~~