Thursday, May 17, 2012

जीवन दर्शन 50

  • देह की और ब्रहमांड की बनावटें एक सी हैं,वेद कहते हैं

  • देह,ह्रदय में बसे ब्रह्म की तलाश का माध्यम है और ब्रह्माण्ड की तलाश मन की तलाश है

  • ब्रह्माण्ड की रिक्तता में ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है

  • मन की रिक्तता में ह्रदय में बसा ब्रह्म दिखता है

  • मन में कभीं दो सूचनाएं एक साथ नहीं रह सकती

  • मन कभीं स्वयं के संबंधमें नहीं विचार करता

  • मन जिस घडी स्व पर केंद्रित हो जाता है वह घडी रूपांतरण की घडी होती है

  • वह जो इस घडी को चूक गया , चूक गया और जो पकड़ लिया वह पार गया

  • भोग और भगवान एक साथ एक मन में नहीं बस सकते

  • लेकिन भोग के प्रति उठा होश प्रभु से परिपूर्ण कर देता है

  • मन को बाहर से अंदर की दिशा देना ही ध्यान है

  • जब मन बाहर न भाग कर अंदर रमता है तब वैराज्ञ आगमन होता है

  • वैराज्ञ निर्वाण का द्वार है

  • निर्वाण प्राप्ति ही परम गति है

  • परम गति का अर्थ है आवागमन स मुक्त हो कर प्रभु में समा जाना

=====ओम्======



Tuesday, May 15, 2012

जीवन दर्शन 49

यहाँ सभीं अपनें को आजाद समझते हैं , लेकिन … ...

हैं सभीं गुलाम , जैसे … ...

कोई ममता का गुलाम है

कोई कामना का गुलाम ही

कोई अहँकार का गुलाम है

कोई सौन्दर्यता का गुलाम है

कोई भोजन का गुलाम है

कोई लोभ का गुलाम है

कोई भय का गुलाम है

कोई पत्नी का गुलाम है

कोई पति का गुलाम है

कोई अपनें धार्मिक गुरु का गुलाम है इसलिए की जो संपदा उसके पास है वह कहीं सरक न जाए

कोई अपनें ब्यापार का गुलाम है

कोई मंदिर का गुलाम बन कर धन का स्वामी कुबेर बनना चाहते है

धन – धान्य , परिवार , वासना , अहँकार और सात्त्विक , राजस एवं तामस गुणों के तत्त्वों के सभीं गुलाम है लेकिन स्वयं को आजाद समझ कर सीना तान कर रह रहे हैं और उनका यहीं भ्रम उनको ज़िंदा भी रख रखा है / जिस दिन यह बोध हो जाता है कि हम उसकी गुलामी कर रहे हैं जो दो कौडी के हैं , जो मुझे नरक की ओर खीच रहे हैं उसी घडी रुपानारण हो उठता है और सत्य की किरण उस मनुष्य केसभीं नौ द्वारों को प्रकाशित कर देती हैंऔर वह ब्यक्ति परम आजाद हो कर चल पड़ता है परम धाम की ओर /

वह जिसकी पीठ भोग – संसार की ओर हो और नजरें अनंत में ठहरी हों वह है तिर्थंकर/ /

====ओम्=====


Thursday, May 10, 2012

जीवन दर्शन 48

  • बुद्धि से उपजी बात को प्रकट करनें के एक नहीं अनेक ढंग हैं

  • ह्रदय में उपज रही बात को प्रकट करनें का कोई ढंग नहीं

  • बुद्धि की बात को लोग सुनते से दिखते हैं और उसमें अपनें स्वार्थ की बात खोजते रहते हैं

  • ह्रदय की बात कहनें - सुननें की नहीं यह तो एक धारा है जो इसमें उतरा , बह गया

  • ह्रदय के भाव को जो भाषा में ढालना चाहा दुखी हुआ

  • मीरा को भी कहना ही पड़ा,अब मैं नाचैव बहुत गोपाल

  • आप मंदिर जा रहे हैं ? क्या कुछ देना है ? या कुछ लेना है ? इस बात को भी सोचना

  • जो आप देनें के लिए अपनें पास रखे हैं उसको देखना और जो पाना चाहते हैं उसको देखना

  • एक कौडी दे कर सम्राट बनना चाहते हो?

  • मनुष्य क्यों प्रभु को इतना बेवकूफ समझता है ?

  • मनुष्य प्रभु को भी क्यों धोखा देता रहता है?

  • इस पृथ्वी पर प्रभु के नाम का जितना फैला हुआ ब्यापार है उतना और किसी बस्तु का नहीं

  • पुरानें मंदिर पृथ्वी में समा रहे हैं और नये सर उठाये ऊपर उठ रहे हैं

  • नये मंदिर पुरानों को क्यों नही देखते?

  • एक तरफ लोग नयी मूर्तियों की रचना में लगे हैं और दूसरी तरफ लोग पुरानी मूर्तियों की तस्करी कर रहे हैं

  • एक तरफ कुछ लोग मंदिरों के आकार प्रकार को नया रूप दे रहे हैं और दूसरी तरफ कुछ लोग शास्त्रों को रूपांतरित करने में लगे हुए हैं

  • मनुष्य धर्म – कर्म सब को बदल रहा है लेकिंन स्वयं को?

  • ===== ओम् ======


Monday, May 7, 2012

जीवन दर्शन 47

  • नयी पीढ़ी पुरानीं पीढ़ी से परेशान है
  • नयी पीढ़ी यह कहते नहीं थकती की हमारे पुर्बज कितनें भले थे
  • हम क्यों उनकी प्रशंशा करते हैं जो गुजर गए हैं?
  • नयी और पुरानी पीढ़ियों में कटुआ का कारण क्या हो सकता है?
  • भाई – भाई में कटुता कब और कैसे आती है ?
  • भाई – भाई का बचपन में उगा प्यार ब्याह के बाद धीरे - धीरे क्यों सिकुड़ने लगता है ?
  • माँ-बेटे के मध्य बेटे की पत्नी क्यों दीवार बन जाती है?
  • भारत में नयी पीढ़ी किधर जा रही है?
  • आज लोग बिना कुछ किये मस्त भोग जीवन क्यों गुजारना चाह रहे हैं?
  • आज कलियुग समाप्त हो चुका है और भोग युग अपनी पंख ठीक से फैला रहा है
  • आज क्यों अपनें अपनों से दूर हो रहे हैं और पराये अपनें बन रहे हैं?
  • आज लोग अपनी सास को माँ और ससुर को डैड कहते हैं और अपनें माँ-पिता को?
  • आज भारत में खान – पान,रहन सहन सबकुछ पश्चिमी हो चुका है तो क्या सोच भारतीय हो
    सकती है?
==== ओम् =====

Thursday, May 3, 2012

जीवन दर्शन 46

वह रो रहा था …...
आखिर वह क्यों रो रहा होगा?एक नहीं अनेक भ्रमित मन – बुद्धि में प्रश्न उठनें लगे थे और मुझसे रहा न गया और मैं उसके पास जा कर पूछ ही लिया--------
एक सून सान जगह थी , जहाँ दूर – दूर तक किसी जीव के होनें की कोई खबर न मिल रही थी , एक झाड में अकेले छुपके बैठ कर कोई सिसक – सिसक कर रो रहा था जिसकी पीठ तो थी संसार की ओर और आँखें झाड की सघनता में जैसे किसी की तलाश में खोई हुयी हों और प्राप्ति न मिलनें के करण रह - रह कर उनसे बूँदें टपक रही थी / मैं उस सज्जन से पूछा -------
भाई आप लगते तो हो सभ्य ब्यक्ति ; पढ़े लिखे संपन्न लेकिन यह बात नहीं समझ में आ रही की आप यहाँ जंगल में अकेले इन कटीली झाड में बैठ कर रो क्यों रहे हो ? मैं आपकी रुलाई की गंभीरता को सह न सका और यहाँ आ कर आप के दुःख का कारण जानना चाहता हूँ , मैं आप के दुःख को समझ कर उसे दूर तो नहीं कर सकता पर पर आप के साथ उसे हलका जरुर कर सकता हूँ / वह ब्यक्ति पीछे देखा और बैठनें का इशारा दिया / मैं बैठ गया , वह मेरी तरफ मुह किया और अपनी दास्तान बतानें लगा , कुछ इस प्रकार -----
वह एक वैज्ञानिक था जिसने कपड़ों का निर्माण किया था आज से हजारों साल पहले / वह वैज्ञानिक कहता है , भाई ! आज से हजारों साल पहले मनुष्य भी जंगलों में लंगूरों की भांति पेड़ों पर रहा करते थे , उनमें से एक मैं भी था / एक दिन मैं सोचा कि क्यों हम लोग नंगे बदन रहते हैं , क्यों न कोई ऎसी ब्यवस्था हो जिसे हम सब अपनें तन को ढक कर रख सकें ? मेरा प्रयाश सफल हुआ और मैं कपड़ा बनानें में कामयाब हो गया और कुछ साल बाद मेरी मौत हो गयी / आज हजारों साल बाद प्रभु का आदेश मिला कि तूं जा मृत्यु लोक और वहाँ लोग क्या कर रहे हैं इस बिषय पर आकडें इकठा
कर / मै पृथ्वी पर आ कर भ्रमित हो गया की यह पृथ्वी क्या वही पृथ्वी है जहाँ मैं आज से हजारों साल पहले हुआ करता था ? जहाँ शहर शब्द न था सम्पूर्ण पृथ्वी जंगल मय थी लेकिन आज … ... ?
वह वैज्ञानिक कहता है-------
मैं वस्त्र का निर्माण किया था तन ढकनें के लिए
लेकिन
आज लोग इसका प्रयोग तन दिखानें के लिए कर रहे हैं,फिर तूं सोच मैं रोऊँ न तो
और क्या करूँ?
====ओम्======

Friday, April 27, 2012

जीवन दर्पण 45

  • जब आप क्रोध में हों तब देखना उसके होनें के कारण को,कारण आप स्वयं नहीं कोई और होगा

  • भोग - तत्त्वों एवं क्रोध का आपसी गहरा सम्बन्ध है

  • राजस गुणों के तत्त्वों के साथ धनात्मक अहंकार होता है जो स्पष्ट दिखता है

  • तामस गुण का अहँकार सिकुड़ा हुआ समय के इन्तजार में केंद्र में झुप कर रहता है

  • भोग तत्त्वों में अहँकार की उम्र सबसे कम होती है

  • अहँकार की अनुपस्थिति में सत् का बोध होता है

  • सत् वह है जो संसार के बोध के साथ प्रभुमय बनाए

  • भोग तत्त्वों एवं अहँकार के सम्मोहन के प्रभाव से जो बच रहता है वह है ज्ञानी

  • ज्ञानी प्रभु के सम्बन्ध में चुप रहता है

  • लाओत्सू कहते हैं , सत् ब्यक्त करनें पर असत्य बन जाता है "

  • अपनें को दर्पण में क्या देखते हो स्वयं के मन को दर्पण बनाओ

===== ओम्======



Friday, April 20, 2012

जीवन दर्शन 44

  • वह क्या है जो स्वयं में भय है ?

  • क्या वह मौत तो नहीं?

  • वह जो प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल चलता है वह मौत की ओर जाता है

  • वह जो प्रकृति के अनुकूल चल रहा है उसे मौत से भय नहीं होता

  • मौत एक ऐसा परम सत्य है जिसको कोई नहीं नक्कार सकता

  • परमात्मा है , ऐसा कहना विवाद रहित नहीं हो सकता

  • लेकिन मौत है , ऐसा कहना विवाद रहित जरुर है

  • वह जो मौत से दूर भागता है,मौत से उतना नजदीक होता जाता है

  • तन की मौत तो सबकी होती है

  • लेकिन मन की मौत होना असंभव है

  • गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं , इंद्रियों में मन मैं हूँ "

  • मन एक माध्यम है जो एक तरफ अमरत्व से जुड़ा है और दूसरी तरफ मौत से

  • मन का जो गुलाम है वह मौत से दूर नहीं रह सकता

  • वह जिसके इशारे पर उसका मन चलता हो उसकी मित्रता मौत से होती है

  • भोगी मौत का बैरी है और योगी मित्र

  • प्रभु में डूबा हुआ योगी मौत को देख सकता है जैसे जुन्नैद

===== ओम्======




Tuesday, April 17, 2012

जीवन दर्शन 43

  • न हम किसी को हसते देख सकते हैं और न रोते

  • आखिर हम किसी को कैसा देखना चाहते हैं ?

  • हसने और रोने के मध्य की स्थिति को क्य समभाव नहीं कह सकते?

  • क्या गीता का मूल आधार समभाव नहीं?

  • जब हम किसी को हसते देखते हैं तब तुरंत पूछते हैं , “ भाई क्या बात है बहुत हस रहे हो ? “

  • जब हम किसी को रोते देखते हैं तब भी कारण जानना चाहते हैं , क्यों ?

  • कारण जाननें से हमें क्या मिलता है?

  • जो हसता है उसके पीछे कोई कारण होता है

  • जो रोता है उसके पीछे भी कोई कारण होता है

  • जो उसके हसने - रोने के करण को जानना चाहता है उसके जानने के पीछे भी कोई कारण होता है

  • क्या कारण रहित रोना नहीं हो सकता?

  • क्या कारण रहित हसना नहीं हो सकता?

  • जिस हसी के पीछे कोई गहरा कारण होता है वहाँ अहँकार भी होता है

  • जिस रोने के पीछे जितना गहरा कारण होगा वहाँ उतना गहरा मोह हो सकता है

  • मोह में नकारात्मक अहँकार होता है

  • वह हसी जिसमें अहँकार न हो और भोग तत्त्वों की छाया न हो,परम से जोड़ती है

  • कारण रहित रोना सत् से जोड़ता है

  • हमें लोगों की इतनी गहरी चिंता क्यों रहती है?

  • हम कब और कैसे स्व पर केंद्रित हो सकेंगे?

  • ध्यान एक मार्ग है जहाँ न हसी है , न रुदन और उससे जो निकलता है वह सब का आदि है

  • सकारण ध्यान ध्यान नहीं,दिखावा होता है

  • ध्यान से मनुष्य स्वयं को पहचाननें लगता है

  • स्व की पहचान में परमेश्वर बसता है

==== ओम्=======





Sunday, April 15, 2012

जीवन दर्शन 42

  • मुह से चुप होना अति सरल है और मन से चुप होना साधना है

  • मुह से चुप होते ही मन की रफ्तार तेज हो जाती है

  • मुह से मौन रहनें का अभ्यास मन से मौन रहनें की स्थिति में पहुंचा सकता है

  • मुह से चुप रहनें की आदत डालनें से मनोविज्ञान बदलता है

  • मनोविज्ञान में आ रहे बदलाव को गंभीरता से समझने की जरुरत होती है

  • यदि अहँकार मुह से मौन बना रहा हो तो इसे समझिए ; यह खतरनाक स्थिति में ले जा सकता है

  • लोग कभीं कभी मौन रहनें का व्रत लेते हैं , यह अभ्यास – योग का एक चरण है

  • जब आप मौन व्रत में हों तब स्वयं को निहारते रहिये

  • हठात इंद्रियों को रोकना अहंकारी बना सकता है

  • इंद्रियों की मित्रता परम सत्य का द्वार खोल सकती है

  • मौन होना अर्थात शब्द रहित होना

  • शब्द रहित होना अर्थात भाव रहित होना

  • और भावातीत की स्थिति ही ब्रह्म की स्थिति है

  • ब्रह्म की अनुभूति जब घटित होती है उस काल में वह साधक स्वयं ब्रह्म हो गया होता है

  • भावातीत की स्थिति में साधक समाधि में पहुंचा होता है

    और

  • वह संसार का द्रष्टा होता है

==== ओम्======




Friday, April 13, 2012

जीवन दर्शन - 41

योगी,ज्ञानी,संन्यासी,वैरागी,कर्म – योगी,सांख्य – योगी,भक्त ये सब एक के संबोधन हैं

वह योगी है जिसका बसेरा भोग संसार में नहीं प्रभु में होता है

योगी भोग का द्रष्टा होता है

योग का मार्ग भोग से गुजरता है

भोग में उठा होश ही योग है

योगी बुद्धि स्तर पर बनना अति आसान पर ह्रदय से योगी होना प्रभु का प्रसाद है

योग का अर्थ है ब्यक्ति विशेष की चेतना का परम चेतना से जुडना

तन स्तर पर जो योग होते हैं वे तन साधना के उपाय भर हैं

तन साधना से मन साधना संभव है लेकिन तन साधना में अहँकार भी साथ साथ सघन होता रहता है

तन साधना स्थिर-प्रज्ञ बना सकती है अगर कहीं किसी स्तर पर साधना में अहंकार का प्रवेश

न हो तब

साधना से ह्रदय का कपाट खुलता है और बुद्धि परम सत्य का द्रष्टा बनी रहती है

ह्रदय के कपाट के खुलनें से संसार का रहस्य दिखता है

ह्रदय साधना का नाभिकेंद्र है ; जहाँ प्रभु - आत्मा का निवास होता है

ह्रदय चक्र जब खुलता है तब स्व का बोध होता है,स्व का बोध तत्त्व – वित् बनाता है

तत्त्व वित् आत्मा से आत्मा में समभाव में जहाँ होता है वहीं परमात्मा होता है

तत्त्व – वित् हजारों साल बाद कभीं कभीं बुद्ध – महाबीर जैसे अवतरित होते हैं

तत्त्व – वित् पंथ का निर्माण नहीं करते , देह स्तर पर उनके जानें के बाद बुद्धि जीवी मार्ग का निर्माण करते हैं और उस मार्ग का ब्यापार चलाते रहते हैं /


====ओम्=======


Wednesday, April 11, 2012

जीवन दर्शन 40

न हसना बुरा है न रोना

न न रोना बुरा,न न हसना

अच्छा और बुरा की सोच गुण प्रभावित बुद्धि की उपज है

गुण प्रभावित बुद्धि पर सत् का प्रतिबिम्ब नहीं बनता

निर्विकार बुद्धि में सत्य के अलावा और कुछ नहीं होता

हंसी और रोना दोनों एक जगह पहुंचाते हैं

हसना और रोना दो अलग – अलग मार्ग दिखते हैं लेकिन ऐसा है नहीं

हसना और रोना एक ऊर्जा के दो रूप हैं भौतिक स्तर पर मात्र

हसना और रोना दो अलग – अलग भाव हैं

भाव भावातीत से हैं

भावातीत और कोई नहीं परमात्मा है

भाव से भाव की उत्पत्ति कैसे संभव है ?

गीता कहता है-----

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः गीता - 2.16

====ओम्=====


Monday, April 9, 2012

जीवन दर्शन - 39

जानना होनें की पौधशाला है

होना अर्थात प्रकृति के रहस्यों में बसना

प्रकृति के दिल की धडकन वह सुनता है जो होश मय होता है

बुद्धि स्तर पर जाननें में अहँकार हो सकता है

बुद्धि स्तर की समझ संदेह मुक्त नहीं भी हो सकती

बुद्धि स्तर पर जानना जब ह्रदय में पहुँचता है तब होश उठता है

ह्रदय की अनुभूति में संदेह का होना संभव नहीं

बुद्धि स्तर की समझ दो पर आधारित होती है

जहाँ एक के दो विकल्प हों वहाँ संदेह का होना अनिवार्य होता है

संदेह जब श्रद्धा में बदलता है तब बुद्धि की सोच ह्रदय में पहुंचती है

श्रद्धा परम सत्य का द्वार है

श्रद्धा और संदेह दोनों एक साथ एक बुद्धि में नहीं रह सकते

संदेह से विज्ञान और श्रद्धा से परमात्मा का रहस्य उजागर होते हैं

भक्ति का प्रारम्भ श्रद्धा से है

विज्ञान का प्रारम्भ संदेह से होता है

जितना गहरा संदेह होगा उतनी गहरी विज्ञान की बात निकल सकती है

श्रद्धा की गहराई में प्रभु बसता है


======ओम्=========




Saturday, April 7, 2012

जीवन दर्शन - 38

जिस सागर में रहते हो उसे पहचानो
स्वयं की पहचान ही सागर से मिलाती है
संसार सागर में तीन प्रमुख लहनें उठती रहती हैं [ सात्त्विक , राजस एवं तामस गुणों की ]
अध्यात्म की आसक्ति सात्त्विक लहर की उप लहर है
आसक्ति,कामना,क्रोध एवं लोभ राजस लहर की उप लहरें हैं
मोह,आलस्य एवं भय तामस लहर की उप लहरे हैं
ऊपर बतायी गयी लहरों एवं उप लहरों का बोध ही स्व का बोध है
स्व के बोध में बिषय,इंद्रिय,मन,बुद्धि,चेतना एवं आत्मा परमात्मा का द्रष्टा बनना होता है
स्व का बोध वह द्रष्टा भाव है जिसमें प्रकृति-पुरुष का रहस्य छिपा है
संसार का रहस्य ही माया रहस्य है
माया एक पर्दा है जो मन-बुद्धि को परम सत्य के दूर रखता है
परम सत्य सर्वत्र है एवं जो हैं उनका आदि मध्य एवं अंत भी वही है
गुणों का बोध अपरा भक्ति से संभव है
अपरा भक्ति का आखिरी द्वार परा भक्ति का प्रवेश – द्वार है
परा भक्त परम सत्य से परम सत्य में बसा हुआ प्रकृति-पुरुष का द्रष्टा होता है

=====ओम्======

Thursday, April 5, 2012

जीवन दर्शन 37

कितने दिन और अपने को अपने से दूर रखोगे?

कितने दिन और नफरत की आग में जलते रहोगे?

कितने दिन और चिंता की चिता में बैठे रहोगे?

कितने दिन और अहँकार की गुलामी में रहोगे?

कितने दिन और काम के सम्मोहन में उलझे रहोगे?

कितने दिन और मोह का रस चखते रहोगे?

कितने दिन और लोभ के काँटों की सेज पर सोते रहोगे?

कितने दिन और असत् से मित्रता रखना चाहोगे?

कितने दिन और रात को दिन समझ कर भागते रहोगे?

कितने दिन और राम को धोखा देते रहोगे?


====== ओम्=======



Tuesday, April 3, 2012

जीवन दर्शन - 36

मन नियंत्रित होता है ध्यान से

मन से मित्रता होती है ध्यान से

मन की दो दिशाएं हैं ; आक्रमण एवं प्रतिक्रमण

जब हम किसी और के सम्बन्ध में सोच रहे होते हैं तब मन आक्रमण की स्थिति में होता है

जब मन बाहर से अंदर की ओर चलता है तब उसे प्रतिक्रमण कहते हैं

आक्रमण में मनुष्य संसार से जुड़ता है

प्रतिक्रमण में मनुष्य यह समझनें लगता है कि मैं कौन हूँ ?

पांच कर्म इन्द्रियाँ एवं पांच ज्ञानेन्द्रिया मन के फैलाव हैं

दस इंद्रियों का सम्बन्ध होता है प्रकृति में बसे पांच बिषयों से

मन से संसार की यात्रा अति सरल यात्रा है

मन से भगवान की यात्रा अति कठिन यात्रा है

मन से मंदिर और मंदिर में भगवान की अनुभूति , साधना की यात्रा है

शांत मन में प्रभु का निवास होता है

मन कामना पूर्ति के माध्यम नहीं,अपितु कामना के प्रति होश मय होनें के माध्यम हैं

मन वह चौराहा है जहाँ से दो मार्ग निकलते हैं ; एक नरक को जाता है और दूसरा स्वर्ग को

मन ख़्वाबों में रखता है और चेतना सत् में

=====ओम्=======





Sunday, April 1, 2012

जीवन दर्शन - 35

  • तीन गुणों से माया है और माया प्रकृति का निर्माता है

  • तीन गुणों के अपनें-अपनें भाव हैं

  • सात्त्विक गुण निर्विकार प्रभु से जोड़ता है

  • राजस गुण भोग में आसक्ति बनाता है

  • तामस गुण मोह – भय एवं आलस्य से जोड़ कर रखता है

  • मनुष्य में सात्विक गुण का केन्द्र ह्रदय है

  • राजस गुण का केंद्र है प्रजनन इंद्रिय के आस – पास का स्थान जिसे स्वाधिस्थान चक्र कहते हैं

  • तामस गुण के भावों का केंद्र है नाभि चक्र[मणिपुर चक्र]

  • श्री कृष्ण कहते हैं , “ तीन गुणों के भाव मुझसे हैं और मैं भावातीत हूँ "

  • शब्दों से संसार बसत है और मौन में भगवान बसता है

  • प्यार ह्रदय की उपज है और वासना मन – बुद्धि की

  • प्यार ह्रदय में बसे प्रभु की तरंगों से है जो आत्मा से निकलती हैं

  • वासना की तरंगें मन से उठती हैं और तन में समाप्त हो जाती हैं

  • वासना अज्ञान की ऊर्जा से है और प्यार सत् की उर्जा है

====ओम् =======




Friday, March 30, 2012

जीवन दर्शन - 34

  • कर्म रहित होना संभव नहीं

  • बिना गुणों के प्रभाव में कर्म करना भी आसान नहीं

  • गुण प्रभावित सभीं कर्म भोग हैं

  • भोग कर्म के करनें से जो खुशी मिलती है उसमें गम का बीज अंकुरित हो रहा होता है

  • बिना गुण – प्रभाव जब कर्म होते हैं तब उन कर्मों को योग कहते हैं

  • कर्म योग का प्रारम्भ सत् गुण से है लेकिन सत् गुण में अंत नहीं , अंत गुणातीत में है

  • सत् गुण के प्रभाव में मनुष्य के देह के सभीं नौ द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित रहते हैं

  • ऐसे सभी कर्म योग कर्म हैं जीनके होनें में कोई बंधन न हो

  • कर्म कर्ता भोग तत्त्वों के प्रभाव में जो भी करता है वह भोग कर्म होता है

  • कर्म योगी को भोग कर्म अकर्म जैसे दिखते हैं

  • कर्म योगी भोग में कमलवत स्थिति में रहता है

  • कर्म योगी जो भी करता है समभाव में करता है

  • कर्म योगी स्व का एवं उससे जो हो रहा होता है उसका भी द्रष्टा होता है

==== ओम्=====





Wednesday, March 28, 2012

जीवन दर्शन - 33

  • कर्म रहित कोई जीव धारी एक पल भी नहीं रह सकता[गीता- 18.11 ]

  • भूतभावः उद्भवकरः विसर्गः इति कर्मः[गीत –8.3 ]

    [जीव जिससे भावातीत हो सके वह कर्म है]

  • कर्म कर्ता मनुष्य या जीव नहीं उनके अंदर तीन गुणों का समीकरण होते हैं

  • मनुष्य में जो गुण जिस समय प्रभावी रहता है वह उस प्रकार का काम करता है

  • सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई नहीं जी पर तीन गुणों का प्रभाव न पड़ता हो[गीता- 18.40 ]

  • थर्मामीटर में जैसे ताप के प्रभाव में पारा ऊपर नीचे होता रहता है वैसे तीन गुण मनुष्य के अंदर उठते - बैठते रहते हैं [ सोच , खान – पान , रहन – सहन के आधार पर ]

  • सात्विक गुण ज्ञान की ओर ले जाता है

  • राजस गुण भोग से बाधता है

  • तामस गुण मोह एवं भय का जन्म दाता है

  • तीन गुण स्वभाव का निर्माण करते हैं

  • स्वभाव से कर्म होता है

  • कर्म से सुख – दुःख का अनुभव होता है

  • किसी के कर्म एवं कर्म – फल की रचना प्रभु आधारित नहीं है[गीता- 5.14 ]

  • मनुष्य जब कर्म करता है तब स्वयं करता समझता है और जब परिणाम गलत होते है तब प्रभु को जिम्मेवार समझता है , क्या है यह राजनीति वह भी प्रभु से ?

  • परिणाम उत्तम तो उस कर्म को करनें वाला मैं हूँ और यदि परिणाम अशुभ हुआ तो वह प्रभु के कारण हुआ,यह है मनुष्य की गणित


====ओम्=======



Monday, March 26, 2012

कौन सिकुड रहा है और कौन फ़ैल रहा है

क्या फ़ैल रहा है और क्या सिकुड रहा है?


मनुष्य फ़ैल रहा है और मानवता सिकुड रही है

राम सिकुड रहे हैं और काम फ़ैल रहा है

असत् फ़ैल रहा है और सत् सिकुड रहा है

भोग – मन फ़ैल रहा है और चेतना सिकुड रही है

श्रद्धा सिकुड रही है और संदेह फ़ैल रहा है

मनुष्य की संख्या फ़ैल रही है और अन्य जीवों की प्रजातियां सिकुड रही है

प्यार सिकुड रहा है और नफ़रत फ़ैल रही है

समता सिकुड रही है और विसमता फ़ैल रही है

प्रकृति निर्माण सिकुड रहा है और मनुष्य कृत्य निर्माण फ़ैल रहा है

अपनापन सिकुड रहा है और परायापन फ़ैल रहा है

मंदिर फ़ैल रहे हैं और धर्म सिकुड रहा है

योगी फ़ैल रहे हैं और योग सिकुड रहा है

पुरानी परम्पराएं सिकुड रही हैं और नयीं परम्पराएं फ़ैल रही हैं

आनें वाले दिनों में राम – कृष्ण के मंदिर लुप्त हो जानें वाले हैं रावण – कंश के मंदिर दिखेंगे


=====ओम्=====




Saturday, March 24, 2012

जीवन दर्शन 31

जीव,जीवन सिद्धांत एवं शब्द जो पैदा हुए हैं एक दिन समाप्त हो जायेंगे

आप देखना आज प्यार,प्रेम,प्रेमी एवं प्रेमिका जैसे शब्दों में कितनी और जान बची पडी है?

आज वासना शब्द की चादर प्यार शब्द को ढक चुकी है

आज समझना कठिन हो गया है कि वासना - प्यार में क्या भेद है ?

वासना माध्यम के सहारे यात्रा करती है और प्यार माध्यम रहित है और सर्वत्र है

वासना का माध्यम भाषा-भाव हैं और प्यार निर्भाव में बसता है

प्यार की धुन रहित धुन परम प्रेमी को सुनाई पड़ती है

प्रेमी शब्द रहित स्थिति में गाता है

संसार वासना का सागर है लेकिन इसका मूल परम प्रेम है

बिना गुण निर्गुण में पहुँचना संभव नहीं और बिना वासना प्यार को छूना भी सभव नहीं

गुण निर्गुण के माध्यम हैं और वासना प्यार का

सभीं गुण एवं उनके भाव प्रभु श्री कृष्ण से हैं लेकिन प्रभु स्वयं निर्गुणी हैं और भावातीत हैं

====ओम्======



Thursday, March 22, 2012

जीवन दर्शन 30

  • रामायण गानें वालों की संख्या अनेक है लेकिन उनमें स्वप्न में भी राम को देखने वाले कितने हैं?

  • घर से भाग कर प्रभु के खोजी अनेक हैं लेकिन उनमें कितने बुद्ध बन पाते हैं?

  • उपवास करने वाले भी कम नहीं लेकिन महावीर कितने बन पाए ?

  • घर में मंदिर बनवाने वाले अनेक हैं पर मन को मंदिर कितने बना पाते हैं ?

  • सभीं कहते हैं, “राम सहारे गाडी चल रही है"पर ह्रदय में बैठे राम को कितने निहारते हैं?

  • मस्तक पर चन्दन सभीं लगाते हैं पर उनमें कितने तीसरी आँख की कल्पना कर पाते हैं?

  • शिव को जल सभीं चढाते हैं पर शिव जो बातें पार्वती को ध्यान के सम्बन्ध में बताई है उनको कितने लोग जानना चाहते हैं ?

  • सीता चौदह साल अपने पति के साथ जंगल में रही और हम उनको पूजते हैं पर लक्षमण की पत्नी उर्मिला जो चौदह साल पति का इन्तजार करने में लगा दी उसे कौन जानता है ?

  • गीता कहता है, “वह जो मोह में शरीर त्यागता है उसे पशु योनी या कीड़ों-पकोड़ों की योनी मिलती है"और श्री राम के पिता दशरथ राम के मोह में शरीर त्यागा था फिर उनको कौन सी योनी मिली होगी?

  • बाल श्री कृष्ण को चाहनें वाले बहुत हैं लेकिन गीत के श्री कृष्ण[सांख्य – योगी कृष्ण]को कितनें लोग चाहते हैं?

  • एक नहीं एनेक बार द्वारिका समुद्र में समा चुकी है और अगले50सालों में एक बार और यह समुद्र में समानें वाली है,इस बात को कनाडा के भारतीय मूल के वैज्ञानिक टाटापल्ली का कहना है/


===== ओम्========





Tuesday, March 20, 2012

जीवन दर्शन 29

  • तीन गुण हैं और सबकी अपनी - अपनी आसक्तियां हैं

  • आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उठता है

  • गुणों के आधार पर तीन प्रकार की कामनाएं भी होती हैं

  • आसक्ति रहित कर्म कर्म – योग है

  • आसक्ति रहित कर्म से निष्कर्मता की सिद्धि मिलती है

  • निष्कर्मता की सिद्धि ही ज्ञान योग की परानिष्ठा है

  • परानिष्ठा सत् का द्वार खोलती है

  • सत् के द्वार से जो दिखता है वह है अब्यक्त

  • कर्म योग की सिद्धि पर कर्म में अकर्म एवं अकर्म में कर्म दिखता है

  • कर्म योग की सिद्धि प्राप्त कर्म योगी को सम्पूर्ण ब्रहमांड एक के फैलाव रूपमें दिखता है

  • अपरा भक्ति को देखा एवं समझा जाता है लेकिन परा को कौन और कैसे समझेगा ?

  • साकार निराकार का द्वार है और निराकार मात्र एक अनुभूति है जहाँ कहनें को कुछ बचता ही नहीं

    ===== ओम्=====



Saturday, March 17, 2012

जीवन दर्शन 28

गीता के शब्दों के भाव को गीता में खोजना ज्ञान – योग में पहुंचा सकता है

गीता सूत्रों की रोशनी में कर्म करना कर्म – योग हो सकता है

ऐसा कौन है जो भय से मुक्त हो ?

ऐसा कौन है जो मौत से न डरता हो ?

ऐसा कौन हो सकता है जो अमर रहे ?

ऐसा कौन है जो मौत से मित्रता स्थापित करके उसके राज को समझना चाहता हो ?

आखिर तन से हमें इतना लगाव क्यों है?

हमारे तन का क्या अस्तित्व है?

ऐसे सभीं प्रश्नों से मुक्ति पाना ही भय रहित होना होता है

और गीता ऐसे प्रश्नों के ऊपर पड़े परदे को उठा कर कहता है , देख यह है परम की माया

गीता संसार – तत्त्वों से परिचय कराता है

गीता भोग होश उठा कर हमारे अगले कदम को योग में पहुंचाता है

गीता योग भोग के द्वार को बंद करके परम गति की यात्रा पर ले जाता है

गीता के श्लोकों में वही उर्जा है जो सामवेद के बृहत्साम श्रुतियों में है

गीता के सूत्र उस ऊर्जा में पहुंचाते हैं जहाँ गायत्री छंद से साधक पहुंचते हैं

गीता भोग से योग में,योग से वैराज्ञ में और वैराज्ञ से परम में पहुंचाता है

=====ओम्========


Wednesday, March 14, 2012

जीवन दर्शन भाग 27

औरों से मिलनें वाले सुख एवं अपनों से मिलनें वाले सुख को एक तराजू में तौलो

मनुष्य सबको गुलाम बन कर क्यों रखना चाहता है?

मनुष्य के ज्ञान – विज्ञान की दिशा परमात्मा को भी गुलाम बनानें को है , क्यों ?

अन्य जीवों की तुलना में मनुष्यों की पलकें अधिक क्यों झपकती हैं?

अन्य जीव तीन मार्गी हैं[काम+भोजन+सुरक्षा]और मनुष्य चार मार्गी[काम,राम,भोजन,सुरक्षा]

भोगी उस चौराहे पर है जहाँ से चार मार्ग निकलते हैं [ काम , राम , भोजन , सुरक्षा ] और मार्गों के चयन में भ्रमित रहता है

योगी का मार्ग पगडण्डी है जो सीधे भोग से निकल कर परम में पहुंचता है जिस पर कोई चौराहा नहीं

भोगी भोग को भगवान समझता है और योगी की बुद्धि में दो नहीं एक[प्रभु]बसता है

भोगी का सम्बन्ध भगवान से मात्र भोग प्राप्ति के लिए होता है और योगी कामना-संकल्प रहित प्रभु में बसा होता है

राम में कम की तलाश है भोगी की और योगी काम को राम का मार्ग समझता है [ गीता - 7.11 धर्माविरुद्धो भूतेषु कामः अस्मि ]

खोज की यात्रा जितनी लंबी होती है मनुष्य उतना बेचैन रहता है और जब एक खोज समाप्त होती है, दूसरी प्रारम्भ भी हो जाती है


====ओम्======


Sunday, March 11, 2012

जीवन दर्शन 26

आज जो हो लेकिन कल जिसका अस्तित्व बदल जाए वह सत्य नहीं

वह जिसके ऊपर समय का प्रभाव न हो वह सत्य है

अपनी सोच के पीछे कामना - अहंकार , मोह – लोभ एवं भय – आलस्य की ऊर्जा न रखो , तुम सत्य में होगे

जबतक औरों के इशारे पर अपना कदम रखते रहोगे तुम सत्य में नहीं पहुँच सकते

लोगों की मानसिकता दिन प्रति दिन उनको सिकोड़ रही है

लोगों की उलझन को जबतक अपनें मनोरंजन का साधन समझते रहोगे तुम्हारा मार्ग गलत होगा

लोगों का कभी सुनो भी हमेशा सुनाते ही रहनें से तुम्हारा अहंकार सघन होता है

जीवन में सहारा जरूरी है लेकिन सहारे का गुलाम बन कर रह जाना दुःख का कारण हो सकता है

जो देखो उसमें उसे पकडो जिससे वह है और वह सत्य होगा

जब कोई आप का अपना बन रहा हो तो होश में रहना उसमें उसका गहरा स्वार्थ छिपा हो सकता है

दो रुपये का बैगन लेते समय आदमी दस बार सोचता है और जीवन का सौदा बिना सोचे कर बैठता है


===== ओम्======


Friday, March 9, 2012

जीवन दर्शन - 25

  • संसार से भाग कर कहाँ जाओगे?

  • जहाँ भी जाओगे तुम्हारा अपना संसार निर्मित हो उठेगा

  • तुम जिस संसार से भागे थे वह किसी और का नहीं था , तुम्हारा अपना था

  • तुम जगह बदलते रहते हो लेकिन स्वयं को नहीं बदलना चाहते

  • जबतक तुम अपनें को नहीं बदलते तुम जहाँ भी रहोगे वह तुमको नरक सा दिखता रहगा

  • यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सभीं सूचनाओं का अपना-अपना संसार है

  • संसार अर्थात एक स्पेस ; हमारी ऊर्जा का क्षेत्र

  • जहाँ कोई अपना , कोई पराया का आभाष न रहे वह प्रभु का स्पेस होता है

  • पर में स्व को देखना एवं स्व में पर को देखना ही भक्ति है

  • जब बुद्धि से तेरा-मेरा का भाव समाप्त हो जाता है तब वह बुद्धि निश्चयात्मिका बुद्धि होती है

  • निश्चयात्मिका बुद्धि में प्रभु बसता है

  • अनिश्चायात्मिका बुद्धि को भोग की बुद्धि होती है

  • ब्राह्मण वह जो ब्रह्म से परिपूर्ण हो

    =====ओम्======



Wednesday, March 7, 2012

गीता में प्रभु की बात

गीता में प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं-----

वैराज्ञ एवं मोह एक साथ एक मन – बुद्धि में नहीं रहते

वैराज्ञ बिना संसार का बोध होना संभव नहीं

संसार का बोध ही प्रकृति - पुरुष का बोध है

प्रकृति माया से माया में है

माया प्रभु निर्मित तीन गुणों का एक सीमा रहित सनातन माध्यम है

माया में आसक्त मायापति को नहीं समझता

माया मुक्त वह होता है जो गुणातीत हो

गुणातीत मात्र प्रभु हैं

मायामुक्त योगी तीन सप्ताह से अधिक समय तक देह को नहीं ढो सकता,यह बात

रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं

दो प्रकार की प्रकृतियाँ हैं;अपरा एवं परा

अपरा के आठ तत्त्व हैं ; पञ्च महाभूत , मन , बुद्धि एवं अहंकार और परा चेतना का नाम है

माया का गुलाम आसुरी प्रकृति वाला होता है

मायामुक्त होने पर योगी देवी प्रकृति वाला बनता है


=====ओम्=====



Sunday, March 4, 2012

जीवन दर्शन - 23

कामना क्रोध की जननी है
क्रोध अज्ञान का लक्षण है
सघन आसक्ति कामना का गर्भ है
काम , कामना , क्रोध एवं लोभ नर्क के द्वार हैं
काम , कामना क्रोध एवं लोभ राजस गुण के तत्त्व है
राजस गुण प्रभु मार्क की मजबूत रुकावट है
राजस् गुण की ऊर्जा का ही नाम है काम - उर्जा
तंत्र में काम ऊर्जा को रूपांतरित करके परम सत्य के खोज की ऊर्जा बनाया जाता है
राजस गुण की ऊर्जा जब निर्विकार होती है तब राम की छाया मन दर्पण पर दिखती है
राजस गुण से ही सात्त्विक गुण का द्वार खुलता है
सात्त्विक ऊर्जा से तत्त्व - वित् के देह के सभीं नौ द्वार प्रकाशित रहते हैं
====== ओम् =======

Friday, March 2, 2012

जीवन दर्शन भाग बाईस

  • अधिकांश लोग छोटी-छोटी बातो में उलझ कर रह जाते हैं

  • अहंकार से युक्त जीवन में सुख कहाँ और हम सुख प्राप्त करना चाहते हैं

  • हम कमीज बनवाते हैं अपनें लिए और पूछते हैं , भाई कैसी है , क्योंकि हमें अपनें पर भी भरोषा कहा

  • लोग क्या कहेंगे,लोग क्या सोचेंगे लोग हँसेंगे,ऎसी सोचें हमें बंधक बना कर रखती हैं

  • लोगों का भय जब इतना गहरा है फिर भगवान का भय कैसा होगा,लेकिन फिरभी हम आँख बंद किये चल रहे हैं,इस संसार में,क्यों?

  • मनुष्य जब किसी ऐसे आयाम में पहंच जाता है जहाँ उसे सभीं मार्ग बंद दिखनें लगते हैं तब वह या तो आत्म हत्या कर बैठता है या मनुष्य से भेडिया बन जाता है

  • कौन हमारा दोस्त है और कबतक यह दोस्ती रहेगी , कुछ कहना कठिन हैं लेकिन ऎसी सोच से वर्तमान की दोस्ती को खतरा न पैदा करो

  • यात्रा उसे तबतक कहते हैं जबतक वह रुके नहीं और ज्योंही वह रुकती है,अपना अस्तित्व खो देती है,जीवन भी एक यात्रा ही है

  • जीवन को अपनें प्रकृति की ऊर्जा से बहनें दो यदि जीवन का मजा उठाना चाहते हो

  • बंधक बन कर जीनें वाला जीता नहीं वह मात्र मौत का इन्तजार करता है

  • रविंद्रनाथ टैगोर कहते है , तितिलियाँ दिन , माह एवं वर्ष के सम्बन्ध में नहीं सोचती , वे जिस पल में जीती हैं उसी में मस्त रहती हैं

=====ओम्====