देह की और ब्रहमांड की बनावटें एक सी हैं,वेद कहते हैं
देह,ह्रदय में बसे ब्रह्म की तलाश का माध्यम है और ब्रह्माण्ड की तलाश मन की तलाश है
ब्रह्माण्ड की रिक्तता में ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है
मन की रिक्तता में ह्रदय में बसा ब्रह्म दिखता है
मन में कभीं दो सूचनाएं एक साथ नहीं रह सकती
मन कभीं स्वयं के संबंधमें नहीं विचार करता
मन जिस घडी स्व पर केंद्रित हो जाता है वह घडी रूपांतरण की घडी होती है
वह जो इस घडी को चूक गया , चूक गया और जो पकड़ लिया वह पार गया
भोग और भगवान एक साथ एक मन में नहीं बस सकते
लेकिन भोग के प्रति उठा होश प्रभु से परिपूर्ण कर देता है
मन को बाहर से अंदर की दिशा देना ही ध्यान है
जब मन बाहर न भाग कर अंदर रमता है तब वैराज्ञ आगमन होता है
वैराज्ञ निर्वाण का द्वार है
निर्वाण प्राप्ति ही परम गति है
परम गति का अर्थ है आवागमन स मुक्त हो कर प्रभु में समा जाना
=====ओम्======