Title :कुछ कथाएं भागवत से :--- Content: कुछ कथाएं भागवत से कलि युग के आगमन तक.... महाभारत युद्ध के समापन तक.... प्रभु श्री कृष्ण के परम धाम यात्रा तक... द्वारका का समुद्र में विलीन होने तक ... परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय तक.... हिमालय से चल कर प्रभास क्षेत्र में पश्चिम मुखी हो कर अरब सागर में अपनें को अर्पित करनें वाली परम पवित्र नदी सरस्वती एक निर्मल उर्जा क्षेत्र की जननी थी । सरस्वती के दोनों तटों पर द्वापर युग के लगभग सभीं परम सिद्ध योगियों के आश्रम हुआ करते थे । भागवत के आधार पर सरस्वती ब्रह्मावर्त क्षेत्र में पूर्व मुखी बहती थी । ब्रह्मावर्त महाराजा मनु का क्षेत्र था जो यमुना के तट पर शूरसेन एवं कुरुक्षेत्र (कुरुक्षेत्र नगर नहीं , क्षेत्र ) के मध्य का भाग था । ब्रह्मावर्त में प्रभु विष्णु भगवान वाराह अवतार में पृथ्वी को रसातल से निकाल कर लाया था । सूकर के रूप में पृथ्वी के भार से प्रभु की देह में कुछ कम्पन हुआ और फल स्वरुप उनके कुछ रोम झड गए थे जो कुश और काश के रूप में उगे । कुश का पयोग धार्मिक कार्यों में नकारात्मक शक्तितों से बचाव के लिए किया जाता है । ब्रह्मावर्त के सम्राट मनु अपनीं पुत्री देवहूति का ब्याह कर्मद ऋषि के किया जिसके गर्भ से विष्णु अवतार रूपमेंकपिलमुनिकाजन्महुआ।विन्दुसरोवर पर कर्मद ऋषि का आश्रम हुआ करता था । सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर जहाँ बेर का जंगल हुआ करता था , वहाँ शम्याप्रास आश्रम था जहां हर समय यज्ञ हुआ करते थे । शाम्याप्रास के साथ वेदव्यास जी का भी आश्रम था जहाँ भागवत की रचना हुयी और व्यास ही सर्वप्रथम भागवत की कथा अपने पुत्र शुकदेव जी को सुनाया था । कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के समय पांडवो की सेना सरस्वती के पश्चिमी तट पर रुकी थी अर्थात शम्याप्रास एवं जहाँ महाभारत युद्ध हुआ ( कुरुक्षेत्र ) दोनों जगह सरस्वती का रुख उत्तर से दक्षिण की ओर रहा होगा जब की ब्रह्मावर्त में इनका रुख पश्चिम से पूर्व की ओर था । जिस समय प्रभास क्षेत्र में ब्रिष्णी , भोज , अन्धक बंशीलोग वारुणी मदिरा पी कर आपस में लड़ रहे थे उस समय सूर्यास्त हो चला था और प्रभु सरस्वती नदी - तट पर मैत्रेय के साथ एक पीपल पेड़ के नीचे वैठे थे । :::: ॐ ::::::
Tuesday, June 11, 2013
Saturday, May 11, 2013
वह जहाँ सत्य बसता है
आज से नहीं बचपन से , हम एक दूसरे के काफी करीब रहे थे
लेकिन इधर लगभग 20 सालों से हम एक दूसरे से दूर हो गए थे
पर यह दूरी भौतिक दूरी थी , हम दोनों का तन एक दूसरे से दूर तो थे
लेकिन दिल एक दूसरे से बेहत करीब थे /
रही होगी उनकी उम्र लगभग 75 साल की
मेरे से तकरीबन पांच साल तो बड़े रहे ही होंगे / जब मैं पढ़ाई प्रारम्भ की थी तब शायद ही कोई दिन रहा हो जिस दिन उनकी मुलाक़ात गाँव के मध्य में स्थित पीपल पेड़ के नीचे न होती रही हो , बड़े ही खुश दिल मिजाज के ब्यक्ति थे और जीवन भर अविवाहित रहे /
आज न जानें मुझे क्या हुआ कि 20 साल बाद गाँव की याद आई और मैं उठाया थैला और चल पड़ा / गाँव पहुँच कर क्या देखता हूँ कि जिस पीपल पेड़ के नीचे अपनी एक भैस के साथ करीमन भाई लगभग एक दर्जन बच्चों के साथ अपनी महफ़िल लगाये हुए मिलते थे , आज उसी पेड़ के नीचे उनका जिस्म एक सफ़ेद चादर में लिपटा जमीन पर विश्राम कर रहा है और उनकी वह भैस उनके ही बगल में चुप चाप बैठी हुयी है / जब मैं उनको जमीन पर पडी देखा तो उनकी पिछली सारी जिंदगी मेरी नज़र में उतर आयी और मैं महशूश करनें लगा कि वास्तवव में जिसके लिए हम जीवन को मशीन बना कर भाग रहे हैं , वह सच्चाई नहीं है , सच्चाई तो यह है ----- /
करीमन भाई थे तो निहायत गरीब पर उनका दिन किसी बादशाह से कम न था /
करीमन भाई को कभीं भी मैं नये कपड़ों में नहीं देखा था लेकिन आज उनकी लाश को नया वस्त्र मिल गया और उनकी आत्मा को भी नया देह मिल गया होगा /
क्या है प्रकृति की गणित ----
जीवन गुजरता है तन ढकने की कोशिश में
जीवन गुजरता है , पेट की जरुरत को पूरी करनें में
जीवन गुजरता है अपनों की जरुरत को पूरा करनें की कोशिश में
जीवन गुजरता है अहँकार - कामना की खुराक इकट्ठा करने में
और ...
धीरे - धीरे जीवन घटता जाता है और जरूरते बढ़ती जाती हैं
और .
एक दिन वही मिलता है जो करीमन भाई को मिला //
=== ओम् =====
Tuesday, April 30, 2013
अँधेरे में तो कहीं हम नहीं चल रहे ?
- ज़रा रुकना , कहीं आप भोजन तो नहीं कर रहे ?
- क्या आप जानते हैं कि यह सब्जी कितनी पुरानी है ?
- जी नहीं , आप भ्रम में हैं , आप की सोच गलत है ?
- आप इतनी पुरानी सब्जी खा रहे हैं जिसकी कल्पना आप की बुद्धि में कभी नहीं उठी /
- आप की पत्नी को यह सब्जी बनानें की कला उनकी माँ से मिली /
- पत्नी की माँ को यह बिरासत में उनकी माँ से मिली थी /
- और यह क्रम चलता रहा और चल रहा है /
- लेकिन इस बात पर हमनें कभीं सोचा भी नहीं /
कहते हैं , जबाना बदल गया , क्या ख़ाक बदल गया ?
जो हम ग्रहण कर रहे हैं , वह सब कितना प्राचीन है , कुछ कहना संभव नहीं /
लेकिन यह सब होते हुए भी एक बात है ......
- आज का बैगन , आलू , चावल ,दूध आदि सब भोजन सामग्री की नश्ल बदल गयी है /
- भोजन बनानें की टेक्नोलोजी लगभग प्राचीन है लेकिन भोजन का स्वाद बदला हुआ है /
- हम लगभग अपनें बुजुर्गों की तरह दिखते हैं , लेकिन हमारी सोच बदल गयी है /
- सभी जड़ी - बूटियाँ - बनस्पतियाँ सब बदल गयी हैं लेकिन आयुर्वेद वही है /
- विद्यालय वहीं हैं लेकिन पढ़ाई बदल गयी है /
- अध्यापक देखनें में वैसे हैं लेकिन उनका दिल बदल गया है /
- किताबें हैं लेकिन उनका रंग बदल गया है /
यदि हम अपनें दैनिक जीवन में झांकते रहें तो उस का आभाष होनें लगता है जो इस बदलाव
के पीछे है /
कहीं इस बदलाव की ऊर्जा उसी की तो उर्जा नहीं ....
जिसकी तलाश हमें कहीं टिकनें नहीं दे रही //
=== ओम् =====
Thursday, April 18, 2013
ज़रा रुकना ....
- कौन सुनता है मंदिर के घंटों की आवाज को ?
- कौन सुनता है मस्जिद के मीनारों से आ रही आयतों को ?
- कौन सुनता है गुरुद्वारे से आ रही गुरुबानी को ?
- कौन सुनता है वेद मन्त्रों को ?
- कौन सुनता है गायत्री छंद को ?
- कौन सुनता है माँ के आशीर्वाद को ?
- कौन सुनता है जबानें की आवाज को ?
- कौन सुनता है गोदी के बच्चे की किलकारी को ?
- कौन सुनता है भूख की कराह को ?
- कौन सुनता है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूँज रही ॐ की धुन को ?
- कौन सुनता है अपनें किये गए कुकर्मों की पुकार को ?
ज्यादा नहीं बश एक घडी अकेले में ...
अमृत बेला में ...
आँखों को बंद करके ....
ज़रा अपनें सीनें की धडकनों के संगीत को सुनना ...
जहाँ ...
और
जिसमें ...
आपको सभीं प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे
==== ओम् ====
Tuesday, April 9, 2013
कौन और कबतक ......
- कौन मेरा है ?
- कौन तेरा है ?
- जो मेरा है , कबतक मेरा रहेगा ?
- जो तेरा है , वह कबतक तेरा रहेगा ?
- जो मेरा है ,क्या वह तेरा नहीं ?
- जो तेरा है , क्या वह मेरा नहीं ?
- जो मेरा है , क्या वह तेरा नहीं हो सकता ?
- जो तेरा है , क्या वह मेरा नहीं हो सकता ?
- मेरा की कितनीं लम्बाई है ?
- तेरा की लम्बाई क्या है ?
- क्या मेरा और तेरा समाप्त नहीं हो सकते ?
- जब मेरा और तेरा समाप्त होते हैं तब क्या होता है ?
इतनें सारे प्रश्नों में उलझनें के बाद बुद्धि जहाँ रूकती है , उसका नाम है -----
कन्हैया
और जो इस दशा में होता है ,
वह गाता है ----
करते हो तुम कन्हैया , मेरा नाम हो रहा है
पतवार के विना मेरी नाव चल रही है
अब्यय , निर्विकार , एक अक्षर , एक ओंकार , अप्रमेय , जो चाहे वह कह लो ---
लेकिन वह निर्विकार चित्त निर्विकार बुद्धि का बासी जरुर है
==== ओम् ======
Saturday, March 30, 2013
आखिर उसे भूल न सकोगे
- परमात्मा में कोई बसना नहीं चाहता ....
- परमात्मा भोग संसार में नहीं टिकनें देता ....
- हम दुःख नहीं चाहते और दुःख बिना सुख को समझते भी नहीं ....
- हम दुःख के झोपड़े में सुख की बीन बजाना चाहते हैं और सुख के महल का हमें कोई अनुभव नहीं ...
- हम जिसे अपना बनाते हैं वही एक दिन पराया हो जाता है .....
- हम भूल जाते हैं कि सभीं अपनें एक दिन पराये ही तो थे ....
- पुनः जब वे पराया बन जाते हैं फिर हमें दुःख क्यों होता है ?
- काम को परम का दर्जा देते हैं और परम का गुण गान करते हैं मात्र कामना पूर्ति के लिए ...
- हमारी चाह हमें संसार से जोड़ रखी है और बिना चाह वाला प्रभु में बसा होता है ....
- अहँकार की कडुआहट को बिना समझे उसे अपनाए हुए हैं और चैन से रहना भी चाहते हैं ...
- क्रोध की रस्सी में अपना पैर बाध रखे हैं और परम की ओर दौडना भी चाहते हैं ....
- राग में डूबे हैं और वैराज्ञ को समझना चाहते हैं ....
- आँखों से मोह की ऊर्जा है और देखना चाहते हैं योगीराज मोहन को .....
आखित हम चाहते क्या हैं ? क्या बिना उसके हमारा अस्तित्व संभव है ?
चाहे लाख उपाय करलो , लेकिन उसे अपनें ह्रदय से निकाल न सकोगे
फिर
क्यों नहीं उसे अपना लेते ?
=== ओम् ====
Tuesday, March 19, 2013
कौन ऐसा कर रहा है ?
- बुद्ध कहते हैं , अब बस्ती रहनें लायक नहीं ----
- नौजवान बस्ती से दूर शहर की ओर पलायन कर रहे हैं ----
- स्त्रियाँ कहती हैं , अब गाँव रहनें लायक नही रहा -----
- बेटियाँ कहती हैं , अब बस्ती की हवा ठीक नहीं ----
- बुड्ढे कहते हैं , अंगरेजों का जबाना ठीक था -----
- पशु कहते हैं , अब बस्ती में गुजारा नहीं होता ----
आखिर , आखिर बस्ती [ गाँव ] के मोहौल को कौन बरबाद कर रहा है ?
- गाँव के लोग शरह की ओर भाग रहे हैं .....
- गाँव के किसानों की जमीनें बेटियों की शादी में बिक रहा हैं .....
- चाहे गाँव हो या शहर , सभीं जगह काम की गहरी छाया है ....
- काम के सम्मोहन में मनुष्य मनुष्य नहीं हेवान बन चुका है ....
नर हों या नारियाँ , लड़के हों या लडकियां सभीं जो हैं जैसे हैं वैसे अपनें को नहीं दिखाना चाहते , क्यों ?
बुड्ढे अपनें को बुड्ढा समझनें की गलती कभीं नहीं करते ....
सिर के बाल , दाढ़ी , मूंछ सफ़ेद हो चुके हैं , उनकी उम्र को छिपानें की पूरी ब्यवस्था की जा चुकी है ....
नारियों के वस्त्रों की डिजाइन को देखिये , उनके अंदर से जैसे कामदेव झाँक रहे हों ....
आखिर आज के मनुष्य को क्या हो गया है ?
वह अपी असलियत को क्यों छिपा रहा है ?
वह प्रकृति के साथ क्यों खिलवाड कर रहा है ?
आज एक नहीं अनेक प्रश्न हैं जिन पर यदि गहराई से ध्यान न दिया कया तो -----
जैसे वर्तमान से पूर्व की सभीं सभ्यताएं पृथ्वी के अंदर दब चुकी है ....
वैसे ---
वर्तमान की सभ्यता भी , पृथ्वी के अंदर विश्राम करनें लगेगी //
==== ओम् =====
Wednesday, March 6, 2013
वह दिन और आज का दिन
कुछ लोग पार्टी बदल रहे हैं
कुछ लोगों का देश बदल रहा है
कुछ लोगों का धर्म बदल रहा है
कुछ लोग घर बदल रहे हैं
कुछ लोग गाँव बदल रहे हैं
कुछ लोग अपनी भाषा बदलें में लगे हैं
कुछ अपना खान - पान बदलनें में लगे हैं
कुछ पाठशाला बदल रहे हैं
कुछ अपना पेशा बदल रहे हैं
लेकिन बहुत दुःख होता है ......
यह देख कर कि -----
कोई स्वयं को बदलनें के लिए कभीं सोचता भी नहीं /
क्या होगा यह सब बदलनें से जबतक हम स्वयं को नहीं बदलते ?
भाषण से इमानदारी आयेगी ?
परिस्थितियों को बदलनें से क्या संसार बदलेगा ?
मंदिर बदलनें से क्या भगवान बदलेगा ?
धर्म बदलनें से क्या प्राकृतिक नियम बदलेंगे ?
भाषा बदलनें से क्या हम अंग्रेज बन जायेंगे ?
पोशाक बदलनें से क्या हम बदल जायेंगे ?
कुछ नहीं बदलता , जबतक हम स्वयं को नहीं बदलते , हम रुके हुए हैं एक जगह और परेशान हैं कि यह सब क्या हो रहा है ? यह सब जो हो रहा है सा दिख रहा है वह सब हमारा अपना भ्रम है , वस्तुतः कुछ नहीं हो रहा , मात्र हम रुक - रुक कर स्वप्न देख रहे हैं , स्वप्न तबतक प्यारा होता है जबतक देखा जाता है और ज्योंही आँख खुलती है , हम कहीं होते हैं और हमारा स्वप्न हमपर हसता रहता है और मौन में कहता है , अब देख तूं कि कितना बुद्धिमान है ; जबतक तेरी ऑंखें बंद थी , सब सत्य था लेकि जब आँखे खुली तो वह सत्य असत्य में बदल गया , अब तूं soc
Tuesday, February 26, 2013
कौन और कब सुना -----
मनुष्य - जी हाँ मनुष्य के मष्तिष्क की बनावट कुछ ऎसी है जिसे सुपर कंप्यूटर से भी अधिक शक्तिशाली बाना जा रहा है , वह साकार सूचनाओं के आधार पर निराकार सूचनाओं में झांक सकता है और झाँक भी रहा है / मनुष्य काम से राम तक की सोच अपनें मष्तिष्क में रखता है लेकिन दुःख इस बात का है अनुशय को न काम से तृप्ति मिल रही और न संसार में ब्याप्त उन मार्गो पर दिख रही जिनको लोग राम मार्ग कह कर राम का ब्यापार कर रहे हैं /
जीवों में मात्र मनुष्य एक ऐसा जीव है जो ऊपर आकाश में देखता है और नीचे पृथ्वी के गर्भ में भी झांकता रहता है लेकिन कहीं से उसे पल भर को भी शांति नहीं दिखती , ऐसा क्यों ? क्योंकि वह कहीं घडी भर रुकता ही नहीं / बीसवीं शताब्दी में आइन्स्टाइन प्रकाश की गति को परम माना लेकिन मनुष्य के मन की गति प्रकाश की गति से भी अधिक गति वाला है / कहते है , सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचनें में आठ मिनट लेता है और मनुष्य एक सेकण्ड के हजारहवें समयांश में सूर्य को देख लेता है /
सभीं जीव भोग में भाग रहे हैं और सबका एक मार्ग है - भोग - भोजन लेकिन मनुष्य बिचारा भ्रमित है ; वह कभीं भोग तो कभी भगवान , कभी काम तो कभीं राम , कभीं भोग तो कभी योग - एक कोजब एक हाँथ से पकता है और दूसरा उसका हाँथ तुरंत दूसरे को पकड़ लेता है / मनुष्य जब योग में बैठता है तब उसे भोग बुलानें लगता है और जब भोग में रमता है तब उसे योग कि आहट सुनाई पड़नें लगती है /
वह जो भोग को योग का माध्यम समझा ......
वह जो काम को राम का मार्ग समझा ....
वह जो पर में स्वयं को देखा .....
वह जो स्वयं में पर को देखा ....
उसे चैन खोजना नहीं पड़ता -----
उसे स्वर्ग खोजना नही पड़ता ----
वह जहाँ होता है , वहीं चैन होता है ....
और
वहीं स्वर्ग होता है
===== ओम् ======
Tuesday, February 12, 2013
कौन सुनानें वाला है और कौन सुनने वाला है ?
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर पूर्ण रूप से श्रद्धा की लहर बह रही होती है ....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर धनात्मक अहँकार का अभाव है .....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर सात्त्विक गुण प्रभावी होता है ....
सुननें वाला वह है , जिसके सभीं नौ द्वार प्रकाशित हो रहे होते हैं ....
और ----
सुनानें वाला वह है , जो प्रभु समान होता है ....
सुनानें वाला वह है , जो ब्रह्म वित् होता है .....
सुनानें वाला वह है , जो काम , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहकार रहित हो ...
सुनानें वाला वह है , जो भौतिक साधनों से संपन्न है ....
सुनानें वाला वह है , जो देता तो है लेकिन उसका देना उसके अहँकार का भोजन होता है ...
कुछ बातें सुननें और सुनानें वालो के सम्बन्ध में दी गयी हैं , लेकिन इन बातों में दो प्रकार के सुननें वाले हैं और दो ही प्रकार के सुनानें वाले हैं ; पहली श्रेणी है उनकी जो योगी है और दूसरी श्रेणी उनकी है जो भोगी हैं /
भोगी सुननें वाला है और भोगी ही सुनाने वाला -----
योगी सुननें वाला है और योगी हि सुनानें वाला ----
योगी सुनानें वाला है और भोगी सुननें वाला ----
लेकिन
भोगी सुनानें वाला हो और योगी सुननें वाला हो ऐसा होना कठिन है ,
क्योंकि
भोगी , भोगी की बात को समझ सकता है ....
योगी , योगी की बात को समझता है ....
योगी , भोगी की बात को समझता है ...
पर
योगी की बात को भोगी नहीं समझता , और यदि समझता है तब वह उस घडी भोगी नहीं होता , उस घडी उसका मन - बुद्धि भोग भाव की ऊर्जा को नहीं धारण किये हुए होते और जब ऐसा होता है तब उस भोगी को वह खिडकी भी दिखती है जहाँ से सत् की किरण उसकी ओर आती उसे दिख सकती है /
भोग से योग में रखा कदम ब्रह्म अनुभूति में पहुंचा सकता है
योग से भोग में लौटा कदम नर्क में पहुंचाता है
=== ओम् ====
Wednesday, February 6, 2013
वहाँ क्या है ?
- जहाँ न दिन है न रात ....
- जहाँ न सत् है न असत् .....
- जहाँ न मैं हैं न तूं .............
- जहाँ न काम है , न राम ....
- जहाँ न माया है , न काया .....
- जहाँ न आसमान है , न धरती .....
- जहाँ न पाप है न पुण्य .....
- जहाँ न अच्छा है न बुरा ....
- जानां न दुःख है , न सुख ....
- जहाँ न भय है न मोह ....
- जहाँ न कामना है , न क्रोध .....
- जहाँ न लोभ है , न अहँकार ....
आखिर ऐसे आयाम में क्या हो सकता है ?
- गुण तत्त्वों के परे निर्गुणी रहता है
- माया परे मायापति रहता है
- काम परे कामेश्वर रहता है
- सभीं भावों के परे भावातीत रहता है
फिर हम सब क्यों उसे समझनें में असमर्थ हैं ?
बहुत सीधा सा जबाब है :
हम जहाँ हैं , जहाँ रहते हैं , उसको समझनें की कोशिश करते ही नहीं
जिस घडी हमारी दृष्टि स्व पर केंद्रित हो जायेगी , उस घडी उसे समझनें की जरुरत न होगी , वह सर्वत्र नजर आनें ही लगेगा अतः पर से अपनी दृष्टि को स्व पर केंद्रित करनें का अभ्यास करना हमारे हाँथ में है और यह अभ्यास जिस घडी अभ्यास - योग में रूपांतरित हो उठेगा उस घडी हमें उसे खोजनें के किये काशी या काबा की यात्रा न करनी होगी , हम जहाँ भी होंगे वही काशी और काबा हो उठेगा /
प्रभु तो सर्वत्र है लेकिन ज्योंही भोग से हमारी दृष्टि प्रभु की ओर मुडती है , न जानें क्यों हमारी पलकें झपक जाती हैं और हम चूकते चले जा रहे हैं , काश ! वह घडी आये जब हमारी पलकें झपकें नही और हम प्रभु को अपनें नयनों में बसा सकें /
==== ओम् =====
Thursday, January 31, 2013
सब बदल रहा है ----
घर ....
गाँव ....
घर - गाँव के लोग ....
शहर , शहर के लोग ....
देश , देश के लोग , देश के लोगों का रहन सहन ....
पढ़ाई और पढ़ाई का तरीका ....
रहन - सहन , खान - पान .....
रीति - रिवाज ....
तीज - त्यौहार मनानें के तरीके ....
सब कुछ बदल रहा है लेकिन इस बदलाव में जो ऊर्जा काम कर रही है क्या वह भी बदल रही है ?
आज का युग विज्ञान का युग है , विज्ञान अर्थात वह जिसका आधार गहरी सोच हो और गहरी सोच से जो निकलता है उसे कहते हैं विज्ञान / सोच की मूल है संदेह और संदेह में सत्य असत्य की तरह और असत्य सत्य की तरह दिख सकता है / विज्ञान के नियमों की उम्र बहुत लंबी नही , और लंबी हो भी कैसे सकती है क्योंकि वह जिसका जन्म संदेह से हो रहा हो उसकी उम्र लंबी कैसे हो सकती है ?
आज मंगल ग्रह के ऊपर वैज्ञानिकों की नजर टिकी हुयी है और उनको वहाँ जो भी दिख रहा है उसमें पानी दिख रहा है क्योंकि बिना पानी जीव का होना संभव नहीं और वैज्ञानिकों की पूरी उम्मीद है कि मंगल पर कभीं जीव रहा करते थे / वैज्ञानिक सपना देखता है और उसका जीवन उस सपनें को सत्य का रूप देनें में गुजर जाता है / आइन्स्टाइन , मैक्स प्लैंक , श्रोडिंगर एवं अन्य सभीं नोबल पुरष्कार विजेताओं के जीवन को देखिये , वे सभी जो स्वप्न देखा उसकी गणित बनाते - बनाते उनका जीवन गुजर गया और पूर्ण तनहाई में उनके जीवन का अंत हुआ /
एक हैं वैज्ञानिक जो दिन में भी स्वप्न देखते हैं और उनको पता नहीं चल पाता की कब दिन हुआ और कब रात आयी और दूसरे हैं उपनिषद के ऋषि जिनका केंद्र वह बेला होती है जहाँ न रात होती है और न दिन जिसे कहते है संध्या या अमृत बेला / एक ऋषि अमृत बेला में योगयुक्त स्थिति में जो देखता है उसकी गणित नहीं बनाता क्योंकि उसे अपनी अनुभूति पर कोई संदेह नही और वह अपनी अनुभूति को किसी और पर लादना भी नहीं चाहता , जो चाहे उसकी बात को मानें और जो न चाहे न मानें लेकिन वह स्वयं अपनी अलमस्ती में रहता है /
- बदलाव में बदलाव की प्रक्रिया के माध्यम से उसे समझना जो सनातन है ....
- बदल रही साकार सूचनाओं में उसे देखना जो निराकार है .....
- बदलाव में उसे देखना जो साकार से इराकार में और निराकार से साकार में रूपांतरित हो रहा है ,,,,
- इस देखनें को कहते हैं ज्ञान ...
- ज्ञान प्रकृति और पुरुष [ अर्थात बदल रही सूचनाओं एवं उनके मूल ऊर्जा जिससे वे हैं] का बोध है ...
- प्रकृति बदलाव का नाम है ....
इस बदलाव में जो निराकार ऊर्जा काम कर रही है उसका नाम है परमात्मा ,ब्रह्म ,
महेश्वर , ईश्वर आदि - आदि /
रूपांतरण में उसे देखना जो रूपांतरण का मूल है , योग है ....
=== ओम् ====
Saturday, January 19, 2013
संसार में आना एक अवसर है , उसे यों ही न जानें दें
कबतक और क्यों किसी की उंगली पकड़ कर चलते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से दूर भागते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं को भी धोखा देते रहोगे ?
कबतक और क्यों दूसरों को सुनाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनें कद को खीच - खीच कर लंबा दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनी असलियत को छिपा कर रखना चाहते हो ?
कबतक और क्यों स्वयं को सर्वोपरि दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से भागते रहोगे ?
जीवन जो मिला है वह प्रभु का प्रसाद है .....
जीवन जो मिला है वह एक अवसर है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह हर पल घट रहा है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह मात्र आप का नहीं है .....
जीवन को गंगा धारा की तरह बहनें दो , वह स्वयं सागर से मिल जाएगा ...
जीवन को प्रश्न रहित बनाओ .......
और
जीवन को प्रभु को समर्पित करो
और
स्वयं को कर्ता नहीं द्रष्टा रूप में देखो ....
और
तब जीवन का वह परम रस मिलेगा जिसकी ही तलाश हमें आवागमन में बनाए हुए है //
===== ओम् =======
Sunday, January 13, 2013
स्वयं से पूछो
आप अपनें जीवन - यात्रा का रुख किधर को रखा है ?
आप दिल से किसे चाहते हैं ; भोग को या भगवान को या दोनों को ?
भोग और भागवान एक साथ एक बुद्धि में नहीं रहते , ऎसी बात गीता कहता है , फिर ?
क्या यह संभव नहीं कि भोग के आइनें में भगवान को देखा जाए ?
- हमारा अधिकाँश समय दूसरों के सम्बन्ध में सोचनें में गुजर जा रहा है , क्य हम इसे समझते हैं ?
- जितना समय हम दूसरों में बुराई को खोजनें में लगाते हैं यदि उसका एक चौथाई भी अपनें में बुराइयों को देखनें में लगाएं तो संभव है आप परम सत्य को देखनें में सफल हो सकें
- ऐसा क्यों है कि हमें दूसरों में मात्र बुराइयां दिखती हैं और अपनें में अच्छाइयां ही अच्छाइयां ?
- क्या हम राम को इस लिए चाहते हैं कि सारी सोचें कामयाब हो सकें ?
- क्या राम मात्रा कामनाओं को पूरा करनें की मशीन बन कर रह गया है ?
- क्या हम राम के अधीन हैं या राम हमारे अधीन ?
- हम क्यों चाहते हैं कि सभीं हमारे इशारे पर चलें चाहे वह भगवान ही क्यों न हो ?
- पिता , माता , पत्नी , पुरुष , पुत्र / पुत्री , सगे - संबंधी सभीं को हम अपना गुलाम क्यों बनाना चाहते हैं ?
- बहुत हो चुका , मालिक बनें लेकिन मात्र अतृप्तता ही मिली , फिर क्या करें ?
- चलो , अभीं तक जिनको हम अपना गुलाम बनाना चाहते रहे उनमें से किसी एक का ही सही , गुलाम बन कर देखते हैं
- क्या हम समझते हैं कि प्रभु संदेहों से भरी बुद्धि - क्षेत्र में नहीं रहता , वह तो बसेरा बनाता है उनके हृदयों में जिनके ह्रदय ......
मीरा , कबीर , नानक , परम हंस रामकृष्ण जैसे हों ......
ऐसे दिल जिनसे श्रद्धा छलकती हो
ह्रदय में श्रद्धा की लहर उठाई नहीं जा सकती यह तो प्रभु का प्रसाद है जो किसी - किसी को कभीं - कभीं मिलता है
अब सोचिये नहीं -----
क्योंकि ....
नानकजी साहिब कहते हैं ....
सोचे सोचि न होवहीं ----ज्यों सोची लख बार .....
जहाँ सोच है , वहाँ संदेह भी होगा , क्योंकि सोच संदेह की पहचान है
==== ओम् ======Tuesday, January 8, 2013
यह क्या हो सकता है ?
- जहाँ न दुःख हो और जहाँ न सुख हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न दिन हो न रात हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न अपना हो , न पराया हो , वहाँ कौन हो सकता है ?
- जहाँ न भोग हो , न योग हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न कुछ अच्छा हो न बुरा , वहाँ क्या हो सकता है ?
- वह जिसे न तन से , न मन से पकड़ा जा सके , वह कौन हो सकता है ?
- जिसे न गाया जा सके , न लिखा जा सके , वह कौन हो सकता है ?
जीवन प्रश्नों से भरा है , जबतक मन - बुद्धि में संदेह है , तबतक प्रश्न का होना भी संभव है
जिस घडी मन - बुद्धि संदेह रहित होते हैं उस घड़ी मन -बुद्धि प्रश्न रहित हो उठते हैं
और
- प्रश्न रहित मन - बुद्धि का आयाम प्रभु का आयाम होता है
- प्रभु निर्भाव मन - बुद्धि पटल पर प्रतिबिंबित होते हैं और उनकी अनुभूति चेतना को होती है
मनुष्य एक खोजी जीव है और सब में उसे जो मिलता है वह उसे और अतृप्त बना जाता है और अतृप्तता की तिब्रता हर पल ऊपर ही उठती जा रही है /
जो उसे पा लेता है , उस घडी तो शांत हो उठता है लेकिन ज्योंही उसके उसका सम्बन्ध टूटता है , पुनः वह ब्याकुल हो उठता है और यह क्रम तबतक चलता रहता है जबतक तन में प्राण हैं /
- जिसनें उसे मनमोहन नाम दिया होगा , वह उसके कितनें गहरे प्यार में रहा होगा ?
Thursday, January 3, 2013
जीवन को देखो ----
प्रभु के इस प्रसाद को ऐसे प्रयोग करो कि यह प्रभु तक पहुंचा सके
प्रभु के प्रसाद को न खीच - खीच कर लंबा करो न इसे सिकोड़ कर रखो
जीवन की पीछली तस्बीरों को न तो भूलो और न ही उनका गुलाम बनो
अपनें अगले कदम को जहाँ रखो उसे ठीक से समझो
जीवन में हर कदम एक मोड है , जहाँ से स्वर्ग - नर्क की राहे निकलती हैं
जीवन का हर पल प्रभु मय है , अगर कोई प्रभु समर्पित जीवन जी रहा हो , तो
प्रभु आप को सबकुछ तो दे दिया है , अब और की मांग क्या उचित है ?
औरों को देख कर अपनें जीवन के रुख को न बदलो
संसार में सबका अपना - अपना जीवन है
संसार में सबके जीवन का अपना - अपना रंग है
संसार में सबके जीनें का अपना - अपना ढंग है
एक संसार प्रभु निर्मित है और उस में हम सब अपना - अपना संसार बनानें में लगे हैं
संसार में सबको एक निश्चित अवधि का जीवन मिला हुआ है ....
इस अवधि को कौन कैसे गुजारता है , यह सबकी अपनी -अपनी सोच है
Friday, December 28, 2012
कौन सुनता है ? कोई तो सुनता ही होगा
दिल से कौन सुनता है ?
- गुरुद्वारा से आ रही गुरुवानी की परम धुन को .....
- मंदिर से उठती ओम् की धुन को .....
- मस्जिद से आ रही अल्लाह ओ अकबर की पुकार को .....
- खाली पेट वाले की भूख के दर्द को ......
- वक्त की पुकार को .....
- सब के सीनें में दबी दर्द को ......
- मीरा के भजन को .....
- कबीर जी के वचनों को .....
- नानक जी के ह्रदय के भाव को .....
- गायत्री के छंद को ......
- पृथ्वी की दर्द भरी आवाज को ....
ऎसी एक नहीं अनेक बातें हैं, हम इन्शान को सुननें के लिए
लेकिन ---
हम क्यों नहीं सुन पा रहे , कोई तो कारण होगा ही ?जी , हाँ , कारण है और गहरा कारण है .....
हम यदि स्वयं को देखें तो एक चलती - फिरती लाश के अधिक नहीं जिसकें गति तो है ....
लेकिन
चेतना नहीं
ऐसा कौन सा धर्म ग्रन्थ है जो यह न कहता हो कि ----
परमात्मा तुम्हारे ह्रदय में है , हम जानते भी हैं लेकिन समझते नहीं , न ही समझनें की कोशिश करते हैं /
प्रोफ़ेसर आइन्स्टाइन कहते हैं : -----
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जानते हैं उसे अपनें ह्रदय से समझते भी हैं /
सौ साल जीना ब्यर्थ है यदि बेहोशी में जीया जाए
और
होश भरा एक पल का जीवन ही वह जीवन है .....
जिसकी तलाश हम सब को है //
==== ओम् =====Friday, December 21, 2012
केवल दो घडी , सोचना
- आज कौन जीना चाहता है ?
- आज कौन मरना चाहता है ?
- आज मनुष्य अपनें जीनें - मरनें का क्या मापदंड बना रखा है
- क्यों लोग भोग के लिए जीना और भोग के लिए मरना चाह रहे हैं ?
- आज क्यों लोग परमात्मा को पीठ पीछे रख रहे हैं ?
- आज क्यों मनुष्य की सोच नकारात्मक हो रही है ?
- आज जितना भय मनुष्य को मनुष्य से है उतना भय और किसी जीव से नहीं , क्यों ?
- आज का मनुष्य आखिर चाहता क्या है ? मात्रा कामना - काम की तृप्ति /
- आज वे सबहीं पराये से क्यों दिखाते हैं जो पहले अपने हुआ करते थे ?
एक घडी ही सही ....
आज नहीं तो कल ही सही ....
लेकिन ....
आप शांत मन - बुद्धि के आयाम में बैठ कर परम सत्य में जरुर डूबें /
==== ओम् =====
Wednesday, December 12, 2012
एक नज़र इस पर भी
कौन परमात्मा की ओर पीठ करके रहना चाहता है ?
कौन शास्त्रों को नही पढ़ना चाहता ?
कौन शात्रों को अपनें जीवन की डोर बनाना चाहता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को नक्कारता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को अपनें जीवन में उतारना चाहता है ?
कौन झूठ बोलना चाहता है ?
कौन सत्य पर यकीन करता है ?
कौन किसी से सलाह नहीं लेता ?
यहाँ सलाह देनें वालों की कतारें खडी हैं लेकिन उनकी सलाह को लेनें वाले कितनें हैं ?
मंदिर में प्रसाद लेनें वालों की लंबी लाइन लगी दिखती है लेकिन प्रभु के प्रसाद - प्राप्ति के बाद भी वे अतृप्त क्यों दिखते हैं ?
कौन किसको और कब अपना समझता है ?
मंदिर - गुरुद्वारा में जा रहे हैं और साथ में पेस्तौल लटकाए हैं , क्यों प्रभु पर विश्वास नही ?
कौन प्रभु पर और किस लिए विश्वास करता है ?
प्रभु पर हमारा विश्वास कितना गहरा है ?
** मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल रहा हूँ जो राधे - राधे , कृष्ण - कृष्ण , राम - राम कहते हुए अब जीवन के आखिरी पायदान पर जा पहुंचे हैं / मैं उनसे एक सवाल करता हूँ , क्या आप कभीं स्वप्न में भी राधा को , या कृष्ण को या राम को देखा ? सब का एक उत्तर मिलता है , जी नहींऔर वह भी गुस्से में पर एक सज्जन ऐसे भी मिले जो बतानें से पूर्व रो पड़े और बोले , यदि दिखे होते तो आज यहाँ गंगा किनारे क्यों बैठा होता ?
सत् की स्मृति यदि गहरी हो तो जीवन सत् में गुजरता है
न कि ....
जीवन सत्य की खोज में गुजरता है /
बश एक पल , मात्रा एक पलांश जब गहरी सोच की लहर ह्रदय में उठेगी तब वह स्वप्न में ही नहीं वर्तमान में आप के सामनें दिखनें लगेगा
और
तब आप वही कहेंगे जो गीता कहता है -----
वह सबे बाहर , सबसे दूर , सब के समीप , सब के अंदर है
और
सभीं उसके फैलाव स्वरुप हैं
==== ओम् ========
Friday, December 7, 2012
अपनें को सुनो और देखो भी
सड़क एक दम सीधी हो तो उत्तम रहेगा /
दोनों किनारे एक दूसरे के समानांतर चलते हैं पर .....
सड़क के दोनों किनारे सामनें कही दूर आपस में मिलते हुए से दिखते हैं .....
लेकिन ऐसा होता नहीं /
क्या कभीं आप अपनें इस भ्रान्ति के सम्बन्ध में सोचा है ?
दोनों किनारे समानांतर चलते हैं और आपस में मिलते हुए से भी दिखते हैं .....
दो आँखें और एक बुद्धि हमें किस भ्रान्ति में रख रहे हैं ....
आप कभीं इस पर सोचा नहीं होगा ?
सड़क की भांति हमारे जीवन का भी रहस्य है .....
भोग - योग दोनों समानांतर चलते से दिखते हैं लेकिन ऐसा है नहीं /
भोग एक माध्यम है जिसमें उठा होश ही योग है और योग वाहन पहुंचाता है ......
जहाँ दोनों मिलते से दिखते भर नहीं मिलते भी हैं ....
और उस मिलन को कहते हैं अब्यक्त , अचिन्त्य , अप्रमेय , ब्रह्म और .......
सांख्य - योगी जिसे कहते हैं परम पुरुष और ......
जिसे ध्यान में उतरे योगी अपनें ह्रदय में देखते हैं ....
ब्रह्म चारी अपने ब्रह्म चर्या में पाते हैं ....
तप करनें वाले अपनें तप की ऊर्जा में देखते हैं ...
और ...
प्रेमी अपनें प्यार में पाते हैं //
=== ओम् =====
Sunday, December 2, 2012
जबतक -------
[क] जबतक श्वासें चल रही हैं , उसके लिए
- अपनें - पराये हैं
- यह तेरा और यह मेरा है
- जाति - धर्म है
- दिन - रात हैं
- सुख - दुःख है
- अच्छा - बुरा है
वह सब है जो चाह आधारित है
लेकिन -----
[ख] जब श्वासें चलानी बंद हो जाती है , तब
- वह स्वयं अपना सांसारिक अस्तित्व खो बैठता है
- पलंग से उसे उसके अपनें ही उठा कर जमीं पर लिटा देते हैं
- उसका नाम रामानंद - ज्ञानानंद नहीं रह जाता
- उसे अब उसके अपनें ही मुर्दा कहनें लगते हैं
- उसकी कोई जाति नहीं रहती
- उसका कोई धर्म नहीं होता
- उसकी कोई चाह नहीं रहती , भौतिक स्तर पर
- उसके लिए उसके कोई अपनें - पराये नहीं रहते
- उसे सुख - दुःख , गर्म - ठंढा और अन्य सभीं द्वैत्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
- उसे संसार में हो रही घटनाएँ नहीं हिला पाती
वह जिस आयाम में होता है उसके लिए .......
उस घडी जो रहता है , उसे गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ----
अब्यय , अप्रमेय , अब्यक्त , सनातन
और .....
मनुष्य जीवन भर भागता रहता है , जो उसे मिलता है उससे उसे क्षण भर की शांति मिलती है लेकिन .....
वे धन्य हैं ----
जिनको उनकी श्वास चलते अपनी श्वासों के मध्यम से उस परम अब्यय की खुशबू मिल जाती है ----
और उस खुशबू में वे तृप्त हो उठते हैं
उनके लिए ---
सभीं द्वित्य तिरोहित हो उठते हैं
और ---
वह अद्वैत्य की ऊर्जा में अलमस्त रहता है
=== ओम् =====
Sunday, November 25, 2012
गुरु प्रसाद - 1
- दस गुरुओं के साधनाओं का फल है
- सत्रह भक्तों की अनुभूतियों का रस है
- पंद्रह परम भक्तों की वाणियों का सुर है
- भाई मरदाना जैसे परम भक्त की धुनें है
- 1जो चौदह सौ तीस पृष्ठों में फैला हुआ है
- तीसरे गुरु श्री अमर दास की नौ सौ चौहत्तर वाणियों का संग्रह है
- दूसरे गुरु श्री अंगदजी साहिब की तिरसठ वाणियों की गंगा प्रवाहित होती हैं
- आखिरी गुरु श्री गोबिंद जी साहिब का निर्देशन है और भाई मणि सिंह की बुद्धि है जिनके द्वारा यह लिपिबद्ध हुआ
- सन चौदह सौ से सत्रह सौ के मध्य के संतों फकीरों की वाणियों का संग्रह है
- दस गुरुओं सत्तरह भक्तों एवं पन्द्रह परम सिद्धों की ऊर्जा है
- ऐसे परम पवित्र को छोड़ कर आप और कहाँ और क्या खोज रहे हैं
- एक ओंकार
Friday, November 23, 2012
कोई तो सुनता ही होगा
- कौन क्या बोल रहा है , यह महत्वपूर्ण नहीं , आप क्या सुन रहे हैं , यह महत्वपूर्ण है
- बोलनें वाला कभी यह नहीं समझता कि सुननें वाला क्या सुन रहा है
- सुननें वाला कभी यह नहीं सोचता की बोलनें वाला क्या बोलना चाह रहा
- बुद्धि स्तर की समझ बहुत कमजोर समझ होती है
- ह्रदय की समझ , गहरी समझ है
- जिस से हमारा कोई खास मतलब होता है उसकी हर बात हमें स्वीकार होती है
- जिससे हमारा कोई मतलब नहीं उसकी बात को सुननें के हमारे कान और होते हैं
- प्रकृति अब सिकुड़ने लगी है और मनुष्य का अहंकार फ़ैल रहा है
- विज्ञान के आविष्कारों का प्रकृति को सिकोड़ने में हो रहे प्रयोग घातक हो सकते हैं
- विज्ञान संदेह आधारित है और संदेह की रोशनी में सत्य को देखना संभव नहीं
- संदेह जब श्रद्धा में बदलता है तब उस ऊर्जा से सत्य दिखता है
विज्ञान का केन्द्र मन - बुद्धि हैं और ज्ञान का केन्द्र है ह्रदय
निर्विकार मन - बुद्धि का सीधा सम्बन्ध ह्रदय से होता है
ह्रदय में चेतना की ऊर्जा तब प्रभावी होती है जब मन - बुद्धि निर्विकार हो जाते हैं
हमेशा औरों के सम्बन्ध में ही क्यों सोचते रहते हो कभीं अपनें बाते में भी सोचा करो
- आज औरों के ऊपर कफ़न डाल रहे हो एक दिन और तुम पर कफन डालेंगे
==== ओम् ======
Saturday, November 17, 2012
हम इनके मध्य हैं - - - - -
- एक परमात्मा ......
- अनेक देवता ........
- एक माया ............
- अनेक जीव .........
- दो प्रकृतियाँ ........
- ऊपर आकाश .....
- नीचे एक काल्पनिक संसार , पाताल .....
- सप्त सिंधु ......
- सप्त ऋषि .....
- सप्त दिन [ सप्ताह ] .....
- नौ ग्रह .......
- देव - दानव .....
- सच - झूठ ......
- अपना - पराया .....
- सास - ससुर , पति - पत्नी , पुत्र - पुत्री , समाज
- समाज की जरूरतें और स्वयं की चाह
- स्वर्ग - नर्क का भय
हमारे रहनें के आयाम तो अनेक हैं , हम उनमे कैसे रहते हैं , यह हमारे जीवन की दिशा को तय करता है
जीवन वह है जो न अपनें लिए जीया जाए , न पराये के लिए ,जीवन चाह रहित एक दरिया की धार जैसे बहते रहना चाहिए जहाँ किसी अवरोध की कोई फ़िक्र न रहे और धीरे - धीरे ऐसा जीवन जहाँ पहुँचता है उसी का नाम है.........
परम धाम
==== ओम् ======
Saturday, November 10, 2012
मनुष्य और पशु
भोग - भोजन की खोज में पशु आखिरी श्वास भरता है
मनुष्य भोग में होश उठा कर परम गति प्राप्त करता है
परम गति अर्थात जहाँ समय की छाया नहीं पड़ती
जहाँ सूर्य - चन्द्र - अग्नि प्रकाश का श्रोत नहीं
जो स्व प्रकाशित है
पशु का मूल स्वभाव है भोग और ....
मनुष्य का मूल स्वभाव है अध्यात्म
गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं [ श्लोक - 8.3 ] .....
स्वभावः अध्यात्मं उच्यते
पशु कभीं आकाश नहीं देखता और मनुष्य आकाश में भी घर बननें को सोच रहा है
वह जो काम को न समझा , वह जो कामना को नहीं समझा , वह जो क्रोध को नहीं समझा ...
वह जो मोह को नहीं समझा , वह जो अहँकार को नहीं समझा .....
वह पशु है और वह भी भोग - भोजन की तलाश में कहीं मध्य मार्ग के चौराहे पर दम तोड़ देगा और पुनः पशुवत योनि में पैदा हो कर भोग - भोजन में भागता रहेगा ,
लेकिन ----
जो काम से राम की यात्रा कर लिया , जो भोग में भगवान की छाया देख ली , वह आवागमन से मुक्त हो कर प्रभु में बसेरा बना लेता है /
=== ओम् =====
Saturday, November 3, 2012
होश में या बेहोशी में ----
मैनें अमुक पराये को अपना लिया है , क्या यह सत्य है ?
क्या पराये को अपनाया जा सकता है ?
क्या अपनों को पराया बनाया जा सकता है ?
अपनों को पराया बनाना ------
परायों को अपना बनाना ------
दोनों बातों में समान वजन है ; जो एक को कर लिया दूसरा उसके लिए कठिन नहीं
जो यह कहता है कि हमनें अमुक को अपना लिया लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ,
यह बात दिल की बात नहीं बाहर - बाहर की बात है ----
जो दिल से किसी को अपनाता है उसके पास मैं और तूं दो नहीं रहते , अपनानें के साथ ही मैं तूं में बिलीन हो जाता है , फिर कौन बचा रहता है जो यह कहे कि , उसको मैं अपना लिया था लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ?
अपनाना कोई कृत्य नहीं , यह एक घटना है जो स्वतः घटती , पता तक नहीं चल पाता और जब यह पता चलता है कि मैनें अपना लिया है उसी घडी उसमें अपनानें की ऊर्जा बदल जाती है / अपनाना एक प्रकार की साधना का फल है जिस पर कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहँकार की छाया तक नहीं पड़ती और जहाँ ऐसा आयाम हो वह स्थान तीर्थ होता है और वहाँ प्रभु को खोजा नहीं जाता , वहाँ सर्वत्र प्रभु ही प्रभु दिखता है /
आप न कुछ अपनानें की कोशिश करे न त्यागानें की , आप मात्रा उसे देखें जो आप के साथ घटित हो रहा हो और ----
आप का जब यह अभ्यास सघन होगा तब आप कुछ और हो गए होंगे , मेरे जैसे बैठ कर ब्लॉग नहीं लिखेंगे , ब्लॉग में स्वय को घुला दिए होंगे जैसे गंगा गंगा सागर में स्वयं को घुला कर मुक्त हो जाती है /
==== ओम् ======
Wednesday, October 31, 2012
आइये देखते हैं स्वयं को -------
लेकिन ----
जो हमनें स्वयं ले रखा है उसका क्या होगा ?
जो गट्ठर हमारी पीठ पर रखा गया है वह तो समझो उतर ही रहा है
लेकिन -----
जो हमनें स्वयं रखा है उसका क्या होगा ?
हम चिंतित हैं क्यों ?
इसलिए नहीं कि हमारे पास वह नहीं जिसे हम चाहते हैं
लेकिन----
इस लिए कि वह उनके पास क्यों है ?
मनुष्य दूसरे की गलती पर स्वयं को ताडित करता है , क्यों ?
जैसे यदि कोई हमें गाली दे दे तो हमारा खून खौलनें लगता है , ऐसा क्यों ?
यदि वह गाली दे रहा है हम उसे ले क्यों रहे हैं ,
उसे यदि न लिया जाए तो वह वापिस जा कर उस ब्यक्ति के सीनें में चोट मारेगा
लेकिन----
हम ऐसा करनें का अभ्यास नहीं करते
==== ओम् =====
Saturday, October 27, 2012
कभीं अकेले में ही सही सोचना ----
जीवन कितना चौड़ा है ....
जीवन कितना गहरा है ....
जीवन की चौड़ाई को हम नित पल खीच - खीच कर बढानें में लगे हैं लेकन जब जीवन की लम्बाई की सोच आती है तब हम बेचैन से होनें लगते हैं , ऐसा क्यों ?
जीवन की गहराई के सम्बन्ध में हमारा मन कभीं नही सोचता और हम अपनें जीवन के इन तीन आयामों में से मात्र एक पर टिके हुए जीवन गुजार रहे हैं /
सभीं यहाँ परम आनंद के आशिक हैं लेकिन जीवन का मात्र एक तिहाई आयाम को पकडे हुए चल रहे हैं , भला ऎसी स्थिति में कैसे परम आनंद की झलक मिल सकती है ? ऐसा जीवन तो तनहा जीवन ही रहेगा /
परम आनंद प्रभु का द्वार है , जो जीवन की गहराई में कहीं अनंत में जा कर परम प्रकाश के माध्यम से दिखता है और वह भी कई शताब्दियों में किसी - किसी को और एक हम हैं जो जीवन की गहराई के सम्बन्ध में कभीं सोचते ही नहीं , फिर हमें परम आनंद कैसे मिल सकता है ?
जीवन की गणित आम गणित से भिन्न है , इस गणित पर गुरजिएफ के एक महान शिष्य एवं महान गणितज्ञ ओस्पेंसकी खूब सोचे हैं और सोचते - सोचते वे जरुर परम आनंद में पहुंचे होंगे /
जीवन की लम्बाई हमारे दो श्वासों के बीच की दूरी के एक अंश के बराबर होती है , जिसको हम कभीं नहीं देखना चाहते , क्योंकि बुद्ध कहते हैं - एक घंटा जो रोजाना अपनी प्राण - अपान वायुओं को देखता रहता है उसे निर्वाण प्राप्त हो सकता है और निर्वाण परम आनंद का द्वार है जहाँ से परम प्रकाश की अनुभूति होती है /
हम अपनें जीवन की चौड़ाई को अपनें अहँकार की रस्सी से मापते हैं ; जितना बड़ा अहंकार उतना चौड़ा
जीवन ; यह एक ऐसा भ्रम है जो सीधे नरक के द्वार पर ले जा कर कहता है - जा , अब तेरी मंजिल आगयी /
जीवन का मजा लेना चाहते हो तो -----
आज से रोजाना कुछ समय के लिए अपनी यातो प्राण वायु को या फिर अपान वायु को विचार रहित मन - बुद्धि से देखनें का अभ्यास प्रारम्भ करें , क्या पता यही आप को निर्वाण में पहुंचा दे ?
===== ओम् =====
Tuesday, October 23, 2012
जरा समझना ------
- वे आप के साथ हैं या आप उनके ......
- पुत्र आप के साथ है या आप पुत्र के साथ .....
- पत्नी आप के साथ है या आप पत्नी के साथ ......
- परिवार आप के साथ है या आप परिवार के साथ .....
- आप अपनी सोच के गुलाम हैं या आप की सोच आप की ......
- आप इंद्रियों के गुलाम हैं या इन्द्रियाँ आप की ......
- आप अपनें मन के संग हैं या मन आप के संग ......
- आप परमात्मा को खोज रहे हैं या परमात्मा आप को ......
- आप से परमात्मा है या परमात्मा से आप ......
- आप के संग परमात्मा है या परमात्मा के संग आप .......
- आप प्रकृति से हैं या प्रकृति आप से .......
वहाँ जो दिखेगा , उस से और उस में यह ब्रह्माण्ड है
==== ओम् ========
Sunday, October 7, 2012
जरा रुकना बश दो घडी
- कौन दुखी रहना चाहता है ?
- यहाँ कितने सुखी हैं , तन एवं मन से ?
- कितनें अपने दुःख का कारण स्वयं को समझते हैं ?
- कितनें अपनें दुःख को समझते हैं ?
- कितनें औरों के दुःख को समझते हैं ?
- कितनें औरों के दुःख को देख कर आनंदित होते हैं ?
- कितनें दुःख की मूल को देखना चाहते हैं ?
- कितनें सच्चाई को समझना चाहते हैं ?
- कितनें दूसरों को दुखी कर के सुख का अनुभव करते हैं ?
- कितनें दूसरों के दुःख को अपनें दुःख की भांति देखते हैं ?
जो सब पर बराबर नजर डाले हुए है और जहाँ एक दिन सबको पहुँचना है और पहुँच कर अपनें किये गए का जबाब भी देना है , जहाँ कोई तर्क - वितर्क की कोई संभावना नहीं , जहाँ चेहरा देख कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया जाता है /
समय किसी का इन्तजार नहीं करता , दो घडी कभीं अकेले में बैठ कर सोचना कि ........
जिनके लिए इतनी गति से भाग रहे हो क्या वे आप के साथ चिता जलनें तक भी रुक पायेंगे ?
==== ओम् =======
Tuesday, October 2, 2012
जीवन दर्शन - 58
क्रोध - ऊर्जा की आवृति प्रति सेकण्ड अधिक होती है
मोह - उर्जा इन्द्रियों को सुखाता है
क्रोध - उर्जा नाश की ओर ले जाता है
कामना में जब गहरा अहँकार होता है तब जब वह कामना दूटती है , क्रोध उठता है
कमजोर अहँकार की कामना - ऊर्जा मोह में बदल जाती है
कामना देह की कोशिकाओं में फैलाव लाता है
मोह कोशिकाओं को सिकोड़ता है
मोह का अहंकार बाहर से नही दिखता , यह अंदर सिकुड़ा रहता है
कामना का अहँकार बाहर परिधि पर छाया रहता है
==== ओम् ========
Friday, September 21, 2012
Kabhi - kabhi inko bhi samajhe
1- kaun khush nahi rahana chaahataa
2- kaun chaahataa hai ki uski aankho se boonde tapakatii rahen
Lekin--------
Yahaan kitane log aur kitanii ghadii khushii me gujaar rahe hain
Psnnch logo se khushii kii paribhashaa poochhana , ho sakta hai aap ko paanch se bhii kuchh adhik paribhaashaayen mile .
Manushya apane man kaa gulasm hai aur man ke paas sandeh ke alawaa aur kuchh nahiin
Atah ....
Apane man ko pahale samajhe aur jb man kii samajh pakki hojaayegi tb aap ko kisii kii paribhshaa kr sambsndh me nahi sochana hogaa
Kyonk.....
Tb aap datya me honge
##### OM #####
Tuesday, September 11, 2012
Jaraa Dekhana
Sansaar me kyaa nahi jo manushya ki pakad se pare ho lekin itanii samarth ke baawajood bhi manushya kiskii koj me khoyaa huaa hai ?
:::::: om :::::
Thursday, July 26, 2012
जीवन दर्शन - 55
- क्रोध एवं मोह दोनों में देह में कंपन होता है
- क्रोध के कंपन की आबृति मोह के कंपन की आबृति से अधिक होती है
- क्रोध का केंद्र मुह में जबड़ों में होता है
- मोह का केन्द्र है नाभि
- मोह जोडनें की उर्जा रखता है
- क्रोध में तोड़ने की उर्जा होती है
- कामना , क्रोध में धनात्मक अहँकार होता है
- मोह में नकारात्मक अहँकार होता है
- मोह एक प्रकार की कामना ही है लेकिन इसका केंद्र है तामस गुण
- कामना काम ऊर्जा का रूपांतरण है और इसका केंद्र है राजस गुण
Monday, June 11, 2012
जीवन दर्शन 54
बुद्ध पुरुष सुख एवं दुःख दोनों का चिकित्सक होता है
बुद्ध पुरुष न सुख देते हैं न दुःख
बुद्ध पुरुष उस आयाम में पहुंचाते हैं जहाँ से एक तरफ सुख औए एक तरफ दुःख दिखते हैं
बुद्ध पुरुष सुख एवं दुःख दोनों का द्रष्टा बनाते हैं
बुद्ध पुरुष वह रोशनी देते हैं जिससे सुख एवं दुःख दिखते हैं
बुद्ध पुरुष को खोजा नही जा सकता
बुद्ध पुरुष कहीं नहीं हैं और सर्वत्र हैं
बुद्ध पुरुष को देखनें की रोशनी ध्यान से मिलती है
ध्यान की गहराई में जब चेतना आत्मा को छूटी है तब उस घडी कोई बुद्ध वहाँ दिखते हैं
बुद्ध बताना तो वह सब चाहते हैं जिनकी अनुभूति उनको हुयी होती है
लेकिन …....
**इंद्रियों के माध्यम से अपनी अनुभूति ब्यक्त करनें की कोशिश अधूरी ही रहती है
**परम अनुभूति को इंद्रियों से ब्यत किया नही जा सकता
**परम सत्य ब्यक्त होते ही असत्य बन जाता है
**सत्य में वह जीता है जो गुणातीत होता है
**गुणातीत परम तुल्य होता है
**परम तुल्य योगी को जो समझता है वह स्वयं गुणातीत योगी ही होता है
**दो बुद्ध कभीं आपस में बातें नहीं करते
वे धन्य हैं जो बुद्ध - ऊर्जा क्षेत्र में रहते हैं
बुद्ध ऊर्जा क्षेत्र हैं - जैसे - कर्बला , काशी , मक्का , मानसरोवर , कैलाश , जेरुसलेम , द्वारका , उज्जैन , हरिद्वार , केदारनाथ , बद्रीनाथ , 51 शक्ति पीठें , 11 ज्योतिर्लिंगम के स्थान आदि
====ओम्=======
Sunday, June 3, 2012
जीवन दर्शन 53
आत्मा यदि मात्र बुद्धि की उपज है तो फिर उस ब्यक्ति की बुद्धि कैसी रही होगी जिसनें आत्मा के सम्बन्ध में सोचा होगा?
गीता में श्री कृष्ण कहते हैं,आत्मा के रूप में मैं सबके दृदय में रहता हूँ और इसके माध्यम से सब का आदि मध्य एवं अंत मैं ही हूँ
गीता में प्रभु यह भी कहते हैं,आत्मा मेरा ही अंश है
अगर आत्मा शब्द का जन्म न हुआ होता तो परमात्मा शब्द भी न होता
प्रभू का एक जीव-माध्यम सर्वत्र फैला हुआ है,सम्पूर्ण ब्रहांड में जो प्राण ऊर्जा का माध्यम है
प्रभु का यह माध्यम तीन गुणों के माध्यम माया के साथ है
माया से माया में दो प्रकृतिया हैं;अपरा एवं परा
अपरा साकार प्रकृति है जिसमें पञ्च महाभूत,मन,बुद्धि एवं अहँकार होते हैं
परा प्रकृति आत्मा माध्यम का बाहरी झिल्ली होती है जिसको चेतना कहते हैं और जिसके माध्यम से जीव एवं प्रकृति का मिलन होता है और यह मिलन ही नये जीव को संसार में ले आता है
यदि प्रकाश का अति शूक्ष्म कण फोटान हो सकता है तो फिर परमात्मा का अति शूक्ष्म कण आत्मा क्यों नहीं हो सकता?
विज्ञान के पास आज तक कोई कैसा ऊर्जा का श्रोत नहीं उपलब्ध जो अनादि हो और आत्मा जीव के देह में ऊर्जा का एक ऐसा श्रोत है जो अनादि है और जो देह समाप्ति पर मन एवं इंद्रियों को ले कर अन्य नया देह की तलाश भी करता है
देह में स्थित यह आत्मा का एक सीमित रूप जीवात्मा कहलाता है
आत्मा निर्गुणी है और जीवात्मा को निर्गुणी नहीं कह सकते क्योंकि यह मन एवं इंद्रियों के माध्यम से बिषयों सम्बंधित रहता है
जिसकी जीवात्मा इतनी निर्विकार हो गयी होती है जिसको जीवात्मा न कह कर आत्मा कहना असंगत न होगा,वह परा भक्त परम-गति प्राप्त करता है और वह देह में निर्गुण परम तुल्य होता है
भोगी जो भी करता है उसका हर कृत्य उसकी जीवात्मा को और विकारों से भरता रहता है और योगी के सभीं कृत्य उसकी जीवात्मा को और निर्मल करते रहते हैं
योग – साधना का अर्थ है जीवात्मा को निर्मल करना और निर्मल स्थिति में जीवात्मा वह दर्पण होता है जिसपर प्रभु दिखते हैं लेकिन देखनें वाला भोगी नहीं योगी ही होता है
=====ओम्======
Tuesday, May 29, 2012
जीवन दर्शन 52
हमारी स्मृतियाँ हमें गुमराह होनें से बचा सकती हैं
हमारी स्मृतियाँ हमें आसुरी मार्ग पर ले जा सकती हैं
हमारी स्मृतियाँ हमें प्रभु से जोड़ सकती हैं
इस पल से पहले की स्मृतियाँ ही हमारे इस पल की रूप-रेखा बनाती हैं
स्मृतियों किसी को प्रिय – अप्रिय बनाती हैं
स्मृतियाँ हँसाती-रुलाती हैं
जैसे कल का संचित धन आज के भोजन का साधन बनता है वैसे कल की स्मृतियाँ आज के मन की भोजन – माध्यम हैं
बुद्ध सिखाते थे,आलय विज्ञान;इस विज्ञान में मनुष्य के जन्म – जन्मान्तर की स्मृतियों में वापिस ले जानें की ब्यवस्था है और इस प्रकार सृष्टि के प्रारम्भ से ले कर आजतक की स्मृतियों से गुजरनें वाला अंत में स्मृति रहित हो जाता था और उसका मन एक दर्पण सा बन जाता था जिस पर प्रकृति का निर्माता प्रभु दिखनें लगता था और वह योगी तब आंखे बंद करके ध्यान में डूबा प्रभु में हुआ करता था
स्मृतियाँ एक तरफ मुक्ति के द्वार हैं और दूसरी तरफ नर्क का द्वार भी
भोग – तत्त्वों के सम्मोहन में बसे ब्यक्ति की स्मृतियाँ उसे नर्क में बसानें का यत्न करती रहती हैं
और भोग तत्त्वों का सम्मोहन जिस पर नहीं होता उसकी स्मृतियाँ प्रभु के मार्ग को दिखाती हैं
==== ओम्======
Saturday, May 26, 2012
जीवन दर्शन 51
क्या कभीं आप ऐसा सोचते हैं कि …....
आज आप जिन गलियों में किसी की उंगली पकड़ कर उसे घुमा रहे हैं [ अपनें बेटे को / बेटी को ] उन गलियों में कभीं आप को भी आपकी उंगली पकड़ कर कोई घुमाता रहा है /
जिस घर में आज आप किसी को दुल्हन [ पुत्र की पत्नी ] शब्द से संबोधित करते हैं उसी घर में किसी दिन उसी शब्द से कोई आप को संबोधित करता रहा है /
जिस घर में आप किसी को पानी लानें को कह रहे हैं उसी घर में किसी दिन कोई आप को पानी लानें को कहता था /
जिस घर का मालिक कल कोई और था आज उसी घर का मालिक आप है /
आज जिस संपदा का मालिक आप हैं कल उस का मालिक कोई और होगा /
कल आप किसी के पुत्र / पुत्री थे , आज को आप का पुत्र / पुत्री है और आनें वाला कल आप को किसी का दादा / दादी बनानें वाला है /
किसी दिन किसी की गोदी में आप होते थे और आज आप की गोदी में कोई और है /
ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जो आप को आकर्षित कर सकते हैं , आप की सोच की दिशा बदल सकते हैं लेकिन आप इब संवेदनशील तथ्यों की ओर पीठ किये हुए हैं / आप ज़रा सोचना ऎसी बातों को यदि आप समयानुकूल सोचते रहे को क्य आप में कभीं अहँकार आ सकता है ?
ऊपर की स्मृतियाँ आप को समभाव में रखती हैं
और
गीता कहता हैं-------
समभाव मुक्ति का द्वार है//
===== ओम्======