Wednesday, March 25, 2026

उत्तराखंड के तीन शक्ति पीठ


टिहरी - गढ़वाल (उत्तराखंड) के त्रिकोणी शक्तिपीठ

उत्तराखंड के त्रिकोणी शक्तिपीठों का तुलनात्मक दृश्य ⤵️

शक्तिपीठ

विवरण

संबंधित मां सती का अंग

कुंजापुरी

नरेंद्रनगर से ~10 km दूरी एवं 1676 m ऊंचाई पर स्थित है

मां का कान यहां गिरा था

सुरकंडा

नरेंद्रनगर से 43 km दूर 2757 m ऊंचाई वाले सुरकुट पर्वत पर स्थित है

माता का सिर यहां गिरा था

चंद्रबदनी

देवप्रयाग से 34 km दूरी एवं 2277 m ऊंचे चन्द्रकूट पर्वत पर स्थित है

सती के देह का कोई भाग

 यहां गिरा था 


 ऊपर नक्शे में इन तीन शक्ति पीठों को को सीधी रेखा से जोड़ने पर एक त्रिभुज की आकृति बनती है जिसके बीच में टिहरी झील स्थित है ।

सुरकंडा, कुंजापुरी और चंद्रबदनी को एक साथ त्रेक्य (तीन) शक्तिपीठ कहा जाता है।  ये तीनों शक्तिपीठ टिहरी गढ़वाल में तीन अलग - अलग पहाड़ियों पर हैं और इनका संबंध सती माता माता के प्रमुख अंगों से जुड़े माने जाते हैं। अब हम इन शक्ति पीठों के दर्शन की यात्रा पर निकलते हैं ।

हरिद्वार से कुंजापुरी - सुरकंडा की यात्रा

हरिद्वार से नरेंद्रनगर और नरेंद्रनगर से मां कुंजापुरी दर्शन की पहली यात्रा होती है। कुंजापुरी से वापिस नरेंद्रनगर आ कर सुरकंडा दरबार का दर्शन करना होता है। सुरकंडा दर्शन करके वापिस हरिद्वार आना होता है । हरिद्वार से देव प्रयाग दर्शन करके मां चंद्रबदनी का दर्शन किया जाता है। सुरकंडा से चंबा लौटकर सीधे देवप्रयाग भी जाया जा सकता है जहां से 34 km पर स्थित चंद्रबदनी माता के दरबार पहुंचा जा सकता है लेकिन हरिद्वार वापिस आकर देवप्रयाग - चंद्रबदनी दरबार की यात्रा सीधी यात्रा है ।

कुंजापुरी (ऋषिकेश के करीब) और सुरकंडा (मसूरी के करीब) दोनों शक्तिपीठ हैं और हिमालय की खूबसूरत वादियों में बसे हैं। कुंजापुरी में सूर्योदय का नजारा कमाल का होता है, जबकि सुरकंडा से 360° हिमालय व्यू मिलता है। 

पहली तीर्थ यात्रा : कुंजापुरी शक्तिपीठ दर्शन 

(देखें नीचे स्लाइड में )

# हरिद्वार ~>25km ऋषिकेश ~>4km तपोवन~>12km नरेंद्रनगर ~> 6km हिंडालाखाल ~>3km कुंजापुरी ~> वापिस 9km नरेंद्रनगर > कुल 59 km 

सूर्योदय देखने के लिए यहां भीड़ से बचने के लिए जितना जल्दी पहुंच सकें , उतना ही अच्छा होगा।

1- कुंजापुरी शक्तिपीठ : टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड में 1676 m ऊंचाई पर स्थित कुंजापुरी माँ दुर्गा की उपासना का पवित्र स्थान माना जाता है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि यहां मां सती का कान गिरा था।

 नीचे मां के दरबार का दर्शन करें और साथ में जी Google Earth माध्यम से मां के दरबार की भौगोलिक स्थिति पर भी कुछ घड़ी ध्यान करें। मां का दरबार पहाड़ी के उच्चतम स्थान पर स्थित है।

यहाँ से हिमालय की मनोरम दृश्यावली देखने को मिलती है—जैसे स्वर्गरोहिणी, चौखम्बा, बंदरपंच आदि पर्वत शिखर और नीचे भगीरथी घाटी। यहां के सूर्योदय (sunrise) का दृश्य हृदय को छूनेवाला होता है जिसके लिए प्रकृति प्रेमी भक्त सुबह-सुबह आते हैं। सूर्योदय दर्शन के लिए यहां सुबह पहुंचना चाहिए। पहाड़ी रास्ते हैं — गाड़ी धीमी गति से चलाएँ और सावधान रहें। मंदिर पर कुछ Steep सीढ़ियाँ हैं अतः आरामदायक जूते पहनें। पार्किंग से लगभग 500 m ट्रैक करके मां के दरबार पहुंचना होता है।

दूसरी तीर्थ यात्रा : सुरकंडा शक्तिपीठ दर्शन

नरेंद्र नगर > 25 km चंबा > 15 km कद्दू खाल > 3 km सुरकंडा और वापिस हरिद्वार via नरेंद्रनगर ~ 86+41= कुल 127 km

अब सुरकंडा शक्तिपीठ का दर्शन करते हैं जहां मां सती का सिर गिरा था।

नीचे Google Earth माध्यम से मां के दरबार की भौगोलिक स्थिति प कुछ घड़ी ध्यान कटे हैं।

 

सुरकंडा देवी मंदिर भारत के 51 शक्ति पीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह कर लिया, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए ताकि ब्रह्मांड का विनाश रुक जाए। इनमें माता का सिर (मस्तक) इसी स्थान पर गिरा था, इसलिए इसका नाम "सुरकंडा" पड़ा (सिर + खंड = सिर का टुकड़ा)। यहां माता की शक्ति "महिषासुरमर्दिनी" रूप में पूजी जाती हैं। यह मंदिर बहुत प्राचीन है,पुजाल्दी गांवके लेखवार ब्राह्मण , मंदिर के पुजारी होते हैं। नवरात्रि में यहां बहुत बड़ा मेला लगता है और भक्त दूर-दूर से आते हैं। सुरकंडा देवी मंदिर टिहरी गढ़वाल जिले में धनौल्टी और चंबा के बीच स्थित है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक है और समुद्र तल से 2,756 मीटरकी ऊंचाई पर है। मंदिर तक कार/टैक्सी से कड्डूखल (Kaddukhal) तक पहुंचा जा सकता है, उसके बाद 03 किमी का आसान-मध्यम ट्रेक (1-1.5 घंटे) करना पड़ता है। ट्रेक पर पक्का रास्ता और सीढ़ियां हैं, बच्चे और बुजुर्ग भी कर लेते हैं। अब ropeway भी चल रही है। यहां से 360° हिमालयी दृश्य, गंगोत्री-यमुनोत्री-बंदरपूंछ रेंज दिखती है।मंदिर से हिमालय की बर्फीली चोटियां बहुत सुंदर दिखती हैं। सर्दियों में बर्फ पड़ती है, गर्मियों में ठंडक रहती है। सबसे अच्छा समय: मार्च-जून और सितंबर-नवंबर। मानसून में ट्रेक फिसलन भरा हो जाता है। सर्दियों में बर्फ में ट्रेक करने के लिए अच्छे जूते पहनें। 

जब आप कुंजसपुरी , सुरकंडा और चंद्रबदनी शक्ति पीठों की भौगोलिक स्थिति पर ध्यान करेंगे तब इन तीनों शक्तिपीठ एक त्रिभुज आकृति में दिखेंगे जिनके मध्य में टिहरी झील दिखेगी…

नरेंद्रनगर से चम्बा 25 km है और चंबा से 18 km पर यह शक्तिपीठ है और चंबा से ही 19 km पर टिहरी झील भी है जो भागीरथी-भिलंगना नदियों का संगम है जिसे गणेश प्रयाग नाम से जाना जाता था । यह झील पर्यटन का प्रमुख केंद्र है । जब यह बांध नहीं बना था तब यह old  Tehari शहर था हुआ करता था। आदि शंकराचार्य जी  स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ , गणेश प्रयाग में रुक कर ध्यान किए थे । यह स्थान स्वामी रामतीर्थ के ज्ञान प्राप्ति एवं जल समाधि का स्थान है।

प्राचीन काल में भिलंगना नदी क्षेत भील आदिवासियों का क्षेत्र हुआ करता था और राजा  भी भील ही होता था अतः इस क्षेत्र से बहने वाली नदीका  नाम भिलंगना पड़ा । योग साधना के लिए यह क्षेत्र परण पवित्र क्षेत्र हैं। नीचे स्लाइड में गणेश प्रयाग / टिहरी बांध , भिलंगना - भागीरथी के साथ पञ्च प्रयाग की भी भौगोलिक स्थिति को देख सकते हैं।

तीसरी तीर्थ यात्रा : चंद्रबदनी शक्तिपीठ दर्शन

कुंजापुरी एवं सुरकंडा शक्तिपीठों के दर्शन के बाद चंद्रबदनी शक्तिपीठ तीर्थ यात्रा के लिए निम्न दो विकल्प हैं ..

1- सुरकंडा ~>43 km चंबा ~>90 km  देव प्रयाग ~>34 km चंद्रबदनी : कुल दूरी > 167 km 

2- हरिद्वार से कुंजापुरी एवं सुरकंडा दर्शन के बाद हरिद्वार लौट आए और आगे चंद्रवदनी शक्तिपीठ की यात्रा निम्न प्रकार करें ……

हरिद्वार ~>25 km ऋषिकेश~>95 km देवप्रयाग

 via NH - 7  ~> 34 km हिंडोलखाल + चंद्रबदनी शक्तिपीठ via Hindalakhal - Tehari Road + 34 km वापिस देवप्रयाग

 > कुल यात्रा : 188 km 


मां चंद्रबदनी शक्तिपीठ मंदिर उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित एक बहुत प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह देवी सती को समर्पित है और 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है । मंदिर चंद्रकूट पर्वत (जिसे अब चंद्रबदनी पर्वत कहा जाता है) की चोटी पर स्थित है, जहाँ से हिमालय की बर्फीली चोटियाँ और गढ़वाल की हरी-भरी घाटियाँ दिखाई देती हैं। यहाँ आध्यात्मिक शांति, भक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। यह समुद्र तल से 2277 मीटर ऊंचाई पर स्थित है ।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को काटा था (शिव के तांडव को शांत करने के लिए), तो उनका धड़ (torso) यहाँ गिरा था। इसलिए यहाँ मूर्ति के बजाय श्री यंत्र की पूजा होती 

है ।मंदिर गोलाकार (octagonal) संरचना वाला है, जिसमें गुंबद और छोटे-छोटे मंदिर हैं। यहाँ से 360° पैनोरमिक व्यू मिलता है, जिसमें केदारनाथ, बद्रीनाथ जैसी चोटियाँ दिख सकती हैं (साफ मौसम में)। नवरात्रि में बहुत भीड़ होती है।

मां के दरबार का दर्शन करके देव प्रयाग लौट कर वापिस हरिद्वार (120 km) आया जा सकता है । दूसरा विकल्प यह है कि देवप्रयाग से आगे रुद्रप्रयाग से जा कर पञ्च केदार , गंगोत्री , यमुनोत्री की यात्रा की जा सकती है और रुद्रप्रयाग से आगे कर्ण प्रयाग , नंद प्रयाग , विष्णु प्रयाग होते हुए गोविंद घाट से हेमकुंड साहिब एवं फूलों की घाटी भी जाया जा सकता है । पुनः वापिस गोविंद घाट आ कर बद्रीनाथ , माणा पास की यात्रा करके वापिस माणा गांव आकर बसुधारा फाल्स , सतो एवं स्वर्गारोहण की दिव्य यात्रा भी की जा सकती है।

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