Tuesday, February 26, 2013

कौन और कब सुना -----

जब सुनानें वाला नहीं होता , सुना कर जा चुका होता है तब कुछ लोग उसकी बात  पर सोचते हैं लेकिन तबतक इतनी देर हो चुकी होती है कि उनकी सोच पर संसार की भोग - ऊर्जा का गहरा प्रभाव पड़ चुका होता है और उनकी स्मृति में  सुनानें आये हुए सत् पुरुषके खंडित शब्द  रह - रह के ऐसे चुभते रहते हैं कि वे घडी भर भी अपनें बनाए भोग संसार का मजा नहीं ले पाते / 

मनुष्य - जी हाँ मनुष्य के मष्तिष्क की बनावट कुछ ऎसी है जिसे सुपर कंप्यूटर से भी अधिक शक्तिशाली बाना जा रहा है , वह साकार सूचनाओं के आधार पर निराकार सूचनाओं में झांक सकता है और झाँक भी रहा है / मनुष्य काम से राम तक की सोच अपनें मष्तिष्क में रखता है लेकिन दुःख इस बात का है अनुशय को न काम से तृप्ति मिल रही और न संसार में ब्याप्त उन मार्गो पर दिख रही जिनको लोग राम मार्ग कह कर राम का ब्यापार कर रहे हैं / 

जीवों में मात्र मनुष्य एक ऐसा जीव है जो ऊपर आकाश में देखता है और नीचे पृथ्वी के गर्भ में भी झांकता रहता है लेकिन कहीं से उसे पल भर को भी शांति नहीं दिखती , ऐसा क्यों ? क्योंकि वह कहीं घडी भर रुकता ही नहीं / बीसवीं शताब्दी में आइन्स्टाइन प्रकाश की गति को परम माना लेकिन मनुष्य के मन की गति प्रकाश की गति से भी अधिक गति वाला है / कहते है , सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचनें  में आठ मिनट लेता है और मनुष्य एक सेकण्ड के हजारहवें समयांश में सूर्य को देख लेता है / 

सभीं जीव भोग में भाग रहे हैं और सबका एक मार्ग है - भोग -  भोजन लेकिन मनुष्य बिचारा भ्रमित है ; वह कभीं भोग तो कभी भगवान , कभी काम तो कभीं राम , कभीं भोग तो कभी योग - एक कोजब  एक हाँथ से पकता है और दूसरा उसका हाँथ तुरंत दूसरे को पकड़ लेता है / मनुष्य जब योग में बैठता है तब उसे भोग बुलानें लगता है और जब भोग में रमता है तब उसे योग कि आहट सुनाई पड़नें लगती है / 

वह जो भोग को योग का माध्यम समझा ......
वह जो काम को राम का मार्ग समझा ....
वह जो पर में स्वयं को देखा .....
वह जो स्वयं में पर को देखा ....
उसे चैन खोजना नहीं पड़ता -----
उसे स्वर्ग खोजना नही पड़ता ----
वह जहाँ होता है , वहीं चैन होता है ....
और 
वहीं स्वर्ग होता है 

===== ओम् ======

Tuesday, February 12, 2013

कौन सुनानें वाला है और कौन सुनने वाला है ?

सुननें वाला वह है , जो कामना का गुलाम है ....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर पूर्ण रूप से श्रद्धा की लहर बह रही होती है ....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर धनात्मक अहँकार का अभाव है .....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर सात्त्विक गुण प्रभावी होता है ....
सुननें वाला वह है , जिसके सभीं नौ द्वार प्रकाशित  हो रहे होते हैं ....

और ----

सुनानें वाला वह है , जो प्रभु समान  होता है ....
सुनानें वाला वह है , जो ब्रह्म वित् होता है .....
सुनानें वाला वह है , जो काम , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहकार रहित हो ...
सुनानें वाला वह है , जो भौतिक साधनों से संपन्न है ....
सुनानें वाला वह है , जो देता तो  है लेकिन उसका देना उसके अहँकार का भोजन होता है ...

कुछ बातें सुननें और सुनानें वालो के सम्बन्ध में दी गयी हैं , लेकिन इन बातों में दो प्रकार के सुननें वाले हैं और दो ही प्रकार के सुनानें वाले हैं ; पहली श्रेणी है उनकी जो योगी है और दूसरी श्रेणी उनकी है जो भोगी हैं /
 भोगी सुननें वाला है और भोगी ही सुनाने वाला -----
योगी सुननें वाला है और योगी हि सुनानें वाला ----
योगी सुनानें वाला है और  भोगी सुननें वाला ----

लेकिन 

भोगी सुनानें वाला हो और योगी सुननें वाला हो ऐसा होना कठिन है ,

 क्योंकि 

भोगी , भोगी की बात को समझ सकता है ....
योगी , योगी की बात को समझता है ....
योगी , भोगी की बात को समझता है ...
पर 

योगी की बात को भोगी नहीं समझता , और यदि समझता है तब वह उस घडी भोगी नहीं होता , उस घडी उसका मन - बुद्धि भोग भाव की ऊर्जा को नहीं धारण किये हुए होते और जब ऐसा होता है तब उस भोगी को वह खिडकी भी दिखती है जहाँ से सत् की  किरण उसकी ओर आती उसे दिख सकती है / 
भोग से योग में रखा कदम ब्रह्म अनुभूति में पहुंचा सकता है 
योग से भोग में लौटा कदम नर्क  में पहुंचाता है 

=== ओम् ====



Wednesday, February 6, 2013

वहाँ क्या है ?


  • जहाँ न दिन है न रात ....
  • जहाँ न सत् है न असत् .....
  • जहाँ न मैं हैं न तूं .............
  • जहाँ न काम है , न राम ....
  • जहाँ न माया है , न काया .....
  • जहाँ न आसमान है , न धरती .....
  • जहाँ न पाप है न पुण्य .....
  • जहाँ न अच्छा है न बुरा ....
  • जानां न दुःख है , न सुख ....
  • जहाँ न भय है न मोह ....
  • जहाँ न कामना है , न क्रोध .....
  • जहाँ न लोभ है , न अहँकार ....


आखिर ऐसे आयाम में क्या हो सकता है ?


  • गुण तत्त्वों के परे निर्गुणी रहता है 
  • माया परे मायापति रहता है 
  • काम परे कामेश्वर रहता है 
  • सभीं भावों के परे भावातीत रहता है 

फिर हम सब क्यों उसे समझनें में असमर्थ हैं ?

बहुत सीधा सा जबाब है :

हम जहाँ हैं , जहाँ रहते हैं , उसको समझनें की कोशिश करते ही नहीं 
जिस घडी हमारी दृष्टि स्व पर केंद्रित हो जायेगी , उस घडी उसे समझनें की जरुरत न होगी , वह सर्वत्र नजर आनें ही लगेगा अतः पर से अपनी दृष्टि को स्व पर केंद्रित करनें का अभ्यास करना हमारे हाँथ में है और यह अभ्यास जिस घडी अभ्यास - योग में रूपांतरित हो उठेगा उस घडी हमें उसे खोजनें के किये काशी या काबा की यात्रा न करनी होगी  , हम जहाँ भी होंगे वही  काशी और काबा हो उठेगा / 
प्रभु तो सर्वत्र है लेकिन ज्योंही भोग से हमारी दृष्टि प्रभु की ओर मुडती है , न जानें क्यों हमारी पलकें झपक जाती हैं और हम चूकते चले जा रहे हैं , काश ! वह घडी आये जब हमारी पलकें झपकें नही और हम प्रभु को अपनें नयनों में बसा सकें /

==== ओम् =====

वहाँ क्या है ?


Thursday, January 31, 2013

सब बदल रहा है ----

घर का नक्शा .....
घर ....
गाँव ....
घर - गाँव के लोग ....
शहर , शहर के लोग ....
देश , देश के लोग , देश के लोगों का रहन सहन ....
पढ़ाई और पढ़ाई का तरीका   ....
रहन - सहन , खान - पान .....
रीति - रिवाज ....
तीज - त्यौहार मनानें के तरीके ....
सब कुछ बदल रहा है लेकिन इस बदलाव में जो ऊर्जा काम कर रही है क्या वह भी बदल रही है ?

आज का युग विज्ञान का युग है , विज्ञान अर्थात वह जिसका आधार  गहरी सोच हो  और गहरी सोच से जो निकलता है उसे कहते हैं विज्ञान / सोच की मूल है संदेह और संदेह में सत्य असत्य की तरह और असत्य सत्य की तरह दिख सकता है / विज्ञान के नियमों की उम्र बहुत लंबी नही , और लंबी हो भी कैसे सकती है क्योंकि वह जिसका जन्म संदेह से हो रहा हो उसकी उम्र लंबी कैसे हो सकती है ? 

आज मंगल ग्रह के ऊपर वैज्ञानिकों की नजर टिकी हुयी है और उनको वहाँ जो भी दिख रहा है उसमें पानी दिख रहा है क्योंकि  बिना पानी जीव का होना संभव नहीं और वैज्ञानिकों की पूरी उम्मीद है कि मंगल पर कभीं जीव रहा करते थे / वैज्ञानिक सपना देखता है और उसका जीवन उस सपनें को सत्य का रूप देनें में गुजर जाता है / आइन्स्टाइन , मैक्स प्लैंक , श्रोडिंगर एवं अन्य सभीं नोबल पुरष्कार विजेताओं के जीवन को देखिये , वे सभी जो स्वप्न देखा उसकी गणित बनाते -  बनाते उनका जीवन गुजर गया और पूर्ण तनहाई में उनके  जीवन का अंत हुआ / 
एक हैं वैज्ञानिक जो दिन  में भी स्वप्न देखते हैं और उनको पता नहीं चल पाता की कब दिन हुआ और कब रात आयी और दूसरे हैं उपनिषद के ऋषि जिनका केंद्र वह बेला होती है जहाँ न रात होती है और न दिन जिसे कहते है संध्या या अमृत बेला / एक ऋषि अमृत बेला में योगयुक्त स्थिति में जो देखता है उसकी गणित नहीं बनाता क्योंकि उसे अपनी अनुभूति पर कोई संदेह नही और वह अपनी अनुभूति को किसी और पर लादना भी नहीं चाहता , जो चाहे उसकी बात को मानें और जो न चाहे न मानें लेकिन वह स्वयं अपनी अलमस्ती में रहता है / 


  • बदलाव में बदलाव की प्रक्रिया के माध्यम से उसे समझना जो सनातन है ....
  • बदल रही साकार सूचनाओं में उसे देखना जो निराकार है .....
  • बदलाव में उसे देखना जो साकार से इराकार में और निराकार से साकार में रूपांतरित हो रहा है ,,,,
  • इस देखनें को कहते हैं ज्ञान ...
  • ज्ञान प्रकृति और पुरुष [ अर्थात बदल रही सूचनाओं एवं उनके मूल ऊर्जा जिससे वे हैं]  का बोध है ...
  • प्रकृति बदलाव का नाम है ....

इस बदलाव में जो निराकार ऊर्जा काम कर रही है उसका नाम है परमात्मा ,ब्रह्म ,
 महेश्वर , ईश्वर आदि - आदि /

रूपांतरण में उसे देखना जो रूपांतरण का मूल है , योग है ....

=== ओम् ====

Saturday, January 19, 2013

संसार में आना एक अवसर है , उसे यों ही न जानें दें

कबतक और क्यों किसी की उंगली पकड़ कर चलते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से दूर भागते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं को भी धोखा देते रहोगे ?
कबतक और क्यों दूसरों को सुनाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनें कद को खीच - खीच कर लंबा दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनी असलियत को छिपा कर रखना चाहते हो ?
कबतक और क्यों स्वयं को सर्वोपरि दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से भागते रहोगे ?


जीवन जो मिला है वह प्रभु का प्रसाद है .....
जीवन जो मिला है वह एक अवसर है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह हर पल घट रहा है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह मात्र आप का नहीं है .....
जीवन को गंगा धारा की तरह बहनें दो , वह स्वयं सागर से मिल जाएगा ...
जीवन को प्रश्न रहित बनाओ .....
..


और 

जीवन को प्रभु को समर्पित करो

और 

स्वयं को कर्ता नहीं द्रष्टा रूप में देखो ....

और 

तब जीवन का वह परम रस मिलेगा जिसकी  ही तलाश हमें आवागमन में बनाए   हुए है //


===== ओम् =======

Sunday, January 13, 2013

स्वयं से पूछो

आप अपनें जीवन - यात्रा का रुख किधर को रखा है ?
आप दिल से किसे चाहते हैं ; भोग को या भगवान को या दोनों को ?
भोग और भागवान एक साथ एक बुद्धि में नहीं रहते , ऎसी बात गीता कहता है , फिर ?
क्या यह संभव नहीं कि भोग के आइनें में भगवान को देखा जाए ?



  • हमारा  अधिकाँश समय दूसरों के सम्बन्ध में सोचनें में गुजर जा  रहा है , क्य हम  इसे समझते हैं ?
  • जितना समय हम दूसरों में बुराई को खोजनें में लगाते हैं यदि उसका एक चौथाई भी अपनें में बुराइयों को देखनें में लगाएं तो संभव है आप परम सत्य को देखनें में सफल हो सकें 
  • ऐसा क्यों है  कि हमें दूसरों में मात्र बुराइयां दिखती  हैं और अपनें में अच्छाइयां ही अच्छाइयां ?
  • क्या हम  राम को इस लिए चाहते हैं कि  सारी सोचें कामयाब हो सकें ?
  • क्या राम मात्रा  कामनाओं को पूरा करनें की मशीन बन कर रह गया है ?
  • क्या हम राम के अधीन हैं या राम हमारे अधीन ?
  • हम क्यों चाहते हैं कि सभीं हमारे इशारे पर चलें चाहे वह भगवान ही क्यों न हो ?
  • पिता , माता , पत्नी , पुरुष , पुत्र / पुत्री , सगे - संबंधी सभीं को हम अपना गुलाम क्यों बनाना चाहते हैं ?



  • बहुत हो चुका , मालिक बनें लेकिन मात्र अतृप्तता ही मिली , फिर क्या करें ?
  • चलो , अभीं तक जिनको हम अपना गुलाम बनाना चाहते रहे उनमें से किसी एक का ही सही , गुलाम बन कर देखते हैं 
  • क्या हम समझते हैं कि प्रभु संदेहों से भरी बुद्धि - क्षेत्र में नहीं रहता , वह तो बसेरा बनाता है उनके हृदयों में जिनके ह्रदय ......

मीरा , कबीर , नानक , परम हंस रामकृष्ण जैसे हों ......
ऐसे दिल जिनसे श्रद्धा छलकती हो 
ह्रदय में श्रद्धा की लहर उठाई नहीं जा सकती यह तो प्रभु का प्रसाद है जो किसी - किसी को कभीं - कभीं मिलता है
अब सोचिये नहीं -----
क्योंकि ....

नानकजी साहिब कहते हैं ....

सोचे सोचि न होवहीं ----
ज्यों सोची लख बार .....

जहाँ सोच है , वहाँ संदेह भी होगा , क्योंकि सोच संदेह की पहचान है 

==== ओम् ======


Tuesday, January 8, 2013

यह क्या हो सकता है ?


  • जहाँ न दुःख हो और जहाँ न सुख हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
  • जहाँ न दिन हो न रात हो , वहाँ क्या  हो सकता है ?
  • जहाँ न अपना हो , न पराया हो , वहाँ कौन हो सकता है ?
  • जहाँ न भोग हो , न योग हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
  • जहाँ न कुछ अच्छा हो न बुरा , वहाँ क्या हो सकता है ?
  • वह जिसे  न तन से , न मन से पकड़ा जा सके , वह कौन हो सकता है ?
  • जिसे न गाया जा सके , न लिखा जा सके , वह कौन हो सकता है ?

जीवन प्रश्नों से भरा  है , जबतक मन - बुद्धि में संदेह है , तबतक प्रश्न का होना भी संभव है
 जिस घडी मन - बुद्धि संदेह रहित होते हैं उस घड़ी मन -बुद्धि प्रश्न रहित हो उठते हैं

और 


  • प्रश्न रहित मन - बुद्धि का आयाम  प्रभु का आयाम होता है 
  • प्रभु निर्भाव मन - बुद्धि पटल पर प्रतिबिंबित होते हैं और उनकी अनुभूति चेतना को होती है 

मनुष्य एक खोजी जीव है और सब में उसे जो मिलता है वह उसे और अतृप्त बना जाता है और अतृप्तता की    तिब्रता हर पल ऊपर ही उठती जा रही है /
जो उसे पा लेता है , उस घडी तो शांत हो उठता  है लेकिन ज्योंही उसके उसका सम्बन्ध टूटता है , पुनः वह ब्याकुल हो उठता है और यह क्रम तबतक चलता रहता है जबतक तन में प्राण हैं /

  • जिसनें उसे मनमोहन नाम दिया होगा ,  वह उसके कितनें गहरे प्यार में रहा होगा ?
=== ओम् ======


Thursday, January 3, 2013

जीवन को देखो ----

जीवन जो मिला है उसे प्रभु का प्रसाद समझो
प्रभु के इस प्रसाद को ऐसे प्रयोग करो कि यह प्रभु तक पहुंचा सके
प्रभु के प्रसाद को न खीच - खीच कर लंबा करो न इसे सिकोड़ कर रखो
जीवन की पीछली तस्बीरों  को न तो भूलो और न ही  उनका गुलाम बनो
अपनें अगले कदम को जहाँ रखो उसे ठीक से समझो
जीवन में हर कदम एक मोड है , जहाँ से स्वर्ग - नर्क की राहे निकलती हैं
जीवन का हर पल प्रभु मय है , अगर कोई प्रभु समर्पित जीवन जी रहा हो , तो
प्रभु आप को सबकुछ तो दे दिया है , अब और की  मांग क्या उचित है ?
औरों को देख कर अपनें जीवन के रुख को न बदलो
संसार में सबका अपना - अपना जीवन है
संसार में सबके जीवन का अपना - अपना रंग है
संसार में सबके जीनें का अपना - अपना ढंग है
एक संसार प्रभु निर्मित है और उस में हम सब अपना - अपना संसार बनानें में लगे हैं
संसार में सबको एक निश्चित अवधि का जीवन मिला हुआ है ....
इस अवधि को कौन कैसे गुजारता है , यह सबकी अपनी -अपनी सोच है



Friday, December 28, 2012

कौन सुनता है ? कोई तो सुनता ही होगा

दिल से कौन सुनता है ?


  • गुरुद्वारा से आ रही गुरुवानी की परम धुन को .....
  • मंदिर से  उठती ओम् की धुन को .....
  • मस्जिद से आ रही अल्लाह ओ अकबर की पुकार को .....
  • खाली पेट वाले की भूख के दर्द को ......
  • वक्त की पुकार को .....
  • सब के सीनें में दबी दर्द को ......
  • मीरा के भजन को .....
  • कबीर जी के वचनों को .....
  • नानक जी के ह्रदय के भाव को .....
  • गायत्री के छंद को ......
  • पृथ्वी की दर्द भरी आवाज को ....

ऎसी  एक नहीं अनेक बातें हैं, हम इन्शान को सुननें के लिए

 लेकिन ---

हम क्यों नहीं सुन पा रहे , कोई तो कारण होगा ही ?
जी , हाँ , कारण है और गहरा कारण है .....
हम यदि स्वयं को देखें तो एक चलती - फिरती लाश के अधिक नहीं जिसकें गति तो है ....
लेकिन
 चेतना नहीं 
ऐसा कौन सा धर्म ग्रन्थ है जो यह न कहता हो कि ----
परमात्मा तुम्हारे ह्रदय में है , हम जानते भी हैं लेकिन समझते नहीं , न ही समझनें की कोशिश करते हैं /

प्रोफ़ेसर आइन्स्टाइन कहते हैं : -----

बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जानते हैं उसे अपनें ह्रदय से समझते भी हैं /

सौ साल जीना ब्यर्थ है यदि बेहोशी में जीया जाए
और
होश भरा एक  पल का जीवन ही वह जीवन है .....
जिसकी तलाश हम सब को है //

==== ओम् =====

Friday, December 21, 2012

केवल दो घडी , सोचना

  • आज कौन जीना चाहता है ?
  • आज कौन मरना चाहता है ?
  • आज मनुष्य अपनें जीनें - मरनें का क्या मापदंड बना रखा है
  • क्यों लोग भोग के लिए जीना और भोग के लिए मरना चाह रहे हैं ?
  • आज क्यों लोग परमात्मा को पीठ पीछे रख रहे हैं ?
  • आज क्यों मनुष्य की सोच नकारात्मक हो रही है ?
  • आज जितना भय मनुष्य को मनुष्य से है उतना भय और किसी जीव से नहीं , क्यों ?
  • आज का मनुष्य आखिर चाहता क्या है ? मात्रा कामना - काम की तृप्ति /
  • आज वे सबहीं पराये से क्यों दिखाते हैं जो पहले अपने हुआ  करते थे ?
बहुत सारे प्रश्न हैं और प्रश्न रहित मन - बुद्धि कभी शांत नहीं हो सकते / शांत मन - बुद्धि जिसे देखते हैं वह होता है परम सत्य और हम अपनें मन - बुद्धि को प्रश्न रहित करना नहीं चाहते , आखिर वह कौन सी मजबूरी है ?

एक घडी ही सही ....

आज नहीं तो कल ही सही ....

लेकिन ....

आप शांत मन - बुद्धि के आयाम में बैठ कर परम सत्य में जरुर डूबें /

==== ओम् =====

Wednesday, December 12, 2012

एक नज़र इस पर भी

कौन परमात्मा से नहीं मिलना चाहता ?
कौन परमात्मा की ओर पीठ करके रहना चाहता है ?
कौन शास्त्रों को नही पढ़ना चाहता ?
कौन शात्रों को अपनें  जीवन की डोर बनाना चाहता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को नक्कारता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को अपनें जीवन में उतारना चाहता है ?
कौन झूठ बोलना चाहता है ?
कौन सत्य पर यकीन करता है ?
कौन किसी से सलाह नहीं लेता ?
यहाँ सलाह देनें वालों की कतारें खडी हैं लेकिन उनकी सलाह को लेनें वाले कितनें हैं ?
मंदिर में प्रसाद लेनें वालों की लंबी लाइन लगी दिखती है लेकिन प्रभु के प्रसाद - प्राप्ति के बाद भी वे अतृप्त क्यों दिखते हैं ?
कौन किसको और कब अपना समझता है ?
मंदिर - गुरुद्वारा  में जा रहे हैं और साथ में पेस्तौल लटकाए हैं , क्यों प्रभु पर विश्वास नही ?
कौन प्रभु पर और किस लिए विश्वास करता है ?
प्रभु पर हमारा  विश्वास कितना गहरा है ?
** मैं बहुत  से ऐसे  लोगों से मिल रहा  हूँ जो राधे - राधे , कृष्ण - कृष्ण , राम - राम कहते हुए अब जीवन के आखिरी पायदान पर जा पहुंचे हैं / मैं  उनसे एक सवाल करता हूँ , क्या आप कभीं स्वप्न में भी  राधा को , या कृष्ण को या राम को देखा ? सब का एक उत्तर मिलता है , जी नहींऔर वह भी  गुस्से में  पर  एक सज्जन ऐसे भी मिले जो बतानें से पूर्व रो पड़े  और बोले , यदि दिखे होते तो आज यहाँ गंगा किनारे क्यों बैठा होता ?
सत् की स्मृति यदि गहरी हो तो जीवन सत् में गुजरता है
 न कि ....
जीवन सत्य की खोज में गुजरता है / 
बश एक पल , मात्रा एक पलांश जब गहरी सोच की लहर ह्रदय में उठेगी तब वह  स्वप्न में ही नहीं वर्तमान में आप के सामनें दिखनें लगेगा 
और 
तब आप वही कहेंगे जो गीता कहता है -----
वह सबे बाहर , सबसे दूर , सब के समीप , सब के अंदर है 
और 
सभीं उसके फैलाव स्वरुप हैं 
==== ओम् ========

Friday, December 7, 2012

अपनें को सुनो और देखो भी

एक सूनी सड़क के मध्य खडा हो कर सड़क को देखो ....
सड़क एक दम सीधी हो तो उत्तम रहेगा /
दोनों किनारे एक दूसरे के समानांतर चलते हैं पर .....
सड़क के दोनों किनारे सामनें कही दूर आपस में मिलते हुए से दिखते हैं .....
लेकिन ऐसा होता नहीं /
क्या कभीं आप  अपनें इस  भ्रान्ति के सम्बन्ध में सोचा है ?
दोनों किनारे समानांतर चलते हैं और आपस में मिलते  हुए से भी  दिखते हैं .....
दो आँखें और एक बुद्धि हमें किस भ्रान्ति में रख रहे हैं ....
आप कभीं इस पर सोचा नहीं होगा ?

सड़क की भांति हमारे जीवन का भी रहस्य है .....
भोग - योग दोनों समानांतर चलते से दिखते हैं लेकिन ऐसा है नहीं /
भोग एक माध्यम है जिसमें उठा होश ही योग है और योग वाहन पहुंचाता है ......
जहाँ दोनों मिलते से दिखते भर नहीं मिलते भी हैं ....
और उस मिलन को कहते हैं अब्यक्त , अचिन्त्य , अप्रमेय , ब्रह्म और .......
सांख्य - योगी जिसे कहते हैं परम पुरुष और ......
जिसे ध्यान में उतरे योगी अपनें ह्रदय में देखते हैं ....
ब्रह्म चारी अपने ब्रह्म चर्या में पाते हैं ....
तप करनें वाले अपनें तप की ऊर्जा में देखते हैं ...
और ...
प्रेमी  अपनें प्यार में पाते हैं //
=== ओम् =====

Sunday, December 2, 2012

जबतक -------

[क] जबतक श्वासें चल रही हैं , उसके लिए

  • अपनें - पराये हैं
  • यह तेरा और यह मेरा है
  • जाति - धर्म है
  • दिन - रात हैं
  • सुख - दुःख है
  • अच्छा - बुरा है
और ----
वह सब है जो चाह आधारित  है
लेकिन -----

[ख] जब श्वासें चलानी बंद हो जाती है , तब

  • वह स्वयं अपना सांसारिक अस्तित्व खो बैठता है
  • पलंग से उसे उसके अपनें ही उठा कर जमीं पर लिटा देते हैं
  • उसका नाम रामानंद - ज्ञानानंद नहीं रह जाता 
  •  उसे अब उसके अपनें ही मुर्दा कहनें लगते हैं
  • उसकी कोई जाति नहीं रहती
  • उसका कोई धर्म नहीं होता
  • उसकी कोई चाह नहीं रहती , भौतिक स्तर पर
  • उसके लिए उसके कोई अपनें - पराये नहीं रहते
  • उसे सुख - दुःख , गर्म - ठंढा और अन्य सभीं  द्वैत्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
  • उसे संसार में हो रही घटनाएँ नहीं हिला पाती
और ----
वह जिस आयाम में होता है उसके लिए .......
उस घडी जो रहता है , उसे गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ----
अब्यय , अप्रमेय , अब्यक्त , सनातन
और .....
मनुष्य जीवन भर भागता रहता है , जो उसे मिलता है उससे उसे क्षण भर की शांति मिलती है लेकिन .....
वे धन्य हैं ----
जिनको उनकी श्वास चलते अपनी श्वासों के मध्यम से उस परम अब्यय की खुशबू मिल जाती है ----
और उस खुशबू में वे तृप्त हो उठते हैं
उनके लिए ---
सभीं द्वित्य तिरोहित हो उठते हैं
और ---
वह अद्वैत्य की ऊर्जा में अलमस्त रहता है
=== ओम् =====

Sunday, November 25, 2012

गुरु प्रसाद - 1


श्री ग्रन्थ साहिब जी परम ज्ञान सागर हैं जिसमें …
...
  • दस गुरुओं के साधनाओं का फल है
  • सत्रह भक्तों की अनुभूतियों का रस है
  • पंद्रह परम भक्तों की वाणियों का सुर है
  • भाई मरदाना जैसे परम भक्त की धुनें है
  • 1जो चौदह सौ तीस पृष्ठों में फैला हुआ है
  • तीसरे गुरु श्री अमर दास की नौ सौ चौहत्तर वाणियों का संग्रह है
  • दूसरे गुरु श्री अंगदजी साहिब की तिरसठ वाणियों की गंगा प्रवाहित होती हैं
  • आखिरी गुरु श्री गोबिंद जी साहिब का निर्देशन है और भाई मणि सिंह की बुद्धि है जिनके द्वारा यह लिपिबद्ध हुआ
  • सन चौदह सौ से सत्रह सौ के मध्य के संतों फकीरों की वाणियों का संग्रह है
  • दस गुरुओं सत्तरह भक्तों एवं पन्द्रह परम सिद्धों की ऊर्जा है
  • ऐसे परम पवित्र को छोड़ कर आप और कहाँ और क्या खोज रहे हैं
  • एक ओंकार

Friday, November 23, 2012

कोई तो सुनता ही होगा


  • कौन क्या बोल रहा है , यह महत्वपूर्ण नहीं , आप क्या सुन रहे हैं , यह महत्वपूर्ण है 
  • बोलनें वाला कभी यह नहीं समझता कि सुननें वाला क्या सुन रहा है 
  • सुननें वाला कभी यह नहीं सोचता की बोलनें वाला क्या बोलना चाह रहा 
  • बुद्धि स्तर की समझ बहुत कमजोर समझ होती है 
  • ह्रदय की समझ , गहरी समझ है 
  • जिस से हमारा कोई खास मतलब होता है उसकी हर बात हमें स्वीकार होती है 
  • जिससे  हमारा कोई मतलब नहीं उसकी बात को सुननें के हमारे कान और होते हैं 
  • प्रकृति अब सिकुड़ने लगी है और मनुष्य का अहंकार फ़ैल रहा है 
  •  विज्ञान के आविष्कारों का प्रकृति को सिकोड़ने में हो रहे प्रयोग घातक हो सकते हैं 
  • विज्ञान संदेह आधारित है और संदेह की रोशनी में सत्य को देखना संभव नहीं 
  • संदेह जब श्रद्धा में बदलता है तब उस ऊर्जा से सत्य दिखता है 

विज्ञान का केन्द्र मन - बुद्धि हैं और ज्ञान का केन्द्र है ह्रदय 
निर्विकार मन - बुद्धि का सीधा सम्बन्ध ह्रदय से होता है 
ह्रदय में चेतना की ऊर्जा तब प्रभावी होती है जब मन - बुद्धि निर्विकार हो जाते हैं
हमेशा औरों के सम्बन्ध में ही क्यों सोचते रहते हो कभीं अपनें बाते में भी सोचा करो

  • आज औरों के ऊपर कफ़न डाल रहे हो एक दिन और तुम पर कफन  डालेंगे 

==== ओम् ======


Saturday, November 17, 2012

हम इनके मध्य हैं - - - - -


  • एक परमात्मा ......
  • अनेक देवता ........
  • एक माया ............
  • अनेक जीव .........
  • दो प्रकृतियाँ ........
  • ऊपर आकाश .....
  • नीचे एक काल्पनिक संसार , पाताल .....
  • सप्त सिंधु ......
  • सप्त ऋषि .....
  • सप्त दिन [ सप्ताह ] .....
  • नौ ग्रह .......
  • देव - दानव .....
  • सच - झूठ ......
  • अपना - पराया .....
  • सास - ससुर , पति - पत्नी , पुत्र - पुत्री , समाज 
  • समाज की जरूरतें और स्वयं की चाह 
  • स्वर्ग - नर्क का भय 

हमारे रहनें के आयाम तो अनेक हैं , हम उनमे कैसे रहते हैं , यह हमारे जीवन की दिशा को तय करता है 
जीवन वह है जो न अपनें लिए जीया जाए , न पराये  के लिए ,जीवन  चाह  रहित एक दरिया की धार जैसे बहते रहना चाहिए जहाँ किसी अवरोध की कोई फ़िक्र न रहे और धीरे - धीरे ऐसा जीवन जहाँ पहुँचता है उसी का नाम है.........
 परम धाम 
==== ओम् ======

Saturday, November 10, 2012

मनुष्य और पशु

भोग से भोग में मनुष्य और पशु दोनों पैदा होते हैं 
भोग - भोजन की खोज में पशु आखिरी श्वास भरता है 
मनुष्य भोग में होश उठा कर परम गति प्राप्त करता है 
परम गति अर्थात जहाँ समय की छाया नहीं पड़ती 
जहाँ सूर्य - चन्द्र - अग्नि प्रकाश का श्रोत नहीं 
जो स्व प्रकाशित है 
पशु का मूल स्वभाव है भोग और ....
मनुष्य का मूल स्वभाव है अध्यात्म
गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं [ श्लोक - 8.3 ] .....
स्वभावः अध्यात्मं उच्यते 
पशु कभीं आकाश नहीं देखता और मनुष्य आकाश में भी घर बननें को सोच रहा है
वह जो काम को न समझा , वह जो कामना को नहीं समझा , वह जो क्रोध को नहीं समझा ...
वह जो मोह को नहीं समझा , वह जो अहँकार  को नहीं समझा .....
वह पशु है और वह भी भोग - भोजन की तलाश में कहीं मध्य मार्ग  के चौराहे पर दम तोड़ देगा और पुनः पशुवत योनि में पैदा हो कर भोग - भोजन में भागता रहेगा ,
 लेकिन ----
जो  काम से राम की यात्रा कर लिया , जो भोग में भगवान की छाया देख ली , वह आवागमन से मुक्त हो कर प्रभु में बसेरा बना  लेता है /
=== ओम् =====

Saturday, November 3, 2012

होश में या बेहोशी में ----

लोग कहते हैं ------
 मैनें अमुक पराये को अपना लिया है , क्या  यह सत्य है ?
क्या पराये  को अपनाया जा सकता है ?
क्या अपनों को पराया बनाया जा सकता है ?

अपनों को पराया बनाना ------
परायों को अपना बनाना ------
दोनों बातों में समान वजन है ; जो एक को कर लिया दूसरा उसके लिए कठिन नहीं
जो यह कहता है कि हमनें अमुक को अपना लिया लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ,
यह बात दिल की बात नहीं बाहर - बाहर की बात है ----
जो दिल से किसी  को अपनाता है उसके पास मैं और तूं दो नहीं रहते , अपनानें के साथ ही मैं तूं में बिलीन हो जाता है , फिर कौन बचा रहता है जो यह कहे कि , उसको मैं अपना लिया था लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ?
अपनाना कोई कृत्य नहीं , यह एक घटना है जो स्वतः घटती ,  पता तक नहीं चल पाता और जब यह पता चलता है कि  मैनें  अपना लिया है उसी घडी उसमें अपनानें  की ऊर्जा बदल जाती है / अपनाना एक प्रकार की साधना का फल है जिस पर कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहँकार की छाया तक नहीं पड़ती और जहाँ ऐसा आयाम हो वह स्थान तीर्थ होता है और वहाँ प्रभु को खोजा नहीं जाता , वहाँ सर्वत्र प्रभु ही  प्रभु दिखता है /
आप न कुछ अपनानें की  कोशिश करे न त्यागानें की , आप मात्रा उसे देखें जो आप के  साथ घटित हो रहा हो और ----
आप का जब यह अभ्यास सघन होगा तब आप कुछ और हो गए होंगे , मेरे जैसे बैठ कर ब्लॉग नहीं लिखेंगे , ब्लॉग में स्वय को घुला दिए होंगे जैसे गंगा गंगा सागर में स्वयं को घुला कर मुक्त हो जाती है /
==== ओम् ======

Wednesday, October 31, 2012

आइये देखते हैं स्वयं को -------

जो मिला हुआ है वह आज नहीं तो कल टल ही जायेगा 
लेकिन ----
जो हमनें  स्वयं ले रखा है उसका क्या होगा ?

जो गट्ठर हमारी पीठ पर रखा गया है वह तो समझो उतर ही रहा है 
लेकिन -----
जो हमनें स्वयं रखा है उसका क्या होगा ?

हम चिंतित हैं क्यों ? 
इसलिए नहीं कि हमारे पास वह नहीं जिसे हम चाहते हैं 
लेकिन----
 इस लिए कि वह  उनके पास क्यों है ?

मनुष्य दूसरे की गलती पर स्वयं को ताडित करता है , क्यों ?
जैसे यदि कोई हमें गाली दे दे तो हमारा  खून खौलनें लगता है , ऐसा क्यों ?
 यदि वह गाली दे रहा है हम उसे ले क्यों रहे हैं ,
 उसे यदि न लिया जाए तो वह वापिस जा कर उस ब्यक्ति के सीनें में चोट मारेगा 
लेकिन----
 हम ऐसा करनें का अभ्यास नहीं करते 

==== ओम् =====