Wednesday, November 24, 2021

गीता अध्याय - 6 हिंदी भाषान्तर

 देखे गीता के मोती

देखे गीता तत्त्व विज्ञान


 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय : 6


# इस अध्यायमें अर्जुनका प्रश्न : 6 और प्रश्न 7 निम्न प्रकार से हैं …

प्रश्न : 6 :श्लोक : 33 - 34

हे मधुसूदन! जो यह योग आप समभाव से कहा , उसे मैं अपनें मन की चंचलता के कारण नहीं समझ पा रहा हूँ ।

मन को बश में करना , वायु को बश में करने जैसा है।

प्रश्न : 7:श्लोक : 37 - 39

हे कृष्ण ! असंयमी किन्तु श्रद्धावान एवं विचलित मन वाले योगी की गति कैसी होती है ?

अब आगे ⬇


क्र सं

बिषय 

श्लोक

योग

11

अर्जुन के दो प्रश्न

33 - 34

37 - 39

05

2

मन 

अभ्यास - वैराग्य

योग खंडित होना

6 +10 

26 - 27

35 - 36

40  - 47

14

3

संन्यास - योग

कर्म - कर्मयोग

1 - 4 , 23

05

4

● स्वयं का मित्र

● समभाव , 

● युक्तयोगी 

● योग करने की विधि


5 , 7 - 9 , 31 - 32

11 - 22 , 

28 - 30 , 

24 - 25

23

योग

➡️

➡️

47


श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय : 6 सार

★ अध्याय : 6 का केंद्र मन है ★

मन से मनुष्य भोग - योग , ब्रह्म - माया और  प्रकृति - पुरुष के रहस्य को समझ कर मुक्त हो जाता है । 

⚛अब मन सम्बंधित श्रीमद्भगवत पुराण के कुछ सुत्रों पर ध्यान करते हैं ⤵️

भागवत : 5.6 : योगी मन पर भरोषा नहीं रखता ।

भागवत : 3.5 : मन से बंधन और मन से मोक्ष है।

भागवत : 10.1 : विचारों का पुंज , मन है ।

भागवत : 11.22 : कर्म संस्कारों का पुंज मन है ।

भागवत : 11.13 : जगत् मन का विलास है ।

भागवत : 11.22 : पूर्व अनुभवों पर मन भरे की भांति मंडराता रहता है ।

⚛ गीता में मन सम्बंधित श्लोक 👇


अब आगे अध्याय - 6 के 47 श्लोकों का हिंदी भाषान्तर ⬇️

श्लोक : 1 > योगी - सन्यास

अनाश्रितः कर्मफलम् कार्यम् कर्म करोति यः ।

सः सन्यासी च योगी च न निरग्नि : न च अक्रिय :।।

➡️ कर्म फल अनाश्रित कर्म करनेवाला सन्यासी एवं योगी होता हैकि अग्नि एवं कर्म त्यागी , योगी - सन्यासी होता है । यहाँ अग्नि का अर्थ है वैदिक यज्ञ ।

श्लोक : 2 > संन्यास - योग क्रमशः

● संन्यास और योग दोनों एक हैं / 

● संकल्पों का त्यागी , योगी है ।

श्लोक : 3 > कर्म - कर्मयोग

आरुरुक्षो: मुने : योगं कार्यम् कारणं उच्यते ।

योगरूढ़स्य तस्य एव शमः कारणं उच्यते ।।

● योग आरूढ़ होने की चाह रखने वाले के लिए 

कर्म  और योगारूढ़के लिए शम माध्यम है ।

शम का अर्थ है अंतःकरण का शांत रहना ।

श्लोक : 4 >  योगारूढ़

◆ जब भोग - कर्म में इंद्रियाँ अनासक्त रहती है तब 

सर्व संकल्प सन्यासी , योगारूढ़ कहलाता है ।

श्लोक :  5 - 6 > स्वयंका मित्र कौन है 

मनुष्य स्वयं का मित्र और शत्रु है । मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे , अधोगतिमें न डाले । 

◆ आत्म बोधी स्वयंका मित्र होता है , अन्यथा वह स्वयं का शत्रु है ।

यहाँ निम्न को देखिये ⬇️

★ बुद्ध कहते हैं : 

अप दीपो भव ।

और प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं :

◆ मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे 

श्लोक - 7 : प्रभुमय

समभाव , प्रशांत जितात्मान प्रभु में होता है ।

श्लोक - 8 : युक्त योगी 

ज्ञान - विज्ञान से तृप्त , निर्विकार अंतःकरण वाला , इंद्रियों को नियंत्रण में रखने वाला , समदृष्टि वाला , युक्त योगी होता है ।

श्लोक : 9 : समभाव वाला

समभाव - समदृष्टि वाला श्रेष्ठ होता है ।

श्लोक : 10 : योगी 

आशा रहित , यत चित्त ( मन , बुद्धि एयर अहँकार पर जिसका नियंत्रण हो ) , एकांकी , संग्रह न करने के भाव से भरा हुआ , अकेले रहने वाला आत्मा माध्यम से परमात्मा केंद्रित योगी होता है ।

श्लोक : 11- 20 : योग करने की विधि

1 - शुद्ध समतल भूमि पर कुश या मृगछाला बिछा कर किसी भी स्थिर सुख देनेवाले आसान में स्वयं को स्थिर करना चाहिए ।

2 - उस आसान पर बैठ कर  चित्त एवं इन्द्रियों की क्रियाओं को बश में करके , एकाग्र मन से अंतःकरण विशुद्धि हेतु योग का अभ्यास  करना चाहिए ।

3 -  काया , सिर , गर्दन को तनाव रहित स्थिति में  सीधा रखते हुए दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर केंद्रित रखने का अभ्यास करना चाहिए । 

4 - ब्रह्मचारी व्रत में स्थित  भय रहित प्रशांत  अंतःकरण के साथ  प्रभु केंद्रित  बने रहना चाहिए ।

5 - इस योगाभ्यास से  योगी सदा  मुझमें बसा हुआ , मेरे परम्  निर्वाण  शांति को प्राप्त करता है ।

6 - सामान्य आहार - विहार , निद्रा  एवं कर्म करने वाले का ध्यान फलित होता है । उपवास , असामान्य जागरण , असामान्य निद्रा , असामान्य भोजन करने वाले का ध्यान फलित नहीं होता ।

7 - जिस समय चित्त प्रभु में स्थिर हो जाता है , उसी समय वह योगी सर्व भोगों से  अनासक्त हुआ  योगयुक्त हो जाता है ।

8 - जिस प्रकार वायु रहित स्थानमें रखे हुए दीपक की ज्योति अचलायमान  होती है ,  वैसी ही स्थिति योगारूढ़ योगी के चित्त की होती है ।

9 - जिस घडी योगमें चित्त  पूर्ण शांत हो जाता है , उस घड़ी वह योगी आत्मा से आत्मा में बसा हुआ पूर्ण संतुष्ट होता है ।

श्लोक : 21 + 22

सुखं आत्यन्तिकम् यत् 

तत् बुद्धिग्राह्यम् अतीन्द्रियं ।

वेत्ति यत्र न च एव अयम् 

स्थितः चलति तत्त्वं ।।

# इंद्रियातीत निर्मल बुद्धिसे परम् आनंदकी अनुभूति करनेवाला योगी प्रभु को तत्त्व से समझता है और बड़े से बड़े दुःख में भी प्रभु से कभीं विचलित नहीं  होता।

श्लोक : 23

" दुःख संयोग वियोगः , योगः "

यह  दुःख संयोग वियोग क्या है ? 

' इन्द्रिय - बिषय संयोग दुःख का कारण है ' इस सूत्र को गीता : 5.22 , भागवत : 11.26 , पतंजलि योग सूत्र साधन पाद सूत्र : 15 + 17 + 24 +24 नें भी दिया गया है ।

इंद्रियों में बिषयों के प्रति वितृष्णा का भाव होना , वैराग्य है सुर वैराग्य ही दुःख मुक्ति का माध्यम है ।


श्लोक :24 - 32 

संकल्प से उत्पन्न कामनाओं को त्याग कर ,मनसे इन्द्रिय नियोजन करनेका अभ्यास करता हुआ , बुद्धिसे मनको प्रभु पर केंद्रित करते हुए प्रभु चिंतनमें मनको बसाना चाहिए।

यह अस्थिर मन , चंचल मन , जहाँ - जहाँ विचरता हो , उसे वहाँ - वहाँ से बार - बार हटा कर प्रभु पर केंद्रित करते रहने का अभ्यास करना चाहिए ।

जिसका रजो गुण शांत है ,जिसका मन शांत है , उसका ब्रह्म से एकत्व स्थापित हो जाता है और वह इस प्रकार निरंतर अभ्यास से आत्मा केंद्रित योगी ब्रह्म संस्पर्श से अत्यंत सुख अनुभव करता है । ऐसा समदर्शी योगयुक्त योगी सभीं भूतों में स्थित आत्मा को और सभीं भूतों को आत्मा में देखता है ।

🕉️ यो माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति।

तस्य अहम् न प्रणश्यामि सः च मे न प्रणश्यामि ।। ~~ गीता : 6.30 ~~

जो मुझे सर्वत्र देखता है , जो सब में मुझे देखता है , 

उसके लिए मैं अदृश्य नहीं और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं। 

जो सुख - दुःख में समभाव है , जो सभीं भूतों को बराबर समझता है , वह योगी परम् तुल्य होता है ।


श्लोक :33 - 35 >अर्जुन का  06 वाँ प्रश्न 

हे मधुसूदन ! जो योग आप मुझे बताए हैं , उसकी स्थिर स्थिति को मैं अपनें मनकी चंचलता के कारण नहीं समझ पा रहा हूँ।

प्रभु कहते है ⬇️

निःसंदेह यह मन चंचल है बश में करना कठिन भी है पर इसे अभ्यास और वैराग्य से  बश में किया जा सकता है । 

अभ्यास - वैराग्य क्या  है ?

इस संबंध में देखिये पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 12 - 16

ऊपर के सूत्रों  में महर्षि कह रहे हैं ⬇

★ महर्षि पतंजलि समाधि पाद में चित्त वृत्ति निरोध की 08 विधियाँ बताते हसीन जिनमें से एक प्रमुख और सभीं विधियों की भूमि है - अभ्यास - वैराग्य ।

☸ अभ्यास - वैराग्य की परिभाषा भी देते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं ⤵️

➡चित्त - वृत्तियों को शांत रखने के लिए किये जा रहे यत्न को अभ्यास कहते हैं ।

➡️ पूर्ण श्रद्धा - समर्पण भाव में नियमित लंबे समय तक अभ्यास करते रहने से दृढ भूमि मिलती है । दृढ भूमि अपर वैराग्य में पहुँचाती है । अपर वैराग्य , पर वैराग्य में ले जाता है जो समाधि का द्वार है ।

➡ इन्द्रिय - बिषय संयोग , भोग है और इस भोग के प्रति वितृष्णा का उपजना , अपर वैराग्य है । अपर वैराग्य का दृढ होना पर वैराग्य है ।

➡️ पर वैराग्य में पुरुष को स्व - बोध हो जाता है और वह गुणातीत की स्थिति में आ जाता है जो योग यात्रा की उच्च स्थिति है।

श्लोक :36

असंयम मन वाले का योग सिद्ध नहीं होता और नियोजित मन  करने का अभ्यास करनें वाले का योग वैराग्य में पहुंचने पर  सिद्ध हो जाता है ।


श्लोक :37- 39  > अर्जुन का प्रश्न > 07

जब असंयमी एवं श्रद्धावान योगी अपनें आखिरी समय आने पर  योग बिचलित हो जाता है तब वह किस गति को प्राप्त होता है ?

⚛️ इस प्रश्न के उत्तर के लिए अगके श्लोक : 40 - 47 तक को समझें ⤵️

श्लोक :40 - 44

1- ऐसे योगी का इस लोक एवं परलोक में बिनाश नहीं होता । वह दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता ।

2 - ऐसा योगी पुण्यवानों के लोक को प्राप्त होता है और वहाँ बहुत समय तक रह कर शुद्ध आचरण श्रीमानों के कुल में जन्म लेता है ।

3 - अथवा पुण्यवान लोकों में न जा कर सीधे श्रीमानों के घर में जन्म लेता है । लेकिन ऐसा जन्म दुर्लभ होता है ।

4 - इस प्रकार पिछले जन्म की अपने अधूरी  साधना को आगे बढ़ाता है ।

श्लोक :45 

प्रयत्नशील योगी अभ्यास माध्यम से अपनें पिछले जन्मों के संस्कारों की ऊर्जा से वर्तमान जन्म में ही परमगति प्राप्त कर जाता है , कैसे ? देखिये आगे ?

🕉️ ऐसे योगी का  पिछले जन्म में सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि प्राप्त करने के बाद जब शरीर छूट जाता है तब वे वर्तमान का जीवन असम्प्रज्ञात समाधि सिद्धि के लिए जीते हैं और इस प्रकार असम्प्रज्ञात समाधि सिद्धि प्राप्त करते हैं तथा आगे धर्ममेघ समाधि सिद्धि के लिए ध्यान , धारणा , समाधि एवं संयम सिद्धि से कैवल्य - मोक्ष की प्राप्ति करते हैं  

(यहाँ देखिये पतंजलि विभूति पाद सूत्र : 2 - 6 )

श्लोक :46 - 47 

1- योगी , तपस्वी से , ज्ञानियों से और सकाम कर्म करनेवालों से भी श्रेष्ठ है अतः हे अर्जुन ! तुम योगी बनो।

2 - योगियों में पूर्ण श्रद्धा से जो योगी मुझे भजता है , वह मुझे प्रिय है ।


// अध्याय : 06 समाप्त //

Thursday, November 18, 2021

पतंजलि विभूति पाद सारांश

 


पतंजलि समाधि पाद ( 51 सूत्र ) में योग क्या है ? चित्त वृत्तियां हमें किस प्रकार नियंत्रित कर रही हैं तथा चित्त वृत्तियों को सही दिशा में रखने के 08 उपायों को  बताया गया है । जब चित्त की वृत्तियाँ निरोधित हो जाती है तब सम्प्रज्ञात समाधि की अनुभूति होती है

पतंजलि योगसूत्र के दूसरे पाद - साधन पाद में अष्टांगयोगके दूसरे अंग नियम के 05 अंगों में से तप , स्वाध्याय और ईश्वर  प्रणिधान को क्रियायोग का  नाम दिया गया है  । साधन पाद के सूत्र : 28 - 55 के मध्य अष्टांगयोग के 05 अंगों को बताया गया है । क्रियायोग  और अष्टांगयोग के 05 अंगों के साथ साधन पाद में पञ्च क्लेष , दुःख , प्रकृति - पुरुष , कृतार्थ और समाधि के संबंध में भी प्रकाश डाला गया है ।

साधन पाद के बाद पतंजलि योगसूत्र में तीसरा पाद है - विभूति पाद जिसका सार यहाँ देख सकते हैं 👇

क्र. सं.

सूत्र 

बिषय 

1

1 - 6

ध्यान , धारणा , समाधि एवं संयम सिद्धि से प्रज्ञा आलोकित होती है । यह योग साधना की दृढ़ भूमि है जहाँ से असम्प्रज्ञात समाधि , कैवल्य और मोक्ष की अगली यात्रा होती है ।

2

7 - 15

यम से सम्प्रज्ञात समाधि तक कि अष्टांगयोग की साधना किसी न किसी सात्त्विक आलंबन - आधारित होती है और यह आलंबन आगे की योग साधना की यात्रा का एक बड़ा अवरोध बन जाता है ।

चित्त के व्युत्थान और निरोध दो धर्म हैं । व्युत्थान का क्षीण हो जाना और चित्त का निरोध पर टिक जाना साधना की उच्च भूमियों की सफल यात्रा के  शुभ संकेत है । चित्त जब निरोध संस्कार में स्थिर हो जाता है तब इसे चित्त एकाग्रता परिणाम कहते हैं ।

 पञ्च महाभूत और 11 इंद्रियों के धर्म , लक्षण , अवस्था और परिणाम को समझना चाहिए ।

धर्म वह जो सदैव साथ रहे । लक्षण उन्हें कहते हैं जिनके आधार पर किसी को जाना जाता है । अवस्था का अर्थ है स्थिति और परिणाम का अर्थ है फल जैसे चित्त के 03 परिणाम हैं ; निरोध , समाधि और एकाग्रता ।

3

16 - 49

यहाँ 31 सूत्रों में संयम सिद्धि से विभिन्न प्रकार की 45 सिद्धियों की प्राप्ति के संबंध में बताया गया है और शेष 03 सूत्रों को अलग से स्पष्ट किया गया है ।

4

50 - 55

अपर - पर वैराग्य , योगी का पतन 

विवेक ज्ञान प्राप्ति आदि के संबंध में बताया गया है । जाति , लक्षण और देश के आधार पर जिसे न जाना जा सके उसे विवेक ज्ञान से जाना जाता है । असंप्रज्ञात समाधि सिद्धि से विवेक ज्ञान मिलता है जो गुणातीत बनाता है ।

जबतक कैवल्य नहीं मिलता तबतक अविद्या निर्मूल नहीं होती । अविद्या के निर्मूल हो जाने पर प्रकृति - पुरुष का पृथक - पृथक होना स्पष्ट हो जाता है और यही योगयुक्त होना है ।

प्रकृति - पुरुष का एक होने की सोच ,भोग सम्मोहन के कारण है । योग सिद्धि से प्रकृति - पुरुष के पृथक - पृथक होना स्पष्ट हो जाता है।

योग

55

॥ ~~ ॥~~~~~~~॥ ~~॥


🕉️ विभूति पाद सार को देखने के बाद अब विभूति पाद की यात्रा प्रारंभ करते हैं । इस यात्रा को निम्न 04 चरणों में पूरा किया जाएगा 👇

★ चरण 01 में सूत्र : 1- 6 को देखेंगे

★ चरण 02 में सूत्र : 7 - 15 को देखेंगे

★ चरण 03 में सूत्र : 16 - 49 को देखेंगे

★ चरण 04 में सूत्र : 50 - 55 तक को देखेंगे 


चरण : 01

पतंजलि विभूति पाद सूत्र : 1 - 6

ध्यान , धारणा , समाधि एवं संयम सिद्धि से प्रज्ञा आलोकित होती है । यह स्थिति योग साधना की दृढ़ भूमि है जहाँ से योग साधना की क्रमशः असम्प्रज्ञात समाधि , कैवल्य और मोक्ष की अगली यात्रा शुरू होती है ।


चरण : 02

पतंजलि विभूति पाद सूत्र : 7 - 15

अष्टांगयोग की यम से सम्प्रज्ञात समाधि तक की साधना किसी न किसी सात्त्विक आलंबन - आधारित होती है और यह आलंबन आगे की योग साधना की यात्रा में एक बड़ा अवरोध बन जाता है ।

चित्त के व्युत्थान और निरोध दो धर्म हैं । व्युत्थान का क्षीण हो जाना और चित्त का निरोध पर टिक जाना साधना की उच्च भुमियों की सफल यात्रा के लिए एक शुभ संकेत है । चित्त जब निरोध संस्कार में स्थिर हो जाता है तब इसे चित्त एकाग्रता परिणाम कहते हैं ।

◆ पञ्च महाभूत और 11 इंद्रियों के धर्म , लक्षण , अवस्था और परिणाम को समझना चाहिए । 

धर्म वह जो सदैव साथ रहे ।

लक्षण उन्हें कहते हैं जिनके आधार पर किसी को जाना जाता है । 

अवस्था का अर्थ है स्थिति और परिणाम का अर्थ है फल जैसे चित्त के 03 परिणाम हैं ; निरोध , समाधि और एकाग्रता ।

धर्म के लिए धर्मी चाहिए जैसे शक्ति के लिए शक्तिमान चाहिए।

● भूत , वर्तमान और भविष्य में जो रहता हो वह धर्मी है और…...

 ● तीन काल ( भूत , वर्तमान और भविष्य ) धर्म हैं

◆ योग दर्शन सांख्य दर्शन के धरातल पर स्वयं को स्थापित करता है , इसलिए यहाँ सांख्य के सत्कार्य बाद को अपना रहा है । सत्कार्य बाद अर्थात कारण - कार्य बाद अर्थात हर कार्य में कारण विद्यमान रहता है । बिना धर्मी ,धर्म की कोई सत्ता नहीं ।

विभूति पाद सूत्र : 15की रचना निम्न प्रकार है ⬇️

1 - क्रम 

2 - अन्यत्वम् ( बदलाव )

3 -  परिणाम ( फल )

4 -  अन्यत्वे ( बदलाव ) 

5 -  हेतुः 

सूत्र भावार्थ

क्रम में बदलाव , परिणाम में बदलाव लाता है 

क्रम क्या है ? 

पञ्च महाभूतों की स्थिति में क्रमशः हो रहा परिवर्तन , क्रम कहलाता है । चूँकि पञ्च भूतों में क्रम है अतः उनके परिणाम में भिन्नता है ।



चरण : 03


पतंजलि विभूति पाद सूत्र : 16 - 49 【 45 सिद्धियाँ 】

यहाँ 34 सूत्रों में सूत्र - 23 , 35 और 37 को छोड़ कर शेष 31 सूत्रों के माध्यम से संयम सिद्धि से विभिन्न प्रकार की 45 सिद्धियों की प्राप्ति के संबंध में चर्चा की गई है । सूत्र : 23 , 35 और 37 को तालिका के अंत में अलग से स्पष्ट किया गया है । अब 45 सिद्धियों को निम्न तालिका में देखें 👇

सिद्धि /

सूत्र  👇

सिद्धि विवरण 👇

1


सूत्र 16

किसी पदार्थ के तीनों परिणामों ( धर्म , लक्षण , अवस्था ) पर संयम सिद्धि से उस पदार्थ के भूत , वर्तमान और भविष्य का ज्ञान हो जाता है । धर्म , लक्षण और अवस्था को सूत्र : 13 में देखें जो निम्न प्रकार से हैं 👇

धर्म > अर्थात ऐसे गुण जो सदैव साथ रहते हों 

● लक्षण > अर्थात वे संकेत जिनके आधार पर बस्तु / तत्त्व को समझा जा सके 

अवस्था > अर्थात उसकी स्थिति 

2

सूत्र 17

सभीं प्राणियों की भाषा को समझने की सिद्धि

एक वस्तुको  03 तत्त्वों से समझा जाता है - शब्द , अर्थ और प्रत्यय ( ज्ञान ) किसी प्राणी की भाषा को समझने के लिए उस प्राणी के इन 03 तत्त्वों पर संयम सिद्धि पाना आवश्यक है 

3

सूत्र 18

अपने पूर्व जन्मों को जानना 

अपने संस्कारों की संयम सिद्धि  से अपने पूर्व के जन्मों का भी बोध हो जाता है

4

सूत्र 

19 , 20

दूसरे के ज्ञान को जानने से उसके चीत्त - स्वभाव को तो जाना जा सकता है  पर उसके चीत्तके बिषयों को नहीं जाना जा सकता 

5

सूत्र 21

अपने शरीर स्वरुप पर संयम सिद्धि से दूसरे के लिए स्वयंके शरीर को अंतर्धान करने की सिद्धि मिलती है 

6

सूत्र

22

अपने कर्म संयम सिद्धि से स्वयं के मृत्यु का ज्ञान होता है 

👉निम्न तीन प्रकार के क्रम ( कर्म ) हैं 

1 - संचित 2 - प्रारब्ध 3 - क्रियमाण 

 पहले और तीसरे को निरूपक्रम ( बिना प्रयाश मिला कर्म ) कहते हैं और दूसरे को सोपक्रम ( प्रयाश से मिला कर्म ) कहते हैं । जिसका फल जल्दी मिले वह सोप कर्म है और देर से जिसका फल मिले वह निरूप क्रम हैकेवल प्रारब्ध कर्म भोग के लिए मिलता है क्योंकि देह प्राप्ति प्रारब्ध से मिली हुई है ।

7 सूत्र 24

किसी दूसरे के बल की प्राप्ति , उसके बल पर संयम सिद्धि  से मिलती है 

8

सूत्र 25

प्रवृत्ति संयम सिद्धि से परदे के पीछे और सुदूर स्थित विषय - बस्तु का बोध होता है । परदे के पीछे को समझें - जैसे पानी के नीचे या किसी दिवार के उस पार की वस्तुओं का बोध होना 

प्रवृत्ति क्या है ? 

● पतंजलि समाधि पाद सूत्र - 35 में प्रवृत्ति शब्द का प्रयोग किया गया है ।

जब चित्त किसी सात्त्विक आलम्बन से बध जाता है तब वह निर्मल सात्त्विक ऊर्जा से भर जाता है और इस प्रकिया को प्रवृत्ति कहते हैं 

9 सूत्र 26

सूर्य संयमसे 14 भुवनों का बोध होता है 

10 -12

सूत्र - 27

28 , 29

1- चंद्रमा पर संयम सिद्धि मिलने से तारा मंडल का बोध होता है 

2 - ध्रुव तारा संयम सिद्धि से तारा मण्डल के तारों की गतियों का बोध होता है 

3 - स्वयं के नाभि चक्र पर संयम सिद्धि मिलने से स्वयं के शरीर के बाहरी - भीतरी की संरचना का बोध होता है 

13 14 15

सूत्र

30,

31, 32


# कंठ कूप संयम सिद्धि से  भूख - प्यास की निवृत्ति होती है

# कूर्म नाड़ी संयम सिद्धि से स्थिरता मिलती है 

# मूर्धा प्रकाश संयम सिद्धि से  सिद्धों के दर्शन होते हैं 

( मूर्धा सहस्त्रार चक्र को कहते हैं )

16

सूत्र 33

प्रतिभा से सर्वस्व का ज्ञान प्राप्ति 

प्रतिभा अर्थात शुद्ध बुद्धि

17 

सूत्र 34

हृदय संयम सिद्धि से चित्तको जाना जा सकता है

18 से

23

सूत्र 36

पुरुष बोधसे 06 सिद्धियां मिलती हैं

1  - प्रतिभा , 2 - श्रवण , 3 -  वेदन , 4 - आदर्श ,

 5 - आस्वाद , 6 -  वार्ता 

24

सूत्र 38

अपनें चित्त को पर काया में प्रवेश कराना

अविद्याके शिथिल हो जाने से प्रकृति - पुरुष के मूल स्वरूपका बोध हो जाता है और इस प्रकार अपनें चित्तका भी पूर्णरूपेण ज्ञान हो जाता है तथा उसे पर काया में प्रवेश कराया जा सकता है 

25

सूत्र 39

जल एवं काटों आदि पर चलने की सिद्धि

उदान वायु संयम से जल पर चलना , काटो पर चलना आदि की सिद्धि मिलती है 

26

सूत्र 40

शरीर में चमक पैदा करना

समान वायु संयम सिद्धि से योगी का शरीर चमकने लगता है 

27

सूत्र 41

देवताओं जैसी सुनने की शक्ति पाना

शब्द और आकाश के सम्बन्ध के ऊपर संयम सिद्धि से देवताओं जैसी सुनने की शक्ति मिलती है

28

सूत्र - 42

आकाश में भ्रमण करने की ऊर्जा पाना

शरीर और आकाश के सम्बन्ध - बिषय पर संयम सिद्धि से अपनें शरीरको रुई जैसा हल्का बना सकते हैं तथा आकाश में भ्रमण कर सकते हैं ।

29

सूत्र 

43

महा विदेहा की सिद्धि 

सूत्र रचना > बहिः अकल्पिता वृत्ति: महाविदेहा 

ततः प्रकाश आवरण क्षयः अर्थात अकल्पित अपने चित्त को देह से बाहर देखने की संयम सिद्धि से विवेक ज्ञान की प्राप्ति होती है ।इसे महाविदेहा सिद्धि कहते हैं ।

30

सूत्र

44

पञ्च तत्त्वों की सिद्धि

पञ्च तत्त्वों की 05 दशाएं हैं ; 

1- स्थूल  2 - स्वरुप  3 - सूक्ष्म  4 - अन्वय और

 5 - अर्थवक्त 

जब इनके ऊपर संयम सिद्ध हो जाता है तब पञ्च भूतों पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है 

1 - स्थूल : पञ्च भूतों के स्थूल भौतिक रूपों  पर संयम सिद्धि करना 

2 - स्वरुप : पञ्च भूतों के गुणों पर संयम सिद्धि प्राप्त करना 

3 - सूक्ष्म : पञ्च भूतों के तन्मात्रों पर संयम सिद्ध करना 

4 - अन्वय : तीन गुणों पर संयम सिद्ध करना 

5 - अर्थवक्त : यह सोचना की हमें पञ्च तत्त्व क्यों मिले हुए हैं , इस पर संयम सिद्ध करना 

उपर्युक्त पञ्च भूतोंकी दशाओं की सिद्धिसे  पञ्च भूतों की सिद्धि मिलती है 

31 से

40 तक

सिद्धियों की प्राप्ति


सूत्र 

45 + 46

भूतों की दशाओं पर जब संयम किया जाता है

 तब ⬇️

1 - अणिमा आदि सिद्धियाँ मिलती हैं 

2 - काया संपत्ति मिलती है 

3 - पञ्च भूतों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता 

★ काया संपत्ति को सूत्र - 46 में बताया गया है

1 - अणिमा आदि सिद्धियों के सम्बन्ध नें निम्न को देखें जिसे भागवत के आधार पर तैयार किया गया है । ये सिद्धियां हर पल प्रभु श्री कृष्ण के साथ रहती हैं  ⬇️

1- अणिमा : स्वयं को एक अणु रूप में बदल देना

2 - महिमा : स्वयं को बहुत बड़ा बना देना

3 - लघिमा : स्वयं को रुई जैसा हल्का बना लेना

 ( विभूति पाद सूत्र : 42 में यही बात बताई गई है )

4 - गरिमा : अपने को बहुत भारी बना देना 

5 - प्राप्ति : स्वेच्छा से कुछ भी प्राप्त कर लेना

6 - प्राकाम्य : निर्विघ्न इच्छा पूर्ति 

7 - वशित्व : भूतों पर विजय

8 - ईशित्व की प्राप्ति : ईश्वर जैसी शक्ति की प्राप्ति

सूत्र - 46 : काया संपत्ति से यह सूत्र सम्बंधित है 

कायाके 05 स्वरूपों ( रूप , लावण्य , चमक , बल ,  वज्र समान मजबूती )  को बताते हुए ऋषि कहते हैं कि 05 महाभूतों के संयम साधना सिद्धि पर ऊपर व्यक्त काया के 05 स्वरूप मिलते हैं ।

41

सूत्र 47

इन्द्रियों पर विजय 

◆ इंद्रियोंके स्वरूपों पर  संयम करने से उनको जीता जा सकता है । 

इंद्रियों के स्वरूप निम्न हैं ⬇

ग्रहण , स्वरुप , अस्मृता , अन्वय , अर्थवक्त 

1 - ग्रहण :  इंद्रियों की बिषय - ग्रहण करने की शक्ति

2 -स्वरुप : इंद्रियों के स्वरुप उनके तन्मात्र हैं 

3 - अस्मिता : इन्द्रियाँ जो करती हैं उनके पीछे सूक्ष्म मैं का भाव रहता है , उसे अस्मिता कहते हैं 

4 - अन्वय : अन्वयका अर्थ है , पीछे चलना । जितने भी कर्म होते हैं उनके होने के कारण इंद्रियाँ नहीं , तीन गुण होते हैं ।

5 - अर्थवक्त : इंद्रियों का रुख जब बाहर बिषयों की ओर होता है तब वे भोग आसक्ति में डूबती होती हैं और जब अंदर गमन करती हैं तब उनका रुख मोक्ष की ओर होता है 

42 से

44

तक

सूत्र 48

इन्द्रिय जय से निम्न 03 सिद्धियाँ मिलती है

1 - मनकी गति से शरीर को चलाने की सिद्धि मिलती है 

2 - विकिरण भाव : इंद्रियोंको दूर देश तक भेजा जा सकता है 

3 - प्रधान जय : प्रकृति पर पूर्ण नियंत्रण करने की शक्ति मिलती है

सिद्धि

45

सूत्र 49

पञ्च भूतों पर नियंत्रण

सत्त्व ( बुद्धि ) और पुरुष दोनों अलग -अलग हैं , ऐसा बोध होने से संपूर्ण भूतों पर नियंत्रण की शक्ति और सर्वज्ञ की स्थिति मिल जाती है 


चरण : 03.1


सूत्र भावार्थ > बलवान से मैत्री  रखनी चाहिए । अब आगे 👇

विभूति पाद सूत्र 23 के साथ समाधि पाद सूत्र 33 को देखिए  👇

 भावनाएं  04 प्रकार की हैं > मैत्री +करुणा + मुदिता + उपेक्षा 

और  क्रमशः सुख + दुःख + पुण्य + पाप , इनके बिषय हैं । 

अब निम्न स्लाइड में समाधि पाद - 33 + विभूति पाद - 23 के सार को देखें ⬇️

ध्यान रहे कि समाधि पाद सूत्र - 33 योग साधना की 14 बाधाओं से मुक्त रहने के उपाय के सम्बन्ध में है । अब विभूति पाद

 सूत्र - 23 को यहाँ देखें जो कह रहा है " मैत्रादिषु बलानि " अर्थात बलवान व्यक्ति से मित्रता रखनी चाहिए ।



चरण : 03.2

विभूति पाद सूत्र - 35

👌प्रकृति और पुरुषको अलग - अलग देखने वाला चित्त , योग में होता है और दोनों को एक समझनेवाला चित्त भोग में होता है ।



चरण : 03.3

विभूति पाद सूत्र - 37  

" ते समाधौ उपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः "

यहां ते शब्द सूत्र - 36 के लिए प्रयोग किया गया है । समाधौ का अर्थ है समाधि के लिए , उपसर्गा का अर्थ है  अवरोध , व्युत्थाने का अर्थ है सांसारिक भोग केंद्रित जीवन में सिद्धयः का अर्थ है लाभकारी ।

सूत्र भावार्थ 

विभूति पाद सूत्र - 36 में  1  - प्रतिभा , 2 - श्रवण , 3 -  वेदन , 4 - आदर्श ,

 5 - आस्वाद और 6 -  वार्ता , ये 06 सिद्धियों की चर्चा की गई है ।

अब सूत्र - 37 में महर्षि पतंजलि कह रहे हैं 👇

 ये 06 सिद्धियाँ भोग जीवन जीने वालों के लिए तो लाभप्रद हैं लेकिन कैवल्य यात्रा के अवरोध हैं ।


चरण : 04

सूत्र : 50 - 55: 

# यहाँ अपर वैराग्य ,  पर वैराग्य , योगी के  पतन होने की बात और विवेक ज्ञान प्राप्ति के संबंध में चर्चा की गई है 

# जाति , लक्षण और देश के आधार पर जिसे न जाना जा सके उसे विवेक ज्ञान से जाना जाता है ।

# असंप्रज्ञात समाधि सिद्धि से विवेक ज्ञान मिलता है जो गुणातीत बनाता है ।

# जबतक कैवल्य नहीं मिलता तबतक अविद्या का निर्मूल नहीं हो पाता । अविद्या के निर्मूल हो जाने पर प्रकृति - पुरुष का पृथक - पृथक होना स्पष्ट हो जाता है 

# प्रकृति - पुरुष का एक होने की सोच , भोग सम्मोहन के कारण उठती है । 

योग सिद्धि से प्रकृति - पुरुष के पृथक - पृथक होना स्पष्ट हो जाता है ।