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Wednesday, May 21, 2014

यह भी एक बात है

* जब तक संसारकी पूरी हवा नहीं लग जाती है तबतक एक युवाको जीवन रंगीन दिखता रहता है और उसके जीवनके हर पल एक नए आयाम जैसे होते है। धीरे -धीरे वही युवक समयके प्रभाव में वहाँ पहुँच चुका होता है जहाँ वही उसका जीवन उसे बोझ बन जाता है ,यह घटना नहीं है ,यह जीवन यात्रा के दो रंग हैं जो हमारी बंद आँखों को खोलना चाहते हैं पर हम अपनी आँखों को और बंद करते चले जाते हैं और एक दिन अपनीं आँखे थक कर हमेशा केलिए बंद होजाती हैं फलस्वरूप अपना भौतिक अस्तित्व सदैव केलिए समाप्त हो जाता है । 
* हर बेटा पिता बनता है हर पिता दादा बनता है । हर लड़की माँ बनती है ,हर माँ दादी बनती है यदि अन्य बाते सामान्य रहें तो लेकिन क्या इस परिवर्तनका किसी को पूर्वानुमान होता है ? पूर्वानुमान न होनें के कारण तरह -तरह की सामाजिक समस्याएं खड़ी होती रहती हैं और हम सब इन समस्याओं में उलझे -उलझे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से इस संसार को तन्हाई में छोड़ना पड़ता 
है । 
* यह मेरे कुल की मर्यादा है ,यह मेरे इज्जतका सवाल है , यह मेरे धर्म के प्रतिकूल है , ऐसा नहीं हो सकता ,वैसा नहीं हो 
सकता , ऐसे एक नहीं अनेक बंधनों में हम अपनें उत्तराधिकारी को बाद कर रखते हैं इन बंधनों की इतनी गहरी पकड़ होती है कि उस बिचारे के दिल के अरमा सिकुड़ते चले जाते हैं और उसके पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता कि वह भी अपनें पिता की बातोंको अपनें उत्तराधिकारियों के ऊपर थोपे । अप ज़रा अपनी निगाह समाजमें दौड़ाएं और देखें , क्या ऐसा ही नहीं हो रहा ? 
 <> ऐसी स्थिति में और क्या हो सकता है ? ऐसे कितनें दिखते हैं जो अपनी आगे की पीढ़ी के बच्चो को मौका दे रहे हो संसार के अनुभव को प्राप्त करने केलिए ? क्या बिना कुछ किये भी अनुभव मिलता है ? 
~~~ ॐ ~~~