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Friday, June 6, 2014

किधर - किधर देखूँ

# आइये आप और मैं दोनों एक साथ समझते हैं उसे जो घट रहा है पर हम सब अभीं तक उसकी ओर अपनी -अपनी आँखे बंद किये बैठे हैं ।अब जरा समझना , नीचे दी जा रही बातों को :---
* परिवार रचाया क्यों , क्या शांतिके लिए ?
* बस्ती बनाई क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* सम्बन्ध स्थापित किये क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* ब्यापार खडा किया , क्यों , क्या चैन से जीवन गुजारनें केलिए ?
* युद्ध लड़े ,क्यों , क्या शांतिसे रहनें केलिए ?
* मंदिर बनाए , क्यों , क्या शांति केलिए ?
* मंदिर में मूर्ति स्थापित किये ,क्यों ? क्या मन शांति केलिए ?
* खूबसूरत महल खडा किये ,क्यों , क्या दो घडी शांति से रहने केलिए ?
* जीवन गुजार दी ,भाग -दौड़ में ,आखिर क्यों , क्या शांति की खोज केलिए ?
** लेकिन अब ज़रा रुकना और सोचना :--
1- यहाँ इस संसार में हमारा सारा प्रयाश जो शांति और सुरक्षा से जीवन गुजारनें केलिए हुए ,क्या वे विफल नहीं हुए ?
2- यहाँ शांति सभीं चाहते हैं ,पर हैं , कितनें शांति
में ?
3- यहाँ सभीं प्यार में रहना चाहते हैं ,लेकिन हैं कितनें प्यार में ?
4- यहाँ सभीं प्रभुको दिल में बसाना चाहते हैं लेकिन कितनों के पास ऐसा दिल भी है ?
## कहना और सुनना तो बहुत हो चुका पर मिला कुछ नहीं ,क्योंकि कहनें और सुननें से होना
(बदलना ) था पर हम सबकुछ करनें को तैयार हैं पर बदलना नहीं चाहते , फिर क्या होना था ? न होना
था , न होगा कुछ ।
** जो भी हमनें किये , उनके करने से हमें बदल जाना था , पर :---
# हम स्वयंको बदलना नहीं चाहते और जैसे हैं उसी स्थिति में प्रभुको अपनें सामने लाना चाहते हैं , आखिर क्यों ?
# क्योंकि हम उसे भी अपनें अर्थ केलिए प्रयोग करना चाहते हैं ।
# हम जितनें गहरे अज्ञानी हैं , प्रभु को भी अपनें जैसा ही अज्ञानी क्यों समझते हैं ?
# हम संसार में लोगों को धोखा देते - देते इतने मज गए हैं की सब स्वयं को भी बड़ी बारीकी से धोखा दे बैठते हैं और प्रभु को भी खूब धोखा दे रहे हैं , है न नाजे की बात ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~