Wednesday, March 28, 2012

जीवन दर्शन - 33

  • कर्म रहित कोई जीव धारी एक पल भी नहीं रह सकता[गीता- 18.11 ]

  • भूतभावः उद्भवकरः विसर्गः इति कर्मः[गीत –8.3 ]

    [जीव जिससे भावातीत हो सके वह कर्म है]

  • कर्म कर्ता मनुष्य या जीव नहीं उनके अंदर तीन गुणों का समीकरण होते हैं

  • मनुष्य में जो गुण जिस समय प्रभावी रहता है वह उस प्रकार का काम करता है

  • सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसा कोई नहीं जी पर तीन गुणों का प्रभाव न पड़ता हो[गीता- 18.40 ]

  • थर्मामीटर में जैसे ताप के प्रभाव में पारा ऊपर नीचे होता रहता है वैसे तीन गुण मनुष्य के अंदर उठते - बैठते रहते हैं [ सोच , खान – पान , रहन – सहन के आधार पर ]

  • सात्विक गुण ज्ञान की ओर ले जाता है

  • राजस गुण भोग से बाधता है

  • तामस गुण मोह एवं भय का जन्म दाता है

  • तीन गुण स्वभाव का निर्माण करते हैं

  • स्वभाव से कर्म होता है

  • कर्म से सुख – दुःख का अनुभव होता है

  • किसी के कर्म एवं कर्म – फल की रचना प्रभु आधारित नहीं है[गीता- 5.14 ]

  • मनुष्य जब कर्म करता है तब स्वयं करता समझता है और जब परिणाम गलत होते है तब प्रभु को जिम्मेवार समझता है , क्या है यह राजनीति वह भी प्रभु से ?

  • परिणाम उत्तम तो उस कर्म को करनें वाला मैं हूँ और यदि परिणाम अशुभ हुआ तो वह प्रभु के कारण हुआ,यह है मनुष्य की गणित


====ओम्=======



Monday, March 26, 2012

कौन सिकुड रहा है और कौन फ़ैल रहा है

क्या फ़ैल रहा है और क्या सिकुड रहा है?


मनुष्य फ़ैल रहा है और मानवता सिकुड रही है

राम सिकुड रहे हैं और काम फ़ैल रहा है

असत् फ़ैल रहा है और सत् सिकुड रहा है

भोग – मन फ़ैल रहा है और चेतना सिकुड रही है

श्रद्धा सिकुड रही है और संदेह फ़ैल रहा है

मनुष्य की संख्या फ़ैल रही है और अन्य जीवों की प्रजातियां सिकुड रही है

प्यार सिकुड रहा है और नफ़रत फ़ैल रही है

समता सिकुड रही है और विसमता फ़ैल रही है

प्रकृति निर्माण सिकुड रहा है और मनुष्य कृत्य निर्माण फ़ैल रहा है

अपनापन सिकुड रहा है और परायापन फ़ैल रहा है

मंदिर फ़ैल रहे हैं और धर्म सिकुड रहा है

योगी फ़ैल रहे हैं और योग सिकुड रहा है

पुरानी परम्पराएं सिकुड रही हैं और नयीं परम्पराएं फ़ैल रही हैं

आनें वाले दिनों में राम – कृष्ण के मंदिर लुप्त हो जानें वाले हैं रावण – कंश के मंदिर दिखेंगे


=====ओम्=====




Saturday, March 24, 2012

जीवन दर्शन 31

जीव,जीवन सिद्धांत एवं शब्द जो पैदा हुए हैं एक दिन समाप्त हो जायेंगे

आप देखना आज प्यार,प्रेम,प्रेमी एवं प्रेमिका जैसे शब्दों में कितनी और जान बची पडी है?

आज वासना शब्द की चादर प्यार शब्द को ढक चुकी है

आज समझना कठिन हो गया है कि वासना - प्यार में क्या भेद है ?

वासना माध्यम के सहारे यात्रा करती है और प्यार माध्यम रहित है और सर्वत्र है

वासना का माध्यम भाषा-भाव हैं और प्यार निर्भाव में बसता है

प्यार की धुन रहित धुन परम प्रेमी को सुनाई पड़ती है

प्रेमी शब्द रहित स्थिति में गाता है

संसार वासना का सागर है लेकिन इसका मूल परम प्रेम है

बिना गुण निर्गुण में पहुँचना संभव नहीं और बिना वासना प्यार को छूना भी सभव नहीं

गुण निर्गुण के माध्यम हैं और वासना प्यार का

सभीं गुण एवं उनके भाव प्रभु श्री कृष्ण से हैं लेकिन प्रभु स्वयं निर्गुणी हैं और भावातीत हैं

====ओम्======



Thursday, March 22, 2012

जीवन दर्शन 30

  • रामायण गानें वालों की संख्या अनेक है लेकिन उनमें स्वप्न में भी राम को देखने वाले कितने हैं?

  • घर से भाग कर प्रभु के खोजी अनेक हैं लेकिन उनमें कितने बुद्ध बन पाते हैं?

  • उपवास करने वाले भी कम नहीं लेकिन महावीर कितने बन पाए ?

  • घर में मंदिर बनवाने वाले अनेक हैं पर मन को मंदिर कितने बना पाते हैं ?

  • सभीं कहते हैं, “राम सहारे गाडी चल रही है"पर ह्रदय में बैठे राम को कितने निहारते हैं?

  • मस्तक पर चन्दन सभीं लगाते हैं पर उनमें कितने तीसरी आँख की कल्पना कर पाते हैं?

  • शिव को जल सभीं चढाते हैं पर शिव जो बातें पार्वती को ध्यान के सम्बन्ध में बताई है उनको कितने लोग जानना चाहते हैं ?

  • सीता चौदह साल अपने पति के साथ जंगल में रही और हम उनको पूजते हैं पर लक्षमण की पत्नी उर्मिला जो चौदह साल पति का इन्तजार करने में लगा दी उसे कौन जानता है ?

  • गीता कहता है, “वह जो मोह में शरीर त्यागता है उसे पशु योनी या कीड़ों-पकोड़ों की योनी मिलती है"और श्री राम के पिता दशरथ राम के मोह में शरीर त्यागा था फिर उनको कौन सी योनी मिली होगी?

  • बाल श्री कृष्ण को चाहनें वाले बहुत हैं लेकिन गीत के श्री कृष्ण[सांख्य – योगी कृष्ण]को कितनें लोग चाहते हैं?

  • एक नहीं एनेक बार द्वारिका समुद्र में समा चुकी है और अगले50सालों में एक बार और यह समुद्र में समानें वाली है,इस बात को कनाडा के भारतीय मूल के वैज्ञानिक टाटापल्ली का कहना है/


===== ओम्========





Tuesday, March 20, 2012

जीवन दर्शन 29

  • तीन गुण हैं और सबकी अपनी - अपनी आसक्तियां हैं

  • आसक्ति से कामना और कामना से क्रोध उठता है

  • गुणों के आधार पर तीन प्रकार की कामनाएं भी होती हैं

  • आसक्ति रहित कर्म कर्म – योग है

  • आसक्ति रहित कर्म से निष्कर्मता की सिद्धि मिलती है

  • निष्कर्मता की सिद्धि ही ज्ञान योग की परानिष्ठा है

  • परानिष्ठा सत् का द्वार खोलती है

  • सत् के द्वार से जो दिखता है वह है अब्यक्त

  • कर्म योग की सिद्धि पर कर्म में अकर्म एवं अकर्म में कर्म दिखता है

  • कर्म योग की सिद्धि प्राप्त कर्म योगी को सम्पूर्ण ब्रहमांड एक के फैलाव रूपमें दिखता है

  • अपरा भक्ति को देखा एवं समझा जाता है लेकिन परा को कौन और कैसे समझेगा ?

  • साकार निराकार का द्वार है और निराकार मात्र एक अनुभूति है जहाँ कहनें को कुछ बचता ही नहीं

    ===== ओम्=====



Saturday, March 17, 2012

जीवन दर्शन 28

गीता के शब्दों के भाव को गीता में खोजना ज्ञान – योग में पहुंचा सकता है

गीता सूत्रों की रोशनी में कर्म करना कर्म – योग हो सकता है

ऐसा कौन है जो भय से मुक्त हो ?

ऐसा कौन है जो मौत से न डरता हो ?

ऐसा कौन हो सकता है जो अमर रहे ?

ऐसा कौन है जो मौत से मित्रता स्थापित करके उसके राज को समझना चाहता हो ?

आखिर तन से हमें इतना लगाव क्यों है?

हमारे तन का क्या अस्तित्व है?

ऐसे सभीं प्रश्नों से मुक्ति पाना ही भय रहित होना होता है

और गीता ऐसे प्रश्नों के ऊपर पड़े परदे को उठा कर कहता है , देख यह है परम की माया

गीता संसार – तत्त्वों से परिचय कराता है

गीता भोग होश उठा कर हमारे अगले कदम को योग में पहुंचाता है

गीता योग भोग के द्वार को बंद करके परम गति की यात्रा पर ले जाता है

गीता के श्लोकों में वही उर्जा है जो सामवेद के बृहत्साम श्रुतियों में है

गीता के सूत्र उस ऊर्जा में पहुंचाते हैं जहाँ गायत्री छंद से साधक पहुंचते हैं

गीता भोग से योग में,योग से वैराज्ञ में और वैराज्ञ से परम में पहुंचाता है

=====ओम्========


Wednesday, March 14, 2012

जीवन दर्शन भाग 27

औरों से मिलनें वाले सुख एवं अपनों से मिलनें वाले सुख को एक तराजू में तौलो

मनुष्य सबको गुलाम बन कर क्यों रखना चाहता है?

मनुष्य के ज्ञान – विज्ञान की दिशा परमात्मा को भी गुलाम बनानें को है , क्यों ?

अन्य जीवों की तुलना में मनुष्यों की पलकें अधिक क्यों झपकती हैं?

अन्य जीव तीन मार्गी हैं[काम+भोजन+सुरक्षा]और मनुष्य चार मार्गी[काम,राम,भोजन,सुरक्षा]

भोगी उस चौराहे पर है जहाँ से चार मार्ग निकलते हैं [ काम , राम , भोजन , सुरक्षा ] और मार्गों के चयन में भ्रमित रहता है

योगी का मार्ग पगडण्डी है जो सीधे भोग से निकल कर परम में पहुंचता है जिस पर कोई चौराहा नहीं

भोगी भोग को भगवान समझता है और योगी की बुद्धि में दो नहीं एक[प्रभु]बसता है

भोगी का सम्बन्ध भगवान से मात्र भोग प्राप्ति के लिए होता है और योगी कामना-संकल्प रहित प्रभु में बसा होता है

राम में कम की तलाश है भोगी की और योगी काम को राम का मार्ग समझता है [ गीता - 7.11 धर्माविरुद्धो भूतेषु कामः अस्मि ]

खोज की यात्रा जितनी लंबी होती है मनुष्य उतना बेचैन रहता है और जब एक खोज समाप्त होती है, दूसरी प्रारम्भ भी हो जाती है


====ओम्======


Sunday, March 11, 2012

जीवन दर्शन 26

आज जो हो लेकिन कल जिसका अस्तित्व बदल जाए वह सत्य नहीं

वह जिसके ऊपर समय का प्रभाव न हो वह सत्य है

अपनी सोच के पीछे कामना - अहंकार , मोह – लोभ एवं भय – आलस्य की ऊर्जा न रखो , तुम सत्य में होगे

जबतक औरों के इशारे पर अपना कदम रखते रहोगे तुम सत्य में नहीं पहुँच सकते

लोगों की मानसिकता दिन प्रति दिन उनको सिकोड़ रही है

लोगों की उलझन को जबतक अपनें मनोरंजन का साधन समझते रहोगे तुम्हारा मार्ग गलत होगा

लोगों का कभी सुनो भी हमेशा सुनाते ही रहनें से तुम्हारा अहंकार सघन होता है

जीवन में सहारा जरूरी है लेकिन सहारे का गुलाम बन कर रह जाना दुःख का कारण हो सकता है

जो देखो उसमें उसे पकडो जिससे वह है और वह सत्य होगा

जब कोई आप का अपना बन रहा हो तो होश में रहना उसमें उसका गहरा स्वार्थ छिपा हो सकता है

दो रुपये का बैगन लेते समय आदमी दस बार सोचता है और जीवन का सौदा बिना सोचे कर बैठता है


===== ओम्======


Friday, March 9, 2012

जीवन दर्शन - 25

  • संसार से भाग कर कहाँ जाओगे?

  • जहाँ भी जाओगे तुम्हारा अपना संसार निर्मित हो उठेगा

  • तुम जिस संसार से भागे थे वह किसी और का नहीं था , तुम्हारा अपना था

  • तुम जगह बदलते रहते हो लेकिन स्वयं को नहीं बदलना चाहते

  • जबतक तुम अपनें को नहीं बदलते तुम जहाँ भी रहोगे वह तुमको नरक सा दिखता रहगा

  • यहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सभीं सूचनाओं का अपना-अपना संसार है

  • संसार अर्थात एक स्पेस ; हमारी ऊर्जा का क्षेत्र

  • जहाँ कोई अपना , कोई पराया का आभाष न रहे वह प्रभु का स्पेस होता है

  • पर में स्व को देखना एवं स्व में पर को देखना ही भक्ति है

  • जब बुद्धि से तेरा-मेरा का भाव समाप्त हो जाता है तब वह बुद्धि निश्चयात्मिका बुद्धि होती है

  • निश्चयात्मिका बुद्धि में प्रभु बसता है

  • अनिश्चायात्मिका बुद्धि को भोग की बुद्धि होती है

  • ब्राह्मण वह जो ब्रह्म से परिपूर्ण हो

    =====ओम्======



Wednesday, March 7, 2012

गीता में प्रभु की बात

गीता में प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं-----

वैराज्ञ एवं मोह एक साथ एक मन – बुद्धि में नहीं रहते

वैराज्ञ बिना संसार का बोध होना संभव नहीं

संसार का बोध ही प्रकृति - पुरुष का बोध है

प्रकृति माया से माया में है

माया प्रभु निर्मित तीन गुणों का एक सीमा रहित सनातन माध्यम है

माया में आसक्त मायापति को नहीं समझता

माया मुक्त वह होता है जो गुणातीत हो

गुणातीत मात्र प्रभु हैं

मायामुक्त योगी तीन सप्ताह से अधिक समय तक देह को नहीं ढो सकता,यह बात

रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं

दो प्रकार की प्रकृतियाँ हैं;अपरा एवं परा

अपरा के आठ तत्त्व हैं ; पञ्च महाभूत , मन , बुद्धि एवं अहंकार और परा चेतना का नाम है

माया का गुलाम आसुरी प्रकृति वाला होता है

मायामुक्त होने पर योगी देवी प्रकृति वाला बनता है


=====ओम्=====



Sunday, March 4, 2012

जीवन दर्शन - 23

कामना क्रोध की जननी है
क्रोध अज्ञान का लक्षण है
सघन आसक्ति कामना का गर्भ है
काम , कामना , क्रोध एवं लोभ नर्क के द्वार हैं
काम , कामना क्रोध एवं लोभ राजस गुण के तत्त्व है
राजस गुण प्रभु मार्क की मजबूत रुकावट है
राजस् गुण की ऊर्जा का ही नाम है काम - उर्जा
तंत्र में काम ऊर्जा को रूपांतरित करके परम सत्य के खोज की ऊर्जा बनाया जाता है
राजस गुण की ऊर्जा जब निर्विकार होती है तब राम की छाया मन दर्पण पर दिखती है
राजस गुण से ही सात्त्विक गुण का द्वार खुलता है
सात्त्विक ऊर्जा से तत्त्व - वित् के देह के सभीं नौ द्वार प्रकाशित रहते हैं
====== ओम् =======

Friday, March 2, 2012

जीवन दर्शन भाग बाईस

  • अधिकांश लोग छोटी-छोटी बातो में उलझ कर रह जाते हैं

  • अहंकार से युक्त जीवन में सुख कहाँ और हम सुख प्राप्त करना चाहते हैं

  • हम कमीज बनवाते हैं अपनें लिए और पूछते हैं , भाई कैसी है , क्योंकि हमें अपनें पर भी भरोषा कहा

  • लोग क्या कहेंगे,लोग क्या सोचेंगे लोग हँसेंगे,ऎसी सोचें हमें बंधक बना कर रखती हैं

  • लोगों का भय जब इतना गहरा है फिर भगवान का भय कैसा होगा,लेकिन फिरभी हम आँख बंद किये चल रहे हैं,इस संसार में,क्यों?

  • मनुष्य जब किसी ऐसे आयाम में पहंच जाता है जहाँ उसे सभीं मार्ग बंद दिखनें लगते हैं तब वह या तो आत्म हत्या कर बैठता है या मनुष्य से भेडिया बन जाता है

  • कौन हमारा दोस्त है और कबतक यह दोस्ती रहेगी , कुछ कहना कठिन हैं लेकिन ऎसी सोच से वर्तमान की दोस्ती को खतरा न पैदा करो

  • यात्रा उसे तबतक कहते हैं जबतक वह रुके नहीं और ज्योंही वह रुकती है,अपना अस्तित्व खो देती है,जीवन भी एक यात्रा ही है

  • जीवन को अपनें प्रकृति की ऊर्जा से बहनें दो यदि जीवन का मजा उठाना चाहते हो

  • बंधक बन कर जीनें वाला जीता नहीं वह मात्र मौत का इन्तजार करता है

  • रविंद्रनाथ टैगोर कहते है , तितिलियाँ दिन , माह एवं वर्ष के सम्बन्ध में नहीं सोचती , वे जिस पल में जीती हैं उसी में मस्त रहती हैं

=====ओम्====


Wednesday, February 29, 2012

प्रभु से मिलो

परमात्मा से हम कैसा सम्बन्ध बनाना चाहते हैं?

हमें परमात्मा की खोज क्यों है?

यदि परमात्मा हमें मिलता भी हो तो …..... ?

क्या हम उसकी आवाज को पहचानते हैं ?

क्या हम उसके रूप – रंग को समझते हैं ?

क्या हम उसकी संवेदना से वाकिब हैं ?

क्या हम उसके श्वाद को जानते हैं?

यदि ऊपर के प्रश्नो का उत्तर नां में है फिर हम कैसे उसे खोज रहे हैं?

क्या जितनें उसके नाम हैं उनसे हम तृप्त हैं?

कुरानशरीफ में अल्लाह के सौ नामों की चर्चा है लेकिन हैं99नाम आखिर100वां कौन है?

कुरानशरीफ में यह भी लिखा है कि जो औअल है वही आखिरी भी है

बुद्ध से आनंद पूछते है ,

भंते ! आप ईश्वर के नाम पर चुप क्यों हो जाते हैं , बुद्ध मुस्कुराते हुए कहते हैं ,

आनंद ! क्या कहूँ , परिभाषा उसकी होती है जो होता है ----- /

आनंद पुनः पूछते हैं ,

भंते ! क्या वह नहीं है ?

बुद्ध कहते हैं ,

जो हो रहा है वही वह है और जो अभीं भी हो रहा है उसकी परिभाषा करना संभव नहीं/

और गीता कहता है ----

वह अशोच्य – अब्यक्त है

अब अप सोचो उस असोच्य के सम्बन्ध में

=====ओम्=======



Monday, February 27, 2012

आइना

  • जिसमें लोगों का अपना कद औरो से ऊंचा दिखता हो वह क्या है?

  • बेटा / बेटी डाक्टर की पढ़ायी की तैयारी में ब्यस्त है और पिता इस सोच में डूबा है कि वह कौन सी गाडी है जो अभीं तक किसी के पास आजू - बाजू में नहीं है , यह सोच किसकी ऊर्जा का परिणाम है ?

  • राम से सम्बन्ध सभी रखना चाहते हैं लेकिन गज भर दूरी भी रखते हैं,क्यों?

  • राम में बसों या राम को अपनें में बसाओ दोनों स्थितियां क्या हैं ?

  • लोग प्रभु को खोज रहे हैं,यह बात स्पष्ट दिखती है लेकिन कौन समझता है कि प्रभु भी किसी को खोज रहा है?

  • मनुष्य से उसका अहंकार छीन लो उसकी मौत हो जायेगी

  • बुद्ध पुरुष मनुष्य से उसका अहंकार छीनना चाहते हैं और मनुष्य उसे देना नहीं चाहता

  • मनुष्य के पास क्या है ; चाह है तो राह नहीं और राह है तो चाह नहीं , यह क्या है ?

  • भोग की उर्जा प्रभु मार्ग में रुकावट है लेकिन इस उर्जा के प्रति उठा होश सीधे प्रभु में पहुँचाया है

  • क्रोध में नहीं क्रोध से सत् की यात्रा संभव है

  • मोह में नहीं मोह से प्रभु दिख सकता है

    ==== ओम् =======


Saturday, February 25, 2012

उसमें सबकी पहचान है

  • दिन एवं रात को अलग – अलग देखना एक सहज भ्रम है

  • दिन का प्रारम्भ रात्रि से और रात्रि का प्रारम्भ दिन से है

  • ब्यय में अब्यय की झलक पाना ही साधना है

  • वह इंद्रिय रहित है वह मन रहित है लेकिन दोनों का श्रोत वही है

  • क्या वह पांच बिषयों में सीमीत है

  • क्या उसे हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियाँ पहचानती है

  • वह कौन सी बस्तु या जगह है जहां वह नहीं

  • हम उसकी निगाह से परे जा कैसे सकते हैं

  • साकार की यात्रा निराकार में पहुंचाती है

  • भोग का अंत वैराज्ञ है


=====ओम्======


Friday, February 24, 2012

भाषा एवं भाव

  • भाषा बुद्धि की बात को प्रकट करती है और भाव दिल की बात का रस होता है

  • संसार में बनें रहनें के लिए भाषा एक माध्यम है और भाव स्वयं से जोड़ता है

  • संसार में सभीं जीवों की अपनीं-अपनी भाषा होती है जैसे अमेरिका का कुत्ता जगन्नाथ पूरी के कुत्ते की भाषा को समझता है लेकिन मनुष्यों में ऐसा नहीं है/

  • महल में रहने वाला कुत्ता झोपड़े में रहनें वाले कुत्ते से घृणा नहीं करता लेकिन मनुष्य?

  • सभीं देशों के एक वर्ग के सभीं जीव – जंतुओं का रहन – सहन,खान – पान,स्वभाव एवं भाषा एक सी होती है लेकिन मनुष्य की?

  • भाषा का जन्म भावों के ब्यक्त करनें की ऊर्जा से हुआ है

  • जो भाषा भावों के जितनी करीब होती है वह उतनी ही जीवंत होती है

  • कबीर , मीरा , नानक के पास सीमित शब्द ते लेकिन जो बात वे उन शब्दों में ढाला वह सीमा रहित हैं

  • भक्त भाषा का गरीब होता है लेकिन भाव का सागर उनके दिल में बसता है

  • मनुष्य में तीन तरह के भाव बहते हैं;सात्त्विक,राजस एवं तामस और इन तीन के परे जो भाव है उसे भावातीत कहते है जिसकी ऊर्जा में प्रभु बसता है

==== ओम्=====




Wednesday, February 22, 2012

भय - भगवान

  • मृत्य एवं भय में क्या रिश्ता है ?

  • भय तामस गुण का एक तत्त्व है

  • तामस गुण का केंद्र मनुष्य के देह में नाभि है

  • भय – वैराज्ञ एक साथ एक बुद्धि में नहीं बसते

  • बिना वैराज्ञ संसार को समझना संभव नहीं

  • बिना संसार बोध हुए प्रभु से मिलना संभव नहीं

  • बिना वैराज्ञ भगवान मात्र एक संदेह है

  • ससार बोध में स्व – बोध भी सामिल है

  • संसार मनुष्य की परिधि है जहां भोग की चादर फैली हुयी है

  • मनुष्य का केन्द्र है आत्मा जिसके माध्यम से प्रभु दिखता है

  • आत्मा - परमात्मा का बोध निर्विकार मन से होता है

  • निर्विकार मन ही वैराज्ञ है

  • ससार माया की चादर है

  • आया प्रभु निर्मित है

  • माया केंद्रित ब्यक्ति मायापति को नहीं समझता


===== ओम्=====



Monday, February 20, 2012

इसे भी देखो

  • प्रकृति के अनुकूल सभीं जीव अपनें बसेरों का स्थान निश्चित करते हैं लेकिन मनुष्य?

  • एक पेड़ पर अनेक निवास करते हैं और निर्वैर्य भाव से अपनीं-अपी सुरक्षा करते हैं लेकिन मनुष्य?

  • समुद्र हिमालय आ कर गंगा को आमंत्रित नहीं करता,गंगा स्वयं खोजती-खोजती वहाँ पहुंचती है और मनुष्य कब अपनें सागर की तलाश शुरू करता है?

  • समुद्र सम्पूर्ण पृथ्वी की लवणता को धारण करती है और सबको खुश रखती है लेकिन मनुष्य स्वयं की लवणता को भी नहीं धारण करना चाहता , क्यों ?

  • मनुष्य का सारा जीवन खुशियाँ बटोरनें में गुजरता है लेकिन कौन कितना खुश रह पाता है?

  • गर्भाधान , जन्म , जीवन एवं मृत्यु की झलक हर पल प्रकृति दिखाती रहती है लेकिन इनके प्रति हम कितनें जागरूक हैं ?

  • मनुष्य की इंद्रियों की क्षमता अन्य जीवों की इंद्रियों से लगभग तीन गुणा अधिक है लेकिन अन्य जीवों की तुलना में हम उनके एक तीहाई क्षमता ही प्रयोग कर रहे हैं अर्थात धीरे - धीरे मनुष्य के इद्रियों की ग्राह्य शक्ति कम हो रही है , क्यों ?

  • प्रकृति में इतिहास के पन्नें नहीं है जो है वह वर्तमान है और हम इतिहास में उलझे हुए हैं और इस उलझन में हमारा वर्तमान ढलता जा रहा है

  • सभीं की जीवन – यात्रा अनजानें मोड पर लुप्त हो रही हैं और हम उस अनजानें मोड को समझना नहीं चाहते,क्यों?


===== ओम्==============


Saturday, February 18, 2012

प्रकृति और हम

प्रकृति में कौन बड़ा कौन छोटा है?

प्रकृति में मनुष्य को छोड़ कर अन्य जीवों में लड़ाई का कारण भोजन एवं काम है

प्रकृति का अस्तित्व लेनें-देनें पर आधारित है लकिन क्या हम कुछ देना भी चाहते हैं?

पानी – हरियाली प्रकृति देती है लेकिन इसके लिए वह हमसे कुछ चाहती भी है

जन्म प्रकृति आधारित है लेकिन जीवन का मार्ग स्व आधारित है

संसार क्रीडा स्थल है जहां हर पल खुशी का पल होना चाहिएलेकिन---- ?

मेरे दुःख का कारण तुम हो , यह सोच हमें अँधेरे से निकलनें नहीं देती

" नानक दुखिया सब संसार " लेकिन सभीं मौत से दूर भागते हैं

पानें की चाह वाले अनेक हैं लेकिन देनेंवाले?

कुछ मिल सकता है यह सोच हमें लोगों के करीब लाती है लेकिन क्या हमसे वह भी कुछ चाहता है , यह सोच क्या कभी हमारे अंदर आती है ?

==== ओम् =======




Friday, February 17, 2012

अहंकार की छाया

  • अहंकार अपरा प्रकृति का एक मूल तत्त्व है

  • माया तीन गुणों एवं दो प्रकृतियों का जोड़ है

  • अपरा प्रकृति के आठ तत्त्व हैं[पञ्च महाभूत,मन,बुद्धि अहंकार]

  • परा प्रकृति चेतना का ही नाम है

  • अहंकार का स्वभाव कछुए के स्वभाव से मिलता है ; कभी अंदर तो कभी बाहर

  • राजस गुण का अहंकार फैलाता है

  • तामस गुण का अहंकार सिकोड़ता है

  • सात्विक गुण का अहंकार सीधे नर्क में ले जाता है

  • अहंकार मनुष्य को न जीनें देता है न मरनें

  • तेरा - मेरा , अच्छा - बुरा की सोच अहंकार की ऊर्जा का संकेत है

    ====ओम्=====


Wednesday, February 15, 2012

हमारी चाल

कर्म की आसक्ति एवं कर्ता भाव नर्क की राह पर ले जाते हैं

जो हमारे पास है वह प्रभु का प्रसाद है जो ऎसी आत अपने ह्रदय में देखते हैं वे संत होते हैं

आसक्ति एवं अहंकार रहित कर्म परा धाम की ओर ले जाते हैं

दो की दोस्ती तबतक है जबतक एक में धनात्मक एवं दूसरे में नकारात्मक अहंकार होता है

जब दोनों में धनात्मक अहंकार होता है तब झगड़ा होनें की संभावना होती है

जब दोनों में नकारात्मक अहंकार होता है तब दोनों के आँखों से बूँदें टपकती रहती हैं

अपनी असफलताओं के लिए भाग्य – भगवान को जिम्मेदार बनानें वाला कर्म – योगी कैसे हो सकता है

अहंकार न जीनें देता है न मरनें

योगी के पास अपना कुछ नहीं होता वह सबमें अपनें को ही देखता है

भोगी एक कस्सी की भांति होता है,जो भी वह देखता है उसे अपनीं ओर खीचना चाहता है


======ओम्=====




Tuesday, February 14, 2012

जीवन दर्शन भाग एक

  • नदी के दो किनारे आपस में मिलते से दिखते हैं लेकिन कभीं मिलते नहीं

  • नदी के दोनों किनारों का श्रोत एक है ; एक बूँद जिसे नदी में खोजना अति कठीन

  • देह में प्रभु की बूँद है आत्मा जिसको देखना ही परम दर्शन है

  • माया का श्रोत मायातीत है और माया के बिना मायातीत को देखना अति कठिन

  • बोधि धर्मं अपनी आखिरी प्रार्थना में कहते हैं , माया तेरा धन्यबाद यदि तूं न होती तो प्रभु की अनुभूति कैसे होती ?

  • तीन गुणों का श्रोत गुणातीत है

  • जिसको तुम अपना समझ रहे हो क्या वही तो तुम्हारे दुःख का कारण तो नहीं

  • जबतक मन – बुद्धि में अपना-पराया का भाव है तबतक शांति कहाँ

  • संसार तीन मार्गी है ; अपना , पराया और न अपना न पराया , आखिरी मार्ग तब खुलता है जब प्रारंभिक दो बंद हो जाते हैं

  • अपना का भव अहंकार को तीब्र करता है

  • पराया का भाब हीन भाव ला सकता है

  • न अपना न पराया हीगीता का समभाव है

  • जीवन को दो से निकाल कर जब एक पर केंद्रित कर दिया जाता है त वह एक भी तिरोहित हो जाता है उस परम में जहां मात्र एक शून्यता साक्षी के रूप में अचल बिद्यमान रहती है

= ====ओम् ======



Saturday, February 11, 2012

आखिर कबतक भाग तीन


आखिर कबतक राम रहीम के मध्य दिवार बनी रहेगी ?


आखिर कबतक जाति के नाम पर हम अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे ?


आखिर कबतक सरल मार्ग की तलाश हमें भटकाती रहेगी ?


आखिर कबतक गरीब – अमीर की पीठें एक दूसरे के सामनें रहेंगी ?


आखिर कबतक मैं और तूं दो बनें रहेंगे ?


आखिर कबतक अपनें को अपनों से दूर रखोगे ?


आखिर कबतक अहंकार की सवारी करते रहोगे ?


आखिर कबतक कामना की नशा छायी रहेगी ?


आखिर कबतक मोह की रस्सी में बधे रहोगे ?


आखिर कबतक अपने पतन का कारण किसी और को बनाते रहोगे ?


====ओम्=======




Thursday, February 9, 2012

गीता के मूल मन्त्र

गीता तत्त्वों को हम यहाँ गीता ममें देखनें का प्रयाश कर रहे हैं जिसके अंतर्गत पुरुष , परमात्मा एवं ब्रह्म शब्दों को गीता में देखनें का यह हमारा प्रयाश अब अगल्ले सोपान पर पहुँच रहा है , आइये देखते हैं गीता के माध्यम से प्रभु श्री कृष्ण के वचनों को ------

श्लोक – 2.16

नासतो विद्यते भावो

नाभावो विद्यते सतः

श्लोक – 4.7 – 4.8

अधर्म जब धर्म को ढक लेता है , साधू पुरुषों का पृथ्वी पर रहना जब कठिन हो उठत है तब तब प्रभु निराकार से साकार रूप धारण करते हैं /

श्लोक – 13.20

प्रकृति- पुरुष अनादि हैं

श्लोक – 15.16

क्षर – अक् षर [ देह + आत्मा ] दो पुरुष हैं

श्लोक – 15.18

क्षर – अक्षर से परे मैं हूँ [ श्री कृष्ण ]

श्लोक – 3.5 , 3.27 , 3.33 , 18.59 , 18.60

मनुष्य तीन गुणों के प्रभाव में आ कर कर्म करता है और कर्ता भाव का आना अहंकार का सूचक है /

श्लोक – 13.25

क्षेत्रज्ञ की अनुभूति ध्यान से एवं सांख्य – योग से हो सकती है /

==== ओम्========


Wednesday, February 8, 2012

आखिर कबतक भाग दो

आखिर कबतक अपने को छुपाते रहोगे ?

आखिर कबतक जैसे हो वैसे बने रहोगे ?

आखिर कबतक अपनी करनी को ढकते रहोगे?

आखिर कबतक प्रभु को दोषी बनाते रहोगे?

आखिर कबतक स्वयं को परम पवित्र समझते रहोगे ?

आखिर कबतक सत् की ओर पीठ रखोगे ?

आखिर कबतक अपनों के मध्य दिवार खीचते रहोगे ?

आखिर कबतक जाति - धर्म के नाम पर अपनों को बाटते रहोगे ?

आखिर कबतक स्वयं को उलझाते रहोगे?

आखिर कबतक अपनी ऊँचाई को मापते रहोगे?

====ओम्=====


Monday, February 6, 2012

आखिर कबतक भाग एक

  • बच्चा जबतक हमारे इशारे पर चलता है , प्यारा लगता है

  • दो के बीच जितनी दूरी होती है सांसारिक मित्रता उतनी सघन सी दिखती है

  • मित्रता तबतक है तबतक दो में से एक दूसरे के पीछे चलता रहा है

  • कौन और कबतक कोई किसी के पीछे चलना चाहता है

  • आप का मौन आप को प्यार बना कर रखता है

  • कौन मौन रहना चाहता है और कबतक

  • आप तबतक प्यारे हैं जबतक हाँ में हैं मिलाते रहते हैं

  • उसका दर्शन मौन बना देता है

  • स्व की खोज मौन की खोज है

  • उसका दिखाना स्व को विसर्जित कर देता है


====ओम्=====


Saturday, February 4, 2012

अकेलापन

  • दो के मध्य द्वन्द का कारण तीसरा होता है

  • वह तीसरा ब्यक्ति , बस्तु या फिर भ्रम हो सकता है

  • मनुष्य कभी अकेला नहीं रहता,अकेला पन यातो मनोरोगी बनाता है या प्रभु मय बनाता है

  • दो के मध्य तीसरे का होना स्वर्ग या नर्क का द्वार खोल सकता है

  • मन स्तर पर अकेला होना साधना है

  • भौतिक स्तर पर संसार में अकेला होना पागल पन ला सकता है

  • अन्तः करण में अकेला पन ब्रह्म सरोवर होता है

  • राम शब्द बहुतों के नाम का हिस्सा है लेकिन कितनों के ह्रदय में राम है?

  • होठों पर राम नाम का होना अहंकार को मजबूत बना सकता है ह्रदय का राम राम धाम होता है

  • रामलीला करनें वाले – देखनें वाले अनेक हैं लेकिन उनमें से कितनों के दिल में राम बसा होता है


=====ओम्======


Thursday, February 2, 2012

दो से एक

दो से संसार का अस्तित्व है

एक सर्वत्र है स्थिर है और अब्यय है

दूसरा जो पहले से है अस्थिर है और परिवर्तन का संकेत है

दूसरा पहले के फैलाव स्वरुप है और और संकेत देता है कि वह किसी से है

वह एक अनेक में बिभक्त सा दिखता है

अनेकान्तबादी जहां पहुंचते हैं वह अनेक नहीं एक है

उस एक को अनेक रूपों में देखनें वाले परिधि पर होते हैं

सबमें उस एक को जो देखते हैं उनकी यात्रा परिधी से केंद्र की ओर की होती है

परिधि से केंद्र की यात्रा है गीता की यात्रा

गीता की यात्रा में माया के माध्यम से पुरुष को निहारना होता है

====ओम्======




Sunday, January 29, 2012

जरा सोचना


जीवन दर्शन


भाग –01


जरा सोचो




  • आखिर कबतक किसी की उंगली पकड़ कर चलते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अपनें से दूर – दूर भागते रहोगे ?



  • आखिर कबतक औरों को सुनाते रहोगे ?



  • आखिर कबतक स्वयं को धोखा देते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अच्छा बनाते रहोगे ?



  • आकिर कबतक अपना गुणगान करते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अपनें माथे के पसीनें को पोछते रहोगे ?



  • आखिर कबतक मन का गुलाम बने रहोगे ?



  • आखिर कबतक भागते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अहंकार की अग्नि में जलते रहगे ?


Friday, November 25, 2011

स्वयं की पहचान ही उसकी पहचान है

लोग कहते हैं--------

कहाँ है भगवान?

कैसा है भगवन?

किसका है भगवन?

सबका एक या सबका अगल – अलग है भगवन?

मैं समझता हूँ , आज लोगों के मन में जितनें प्रश्न भगवन के संबंध में हैं उतनें प्रश्न किसी अन्य बिषय पर नहीं ,, क्या कारण है कि प्रभु के ऊपर भी मनुष्य प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया है ? मनुष्य प्रभु को भी आजाद नहीं रखना चाहता ; कोई उसे मंदिरों में , कोई उसे गिरिजा घरों में और कोई मस्जिदों में क्यों बंद करना चाहता है ? सपूर्ण ब्रह्माण्ड का रचयीता को भी मनुष्य पिजडे में क्यों बंद करना चाहता है ? जरुर कोई कारण तो होगा ही ?

मनुष्य परमात्मा के सम्बन्ध में तो प्रश्नों का तंत्र बना रखा है …...

मनुष्य स्वयं के सबंध में प्रश्न रहित रहता है …..

इन दो बातों से क्या ऐसा नहीं दिखता कि मनुष्य अपनीं पीठ की ओर चल रहा …

मनुष्य का मुख तो है किसी ओर और उसकी गति है किसी ओर … .

आप कभी उलटा चल कर देखना , बहुत कठिन होता है , उल्टा चलना अर्थात प्रभु की तरफ पीठ करना / एक तरफ हम प्रभु की शरण प्राप्ति की कोशीश में दिखते हैं और दूसरी ओर अपनी पीठ उसकी और रखते हैं . क्यों हम अपना मुह प्रभु की ओर नहीं रहना चाहते ? क्योंकि हम क्या कर रहे हैं उसके प्रति हम स्वयं बोध रहित हैं और अचेतन स्थिति में किया गया कार्य फल रहित बृक्ष कि तरह होता है जहां तनहाई के अलावा और कुछ नहीं रहता //

आप और हम जबतक प्रभु की आँखों में नहीं झाकनें का प्रयत्नं करते तबतक हमें - आप को तनहाई , सागर में ही डूबे रहना है और डूब हुआ मनुष्य कैसा होगा इसकी खोज को मैं आप पर छोडता हूँ //

मैं तो इतना कह सकता हूँ कि -----

स्वयं की तलाश ही प्रभु की तलाश है//

=====ओम्======


Friday, November 18, 2011

आप की उम्र क्या है

क्या कारण है कि मनुष्य के जीवन में चालीस साल तक की उम्र अपनी

एक अलग जगह रखती है?

अब आप देखना ….

जयशंकर प्रसाद कामायनी की रचना लगभग चालीस साल की उम्र में की

तुलसीदास जी चालीस साल की उम्र में रामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की

बुद्ध को चालीस साल की उम्र में परम सत्य दिखा

महाबीर को चालीस साल की उम्र में संसार एक भ्रम सा दिखनें लगा

आदि गुर ु नानकजी साहिब को तीस साल की उम्र में बोध हुआ

रामकृष्ण परम हंश को परम सत्य का बोध हुआ जब वे अभीं 15 साल के भी नहीं हुए थे

आदि शंकराचार्य का जीवन ही चालीस साल से भी कम का रहा है

मीरा,रहीम को बाल कृष्ण सर्वत्र दिखानें लगे जब उनकी उम्र अभीं प्रौढा अवस्था में भी नहीं पहुंची थी रमण महर्षि एवं चैतन्य महा प्रभु को बोध हुआ जब उनकी उम्र तीस स्साल के आस पास रही होगी अलबर्ट आइन्स्टाइन को42साल की उम्र में नोबल पुरष्कार उस बिषय पर मिला जिसको वे अपनी21साल की उम्र में अनुभव की थी/

यदि आप नोबल पुरष्कार विजेताओं को देखें तो आप को ताजुब होगा की लगभग 85% लोगों को

उन – उन बिषयों पर पुरष्कार मिला है जो उनके प्रारंभिक बिषय थे अर्थात जिनके बारे में उनको सोच प्रारंभ हुयी थी लगभग 15 – 25 साल की उम्र में और उसका परिणाम मिला उनको लगभग 35 साल की उम्र से 70 साल की उम्र के मध्य जा कर /

विश्व के अति माने जानें वाले मनोवैज्ञानिक Jung कहते हैं , शायद ही कोई ऐसा मिले जिसकी उम्र चालीस साल पार कर रही हो और उसके दिमाक में परमात्मा की सोच न हो ; जुंग का परमात्मा कौन है ? जुंग का परमात्मा परम सत्य है , वह परम सत्य जो संसार को चला रहा है /

आप की उम्र क्या है?ज़रा विचार करना और अपने को देखनें का प्रयाश पकरना क्या पता--- ?


======ओम्======




Wednesday, November 16, 2011

एक निगाह इधर भी

मां की गोदी----

पिता की उंगलियां-----

पत्नी का प्यार------

पुत्र – पुत्री के बड़े होने का इन्तजार----

और फिर … ..

पौत्र – पौत्री के बड़े होनें का इन्तजार----

यह है भ्रान्ति से भरी हुयी भोग आधारित सोच जिसके सहारे मनुष्य का जीवन परम के प्रकाश में भ्रान्ति के अँधेरे में न जानें कब , कैसे और कहाँ समाप्त हो जाता है ? इधर देह चलनें से इनकार करता है और गिर जाता है और उधर मन तडपता हुआ आत्मा के साथ उड़नें लगता है , खोजनेंलगता है किसी और नये देह को जिससे वह , वह कर सके जो अभीं नहीं कर पाया था या जिसको किया तो था लेकिन तृप्तता न मिल सकी थी / कैसा है यह भ्रान्ति का जीवन ? भ्रान्ति शब्द आप को उचित नहीं लग रहा है लेकिन मैं और कोई शब्द पाता भी तो नहीं ; भ्रान्ति की परिभाषा है – वहाँ जहां अनुमान अनुमान नहीं रह जाता अपितु अनुमान कर्ता को पूर्ण विश्वाश हो जाता है कि अमुक ऐसा ही है और जहां अनुमान अनुमान रहता है उसे संदेह कहते हैं / देखा आपनें जीवन का यह भोग आधारित समीकरण जहां सत्य के प्रकाश को असत्य का अन्धेरा कैसे घेर रखा है ? पुत्र के रूप में मां - पिता के सहारे की सोच में हमारा बचपन निकल गया , जवानी पत्नी ई सोच में गुजर गया और पता भी न चल पाया और जब बच्चे पहले चाचा फिर तौ फिर दादा कहने लगे तो विश्वास ही नहीं होता कि हमारी उम्र यहाँ पहुँच चुकी है और अंततः सभीं सहारे बेसहारे हो जाते हैं और , और सहारे की सोच के लिए वक्त भी नहीं रह जाता और इधर श्वास रुक - रुक के चलने लगाती है और वह घडी आ ही जाती है जब -----

कहाँ

कैसे

और कब यह श्वास रुक जाती है,कुछ नहीं पता लग पाता

यह है हम सब के जीवन की एक झलक


======ओम्=======