●● फिर वही ●●
1- भोग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण होता है और योग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण नहीं होता ।
2-भोगकी यात्रा सुनितोजित यात्रा होती है और योगकी यात्रा एक घटना है जो कभीं भी किसीके साथ घट सकती है ।
3- विधि - विधान और तर्क आधारित यात्रा करनें वाले चूक जाते हैं और प्रकृति पर जो आश्रित हो कर सहज जीवन जीते हैं वे पहुँच जाते हैं ।
4- सुबहसे देर रात तक ब्यस्त जीवनसे आज आप को जो मिला क्या उससे आप संतुष्ट हैं ? यदि नहीं तो क्यों ? अपनीं असफलताके लिए अपनें परिवारके किसी कमजोर इकाईको बलिका बकरा न बना कर , आप स्वयं में झाँक कर देखें कि चूक कहाँ हुयी ।
5- जो आप प्राप्त करना चाहते हैं क्या वह आप को तृप्त कर देगा और यदि आप तृप्त हो भी जाते हैं तो कितनें समय के लिए ? तृप्तता क्षणिक क्यों होती है , कभीं क्या इस बिषय पर आप सोचते हैं ?
6- गुण प्रभावित मन - बुद्धिसे जो प्राप्त होता है उसकी तृप्तता क्षणिक ही होती है और जिस घडी बिना कामना - मोह या अहंकार से जो होता है उसका फल चाहे जो हो पर वह आप को पूर्ण तृप्त कर देगा । 7- ज्यादा नहीं केवल दो को जो अपनें जीवन में समझ लिया , वह योगी हो गया , वे दो तत्त्व हैं कामना और अहंकार ।
8- कामना - अहंकार की गांठें मृत्युके बाद भी वैसी बनी रहती हैं ।
9- मोह और भय का आपसी गहरा प्यार है , दोनों साथ - साथ रहते हैं ।
10- मोहका अहंकार मीठा जहर है और कामना का अहंकार दूर से दिखता है ।
~~~ ॐ ~~~
Sunday, September 8, 2013
फिर वही
Tuesday, September 3, 2013
कुछ
●● कुछ ●●
1- इस देहको धोते रहनें केलिए इसे ढ़ोते रहो जबतक यह स्वतः निर्विकारमें न मिल जाए ।
2- आपसे जो कुछ भी हो रहा है उसे प्रभुका
आदेश - पालन समझ कर करते रहो , उसका करना ही प्रभु की पूजा है ।
3- न किसीसे प्रभावित होओ न किसीको प्रभावित करो ।
4- स्वयंमें उस रोशनीको तलाशते रहो जो अन्धकारमें भी आप जो राह दिखाती है ।
5- जबतक प्रभुकी खोज भोग आधारित होगी प्रभु आपको अब्यक्त ही रहेगा ।
6- पहले इस बातको सोचो कि आप प्रभुसे क्यों जुड़ रहे हो ? प्रभु इस बातको समझता है और वह दिखाई नहीं देता ।
7- संसार धोखा देने - लेने की मंडी बन गया है लेकिन प्रभुको क्यों धोखा दे रहे हो ?
8- अपनेंको कुछ भी बना लो लेकिन उसके सामनें तो सर स्वतः झुक जाता है ।
9- आज जो हैं कल वे न होंगे और जो कल होंगे वे परसों लुप्त हो जायेंगे चाहे वे नदी हों , पहाड़ हों या और कुछ हों लेकिन प्रभु कालसे अप्रभावित वैसा ही रहेगा ।
10- जितना बाहर देखते हो उसका 1/10 भाग भी अगर अपनें अन्दर देखनें का अभ्यास करो तो वह दिखनें लगेगा ।
~~~~ ॐ ~~~~
Thursday, August 29, 2013
कभी कभी
●● कभीं कभीं ●●
1- संसारमें स्वकी और स्वमें प्रभु की खोज जीवनका केंद्र होना चाहिए ।
2 - संसारमें जिसे देखो चाहे वह गृहस्थ हो या
योगी , सबका रुख एक तरफ है , है न कमालका बिषय ; सभीं हर पल एक ही ओर देख रहे हैं और वह आजका परम है भोग ।
3 -प्रभु तो कोरे कागज़ जैसा जीवन दिया था , उसको रंगीन बनाते - बनाते हमनें उसे क्या बना दिया ?
4 - जीवन भर हम दूसरोंमें उसकी अच्छाई को भी बुराईकी शक्लमें देखते रहते और अपना खून जलाते रहे ,एक बार , केवल एक बार अकेलेमें ही सही , अपनें अन्दर हमें खोजना चाहिए की क्या हमारे अन्दर कोई खोट नहीं ।
5 -कितना ताज्जुब दिखता है की एक नोबेल पुरष्कार विजेताकी आलोचना 50 % अंक प्राप्त करता बड़े प्यारसे करता है , उसे पता नहीं कि वह क्या कर रहा है , बिचारा ....।
6 - नकली फूलको लोग इतनें प्यारसे अपनें ख़ास कमरेमें रखते हैं कि उनको शायद स्वप्नमें भी असली फूल की स्मृति नही आती होगी , लेकिन नकली असली कैसे बन सकता है ?
7 - इस समय लोग अन्दरसे सिकुड़ते जा रहे हैं , उन्हें भय है , कहीं मेरी असलियत लोगोंके सामनें न आ जाए और बाहर से फैलते जा रहे हैं जैसा दिखना चाहते हैं जिससे कोई उनके अन्दर न झाँक सके ।
8 - दूसरेकी रोशनीमें कबतक चलोगे , एक दिन वह अपनीं रोशनी वापिस खीच लेगा फिर क्या करोगे ?
9 - क्यों ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हो कि आगे चलना तो कठिन हो रहा है लेकिन पीछे लौटना भी संभव न हो सके ।
10 - प्यार जीने का सहज परम माध्य सबको एक सार मिला हुआ है लेकिन हम उसका भी ब्यापार करनें लगे और वह प्यार ब्यापार की वस्तु बनकर भी घट नहीं रहा ।
~~~ ॐ ~~~
Saturday, August 24, 2013
आस्था
आस्था
● आस्था जब टूटती है तब वह ब्यक्ति भी टूट जाता है लेकिन यह स्थिति मनुष्यको रूपांतरित कर सकती है ।
● कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय और अहंकार रहित टपकती आंसूकी बुँदे मनुष्यको परममें डुबो कर रखती है जिसे कोई हिला नहीं सकता ।
● जो हम कहते हैं , यदि वैसे करें भी तो अपनें को तृप्त रख सकते हैं ।
● जैसा हम करते हैं , यदि वैसा ही बन जाएँ तो हमारी सभीं समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
● अपनें और पराये का भाव यदि समाप्त हो जाए तो सिद्धि मिलनी कठिन नहीं ।
● कामना और अहंकार चलाते नहीं , घुमाते रहेते हैं । ● भोगसे भगवान की यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं , लेकिन मनुष्यके कई जन्म लगजाते हैं ।
● श्वास ध्यानमें जब नासिका से बाहर निकलती श्वास पूर्ण रूपसे दिखनें लगे तो वह ध्यान पूर्णता की ओर जा रहा होता है ।
°°° ॐ °°°
Tuesday, August 20, 2013
क्या करोगे सोचके
क्या करोगे सोचके ? देखना जरा अपनें जीवन की किताबके कुछ पन्नोंको जिनको आप कभीं नहीं
देखा :----
1- जीवनकी कुछ एक ऐसी घटनाएँ होती हैं जिनको जितना सोचोगे वे उतनी और जटिल हो जाती जाती
हैं ।
2- मन स्तर पर आप कुछ भी बन जाएँ लेकिन आपका मूल स्वभाव ठीक समय पर आपको अपनें प्रतिकूल न जाने देगा ।
3- कुछ ऐसे होते हैं जिनकी जगह आपके जीवनमें न के बराबर रही होती है लेकिन समय आनें पर वे आपके बहुत करीब आजाते हैं , आपकी मदद करते हैं और अपनें , दूर खड़े हो कर आपकी बजबूरीको और नंगा देखनेंके अवसरका इन्तजार करते होते हैं ।
4- जीवनमें जिनको हम पकड़ने केलिए , हम अपनी पूरी ऊर्जा लगा रखी थी , उनसे दूरी बढती गयी , ऐसे अनुभव रह - रह कर आपको चुभते रहते हैं । 5- क्या खोजा और क्या पाया ।
6- जो हम अपनें जीवनमें न कर सके , उसे अपनें पुत्रसे करवाना चाहते हैं और वहाँ भी हमें मायूसी ही मिलती है क्योंकि यहाँ जो आता है उसके पास उसका अपना संचित धन होता है और वह उसी केंद्र पर घूमता है ।
7- घरकी ऊब बाहर भगाती है और बाहर लोगोंका ब्यवहार पुनः घरमें कैद कर देता है । 8- दूसरों जैसे बनते - बनते हम स्वयंको भूल जाते है और हाँथ कुछ नहीं लगता ।
°°° ॐ °°°
Sunday, August 4, 2013
दो पल ही सही जरा सोचना
- कौन छोट है , कौन बड़ा है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
- कौन सुन्दर है , कौन कुरूप है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
- कौन अपना है , कौन पराया है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
- अनुभवहीन ब्यक्तिकि ज्ञान की बातें रस रहित होती हैं , क्यों ?
- कहते हैं नानक दुखिया सब संसार , लेकिन मौत के नाम पर सभीं सिकुड़ते हैं , क्यों ?
- हम अपनें दुःख का कारण और को क्यों बनाते हैं ?
- सभीं परेशान है स्वयं से नहीं औरों से , क्यों ?
- आज नहीं तो कल ही सही कुछ पानें कि उम्मीद हमें एक दूसरे से जोड़ कर रखती है , क्यों ?
- कामना टूटते ही क्रोध क्यों उठता है ?
- कामना का अंत क्यों नहीं है ?
- दुःख में सभीं सिकुड़ते हैं और सुख में फैलते ते हैं , क्यों ?
===== ओम् =====
Monday, July 22, 2013
सोच
सोच सोच मनुष्यके जीवनका आधार है ।
सोचसे हम स्वयंको क्षणभरके लिए राजा समझ बैठते हैं और क्षणभरमें अपनेंको रंक समझनें लगते
हैं ,सोचसे कोई बचा नहीं है ।
सोचमें सभीं तैरते हैं लेकिन कोई इसमें दूबनेंकी कोशिश नहीं करता और बिना डूबे मोती पाना संभव नहीं ।
अगर आप मोतीके खोजी हैं तो सोचमें तैरनें की आदतको छोडो और सोच में दूबनेंका अभ्यास करो । सोचमें एक बार दूबनेंका रस मिल जाए तो वह ब्यक्ति सोचसे बाहर आनें पर एक दम भिन्न होगया होता है और समझ जाता है कि सच्चाई कहाँ पर है ।
सोच मनकी उपज है और मन तीन गुणोंकी उर्जासे संचालित है ।
मन कहीं रुकनें नहीं देता और न चैनसे सोच रहित होनें देता ।
मनका काम है भगाए रहना और हम बिना सोचे समझे रात और दिन भाग रहे हैं ।
भोगी आदमी की सोच दो जगह खोजती है ; एक धनके भण्डारको और दूसरीस्त्री प्रसंगको।
योगी सोचसे सोचके परे निकल कर सोचको धन्यबाद देता है और कहता है , सोच तेरा धन्यबाद , यदि तूँ न होती तो हमें ब्रह्म में कौन पहुँचाता ।
योगी सोचसे परे पूर्ण स्थिर प्रज्ञताकी अलमस्तीमें मस्त रहता है और भोगी सोच में उलझा एक नहीं अनेक तत्त्वों जैसे कमाना, क्रोध ,लोभ ,मोह,अहंकार और भय में उलझा हुआ स्वयंसे धीरे -धीरे दूर होता चला जाता है ।
भोगी मरना नहीं चाहता और योगी अपनी मौतका द्रष्टा होता है ।
भोगी मौतसे बचनेंके सारे बंदोबस्त कर रहा है और योगी मौतको एक भौतिक परिवर्तन का अवसर समझता है।
योगी मौत की तैयारी करता है और भोगी मौत की तरफ पीठ करके बेचैनी में रहता है ।
भोगी के माथे का पसीना कभीं नहीं सूखता और योगीके माथे पर कभीं पसीना नहीं आता ।
~~ ॐ ~~
Sunday, July 14, 2013
Saturday, June 29, 2013
इसे समझो
Wednesday, June 19, 2013
कौन नहीं चाहता ---
- संगीत सुनना कौन नहीं चाहता ?
- नृत्य देखना कौन नहीं चाहता ?
- कौन प्रभु के समीप है ; कंश जो सोते - जागते हर पल कृष्ण को देखता रहता था
- या
- फिर वह जो अपनें को भक्त जैसा दिखाना तो चाहता है पर कभीं स्वप्न में भी कृष्ण को नहीं देखा ?
- ऐसा कौन होगा जिसकी नजर राह के किनारे बनें गुरुद्वारा , मंदिर , मस्जिद एवं चर्च पर न टिकती हों ?
- ऐसा कौन होगा जिसके दिल की धडकन किसी मौत की खबर सुन कर न बढ़ती हो ?
- ऐसा कौन होगा जो अपनें को अपनें दिल से किसी से छोटा समझता हो ?
- ऐसा कौन होगा जो अपनें बेटी - बेटे का गुण न गाता हो ?
- ऐसा कौन बेटा होगा जो अपनी माँ के सामनें न झुकता हो ?
- ऐसा कौन होगा जिसकी मूंछें उसकी पत्नी के सामनें आनें पर न झुकती हों ?
- ऐसे कितनें होंगे जो प्रभु को कामना रहित मनोभाव से देखते हों ?
- कोई खोनें को तैयार नहीं और पानें के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता , क्या यह संभव भी है ?
- मनुष्य दो दुखों के बीच के अंतराल को सुख क्यों समझता है ?
- ऐसे कितनें हो सकते हैं जिनके लिए सुख - दुःख नाम की कोई गणित न हो ?
=== ओम् ========
Wednesday, June 12, 2013
गीता अध्याय -01 ( सार )
Tuesday, June 11, 2013
सरस्वती सरिता
Title :कुछ कथाएं भागवत से :--- Content: कुछ कथाएं भागवत से कलि युग के आगमन तक.... महाभारत युद्ध के समापन तक.... प्रभु श्री कृष्ण के परम धाम यात्रा तक... द्वारका का समुद्र में विलीन होने तक ... परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय तक.... हिमालय से चल कर प्रभास क्षेत्र में पश्चिम मुखी हो कर अरब सागर में अपनें को अर्पित करनें वाली परम पवित्र नदी सरस्वती एक निर्मल उर्जा क्षेत्र की जननी थी । सरस्वती के दोनों तटों पर द्वापर युग के लगभग सभीं परम सिद्ध योगियों के आश्रम हुआ करते थे । भागवत के आधार पर सरस्वती ब्रह्मावर्त क्षेत्र में पूर्व मुखी बहती थी । ब्रह्मावर्त महाराजा मनु का क्षेत्र था जो यमुना के तट पर शूरसेन एवं कुरुक्षेत्र (कुरुक्षेत्र नगर नहीं , क्षेत्र ) के मध्य का भाग था । ब्रह्मावर्त में प्रभु विष्णु भगवान वाराह अवतार में पृथ्वी को रसातल से निकाल कर लाया था । सूकर के रूप में पृथ्वी के भार से प्रभु की देह में कुछ कम्पन हुआ और फल स्वरुप उनके कुछ रोम झड गए थे जो कुश और काश के रूप में उगे । कुश का पयोग धार्मिक कार्यों में नकारात्मक शक्तितों से बचाव के लिए किया जाता है । ब्रह्मावर्त के सम्राट मनु अपनीं पुत्री देवहूति का ब्याह कर्मद ऋषि के किया जिसके गर्भ से विष्णु अवतार रूपमेंकपिलमुनिकाजन्महुआ।विन्दुसरोवर पर कर्मद ऋषि का आश्रम हुआ करता था । सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर जहाँ बेर का जंगल हुआ करता था , वहाँ शम्याप्रास आश्रम था जहां हर समय यज्ञ हुआ करते थे । शाम्याप्रास के साथ वेदव्यास जी का भी आश्रम था जहाँ भागवत की रचना हुयी और व्यास ही सर्वप्रथम भागवत की कथा अपने पुत्र शुकदेव जी को सुनाया था । कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के समय पांडवो की सेना सरस्वती के पश्चिमी तट पर रुकी थी अर्थात शम्याप्रास एवं जहाँ महाभारत युद्ध हुआ ( कुरुक्षेत्र ) दोनों जगह सरस्वती का रुख उत्तर से दक्षिण की ओर रहा होगा जब की ब्रह्मावर्त में इनका रुख पश्चिम से पूर्व की ओर था । जिस समय प्रभास क्षेत्र में ब्रिष्णी , भोज , अन्धक बंशीलोग वारुणी मदिरा पी कर आपस में लड़ रहे थे उस समय सूर्यास्त हो चला था और प्रभु सरस्वती नदी - तट पर मैत्रेय के साथ एक पीपल पेड़ के नीचे वैठे थे । :::: ॐ ::::::
Saturday, May 11, 2013
वह जहाँ सत्य बसता है
आज से नहीं बचपन से , हम एक दूसरे के काफी करीब रहे थे
लेकिन इधर लगभग 20 सालों से हम एक दूसरे से दूर हो गए थे
पर यह दूरी भौतिक दूरी थी , हम दोनों का तन एक दूसरे से दूर तो थे
लेकिन दिल एक दूसरे से बेहत करीब थे /
रही होगी उनकी उम्र लगभग 75 साल की
मेरे से तकरीबन पांच साल तो बड़े रहे ही होंगे / जब मैं पढ़ाई प्रारम्भ की थी तब शायद ही कोई दिन रहा हो जिस दिन उनकी मुलाक़ात गाँव के मध्य में स्थित पीपल पेड़ के नीचे न होती रही हो , बड़े ही खुश दिल मिजाज के ब्यक्ति थे और जीवन भर अविवाहित रहे /
आज न जानें मुझे क्या हुआ कि 20 साल बाद गाँव की याद आई और मैं उठाया थैला और चल पड़ा / गाँव पहुँच कर क्या देखता हूँ कि जिस पीपल पेड़ के नीचे अपनी एक भैस के साथ करीमन भाई लगभग एक दर्जन बच्चों के साथ अपनी महफ़िल लगाये हुए मिलते थे , आज उसी पेड़ के नीचे उनका जिस्म एक सफ़ेद चादर में लिपटा जमीन पर विश्राम कर रहा है और उनकी वह भैस उनके ही बगल में चुप चाप बैठी हुयी है / जब मैं उनको जमीन पर पडी देखा तो उनकी पिछली सारी जिंदगी मेरी नज़र में उतर आयी और मैं महशूश करनें लगा कि वास्तवव में जिसके लिए हम जीवन को मशीन बना कर भाग रहे हैं , वह सच्चाई नहीं है , सच्चाई तो यह है ----- /
करीमन भाई थे तो निहायत गरीब पर उनका दिन किसी बादशाह से कम न था /
करीमन भाई को कभीं भी मैं नये कपड़ों में नहीं देखा था लेकिन आज उनकी लाश को नया वस्त्र मिल गया और उनकी आत्मा को भी नया देह मिल गया होगा /
क्या है प्रकृति की गणित ----
जीवन गुजरता है तन ढकने की कोशिश में
जीवन गुजरता है , पेट की जरुरत को पूरी करनें में
जीवन गुजरता है अपनों की जरुरत को पूरा करनें की कोशिश में
जीवन गुजरता है अहँकार - कामना की खुराक इकट्ठा करने में
और ...
धीरे - धीरे जीवन घटता जाता है और जरूरते बढ़ती जाती हैं
और .
एक दिन वही मिलता है जो करीमन भाई को मिला //
=== ओम् =====
Tuesday, April 30, 2013
अँधेरे में तो कहीं हम नहीं चल रहे ?
- ज़रा रुकना , कहीं आप भोजन तो नहीं कर रहे ?
- क्या आप जानते हैं कि यह सब्जी कितनी पुरानी है ?
- जी नहीं , आप भ्रम में हैं , आप की सोच गलत है ?
- आप इतनी पुरानी सब्जी खा रहे हैं जिसकी कल्पना आप की बुद्धि में कभी नहीं उठी /
- आप की पत्नी को यह सब्जी बनानें की कला उनकी माँ से मिली /
- पत्नी की माँ को यह बिरासत में उनकी माँ से मिली थी /
- और यह क्रम चलता रहा और चल रहा है /
- लेकिन इस बात पर हमनें कभीं सोचा भी नहीं /
कहते हैं , जबाना बदल गया , क्या ख़ाक बदल गया ?
जो हम ग्रहण कर रहे हैं , वह सब कितना प्राचीन है , कुछ कहना संभव नहीं /
लेकिन यह सब होते हुए भी एक बात है ......
- आज का बैगन , आलू , चावल ,दूध आदि सब भोजन सामग्री की नश्ल बदल गयी है /
- भोजन बनानें की टेक्नोलोजी लगभग प्राचीन है लेकिन भोजन का स्वाद बदला हुआ है /
- हम लगभग अपनें बुजुर्गों की तरह दिखते हैं , लेकिन हमारी सोच बदल गयी है /
- सभी जड़ी - बूटियाँ - बनस्पतियाँ सब बदल गयी हैं लेकिन आयुर्वेद वही है /
- विद्यालय वहीं हैं लेकिन पढ़ाई बदल गयी है /
- अध्यापक देखनें में वैसे हैं लेकिन उनका दिल बदल गया है /
- किताबें हैं लेकिन उनका रंग बदल गया है /
यदि हम अपनें दैनिक जीवन में झांकते रहें तो उस का आभाष होनें लगता है जो इस बदलाव
के पीछे है /
कहीं इस बदलाव की ऊर्जा उसी की तो उर्जा नहीं ....
जिसकी तलाश हमें कहीं टिकनें नहीं दे रही //
=== ओम् =====
Thursday, April 18, 2013
ज़रा रुकना ....
- कौन सुनता है मंदिर के घंटों की आवाज को ?
- कौन सुनता है मस्जिद के मीनारों से आ रही आयतों को ?
- कौन सुनता है गुरुद्वारे से आ रही गुरुबानी को ?
- कौन सुनता है वेद मन्त्रों को ?
- कौन सुनता है गायत्री छंद को ?
- कौन सुनता है माँ के आशीर्वाद को ?
- कौन सुनता है जबानें की आवाज को ?
- कौन सुनता है गोदी के बच्चे की किलकारी को ?
- कौन सुनता है भूख की कराह को ?
- कौन सुनता है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूँज रही ॐ की धुन को ?
- कौन सुनता है अपनें किये गए कुकर्मों की पुकार को ?
ज्यादा नहीं बश एक घडी अकेले में ...
अमृत बेला में ...
आँखों को बंद करके ....
ज़रा अपनें सीनें की धडकनों के संगीत को सुनना ...
जहाँ ...
और
जिसमें ...
आपको सभीं प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे
==== ओम् ====
Tuesday, April 9, 2013
कौन और कबतक ......
- कौन मेरा है ?
- कौन तेरा है ?
- जो मेरा है , कबतक मेरा रहेगा ?
- जो तेरा है , वह कबतक तेरा रहेगा ?
- जो मेरा है ,क्या वह तेरा नहीं ?
- जो तेरा है , क्या वह मेरा नहीं ?
- जो मेरा है , क्या वह तेरा नहीं हो सकता ?
- जो तेरा है , क्या वह मेरा नहीं हो सकता ?
- मेरा की कितनीं लम्बाई है ?
- तेरा की लम्बाई क्या है ?
- क्या मेरा और तेरा समाप्त नहीं हो सकते ?
- जब मेरा और तेरा समाप्त होते हैं तब क्या होता है ?
इतनें सारे प्रश्नों में उलझनें के बाद बुद्धि जहाँ रूकती है , उसका नाम है -----
कन्हैया
और जो इस दशा में होता है ,
वह गाता है ----
करते हो तुम कन्हैया , मेरा नाम हो रहा है
पतवार के विना मेरी नाव चल रही है
अब्यय , निर्विकार , एक अक्षर , एक ओंकार , अप्रमेय , जो चाहे वह कह लो ---
लेकिन वह निर्विकार चित्त निर्विकार बुद्धि का बासी जरुर है
==== ओम् ======
Saturday, March 30, 2013
आखिर उसे भूल न सकोगे
- परमात्मा में कोई बसना नहीं चाहता ....
- परमात्मा भोग संसार में नहीं टिकनें देता ....
- हम दुःख नहीं चाहते और दुःख बिना सुख को समझते भी नहीं ....
- हम दुःख के झोपड़े में सुख की बीन बजाना चाहते हैं और सुख के महल का हमें कोई अनुभव नहीं ...
- हम जिसे अपना बनाते हैं वही एक दिन पराया हो जाता है .....
- हम भूल जाते हैं कि सभीं अपनें एक दिन पराये ही तो थे ....
- पुनः जब वे पराया बन जाते हैं फिर हमें दुःख क्यों होता है ?
- काम को परम का दर्जा देते हैं और परम का गुण गान करते हैं मात्र कामना पूर्ति के लिए ...
- हमारी चाह हमें संसार से जोड़ रखी है और बिना चाह वाला प्रभु में बसा होता है ....
- अहँकार की कडुआहट को बिना समझे उसे अपनाए हुए हैं और चैन से रहना भी चाहते हैं ...
- क्रोध की रस्सी में अपना पैर बाध रखे हैं और परम की ओर दौडना भी चाहते हैं ....
- राग में डूबे हैं और वैराज्ञ को समझना चाहते हैं ....
- आँखों से मोह की ऊर्जा है और देखना चाहते हैं योगीराज मोहन को .....
आखित हम चाहते क्या हैं ? क्या बिना उसके हमारा अस्तित्व संभव है ?
चाहे लाख उपाय करलो , लेकिन उसे अपनें ह्रदय से निकाल न सकोगे
फिर
क्यों नहीं उसे अपना लेते ?
=== ओम् ====
Tuesday, March 19, 2013
कौन ऐसा कर रहा है ?
- बुद्ध कहते हैं , अब बस्ती रहनें लायक नहीं ----
- नौजवान बस्ती से दूर शहर की ओर पलायन कर रहे हैं ----
- स्त्रियाँ कहती हैं , अब गाँव रहनें लायक नही रहा -----
- बेटियाँ कहती हैं , अब बस्ती की हवा ठीक नहीं ----
- बुड्ढे कहते हैं , अंगरेजों का जबाना ठीक था -----
- पशु कहते हैं , अब बस्ती में गुजारा नहीं होता ----
आखिर , आखिर बस्ती [ गाँव ] के मोहौल को कौन बरबाद कर रहा है ?
- गाँव के लोग शरह की ओर भाग रहे हैं .....
- गाँव के किसानों की जमीनें बेटियों की शादी में बिक रहा हैं .....
- चाहे गाँव हो या शहर , सभीं जगह काम की गहरी छाया है ....
- काम के सम्मोहन में मनुष्य मनुष्य नहीं हेवान बन चुका है ....
नर हों या नारियाँ , लड़के हों या लडकियां सभीं जो हैं जैसे हैं वैसे अपनें को नहीं दिखाना चाहते , क्यों ?
बुड्ढे अपनें को बुड्ढा समझनें की गलती कभीं नहीं करते ....
सिर के बाल , दाढ़ी , मूंछ सफ़ेद हो चुके हैं , उनकी उम्र को छिपानें की पूरी ब्यवस्था की जा चुकी है ....
नारियों के वस्त्रों की डिजाइन को देखिये , उनके अंदर से जैसे कामदेव झाँक रहे हों ....
आखिर आज के मनुष्य को क्या हो गया है ?
वह अपी असलियत को क्यों छिपा रहा है ?
वह प्रकृति के साथ क्यों खिलवाड कर रहा है ?
आज एक नहीं अनेक प्रश्न हैं जिन पर यदि गहराई से ध्यान न दिया कया तो -----
जैसे वर्तमान से पूर्व की सभीं सभ्यताएं पृथ्वी के अंदर दब चुकी है ....
वैसे ---
वर्तमान की सभ्यता भी , पृथ्वी के अंदर विश्राम करनें लगेगी //
==== ओम् =====
Wednesday, March 6, 2013
वह दिन और आज का दिन
कुछ लोग पार्टी बदल रहे हैं
कुछ लोगों का देश बदल रहा है
कुछ लोगों का धर्म बदल रहा है
कुछ लोग घर बदल रहे हैं
कुछ लोग गाँव बदल रहे हैं
कुछ लोग अपनी भाषा बदलें में लगे हैं
कुछ अपना खान - पान बदलनें में लगे हैं
कुछ पाठशाला बदल रहे हैं
कुछ अपना पेशा बदल रहे हैं
लेकिन बहुत दुःख होता है ......
यह देख कर कि -----
कोई स्वयं को बदलनें के लिए कभीं सोचता भी नहीं /
क्या होगा यह सब बदलनें से जबतक हम स्वयं को नहीं बदलते ?
भाषण से इमानदारी आयेगी ?
परिस्थितियों को बदलनें से क्या संसार बदलेगा ?
मंदिर बदलनें से क्या भगवान बदलेगा ?
धर्म बदलनें से क्या प्राकृतिक नियम बदलेंगे ?
भाषा बदलनें से क्या हम अंग्रेज बन जायेंगे ?
पोशाक बदलनें से क्या हम बदल जायेंगे ?
कुछ नहीं बदलता , जबतक हम स्वयं को नहीं बदलते , हम रुके हुए हैं एक जगह और परेशान हैं कि यह सब क्या हो रहा है ? यह सब जो हो रहा है सा दिख रहा है वह सब हमारा अपना भ्रम है , वस्तुतः कुछ नहीं हो रहा , मात्र हम रुक - रुक कर स्वप्न देख रहे हैं , स्वप्न तबतक प्यारा होता है जबतक देखा जाता है और ज्योंही आँख खुलती है , हम कहीं होते हैं और हमारा स्वप्न हमपर हसता रहता है और मौन में कहता है , अब देख तूं कि कितना बुद्धिमान है ; जबतक तेरी ऑंखें बंद थी , सब सत्य था लेकि जब आँखे खुली तो वह सत्य असत्य में बदल गया , अब तूं soc
Tuesday, February 26, 2013
कौन और कब सुना -----
मनुष्य - जी हाँ मनुष्य के मष्तिष्क की बनावट कुछ ऎसी है जिसे सुपर कंप्यूटर से भी अधिक शक्तिशाली बाना जा रहा है , वह साकार सूचनाओं के आधार पर निराकार सूचनाओं में झांक सकता है और झाँक भी रहा है / मनुष्य काम से राम तक की सोच अपनें मष्तिष्क में रखता है लेकिन दुःख इस बात का है अनुशय को न काम से तृप्ति मिल रही और न संसार में ब्याप्त उन मार्गो पर दिख रही जिनको लोग राम मार्ग कह कर राम का ब्यापार कर रहे हैं /
जीवों में मात्र मनुष्य एक ऐसा जीव है जो ऊपर आकाश में देखता है और नीचे पृथ्वी के गर्भ में भी झांकता रहता है लेकिन कहीं से उसे पल भर को भी शांति नहीं दिखती , ऐसा क्यों ? क्योंकि वह कहीं घडी भर रुकता ही नहीं / बीसवीं शताब्दी में आइन्स्टाइन प्रकाश की गति को परम माना लेकिन मनुष्य के मन की गति प्रकाश की गति से भी अधिक गति वाला है / कहते है , सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचनें में आठ मिनट लेता है और मनुष्य एक सेकण्ड के हजारहवें समयांश में सूर्य को देख लेता है /
सभीं जीव भोग में भाग रहे हैं और सबका एक मार्ग है - भोग - भोजन लेकिन मनुष्य बिचारा भ्रमित है ; वह कभीं भोग तो कभी भगवान , कभी काम तो कभीं राम , कभीं भोग तो कभी योग - एक कोजब एक हाँथ से पकता है और दूसरा उसका हाँथ तुरंत दूसरे को पकड़ लेता है / मनुष्य जब योग में बैठता है तब उसे भोग बुलानें लगता है और जब भोग में रमता है तब उसे योग कि आहट सुनाई पड़नें लगती है /
वह जो भोग को योग का माध्यम समझा ......
वह जो काम को राम का मार्ग समझा ....
वह जो पर में स्वयं को देखा .....
वह जो स्वयं में पर को देखा ....
उसे चैन खोजना नहीं पड़ता -----
उसे स्वर्ग खोजना नही पड़ता ----
वह जहाँ होता है , वहीं चैन होता है ....
और
वहीं स्वर्ग होता है
===== ओम् ======
Tuesday, February 12, 2013
कौन सुनानें वाला है और कौन सुनने वाला है ?
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर पूर्ण रूप से श्रद्धा की लहर बह रही होती है ....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर धनात्मक अहँकार का अभाव है .....
सुननें वाला वह है , जिसके अंदर सात्त्विक गुण प्रभावी होता है ....
सुननें वाला वह है , जिसके सभीं नौ द्वार प्रकाशित हो रहे होते हैं ....
और ----
सुनानें वाला वह है , जो प्रभु समान होता है ....
सुनानें वाला वह है , जो ब्रह्म वित् होता है .....
सुनानें वाला वह है , जो काम , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहकार रहित हो ...
सुनानें वाला वह है , जो भौतिक साधनों से संपन्न है ....
सुनानें वाला वह है , जो देता तो है लेकिन उसका देना उसके अहँकार का भोजन होता है ...
कुछ बातें सुननें और सुनानें वालो के सम्बन्ध में दी गयी हैं , लेकिन इन बातों में दो प्रकार के सुननें वाले हैं और दो ही प्रकार के सुनानें वाले हैं ; पहली श्रेणी है उनकी जो योगी है और दूसरी श्रेणी उनकी है जो भोगी हैं /
भोगी सुननें वाला है और भोगी ही सुनाने वाला -----
योगी सुननें वाला है और योगी हि सुनानें वाला ----
योगी सुनानें वाला है और भोगी सुननें वाला ----
लेकिन
भोगी सुनानें वाला हो और योगी सुननें वाला हो ऐसा होना कठिन है ,
क्योंकि
भोगी , भोगी की बात को समझ सकता है ....
योगी , योगी की बात को समझता है ....
योगी , भोगी की बात को समझता है ...
पर
योगी की बात को भोगी नहीं समझता , और यदि समझता है तब वह उस घडी भोगी नहीं होता , उस घडी उसका मन - बुद्धि भोग भाव की ऊर्जा को नहीं धारण किये हुए होते और जब ऐसा होता है तब उस भोगी को वह खिडकी भी दिखती है जहाँ से सत् की किरण उसकी ओर आती उसे दिख सकती है /
भोग से योग में रखा कदम ब्रह्म अनुभूति में पहुंचा सकता है
योग से भोग में लौटा कदम नर्क में पहुंचाता है
=== ओम् ====
Wednesday, February 6, 2013
वहाँ क्या है ?
- जहाँ न दिन है न रात ....
- जहाँ न सत् है न असत् .....
- जहाँ न मैं हैं न तूं .............
- जहाँ न काम है , न राम ....
- जहाँ न माया है , न काया .....
- जहाँ न आसमान है , न धरती .....
- जहाँ न पाप है न पुण्य .....
- जहाँ न अच्छा है न बुरा ....
- जानां न दुःख है , न सुख ....
- जहाँ न भय है न मोह ....
- जहाँ न कामना है , न क्रोध .....
- जहाँ न लोभ है , न अहँकार ....
आखिर ऐसे आयाम में क्या हो सकता है ?
- गुण तत्त्वों के परे निर्गुणी रहता है
- माया परे मायापति रहता है
- काम परे कामेश्वर रहता है
- सभीं भावों के परे भावातीत रहता है
फिर हम सब क्यों उसे समझनें में असमर्थ हैं ?
बहुत सीधा सा जबाब है :
हम जहाँ हैं , जहाँ रहते हैं , उसको समझनें की कोशिश करते ही नहीं
जिस घडी हमारी दृष्टि स्व पर केंद्रित हो जायेगी , उस घडी उसे समझनें की जरुरत न होगी , वह सर्वत्र नजर आनें ही लगेगा अतः पर से अपनी दृष्टि को स्व पर केंद्रित करनें का अभ्यास करना हमारे हाँथ में है और यह अभ्यास जिस घडी अभ्यास - योग में रूपांतरित हो उठेगा उस घडी हमें उसे खोजनें के किये काशी या काबा की यात्रा न करनी होगी , हम जहाँ भी होंगे वही काशी और काबा हो उठेगा /
प्रभु तो सर्वत्र है लेकिन ज्योंही भोग से हमारी दृष्टि प्रभु की ओर मुडती है , न जानें क्यों हमारी पलकें झपक जाती हैं और हम चूकते चले जा रहे हैं , काश ! वह घडी आये जब हमारी पलकें झपकें नही और हम प्रभु को अपनें नयनों में बसा सकें /
==== ओम् =====
Thursday, January 31, 2013
सब बदल रहा है ----
घर ....
गाँव ....
घर - गाँव के लोग ....
शहर , शहर के लोग ....
देश , देश के लोग , देश के लोगों का रहन सहन ....
पढ़ाई और पढ़ाई का तरीका ....
रहन - सहन , खान - पान .....
रीति - रिवाज ....
तीज - त्यौहार मनानें के तरीके ....
सब कुछ बदल रहा है लेकिन इस बदलाव में जो ऊर्जा काम कर रही है क्या वह भी बदल रही है ?
आज का युग विज्ञान का युग है , विज्ञान अर्थात वह जिसका आधार गहरी सोच हो और गहरी सोच से जो निकलता है उसे कहते हैं विज्ञान / सोच की मूल है संदेह और संदेह में सत्य असत्य की तरह और असत्य सत्य की तरह दिख सकता है / विज्ञान के नियमों की उम्र बहुत लंबी नही , और लंबी हो भी कैसे सकती है क्योंकि वह जिसका जन्म संदेह से हो रहा हो उसकी उम्र लंबी कैसे हो सकती है ?
आज मंगल ग्रह के ऊपर वैज्ञानिकों की नजर टिकी हुयी है और उनको वहाँ जो भी दिख रहा है उसमें पानी दिख रहा है क्योंकि बिना पानी जीव का होना संभव नहीं और वैज्ञानिकों की पूरी उम्मीद है कि मंगल पर कभीं जीव रहा करते थे / वैज्ञानिक सपना देखता है और उसका जीवन उस सपनें को सत्य का रूप देनें में गुजर जाता है / आइन्स्टाइन , मैक्स प्लैंक , श्रोडिंगर एवं अन्य सभीं नोबल पुरष्कार विजेताओं के जीवन को देखिये , वे सभी जो स्वप्न देखा उसकी गणित बनाते - बनाते उनका जीवन गुजर गया और पूर्ण तनहाई में उनके जीवन का अंत हुआ /
एक हैं वैज्ञानिक जो दिन में भी स्वप्न देखते हैं और उनको पता नहीं चल पाता की कब दिन हुआ और कब रात आयी और दूसरे हैं उपनिषद के ऋषि जिनका केंद्र वह बेला होती है जहाँ न रात होती है और न दिन जिसे कहते है संध्या या अमृत बेला / एक ऋषि अमृत बेला में योगयुक्त स्थिति में जो देखता है उसकी गणित नहीं बनाता क्योंकि उसे अपनी अनुभूति पर कोई संदेह नही और वह अपनी अनुभूति को किसी और पर लादना भी नहीं चाहता , जो चाहे उसकी बात को मानें और जो न चाहे न मानें लेकिन वह स्वयं अपनी अलमस्ती में रहता है /
- बदलाव में बदलाव की प्रक्रिया के माध्यम से उसे समझना जो सनातन है ....
- बदल रही साकार सूचनाओं में उसे देखना जो निराकार है .....
- बदलाव में उसे देखना जो साकार से इराकार में और निराकार से साकार में रूपांतरित हो रहा है ,,,,
- इस देखनें को कहते हैं ज्ञान ...
- ज्ञान प्रकृति और पुरुष [ अर्थात बदल रही सूचनाओं एवं उनके मूल ऊर्जा जिससे वे हैं] का बोध है ...
- प्रकृति बदलाव का नाम है ....
इस बदलाव में जो निराकार ऊर्जा काम कर रही है उसका नाम है परमात्मा ,ब्रह्म ,
महेश्वर , ईश्वर आदि - आदि /
रूपांतरण में उसे देखना जो रूपांतरण का मूल है , योग है ....
=== ओम् ====
Saturday, January 19, 2013
संसार में आना एक अवसर है , उसे यों ही न जानें दें
कबतक और क्यों किसी की उंगली पकड़ कर चलते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से दूर भागते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं को भी धोखा देते रहोगे ?
कबतक और क्यों दूसरों को सुनाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनें कद को खीच - खीच कर लंबा दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों अपनी असलियत को छिपा कर रखना चाहते हो ?
कबतक और क्यों स्वयं को सर्वोपरि दिखाते रहोगे ?
कबतक और क्यों स्वयं से भागते रहोगे ?
जीवन जो मिला है वह प्रभु का प्रसाद है .....
जीवन जो मिला है वह एक अवसर है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह हर पल घट रहा है ....
जीवन जो मिला हुआ है वह मात्र आप का नहीं है .....
जीवन को गंगा धारा की तरह बहनें दो , वह स्वयं सागर से मिल जाएगा ...
जीवन को प्रश्न रहित बनाओ .......
और
जीवन को प्रभु को समर्पित करो
और
स्वयं को कर्ता नहीं द्रष्टा रूप में देखो ....
और
तब जीवन का वह परम रस मिलेगा जिसकी ही तलाश हमें आवागमन में बनाए हुए है //
===== ओम् =======
Sunday, January 13, 2013
स्वयं से पूछो
आप अपनें जीवन - यात्रा का रुख किधर को रखा है ?
आप दिल से किसे चाहते हैं ; भोग को या भगवान को या दोनों को ?
भोग और भागवान एक साथ एक बुद्धि में नहीं रहते , ऎसी बात गीता कहता है , फिर ?
क्या यह संभव नहीं कि भोग के आइनें में भगवान को देखा जाए ?
- हमारा अधिकाँश समय दूसरों के सम्बन्ध में सोचनें में गुजर जा रहा है , क्य हम इसे समझते हैं ?
- जितना समय हम दूसरों में बुराई को खोजनें में लगाते हैं यदि उसका एक चौथाई भी अपनें में बुराइयों को देखनें में लगाएं तो संभव है आप परम सत्य को देखनें में सफल हो सकें
- ऐसा क्यों है कि हमें दूसरों में मात्र बुराइयां दिखती हैं और अपनें में अच्छाइयां ही अच्छाइयां ?
- क्या हम राम को इस लिए चाहते हैं कि सारी सोचें कामयाब हो सकें ?
- क्या राम मात्रा कामनाओं को पूरा करनें की मशीन बन कर रह गया है ?
- क्या हम राम के अधीन हैं या राम हमारे अधीन ?
- हम क्यों चाहते हैं कि सभीं हमारे इशारे पर चलें चाहे वह भगवान ही क्यों न हो ?
- पिता , माता , पत्नी , पुरुष , पुत्र / पुत्री , सगे - संबंधी सभीं को हम अपना गुलाम क्यों बनाना चाहते हैं ?
- बहुत हो चुका , मालिक बनें लेकिन मात्र अतृप्तता ही मिली , फिर क्या करें ?
- चलो , अभीं तक जिनको हम अपना गुलाम बनाना चाहते रहे उनमें से किसी एक का ही सही , गुलाम बन कर देखते हैं
- क्या हम समझते हैं कि प्रभु संदेहों से भरी बुद्धि - क्षेत्र में नहीं रहता , वह तो बसेरा बनाता है उनके हृदयों में जिनके ह्रदय ......
मीरा , कबीर , नानक , परम हंस रामकृष्ण जैसे हों ......
ऐसे दिल जिनसे श्रद्धा छलकती हो
ह्रदय में श्रद्धा की लहर उठाई नहीं जा सकती यह तो प्रभु का प्रसाद है जो किसी - किसी को कभीं - कभीं मिलता है
अब सोचिये नहीं -----
क्योंकि ....
नानकजी साहिब कहते हैं ....
सोचे सोचि न होवहीं ----ज्यों सोची लख बार .....
जहाँ सोच है , वहाँ संदेह भी होगा , क्योंकि सोच संदेह की पहचान है
==== ओम् ======Tuesday, January 8, 2013
यह क्या हो सकता है ?
- जहाँ न दुःख हो और जहाँ न सुख हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न दिन हो न रात हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न अपना हो , न पराया हो , वहाँ कौन हो सकता है ?
- जहाँ न भोग हो , न योग हो , वहाँ क्या हो सकता है ?
- जहाँ न कुछ अच्छा हो न बुरा , वहाँ क्या हो सकता है ?
- वह जिसे न तन से , न मन से पकड़ा जा सके , वह कौन हो सकता है ?
- जिसे न गाया जा सके , न लिखा जा सके , वह कौन हो सकता है ?
जीवन प्रश्नों से भरा है , जबतक मन - बुद्धि में संदेह है , तबतक प्रश्न का होना भी संभव है
जिस घडी मन - बुद्धि संदेह रहित होते हैं उस घड़ी मन -बुद्धि प्रश्न रहित हो उठते हैं
और
- प्रश्न रहित मन - बुद्धि का आयाम प्रभु का आयाम होता है
- प्रभु निर्भाव मन - बुद्धि पटल पर प्रतिबिंबित होते हैं और उनकी अनुभूति चेतना को होती है
मनुष्य एक खोजी जीव है और सब में उसे जो मिलता है वह उसे और अतृप्त बना जाता है और अतृप्तता की तिब्रता हर पल ऊपर ही उठती जा रही है /
जो उसे पा लेता है , उस घडी तो शांत हो उठता है लेकिन ज्योंही उसके उसका सम्बन्ध टूटता है , पुनः वह ब्याकुल हो उठता है और यह क्रम तबतक चलता रहता है जबतक तन में प्राण हैं /
- जिसनें उसे मनमोहन नाम दिया होगा , वह उसके कितनें गहरे प्यार में रहा होगा ?
Thursday, January 3, 2013
जीवन को देखो ----
प्रभु के इस प्रसाद को ऐसे प्रयोग करो कि यह प्रभु तक पहुंचा सके
प्रभु के प्रसाद को न खीच - खीच कर लंबा करो न इसे सिकोड़ कर रखो
जीवन की पीछली तस्बीरों को न तो भूलो और न ही उनका गुलाम बनो
अपनें अगले कदम को जहाँ रखो उसे ठीक से समझो
जीवन में हर कदम एक मोड है , जहाँ से स्वर्ग - नर्क की राहे निकलती हैं
जीवन का हर पल प्रभु मय है , अगर कोई प्रभु समर्पित जीवन जी रहा हो , तो
प्रभु आप को सबकुछ तो दे दिया है , अब और की मांग क्या उचित है ?
औरों को देख कर अपनें जीवन के रुख को न बदलो
संसार में सबका अपना - अपना जीवन है
संसार में सबके जीवन का अपना - अपना रंग है
संसार में सबके जीनें का अपना - अपना ढंग है
एक संसार प्रभु निर्मित है और उस में हम सब अपना - अपना संसार बनानें में लगे हैं
संसार में सबको एक निश्चित अवधि का जीवन मिला हुआ है ....
इस अवधि को कौन कैसे गुजारता है , यह सबकी अपनी -अपनी सोच है
Friday, December 28, 2012
कौन सुनता है ? कोई तो सुनता ही होगा
दिल से कौन सुनता है ?
- गुरुद्वारा से आ रही गुरुवानी की परम धुन को .....
- मंदिर से उठती ओम् की धुन को .....
- मस्जिद से आ रही अल्लाह ओ अकबर की पुकार को .....
- खाली पेट वाले की भूख के दर्द को ......
- वक्त की पुकार को .....
- सब के सीनें में दबी दर्द को ......
- मीरा के भजन को .....
- कबीर जी के वचनों को .....
- नानक जी के ह्रदय के भाव को .....
- गायत्री के छंद को ......
- पृथ्वी की दर्द भरी आवाज को ....
ऎसी एक नहीं अनेक बातें हैं, हम इन्शान को सुननें के लिए
लेकिन ---
हम क्यों नहीं सुन पा रहे , कोई तो कारण होगा ही ?जी , हाँ , कारण है और गहरा कारण है .....
हम यदि स्वयं को देखें तो एक चलती - फिरती लाश के अधिक नहीं जिसकें गति तो है ....
लेकिन
चेतना नहीं
ऐसा कौन सा धर्म ग्रन्थ है जो यह न कहता हो कि ----
परमात्मा तुम्हारे ह्रदय में है , हम जानते भी हैं लेकिन समझते नहीं , न ही समझनें की कोशिश करते हैं /
प्रोफ़ेसर आइन्स्टाइन कहते हैं : -----
बहुत कम लोग ऐसे हैं जो जानते हैं उसे अपनें ह्रदय से समझते भी हैं /
सौ साल जीना ब्यर्थ है यदि बेहोशी में जीया जाए
और
होश भरा एक पल का जीवन ही वह जीवन है .....
जिसकी तलाश हम सब को है //
==== ओम् =====Friday, December 21, 2012
केवल दो घडी , सोचना
- आज कौन जीना चाहता है ?
- आज कौन मरना चाहता है ?
- आज मनुष्य अपनें जीनें - मरनें का क्या मापदंड बना रखा है
- क्यों लोग भोग के लिए जीना और भोग के लिए मरना चाह रहे हैं ?
- आज क्यों लोग परमात्मा को पीठ पीछे रख रहे हैं ?
- आज क्यों मनुष्य की सोच नकारात्मक हो रही है ?
- आज जितना भय मनुष्य को मनुष्य से है उतना भय और किसी जीव से नहीं , क्यों ?
- आज का मनुष्य आखिर चाहता क्या है ? मात्रा कामना - काम की तृप्ति /
- आज वे सबहीं पराये से क्यों दिखाते हैं जो पहले अपने हुआ करते थे ?
एक घडी ही सही ....
आज नहीं तो कल ही सही ....
लेकिन ....
आप शांत मन - बुद्धि के आयाम में बैठ कर परम सत्य में जरुर डूबें /
==== ओम् =====
Wednesday, December 12, 2012
एक नज़र इस पर भी
कौन परमात्मा की ओर पीठ करके रहना चाहता है ?
कौन शास्त्रों को नही पढ़ना चाहता ?
कौन शात्रों को अपनें जीवन की डोर बनाना चाहता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को नक्कारता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को अपनें जीवन में उतारना चाहता है ?
कौन झूठ बोलना चाहता है ?
कौन सत्य पर यकीन करता है ?
कौन किसी से सलाह नहीं लेता ?
यहाँ सलाह देनें वालों की कतारें खडी हैं लेकिन उनकी सलाह को लेनें वाले कितनें हैं ?
मंदिर में प्रसाद लेनें वालों की लंबी लाइन लगी दिखती है लेकिन प्रभु के प्रसाद - प्राप्ति के बाद भी वे अतृप्त क्यों दिखते हैं ?
कौन किसको और कब अपना समझता है ?
मंदिर - गुरुद्वारा में जा रहे हैं और साथ में पेस्तौल लटकाए हैं , क्यों प्रभु पर विश्वास नही ?
कौन प्रभु पर और किस लिए विश्वास करता है ?
प्रभु पर हमारा विश्वास कितना गहरा है ?
** मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल रहा हूँ जो राधे - राधे , कृष्ण - कृष्ण , राम - राम कहते हुए अब जीवन के आखिरी पायदान पर जा पहुंचे हैं / मैं उनसे एक सवाल करता हूँ , क्या आप कभीं स्वप्न में भी राधा को , या कृष्ण को या राम को देखा ? सब का एक उत्तर मिलता है , जी नहींऔर वह भी गुस्से में पर एक सज्जन ऐसे भी मिले जो बतानें से पूर्व रो पड़े और बोले , यदि दिखे होते तो आज यहाँ गंगा किनारे क्यों बैठा होता ?
सत् की स्मृति यदि गहरी हो तो जीवन सत् में गुजरता है
न कि ....
जीवन सत्य की खोज में गुजरता है /
बश एक पल , मात्रा एक पलांश जब गहरी सोच की लहर ह्रदय में उठेगी तब वह स्वप्न में ही नहीं वर्तमान में आप के सामनें दिखनें लगेगा
और
तब आप वही कहेंगे जो गीता कहता है -----
वह सबे बाहर , सबसे दूर , सब के समीप , सब के अंदर है
और
सभीं उसके फैलाव स्वरुप हैं
==== ओम् ========
Friday, December 7, 2012
अपनें को सुनो और देखो भी
सड़क एक दम सीधी हो तो उत्तम रहेगा /
दोनों किनारे एक दूसरे के समानांतर चलते हैं पर .....
सड़क के दोनों किनारे सामनें कही दूर आपस में मिलते हुए से दिखते हैं .....
लेकिन ऐसा होता नहीं /
क्या कभीं आप अपनें इस भ्रान्ति के सम्बन्ध में सोचा है ?
दोनों किनारे समानांतर चलते हैं और आपस में मिलते हुए से भी दिखते हैं .....
दो आँखें और एक बुद्धि हमें किस भ्रान्ति में रख रहे हैं ....
आप कभीं इस पर सोचा नहीं होगा ?
सड़क की भांति हमारे जीवन का भी रहस्य है .....
भोग - योग दोनों समानांतर चलते से दिखते हैं लेकिन ऐसा है नहीं /
भोग एक माध्यम है जिसमें उठा होश ही योग है और योग वाहन पहुंचाता है ......
जहाँ दोनों मिलते से दिखते भर नहीं मिलते भी हैं ....
और उस मिलन को कहते हैं अब्यक्त , अचिन्त्य , अप्रमेय , ब्रह्म और .......
सांख्य - योगी जिसे कहते हैं परम पुरुष और ......
जिसे ध्यान में उतरे योगी अपनें ह्रदय में देखते हैं ....
ब्रह्म चारी अपने ब्रह्म चर्या में पाते हैं ....
तप करनें वाले अपनें तप की ऊर्जा में देखते हैं ...
और ...
प्रेमी अपनें प्यार में पाते हैं //
=== ओम् =====
Sunday, December 2, 2012
जबतक -------
[क] जबतक श्वासें चल रही हैं , उसके लिए
- अपनें - पराये हैं
- यह तेरा और यह मेरा है
- जाति - धर्म है
- दिन - रात हैं
- सुख - दुःख है
- अच्छा - बुरा है
वह सब है जो चाह आधारित है
लेकिन -----
[ख] जब श्वासें चलानी बंद हो जाती है , तब
- वह स्वयं अपना सांसारिक अस्तित्व खो बैठता है
- पलंग से उसे उसके अपनें ही उठा कर जमीं पर लिटा देते हैं
- उसका नाम रामानंद - ज्ञानानंद नहीं रह जाता
- उसे अब उसके अपनें ही मुर्दा कहनें लगते हैं
- उसकी कोई जाति नहीं रहती
- उसका कोई धर्म नहीं होता
- उसकी कोई चाह नहीं रहती , भौतिक स्तर पर
- उसके लिए उसके कोई अपनें - पराये नहीं रहते
- उसे सुख - दुःख , गर्म - ठंढा और अन्य सभीं द्वैत्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता
- उसे संसार में हो रही घटनाएँ नहीं हिला पाती
वह जिस आयाम में होता है उसके लिए .......
उस घडी जो रहता है , उसे गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ----
अब्यय , अप्रमेय , अब्यक्त , सनातन
और .....
मनुष्य जीवन भर भागता रहता है , जो उसे मिलता है उससे उसे क्षण भर की शांति मिलती है लेकिन .....
वे धन्य हैं ----
जिनको उनकी श्वास चलते अपनी श्वासों के मध्यम से उस परम अब्यय की खुशबू मिल जाती है ----
और उस खुशबू में वे तृप्त हो उठते हैं
उनके लिए ---
सभीं द्वित्य तिरोहित हो उठते हैं
और ---
वह अद्वैत्य की ऊर्जा में अलमस्त रहता है
=== ओम् =====