Thursday, November 7, 2013

भागवत का एक अंश

● कृष्णका मथुरा और ब्रज - 1●
श्रीमद्भागवत पुराणमें ऐसा प्रसंग मिलता है कि प्रभाष क्षेत्रमें जहाँ सरस्वती नदी अरब सागरमें गिरती थी वहाँ सभीं यदुबंशी मैरेयक - बारूणी मदिरा पी कर आपस में लड़ते हुए समाप्त हो गए थे , बलराम जी ध्यान माध्यम से प्राण त्यागा था और प्रभु के लिए उनके धाम से रथ उतरा था जिस पर बैठ कर वे स्वधाम चले गए थे । प्रभु स्वधाम जाते समय अपनें सारथी दारुकके माध्यमसे द्वारका यह संदेशा भिजवाया कि वहाँ जो लोग हैं उनको तुरंत अर्जुनके साथ इन्द्रप्रष्ठ चले जाना चाहए क्योंकि आज से ठीक 7वें दिन द्वारका समुद्र में डूब जायेगी ।
* यह घटना कृष्ण जन्मके बाद ठीक 125 वें वर्ष की है । कृष्ण का स्वधाम जाना , पांडवों का स्वर्गारोहण , धृतराष्ट्र और गांधारी का गंगा तट पर सप्त श्रोत आश्रम पर महानिर्वाण प्राप्त करना , परीक्षितका पृथ्वी सम्राटके रूप में हस्तिनापुरमें आसीन होना और कृष्णके प्रपौत्र बज्रका मथुरा एवं शूरसेन क्षेत्रके सेनाधिपति रूपमें अभिषेक होना , यह सारी घटनाएँ एक साथ घटित हुयी ।
* भागवत कहता है , जब बज्र नाथ मथुरा आये तो मथुरा - वृन्दाबन वीरान हो चुका था, बहुत कम आबादी ही गयी थी और प्रभु श्री कृष्ण के सभीं लीला स्थलों की पहचान भी समाप्त हो चुकी थी ।
* लगभग 70 सालमें ऐसा क्या हुआ मथुरा एवं ब्रज में कि प्रभु के सभीं लीला स्थलों को बतानें वाले कोई न थे और ऐसा जुछ नहीं दीखता था जिसके आधार पर यह समझा जा सके कि इन- इन स्थानों पर प्रभु कभीं लीलाएं की थी ।कहाँ गए वे लोग और क्या हुआ उन स्थानों को ?
> इस बात पर आगे चर्चा की जायेगी <
~~~ ॐ ~~~

Friday, November 1, 2013

मन को समझो

● रे मन ●
1- मन मनुष्यको दैत्य और देव बनाता है ।
2- सात्त्विक अहंकार और काल ( समय ) से सृष्टिके प्रारम्भमें मनका निर्माण होता है ।
3- अपरा प्रकृतिके 08 तत्त्वों ( पञ्च महाभूत + मन + बुद्धि + अहंकार ) में से एक मन है ।
4- मन जब 10 इन्द्रियों से जुड़ता है जब विकारों का पुंज हो जाता है ।
5- मन , चित्त , बुद्धि और अहंकारके योग को अन्तः करण कहते हैं ।
6- जैसे एक समझदार ब्याध पकडे गए हिरन पर भरोषा नहीं रखता वैसे योगी अपनें मन पर भरोषा नहीं रखता ।
7- मन को राजस - तामस गुणों की बृत्तियों से दूर रखना , ध्यान है ।
8- मन पूर्व अनुभव में आये बिषयों पर भौरे की तरह मडराता रहता है ।
9- कर्म संस्कारोंका पुंज , मन है ।
10- मन संसार का विलास है ।
11- 10 इन्द्रियाँ ,मन और स्थूल देह को साधक लिंग शरीर कहते हैं ।
12- Sir Wilder Penfield
( 1891 - 1979 ), a recognised nurologist says : Mind is not brain , it works independent of brain as a computer programmer.
13- Roger Wolcot Sperry
( 1913-1994 ) : Nobel prize 1982 : Nurologist : He says , body doesnot create biochemical and nurological brain nechanism , it is developed before the development of the body . 14 - John C. Accles ( 1903-1997) : nobel prize : 1963 says : Consciousness is extra cerebral located in the area where orthodox brahmins keek crest , this area is called S.M.A. area ( supplement motor area ).
15 - Max Planck -nobel prize 1918 says : Mind is matrix of matters .
~~ ॐ ~~

Sunday, October 27, 2013

सत्य जिसमें हम हैं

● देखो और समझो ●
1- देखो संसारके रंगोंको और उनमें समझो उसे जिससे वे हैं ।
2- हम संसारके रंगोंसे इतना तन्मय हो जाते हैं की भूल कर जाते हैं उनके मूल को समझनें में ।
3- सभीं रंग उससे हैं लेकिन वह स्वयं रंग हीन है , यह कितना गहरा विज्ञान है ?
4- वह मायापति है लेकिन स्वयं मायातीत है।
5- सभीं गुणोंके भाव उस से हैं लेकिन वह
गुणातीत - भावातीत है ।
6- समस्याओं से भागनें वाला कामयाब कैसे हो सकता है ?
7- मनुष्य अपनें को ढकता - ढकता नग्न होता जा रहा है और यह उसे और दुखी बनाता जा रहा है । 8- सच्चाई से कबतक भागोगे , वह तुम्हें कहीं चैन से श्वास न लेनें देगी ।
9- तुम जैसे हो वैसे रहो - तन और मन से , लोग तुमको अस्वीकार करेंगे लेकिन जो सत्य को समझते हैं वे तुम्हारे प्रेमी होंगे और तुम प्रसन्न रह सकोगे । 10- तुम यह समझो कि तुम्हारी खोज सत्य की है और तुम सत्य से भाग रहे हो फिर तुम खुश कैसे रह सकते हो ?
~~~ ॐ ~~~

Friday, October 25, 2013

● प्यार ●

● एक नज़र - 3 ●
1- प्रेम कोई बंधन नहीं , प्रेम सभीं बन्धनों से मुक्त करता है ।
2- प्रेमकी कोई तश्वीर नहीं , वह सभीं तश्वीरों में है ।
3- प्रेमको गाया नहीं जा सकता लेकिन सभीं गाना चाहते हैं
4- प्रेम रसमें डूबा समयातीतमें होता है ।
5- प्रेममें इन्तजारके लिए कोई जगह नहीं ।
6- प्रेम उर्जाका जब संचार होता है तब मन निर्विकल्प आयाममें होता है ।
7- ऐसा कोई जड़ - चेतन नहीं जिसमें प्यारका बीज न हो और सभीं का मूल प्यार ही है ।
8- प्यार उर्जासे परिपूर्ण आँखें जो भी दिखती हैं वह परमात्मा ही होता है ।
9- प्यारके दीवाने कोई तमन्ना नहीं रखते ।
10- प्यार कुछ मांगता नहीं , पा लेता है सब ।
11- प्यारमें मैं नहीं होता , तूँ ही तूँ होता है ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 22, 2013

ध्यानकी राह

● देखो और समझो ●
1- जो है उसे क्या ढूढ़ रहे , उसे पहचानो और उसकी पहचान होती है ध्यान से ।
2- ध्यान क्रिया नहीं है , क्रियामें ध्यान मिल सकता है ।
3- मन - बुद्धि तंत्रकी उर्जा जब निर्विकल्प होती है तब जो अनुभूति होती है वह परम सत्य की अनुभूति होती है ।
4- जब संदेह उठना बंद हो जाता है और श्रद्धा
तन - मनसे टपकनें लगती है तब वह ब्यक्ति ध्यान में होता है ।
5- साफ़ मन वाला मृत्युके आइनेंमें प्रभुकी धुधली तस्वीर देखता है ।
6- भाषा , भाव ब्यक्तका माध्यम है ।
7- शब्दसे दृश्य - द्रष्टाको ब्यक्त किया जाता है ।
8- मौतका भय जीवनके रस से दूर रखता है ।
9- वह जो अपनें जीवनको समझता है , प्रभुसे भयभीत न हो कर उनसे मित्रता स्थापित कर
लेता है ।
10- भय माध्यमसे प्रभुसे जुड़ना अति आसान पर प्रभुमें बसना अति कठिन ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, October 19, 2013

परम मार्ग

● साधनाके मूल मन्त्र ● 
 1- भोगतत्वोंके सम्मोहनसे अप्रभावित मन ब्रह्म -जीवात्मा एकत्वकी अनुभूतिके माध्यम से ब्रह्म वित् बनाता है ।
 2- वैदिक कर्म दों प्रकरके हैं : एक प्रवित्ति परक और दूसरा निबृत्ति परक कहलाता है ।प्रवित्तिपरकका केंद्र भोग होता है और निबृत्तिपरकका केंद्र मोक्ष । 
3- माया मोहित ब्यक्ति असुर कहलाता है । 
4- माया मोहितकी पीठ प्रभुकी ओर होती है और आँखें भोग पर टिकी होती हैं । 
5- संकल्प धारी योगी नहीं हो सकता ।
 6- संकल्पका न होना काममुक्त बनाता है । 
7- काममुक्त ब्रह्मवित् होता है ।
 8- ब्रह्मवित्  का बसेरा  प्रभुमें होता है । 
9- ब्रह्मवित् और माया सम्मोहितकी आँखें कभीं एक दुसरे से नहीं मिलती । 
10- दुःख संयोग वियोगः योगः - गीता 
 <> ऊपरके सूत्र मूलतः गीता आधारित हैं <> 
~~~ ॐ ~~~

Saturday, October 12, 2013

पग - पग पर

पग - पग पर
01- किसी को देखो , देखनें से आप का मार्ग सुगम हो सकता है लेकिन इतना और ऐसे न देखो की वह आप के दुःख का कारण बन जाए । यहाँ सबके मार्ग अलग - अलग हैं ; आप जैसा वह नहीं और आप वैसे जैसा नहीं हो सकते , बश इतनी सी बात पकडे रहो । 2- पग - पग पर सोचते रहो कि क्या तुम्हारा अगला कदम उधर ही जा रहा है जिधर तुम्हें अंततः जाना ही है , यदि नहीं टी अब भी वक़्त है तुम अपनें अगले कदम की स्थिति जो तय कर सकते हो ।
3- जरा सोचना - जिसके स्पर्शसे यह जगत चेतन मय है उसे हम चेतनाके एक कण देनें की भी तो सोच नहीं रखते ।
4- जीवन भर हम मुट्ठी खोलते समय डरते हैं कि इसमें जो हमनें इकट्ठे किये हैं वह कहीं सरक न जाए पर अंत समयमें यह मुट्ठी स्वतः खुल जाती है और खाली होती है , देखनें वालों ! सोचना , कल आप की भी मुट्ठी स्वतः खुलनें वाली है , आप इस भ्रमित जीवनसे निकल कर यथार्थ जीवन को अपना सकते , अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा ।
5- अपनें माँ - पितासे नज़र छिपा कर अपना जोड़ा बनानेंका यह प्रयाश क्या आपको यह नहीं इशारा करता कि यह तुम्हारा कृत्य तुमको भी माँ / पिता बनानें जा रहा हैं ? जैसे तुम अपनें माँ / पिताको धोखा दे रहे हो आज से ठीक 15 साल बाद आप की भी औलाद आपको धोखा दे सकती है ।
6- जैसा बीज और धरती होगी उसकी फसल भी वैसी ही होती है , यदि अन्य बातें सामान्य हों तब । 7- यह संसार लेने - देने का एक परम निर्मित क्षेत्र है जहाँ हमसब लेन - देन कर रहे हैं लेकिन जरा
सोचना ,  हम उस परमको क्या दे रहे हैं जबकि हमसबके पास जो भी है वह उसीका दिया हुआ है ?
8- जरा रुकना ! क्या कर रहे हो ? आप इस फूलको क्यों तोड़ रहे हो ? यह बिचारा तो हम सबको खुशबूसे भरता रहता है और हम इसे मौत देते हैं , यह कैसा इन्साफ है ?
9 - फैला लो अपनी पंख जितना फैलाना चाहते हो लेकिन इतनी बात जरुर अपनीं स्मृतिमें बनाए रखना कि जब वह घडी आएगी तेरे पंख स्वतः बंद होजायेंगे।
10 - मंदिरमें जो पहुँच रहे हैं उनमें सुखी कौन हैं और दुखी कौन हैं साफ़ साफ़ नज़र आता है लेकिन कोई ऐसा नज़र नहीं आता जो न सुखी हो न दुखी - सम भावमें हो ।
~~ ॐ ~~

Monday, October 7, 2013

ध्यान की आँखे

● ध्यान की आँखे ●
1- मनुष्य सोच कर और पशु सूंघ कर निर्णय लेते
हैं ।
2- स्थावरों में भोजन संचार नीचे से ऊपरकी ओर होता है ।
3- मनुष्यमें भोजन संचार ऊपरसे नीचे की ओर होता है ।
4- प्रकृति में जो सूचनाएं हैं वे सभी मनुष्य आश्रित हैं और मनुष्य प्रकृति आश्रित है। लेकिन मनुष्य इस बातको भूल रहा है ।
5- आप मुझे नीचा कर सकते हैं लेकिन कोई है जरुर जिसकी नज़र आप पर है , वह एक दिन आपको भी नीचे कर देगा ।
6- भाग लो तबतक जबतक श्वासे चल रही हैं , लेकिन इतनी बात अपनी सोच में रखना कि मिलेगा यहाँ वही जो प्रकृति देना चाहती है । हम दौड़ रहे हैं कुछ और पानें हेतु लेकिन इस लालच की दौड़ में कुछ हर पल खो भी रहे हैं जिसके प्रति हम बेहोशी में हैं। इतना तो सोचो ,जहांसे हम आये हैं ( प्रभु ) वहाँ किस चीज की कमी थी ? जब वहाँ सब है फिर यहाँ आयेही क्यों ? इस भिखारी संसार में । यहाँ बार - बार हमें हमारी भ्रमित चाह लाती रहती है , जिसे हम समझना नहीं चाहते और जिस दिन समझ गए , आनें - जानें से मुक्त हो जायेंगे ।
7- संसारमें पूर्णरूपसे डूबे ब्यक्तिकी आँखें सत्य को नहीं पकड़ पाती ।
8 - परम भोग ध्यानका प्रसाद है और इन्द्रिय भोग ध्यान की रुकावट ।
9- काम , कामना , क्रोध , लोभ और अहंकार में से किसी एक की समझ सबकी समझ होती है क्यों की ये तत्त्व राजस गुणके हैं ।
10- आलस्य , लोभ , अधिक निद्रा और मोह में से किसी एक की समझ सबकी समझ है क्योंकि ये तत्त्व तामस गुणके हैं ।
~~~ ॐ~~~

Monday, September 30, 2013

एक नज़र - 2

● एक नज़र - 2 ●
1- सब लोग शांतिकी खोज में हैं लेकिन शांति में कोई बसना नहीं चाहता क्योंकि शांति मौत के मार्ग को दिखाती है ।
2- परायेको अपना बनाते - बनाते अपनें पराये हो जाते हैं और भनक तक नहीं मिल पाती , है न मजे की बात ?
3- जो खुश हैं इस संसार में वे या तो ब्रह्म वित् हैं या पूरे मूढ़ , दूसरा खुश हो नहीं सकता ।
4- मन और मन नियंत्रित इन्द्रियोंसे प्यार हो नहीं सकता , प्यार तो उनको मिलता है जो प्रभुमें बसेरा करते हैं ।
5-पृथ्वी उन पर हसती है जो इसे अपना गुलाम रूप में देखते हैं , वह कहती है - देख अपनें गुलामके दिलको , तूँ जब भी पनाह के लिए परेशान होगा , कोई तेरे अपनें तुमको पनाह न देंगे तब तुम मेरे पास आना , ढाई गज जगह तेरेको तो मिलेगी ही ।
6- भिखारी हो या सम्राट सबको एक दिन इस मिटटी में मिल जाना है ।
7- क्यों इतनी तेज गतिसे सब भाग रहे हैं ? कुछ तो कारण होगा ही । सब लोग दुःख से दूर सुख में सर्वोपरि स्थान पर आखिरी श्वास भरना चाहते हैं लेकिन सच्चाई क्या है ?
8- जिसे हम अपना बनाते हैं वह पराया हो जाता है , क्या हममें कोई कमी है ?
9- जिस डाल को हम हिलाते हैं उस डाल से आम नही टपकता , टपकता कहीं और से है फिर हम
बार - बार क्यों डाल हिला रहे हैं ?
10- जिस पेड़पर फूल खिल रहे होते हैं उसके नीचे जमीन पर कल के खिले फूल आखिरी श्वास भर रहे होते हैं लेकिन अपनीं आगे की पीढ़ी की मुस्कान देख कर वे खुश रहते हैं ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, September 24, 2013

एक में अनेक

●● एकमें अनेक●●
1- दर्द की दवा है श्रद्धा , श्रद्धा भक्तकी उर्जा है , जिसका केंद्र है भगवान जहाँ दर्द आनंदका ही एक रूप होता है
2- है न कमाल ! उसे सभीं खोज रहे हैं , और वह सबको देख रहा है
3- वह जिसके रूप, रंग , गंध , स्पर्शका कोई इल्म नहीं उसे हम खोज रहे हैं
4- देखते हैं और रोज देखते हैं कि डूबता सूरज वही है जिसे उगते समय हम जल चढ़ाये थे लेकिन यह भूल जाते हैं कि जन्म जिस तख्ती पर लिखा है उसी पर दूसरी तरफ मौत भी लिखा है
5- मौतका भय उसके लिए है जिसके ह्रदयमें प्रभुके लिए कोई जगह नहीं
6- कुछ भी कर लो , कुछ भी बन जाओ लेकिन तबतक चैन न मिलेगा जबतक भक्ति की हवा नहीं लगती
7- कुछ दिन और , फिर देखना जैसे जंगलमें बीमार पशुका अंत होता है वैसा अंत निर्धन ब्यक्तियोंका राज पथों पर होगा
8- पहले सर दर्द - बदन दर्द होता था जिसके इलाजके लिए वक़्त मिल जाता था लेकिन अब तो हृदयदर्दके मरीज ज्यादा हो रहे हैं जहां इलाजके लिए वक़्तही नहीं मिल पाता
9- मुट्ठी भर लोग हैं जो अपनीं चादर से पृथ्वी को ढक रखा है , उनके ही मंदिर हैं , उनके ही ऋषि लोग हैं , उनके ही अदालते हैं और उनके ही राजा हैं लेकिन इस संसारमें प्रजाकी उंगली पाकड़ने वाला कोई नहीं है , अगर कोई होगा तो वह परमेश्वर ही होगा
10- शांति सभीं चाहते हैं पर शांत कोई नही रहता ~~~~ ॐ ~~~~

Tuesday, September 17, 2013

सिद्धोकी बस्ती - 1

¢ सिद्धो की बस्ती - ¢ 
" In the oriental conception , there is something that exists beyond the ordinary perception of things which is beyond the minds' reasoning . " 
~~ Einstein ~~ 
°° जो राग-द्वेषसे सम्मोहित हैं , उनके लिए एक संदेह भरी कल्पना है । 
°° जो तत्त्व योगीका बसेरा है । 
°° जो खोजिओं का लक्ष्य है ।
 ● उस सिद्ध लोगोंकी बस्तीकी एक झांकी आपको यहाँ दिखानेंका असफल प्रयास किया जा रहा है , आइये ! ध्यान -मार्गसे चलते हैं उस बस्तीकी ओर :----
 सन्दर्भ : भागवत : 9.12 , 9.22 , 11.15
 <> श्री रामके पुत्र कुशसे आगे 19वें बंसज मरू एवं कौरव -पाण्डव बंशमें शंतनुके बड़े भाई देवापि सिद्ध हैं ,दोनों आज कलाप गाँवमें रह रहे हैं । कहाँ हो सकता है यह कलाप गाँव ? ऐसी सिद्धों की तीन बस्तियाँ हैं जो आज भी रहस्य दर्शियों और खोजिओंके लिए रहस्य हैं - काशी , कूफा और कलाप ।
 ** कलियुगके अंतमें सूर्य -चन्द्र बंशी क्षत्रियोंका बंश जब समाप्त हो जायेगा तब ये दोनों - मरू एवं देवापि क्रमशः सूर्य बंश एवं चन्द्र बंशकी पुनः स्थापना करेंगे ,यह बात भागवतमें है । 
● क्या हैं यह सिद्धियाँ ? 
<> प्रभु श्री कृष्ण अपनी स्वधाम यात्राके समय अपनें मित्र उद्धवको उपदेश देते समय 18 प्रकार की सिद्धियोंको ब्यक्त कियाहै। सिद्धि साधनासे प्राप्त वह आयाम है जहाँ साधक अपनीं इन्द्रियोंसे वह करनें में सक्षम होता है जो एक सामान्य ब्यक्ति के लिए अचम्भा है । 
^^ कौन है सिद्ध ? 
सिद्धि प्राप्त योगी अभेद्य दीवारों , चट्टानों आदि से गुजर सकता
 है , अपनेंको मनकी गति से चला सकता है , अपनीं कल्पना करनें मात्र से बस्तुओंको प्राप्त कर सकता है , स्व इच्छासे अपनें रूप -रंगको बदल सकता है , दृश और अदृश्य दोनों मेंरह सकता है , भोजन ,वायु और पानी बिना रह सकता है और त्रिकाल दर्शी होता है । 
^^ सिद्धि क्या है ? 
 साधनाके पूर्ण होनें पर सिद्धिका आयाम मिलता है । सिद्धि प्राप्तिके बाद जो लोग सिद्धि का प्रयोग ब्यापार की तरह करनें लगते हैं और पुनः नियमित ध्यानको त्याग देते हैं ,वे धीरे -धीरे अपनीं विशुद्ध उर्जा खोनें लगते हैं और पुनः भोग में उतर आते हैं । सिद्धि प्राप्तिके बाद जो सिद्धिका प्रयोग नहीं करते और ध्यानका त्याग भी नहीं करते उनको परम गति मिलती है और वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं । 
<> सिद्ध पुरुष जो परमात्मामें अपना बसेरा बना रखा होता है उसे भोगी नहीं देख सकता। 
● भागवतमें ब्यक्त कलाप गाँव ठीक अल्कूफा गाँव जैसा है जो सिद्ध सूफी संतोंकी बस्ती है और जिसको फ़्रांसिसी खोजी पिछले पांच सौ सालसे खोज रहे हैं । अल कूफा गाँव इरान -ईराक के रेगिस्तान या सऊदी अरबके रेगिस्तानमें कहीं है लेकिन अभीं तक कोई ब्यक्ति ठीक तरहसे इस अदृश्य गाँवको पकड़ नहीं पाया है पर इसके होनें के कई प्रमाण मिल चुके हैं । 
<> बुद्ध मान्यतामें ऐसे सिद्धों को अरहन्त और जैन परम्परामें जिन कहते हैं । जो ध्यानकी उस परम गहराई को छूता है जहाँ से परम पदकी सीमा प्रारम्भ होती है , वह सिद्ध होता है । सिद्ध चाहे तो परम धाम जा सकता है और चाहे तो ध्यानियोंको मार्ग दिखानेंके लिए मृत्यु लोकमें रह सकता है । सिद्ध साकार और निराकार दोनों आकारोंमें भ्रमण करते हैं । 
<> ध्यानका पुजारी जो निर्विकार स्थिति में अपनें भ्रमण कालमें जब सिद्ध क्षेत्रसे गुजरता है तब वह क्षेत्र उसे खीचनें लगता है और उस क्षेत्रसे बाहर वह नहीं होना चाहता। 
 ● जहाँ जाने - अनजानें में पहुचनें पर बाहर की निर्विकार उर्जा नाभि मार्गसे देहमें भरनें लगे और देह रोमांचित हो उठे और ऐसा लगनें लगे कि हमें वह मिल गया है जिसकी हमें तलाश थी , तो वह क्षेत्र सिद्धों का क्षेत्र होता है ।वह जो वहाकं की ऊर्जा की तीब्रता को सहनें नें सक्षम हो कर वहाँ रुक जाता है ,वह उसे पा लेता है जिसके लिए वह कई जन्मों से भाग रहा है । 
● सिद्ध समयातीत होते हैं । सिद्ध भोगीको पहचानते हैं पर भोगी सिद्धको नहीं पहचानता। 
<> इजिप्तमें पिरामिडकी ख़ोज करनें वाले लोगों में कितनें ऐसे हैं जो सत्यको देखते ही आम लोगोंके लिए पागल सा दिखनें लगे क्योंकि वे जो देखे , उसे न औरोंको दिखा सके और न उसे ब्यक्त कर पाए अतः लोग उन्हें पागल की संज्ञा दे दिए । पिरामिडोंके अन्दर जानें पर ऐसे लोग , वैज्ञानिक थे लेकिन अन्दर जानेंके बाद उनकी उर्जा बदल गयी ,वे सत्य को देखनें में सफल हुए पर बाहर आ कर अपनें अनुभूति को ब्यक्त न कर पाए और उनके अपनें ही साथी पागल कहनें लगे। आज तक इस बात पर कोई अनुसंधान नहीं हुआ की आखिर ऐसे लोग क्यों अपनी स्मृति खो दी ? 
* अल्कूफाकी खोज करनें वालों में भी बहुतसे लोग पागल हो चुके हैं , आम लोगोंकी दृष्टिमें लेकिन वे पागल नहीं हैं , उनका मार्ग भर बदल गया है , वे सत्य को समझ गए हैं पर सत्य को ब्यक्त नहीं कर पाए । 
** सत्य भोग केन्द्रितके लिए एक भ्रम है और योगीके लिए भोग एक सहज मार्ग है जो सत्यमे पंहुचा सकता है । 
** भोग की सीमा जहां समाप्त होती है वहांसे ध्यान प्रारम्भ होता
 है । 
** ध्यानमें आँखे बंद होती हैं पर मार्ग स्पष्ट दीखता रहता है । 
** ध्यानके पीठ पीछे भोगका आयाम होता है और भोगकी ग्रेविटी बहुत शक्तिशाली है । 
** ध्यान वह चिराग है जो वह रोशनी देता है जिससे अब्यक्त ब्यक्त हो उठता है । 
** सिद्ध बस्तीमें ऐसा ब्यक्ति जो भोगके आखिरी सीमा पर खड़ा होता है , वहाँ का ऊर्जा क्षेत्र उसके अन्दर की ऊर्जा को रूपांतरित कर देता है और वे अपनें राग -द्वेष एवं अहंकारसे बनी स्मृति को खो कर अपनें मूल स्मृति में पहुँच जाते हैं । 
** ऐसे ब्यक्ति भोग संसार के लिए पागल होते हैं और साधनाके लिए सिद्ध योगी होते हैं। 
 ~~~ ॐ ~~~

Sunday, September 15, 2013

स्व चिंतन - 01

● स्वचिंतन ●
1- स्व दर्पण पर अपनें मूल चेहरे को देखो लेकिन इस दर्पण को साफ़ तो करना ही होगा जो ध्यानसे संभव है ।
2- अपनीं आँखोंसे मोहका चस्मा उतारो और निर्मोह आँखोंसे जो दिखे उस पर सोचो नहीं , उसे अपनें हृदय में पहुँचाओ , तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह तुम्हारे हृदय में पहले से है ।
3- जब सबमें तुम और तुममें सब दिखनें लगें तब आँखें स्वयं बंद हो जाती हैं ।
4- जो कल आपके साथ थे , उनमेंसे कुछ आज आपके साथ न होंगे , जो आज आपके साथ हैं उनमें से कुछ कल न होंगे और यह चक्र चलता ही रहेगा । आप कल भी चुक गए थे , देखना आज भी न चूक जाना , बार - बार चुकनें से जीवन सत्य से दूर होता जाता है । जो आप को आज मिला है , वह आपको कुछ दे रहा है लेकिन आप तो अपनीं मुट्ठी बंद किये और आँखें बंद किये उनकी ओर पीठ किये बैठे हो फिर इस स्थितिमें आपको क्या मिलेगा ? क्या बार - बार चुकते रहनें के लिए प्रभु आप को भेजा है ? जीवन भाग रहा है आगे की ओर और आप सरक रहे हैं पीछे की ओर फिर ऐसे में आपको एक बेहोशी भरी मौत के अलावा और क्या मिलेगा ? प्रभु आप से पूछेगा कि तुमको इतनें मौके मिले लेकिन तुम गवाते रहे , आखिर तुम मनुष्य योनि में रहते हुए पशु - जीवन गुजारा अतः अब तुमको वही मिल रहा है जो तुमको भाता रहा है , जाओ और अगला जीवन काम - भोजनकी तलाश में गुजार कर जब तृप्त हो जाना तब पुनः मेरे पास आना ।
5- जिनके कारण तुम सम्राट बन कर चल रहे हो , उनको धन्यबाद देना भी नहीं चाहते ? ज़रा अकेलेमें सोचना कि प्रभुके सामनें जब तुम और ओ आमानें सामनें होगे तब तुम्हारी स्थिति क्या होगी ?
6- अभी भी वक़्त है , अभी तुम इतनी ऊचाई पर नहीं पहुँचे जहाँ से नीचे गिरनें से तुम्हारा अस्तित्व खतरेमें पड़ जाय , जाओ और उनका नमन करो जिनके प्रसादसे तुम यहाँ तक का सफ़र किये हो ।
~~~~ ॐ ~~~~

Monday, September 9, 2013

यह शरीर किसकी संपत्ति है ?

● यह शरीर किसकी संपत्ति है ? ● 
1- क्या उसकी जो इसका भरण -पोषण करता है ? 
 2- क्या उसकी जो अपना बीज देकर इसे पैदा किया है ?
 3- क्या उसकी जो इसे 09 माह अपनें गर्भमें रखी ? 
 4- क्या पत्नी/पतिकी जो इसका भोग करती/ करता है ?
 5- क्या नाना / नानीकी जो इसकी मूल हैं ? 
6- क्या उस अग्निकी जो इसे अंत में राख बना देती है ? 
 7- क्या उस धरतीकी जो इसके अस्तित्वको अपनें में मिला लेती है ? 
8- क्या उस प्रकृतिकी जिसमें यह रहता है ?
 9- क्या उस पशुकी जो इस आस में बैठा है कि कब मौका मिले और मैं उसे अपना भोजन बनाऊँ ? 
 10- क्या उस बंसजकी जो इससे हुआ है ?
 <> जी नहीं ---- 
°° यह शरीर माया निर्मित एक संकेत है जो उसे दिखानेंकी कोशिशमें अस्तित्वको खो देता है , जो इसमें रहता है ।
 °° यह शरीर एक माध्यम है , उस अब्यक्त अप्रमेय सनातन को समझननेंका जिससे यह है । 
°° यह एक ब्रिज है जो भोग -योगको सम्हालता है ।
 °° यह भक्त है उसका जो इसमें रहता है और जब वह निकलता है इसके बाहर, तब यह अपना अस्तित्त्व खो देता है ।
 ~~~ ॐ ~~~

Sunday, September 8, 2013

फिर वही

●● फिर वही ●●
1- भोग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण होता है और योग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण नहीं होता ।
2-भोगकी यात्रा सुनितोजित यात्रा होती है और योगकी यात्रा एक घटना है जो कभीं भी किसीके साथ घट सकती है ।
3- विधि - विधान और तर्क आधारित यात्रा करनें वाले चूक जाते हैं और प्रकृति पर जो आश्रित हो कर सहज जीवन जीते हैं वे पहुँच जाते हैं ।
4- सुबहसे देर रात तक ब्यस्त जीवनसे आज आप को जो मिला क्या उससे आप संतुष्ट हैं ? यदि नहीं तो क्यों ? अपनीं असफलताके लिए अपनें परिवारके किसी कमजोर इकाईको बलिका बकरा न बना कर , आप स्वयं में झाँक कर देखें कि चूक कहाँ हुयी ।
5- जो आप प्राप्त करना चाहते हैं क्या वह आप को तृप्त कर देगा और यदि आप तृप्त हो भी जाते हैं तो कितनें समय के लिए ? तृप्तता क्षणिक क्यों होती है , कभीं क्या इस बिषय पर आप सोचते हैं ?
6- गुण प्रभावित मन - बुद्धिसे जो प्राप्त होता है उसकी तृप्तता क्षणिक ही होती है और जिस घडी बिना कामना - मोह या अहंकार से जो होता है उसका फल चाहे जो हो पर वह आप को पूर्ण तृप्त कर देगा । 7- ज्यादा नहीं केवल दो को जो अपनें जीवन में समझ लिया , वह योगी हो गया , वे दो तत्त्व हैं कामना और अहंकार ।
8- कामना - अहंकार की गांठें मृत्युके बाद भी वैसी बनी रहती हैं ।
9- मोह और भय का आपसी गहरा प्यार है , दोनों साथ - साथ रहते हैं ।
10- मोहका अहंकार मीठा जहर है और कामना का अहंकार दूर से दिखता है ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, September 3, 2013

कुछ

●● कुछ ●●
1- इस देहको धोते रहनें केलिए इसे ढ़ोते रहो जबतक यह स्वतः निर्विकारमें न मिल जाए ।
2- आपसे जो कुछ भी हो रहा है उसे प्रभुका
आदेश - पालन समझ कर करते रहो , उसका करना ही प्रभु की पूजा है ।
3- न किसीसे प्रभावित होओ न किसीको प्रभावित करो ।
4- स्वयंमें उस रोशनीको तलाशते रहो जो अन्धकारमें भी आप जो राह दिखाती है ।
5- जबतक प्रभुकी खोज भोग आधारित होगी प्रभु आपको अब्यक्त ही रहेगा ।
6- पहले इस बातको सोचो कि आप प्रभुसे क्यों जुड़ रहे हो ? प्रभु इस बातको समझता है और वह दिखाई नहीं देता ।
7- संसार धोखा देने - लेने की मंडी बन गया है लेकिन प्रभुको क्यों धोखा दे रहे हो ?
8- अपनेंको कुछ भी बना लो लेकिन उसके सामनें तो सर स्वतः झुक जाता है ।
9- आज जो हैं कल वे न होंगे और जो कल होंगे वे परसों लुप्त हो जायेंगे चाहे वे नदी हों , पहाड़ हों या और कुछ हों लेकिन प्रभु कालसे अप्रभावित वैसा ही रहेगा ।
10- जितना बाहर देखते हो उसका 1/10 भाग भी अगर अपनें अन्दर देखनें का अभ्यास करो तो वह दिखनें लगेगा ।
~~~~ ॐ ~~~~

Thursday, August 29, 2013

कभी कभी

●● कभीं कभीं ●●
1- संसारमें स्वकी और स्वमें प्रभु की खोज जीवनका केंद्र होना चाहिए ।
2 - संसारमें जिसे देखो चाहे वह गृहस्थ हो या
योगी , सबका रुख एक तरफ है , है न कमालका बिषय ; सभीं हर पल एक ही ओर देख रहे हैं और वह आजका परम है भोग ।
3 -प्रभु तो कोरे कागज़ जैसा जीवन दिया था , उसको रंगीन बनाते - बनाते हमनें उसे क्या बना दिया ?
4 - जीवन भर हम दूसरोंमें उसकी अच्छाई को भी बुराईकी शक्लमें देखते रहते और अपना खून जलाते रहे ,एक बार , केवल एक बार अकेलेमें ही सही , अपनें अन्दर हमें खोजना चाहिए की क्या हमारे अन्दर कोई खोट नहीं ।
5 -कितना ताज्जुब दिखता है की एक नोबेल पुरष्कार विजेताकी आलोचना 50 % अंक प्राप्त करता बड़े प्यारसे करता है , उसे पता नहीं कि वह क्या कर रहा है , बिचारा ....।
6 - नकली फूलको लोग इतनें प्यारसे अपनें ख़ास कमरेमें रखते हैं कि उनको शायद स्वप्नमें भी असली फूल की स्मृति नही आती होगी , लेकिन नकली असली कैसे बन सकता है ?
7 - इस समय लोग अन्दरसे सिकुड़ते जा रहे हैं , उन्हें भय है , कहीं मेरी असलियत लोगोंके सामनें न आ जाए और बाहर से फैलते जा रहे हैं जैसा दिखना चाहते हैं जिससे कोई उनके अन्दर न झाँक सके ।
8 - दूसरेकी रोशनीमें कबतक चलोगे , एक दिन वह अपनीं रोशनी वापिस खीच लेगा फिर क्या करोगे ?
9 - क्यों ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हो कि आगे चलना तो कठिन हो रहा है लेकिन पीछे लौटना भी संभव न हो सके ।
10 - प्यार जीने का सहज परम माध्य सबको एक सार मिला हुआ है लेकिन हम उसका भी ब्यापार करनें लगे और वह प्यार ब्यापार की वस्तु बनकर भी घट नहीं रहा ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, August 24, 2013

आस्था

आस्था
● आस्था जब टूटती है तब वह ब्यक्ति भी टूट जाता है लेकिन यह स्थिति मनुष्यको रूपांतरित कर सकती है ।
● कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय और अहंकार रहित टपकती आंसूकी बुँदे मनुष्यको परममें डुबो कर रखती है जिसे कोई हिला नहीं सकता ।
● जो हम कहते हैं , यदि वैसे करें भी तो अपनें को तृप्त रख सकते हैं ।
● जैसा हम करते हैं , यदि वैसा ही बन जाएँ तो हमारी सभीं समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
● अपनें और पराये का भाव यदि समाप्त हो जाए तो सिद्धि मिलनी कठिन नहीं ।
● कामना और अहंकार चलाते नहीं , घुमाते रहेते हैं । ● भोगसे भगवान की यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं , लेकिन मनुष्यके कई जन्म लगजाते हैं ।
● श्वास ध्यानमें जब नासिका से बाहर निकलती श्वास पूर्ण रूपसे दिखनें लगे तो वह ध्यान पूर्णता की ओर जा रहा होता है ।
°°° ॐ °°°

Tuesday, August 20, 2013

क्या करोगे सोचके

क्या करोगे सोचके ? देखना जरा अपनें जीवन की किताबके कुछ पन्नोंको जिनको आप कभीं नहीं
देखा :----
1- जीवनकी कुछ एक ऐसी घटनाएँ होती हैं जिनको जितना सोचोगे वे उतनी और जटिल हो जाती जाती
हैं ।
2- मन स्तर पर आप कुछ भी बन जाएँ लेकिन आपका मूल स्वभाव ठीक समय पर आपको अपनें प्रतिकूल न जाने देगा ।
3- कुछ ऐसे होते हैं जिनकी जगह आपके जीवनमें न के बराबर रही होती है लेकिन समय आनें पर वे आपके बहुत करीब आजाते हैं , आपकी मदद करते हैं और अपनें , दूर खड़े हो कर आपकी बजबूरीको और नंगा देखनेंके अवसरका इन्तजार करते होते हैं ।
4- जीवनमें जिनको हम पकड़ने केलिए , हम अपनी पूरी ऊर्जा लगा रखी थी , उनसे दूरी बढती गयी , ऐसे अनुभव रह - रह कर आपको चुभते रहते हैं । 5- क्या खोजा और क्या पाया ।
6- जो हम अपनें जीवनमें न कर सके , उसे अपनें पुत्रसे करवाना चाहते हैं और वहाँ भी हमें मायूसी ही मिलती है क्योंकि यहाँ जो आता है उसके पास उसका अपना संचित धन होता है और वह उसी केंद्र पर घूमता है ।
7- घरकी ऊब बाहर भगाती है और बाहर लोगोंका ब्यवहार पुनः घरमें कैद कर देता है । 8- दूसरों जैसे बनते - बनते हम स्वयंको भूल जाते है और हाँथ कुछ नहीं लगता ।
°°° ॐ °°°

Sunday, August 4, 2013

दो पल ही सही जरा सोचना


  • कौन छोट है , कौन बड़ा है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • कौन सुन्दर है , कौन कुरूप है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • कौन अपना है , कौन पराया है  , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • अनुभवहीन ब्यक्तिकि ज्ञान की बातें रस रहित होती हैं , क्यों ?
  • कहते हैं नानक दुखिया सब संसार , लेकिन मौत के नाम पर सभीं सिकुड़ते हैं , क्यों ?
  • हम अपनें दुःख का कारण और को क्यों बनाते हैं ?
  • सभीं परेशान है स्वयं से नहीं औरों से , क्यों ?
  • आज नहीं तो कल ही सही कुछ पानें कि उम्मीद हमें एक दूसरे से जोड़ कर रखती है , क्यों ?
  • कामना टूटते ही क्रोध क्यों उठता है ?
  • कामना का अंत क्यों नहीं है ?
  • दुःख में सभीं सिकुड़ते हैं और सुख में फैलते ते हैं , क्यों ?

===== ओम्  =====



Monday, July 22, 2013

सोच

सोच सोच मनुष्यके जीवनका आधार है ।
सोचसे हम स्वयंको क्षणभरके लिए राजा समझ बैठते हैं और क्षणभरमें अपनेंको रंक समझनें लगते
हैं ,सोचसे कोई बचा नहीं है ।
सोचमें सभीं तैरते हैं लेकिन कोई इसमें दूबनेंकी कोशिश नहीं करता और बिना डूबे मोती पाना संभव नहीं ।
अगर आप मोतीके खोजी हैं तो सोचमें तैरनें की आदतको छोडो और सोच में दूबनेंका अभ्यास करो । सोचमें एक बार दूबनेंका रस मिल जाए तो वह ब्यक्ति सोचसे बाहर आनें पर एक दम भिन्न होगया होता है और समझ जाता है कि सच्चाई कहाँ पर है ।
सोच मनकी उपज है और मन तीन गुणोंकी उर्जासे संचालित है ।
मन कहीं रुकनें नहीं देता और न चैनसे सोच रहित होनें देता ।
मनका काम है भगाए रहना और हम बिना सोचे समझे रात और दिन भाग रहे हैं ।
भोगी आदमी की सोच दो जगह खोजती है ; एक धनके भण्डारको और दूसरीस्त्री प्रसंगको।
योगी सोचसे सोचके परे निकल कर सोचको धन्यबाद देता है और कहता है , सोच तेरा धन्यबाद , यदि तूँ न होती तो हमें ब्रह्म में कौन पहुँचाता ।
योगी सोचसे परे पूर्ण स्थिर प्रज्ञताकी अलमस्तीमें मस्त रहता है और भोगी सोच में उलझा एक नहीं अनेक तत्त्वों जैसे कमाना, क्रोध ,लोभ ,मोह,अहंकार और भय में उलझा हुआ स्वयंसे धीरे -धीरे दूर होता चला जाता है ।
भोगी मरना नहीं चाहता और योगी अपनी मौतका द्रष्टा होता है ।
भोगी मौतसे बचनेंके सारे बंदोबस्त कर रहा है और योगी मौतको एक भौतिक परिवर्तन का अवसर समझता है।
योगी मौत की तैयारी करता है और भोगी मौत की तरफ पीठ करके बेचैनी में रहता है ।
भोगी के माथे का पसीना कभीं नहीं सूखता और योगीके माथे पर कभीं पसीना नहीं आता ।
~~ ॐ ~~