★ऋषि अष्टावक्र से सम्बंधित एक कथा ⬇️
अगले अंक में अष्टावक्र गीता -पात्र परिचय में कुछ और बातें , आप के लिए दी जाएंगी ।// ॐ //
★ऋषि अष्टावक्र से सम्बंधित एक कथा ⬇️
अगले अंक में अष्टावक्र गीता -पात्र परिचय में कुछ और बातें , आप के लिए दी जाएंगी ।// ॐ //
अष्टावक्र गीता प्रारम्भ करने से पहले इसके पात्रों से परिचय होना आवश्यक है अतः राजा जनक , मित्र -वरुण के बाद आज हम ऋषी अष्टावक्र से मिल रहे हैं।
अष्टावक्र का संक्षिप्त परिचय दो भागों में देखी जा सकती है । आज पहले भागको देख रहे हैं 👇
अष्टावक्र गीता प्रारम्भ करने से पहले हम अष्टावक्र गीता के पात्रों से परिचय कर रहे हैं जिससे आगे चल कर कोई संदेह न हो सके । पहले विदेह राजा जनक से परिचय हुआ और अब जल के देवता मित्र वरुण से मिलते हैं ⬇️
// ॐ //अष्टावक्र वक्र गीता भाग - 2 के अंतर्गत पहले पात्रों से परिचय करते हैं । आज राजा जनक के सम्बन्ध में कुछ बातें श्रीमद्भागवत पुराण के आधार पर देखते हैं ।
आज से अष्टावक्र गीता प्रारम्भ हो रहा है । परिचय के रूप में आप के लिए यह स्लाइड दी गयी है ।
अगले अंकों में अष्टावक्र गीता की आगे की यात्रा पर होंगे ।। ॐ ।।
समय भाग्य रेखा के संग - संग चलता है । जीवन के संगीत को यदि सुनना हो तो जिंदगी की यात्रा में जब भी कोई ठोकर लगे तो घबड़ाना नहीं , वही रुक जाना और अपनी गलतियों के सम्बन्ध में सोचने के लिए हिम्मत जुटाना वैसे यह है , बहुत कठिन पर इसके अलावा और उपाय भी तो नहीं । कौन देख रहा है , आपको ? किससे डर रहे हैं , आप ? यदि अपनी गलतियों को आप स्वयं नहीं देख सकते तो और कौन देखेगा ?
समय गुरुओं का भी गुरु है , पर्त दर पर्त गलतियों को दिखाता रहता है लेकिन एक हम हैं जो आँख खोलना ही नहीं चाहते , ऐसी परिस्थिति में हम अपने जीवन यात्रा में बार -बार ठोकरे खाते रहते हैं और चलते रहते हैं ।
इस यात्रामें जीवन का सूरज कब , कहाँ और कैसे डूब जाता है , आहट भी नहीं मिल पाती ।
जीवन यात्रा में कितनी यात्रा हुयी , कितनी बाकी है , इस मुद्दे पर कभीं न सोचना लेकिन इस बात पर हर पल सोचते रहना कि यात्रा होश पूर्ण कर रहे हो या बेहोशी में कर रहे हो !
पिछले अंक में सांख्य कारिका - 3 के आधार पर 25 तत्त्वों को दिखता गया और अब तन्मात्र , महाभूत , 05 ज्ञान इंद्रियों एवं 05 कर्म इंद्रियों के सम्बन्ध को देखते हैं 👇
यहाँ यह दिखाया जा रहा है कि जड़ प्रकृति के ऊपर जब चेतन पुरुष का प्रकाश पड़ता है तब वह सक्रिय हो उठती है और उसके विकृत होनें से पहले सर्ग महत् ( बृद्धि ) की उत्पत्ति कैसे होती है ? और यहाँ से कारण - कार्य सांख्य सिद्धान्त का श्रीगणेश कैसे होता है ?
सृष्टि विकास की पूरी गणित सांख्य दर्शन देता है जिस सिद्धान्त को वैज्ञानिक ढूढ रहे हैं ।
आइये ! हम सब अब सावधानी के साथ उतरते हैं , इस गणित में 👇
ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य कारिकाओं की श्रंखला में आज हम तीसरी कारिका के भाग - 1 को देख रहे हैं।
तीन गुणों के साम्यावस्था का माध्यम , मूल प्रकृति है । इस अवस्था में यह निष्क्रिय होती है लेकिन इसे ज्योंकी पुरुष का प्रकाश मिलता है , यह सक्रिय हो उठती है और संर्गों की उत्पत्ति होती है । संर्गों से विसर्गों की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा रचित है ।
देखिये निम्न स्लाइड को 👇
आज हम सांख्य कारिका - 2 को देख रहे हैं ।यहाँ तीन प्रकार के दुःखों को निर्मूल करने का उपाय बताया जा रहा है । दुःखों को दूर करने और निर्मूल करने को ठीक से समझना चाहिए । दुःखों को दूर करने के बाद भी दुःख लौट आते हैं क्योंकि उनके बीज हमारे अंदर रहते हैं। निर्मूल में दुःखों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं अतः दुःखों की पुनरावृत्ति नहीं हो पाती । सांख्य दर्शन तीन प्रकार के दुःखों को निर्मूल करने का उपाय तत्त्व - ज्ञान बोध को बता रहा है , देखिये यहाँ👇
पिछले अंक में ईश्वर कृष्ण रचित सांख्य कारिका : 1भाग - 1 में कारिका के भाव को समझा गया और अब भाग - 2 के अंतर्गत 03 प्रकार के दुःखों को समझते हैं ।
भारतीय दर्शन दुःख निवृत्ति और आवागमन से मुक्ति पाने के आधार पर विकसित हुए हैं ।
सांख्य - पतंजलि बहुत सुंदर योग की गणित देते हैं । यदि आप कौन सुनता है के साथ बने रहे तो आप ....
विषय से वैराग्य , वैराग्य में क्रमशः सम्प्रज्ञात समाधि , असम्प्रज्ञात समाधि , लिङ्ग लय , प्रकृति लय , कैवल्य और अंततः मोक्ष तक की मानसिक यात्रा को ठीक - ठीक समझ सकते हैं ।
चलिये , लौटते हैं 03 प्रकार के दुःखों पर 👇
कपिल मुनिके सांख्य दर्शन में ईश्वर कृष्ण द्वारा लिखी गयी 72 सांख्य कारिकाओं से हम मिल रहे हैं ।
इस यात्राके आज पहले दिन पहली कारिका से मिल रहे हैं । इस कारिका को दो भागों में दिया जा रहा है , आशा है , आप हमारे साथ बने रहेंगे ।
भारतीय दर्शन दुःख केंद्रित हैं और सांख्य दुःखों से मुक्त होने की दवा रूप में तत्त्व ज्ञान देता है ।
प्रस्तुत है , कारिका - 01 भाग - 1 👇
कपिक सांख्य दर्शन परिचय का यह आखिरी अंक है। अगले अंक से ईश्वर कृष्ण रचित 72 कारिकाओं को हिंदी भाषान्तर के साथ प्रस्तुत किया जायेगा।
यह अंक पिछले अंको का सार मात्र है जिससे सांख्य दर्शन की कारिकाओं को समझने में कठिनाई न हो।
कपिल का प्रकृति - पुरुष केंद्रित द्वैतयबाद वेदांत के अद्वैतयबाद से भिन्न है।सांख्य दर्शन गणित जैसा है ।
अभीं तक हम महामुनि के समय , जीवन और उनके आश्रम के सम्बन्ध में देखते रहे और अब अगली दो स्लाइड्स में चौथे एवं पांचवें भाग के अंतर्गत सांख्य कारिकाओं के सम्बन्ध में तथा सांख्य दर्शन के केंद्र विंदु को देखने जा रहे हैं जो निम्न प्रकार से हैं 👇
श्रीमद्भागवत पुराणके आधार पर कपिल मुनि और उनके आश्रम विन्दुसर के सम्बन्ध में यहाँ कुछ और सूचनाएँ दी जा रही हैं । नीचे दी गयी दोनों स्लाइड्स आपको कपिल मुनि से जोड़ने का काम कर सकती हैं । अगले अंकों में कुछ और बातों पर चर्चा होगी। आगे चल कर हम 72 सांख्य कारिकाओं पर भी चर्चा प्रारम्भ करेंगे।
आज से कपिल मुनि और उनके सांख्य दर्शन के सम्बन्ध में आपको लगभग प्रतिदिन कुछ न कुछ सूचनाएं मिलती रहेगी । हम हिन्दू हैं , हमारा धर्म सनातन धर्म है लेकिन हम अपनें इस सनातन धर्म के सम्बन्ध में जानते क्या है ? अकेले में परमात्मा को साक्षिणमां कर इस बिषय पर सोचना जरूर । केवल कहने मात्र से क्या होगा , जनाब कुछ अपनें को , कुछ अपनें सनातन धर्म को भी तो जानने की कोशिश कीजिए ! इस शृंखला के अंतर्गत पहले हम अपने प्राचीनतम दर्शन -सांख्य दर्शन में झांकने की कोशिश में
महा मुनि कपिल जी को समझते हैं जो सांख्य के आदि गुरु हैं।
सांख्य दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीत में प्रकृति - पुरुष सम्बंधित कारिकाओं और श्लोकों से परिचय करें।
यहाँ गीता वेदांत आधारित है और कारिकाएँ कपिल मुनि के सांख्य दर्शन से हैं ।
वेदांत ईश्वर केंद्रित है और सांख्य में ईश्वर शब्द नहीं है।
अद्वैत्य और द्वैत्य में प्रकृति - पुरुष रहस्य से परिचित होइए । मदद के लिए निम्न स्लाइड को देखें 👇
महर्षि यहाँ पूरक , रेचक और कुम्भक से परे की स्थिति को चौथे प्रकार का प्राणायाम कह रहे हैं । आखिर यह प्राणायाम है , क्या ?
चौथे प्रकार के प्राणायाम के सम्बन्ध में गीता : 4.29 - 4.30 श्लोकों को भी साथ - साथ समझें ।
प्राणायाम पतंजलि योगसूत्र में अष्टांगयोग का चौथा अंग है । आज से प्राणायाम की चर्चा प्रारम्भ हो रही है।
पतंजलि योग में प्राणायाम का अपना महत्त्व है । प्राणायाम श्वास के प्रति होश बनाने का प्रयोगात्मक विज्ञान है ।
आज इस अंक में हम श्वास सम्बंधित कुछ बुनियादी बातों को देखते हैं 👇
महर्षि पतंजलि अपनें योगसूत्र के साधन पाद के सूत्र : 46 - 48 में आसन के संबंधनमें निम्न बातें बताते हैं 👇
1- योग में देह को जिस स्थिति में स्थिर सुख मिले , उसे आसन कहते हैं ।
2 - आसन - सिद्धि मिलनें पर सहज यत्न से चित्त परम् पर स्थिर हो जाता है और वह योगी निर्द्वन्द्व हो जाता है ।
👉इन बातों के सम्बन्ध में देखिये निम्न स्लाइड को 👇
● सच्चाई से नहीं डरता , लेकिन सच्चाई न समझनेवालों से डरता हूँ ।
● प्रभु से सभीं माफ़ी माँगते हैं लेकिन स्वयं माफ़ नहीं करना चाहते !
● हाँथ की लकीरों में लिखा है जबतक जहाँ रहना , तबतक वहाँ रहना ही पड़ता है ।
● जिंदगी सबकुछ सिखा और समझ देती है लेकिन सिखता - समझता कौन है !
// ॐ //
योग क्या है ? श्रंखला में यह 25 वां अंक है जिसमें पतंजलि योग दर्शन आधारित अष्टांगयोग के प्रथम दी अंग - यम - और नियम साधना के अन्यर्गत व्रत - महाव्रत को यहाँ निम्न स्लाइड के माध्यम से समझते हैं।
देखते हैं ज्ञान -ज्ञानी के सम्बन्ध में गीता के कुछ सांख्ययोग जैसे सूत्रव के सार को जिसमें प्रकृति - पुरुष बोध को ज्ञान बताया गया है ।