Sunday, May 29, 2011

क्या भय भगवान की बुनियाँद है?


फ्रेडरिक नित्झे कहते हैं------

भगवान उन लोगों की खोज है जो -----

कमजोर हैं … ..

जो भयभीत हैं … ..

जो समस्यायों का सामना नहीं कर सकते /


बीसवीं शताब्दी के महान मनोवैज्ञानिक सी जी जुंग कहते हैं -------

मध्य उम्र के लोगों में ऐसे आदमी को खोजना कठिन कई जिसके मष्तिस्क में प्रभु की सोच की

ग्रंथि न होती हो /


अब आप सोचिये की आप किस श्रेणी के ब्यक्ति हैं?

क्या महाबीर , बुद्ध , रामकृष्ण परम हंस , चैतन्य महा प्रभु , आदि शंकाराचार्य जैसे लोग

भयभीत मानसिकता के थे ? महाबीर और बुद्ध के सामनें कौन सी मजबूरियाँ थी कि वे लोग

सत्य की खोज में महल त्याग दिए और भागते रहे जंगलों में ?

प्रोफ . आइन्स्टाइन एक बार नहीं लाखों बार प्रभु को याद किया है और जब उनके दिमाक मे यह बात आयी … .....

God does not play dice .

तब से अंत तक वे उस नियम की तलाश में गुजार दिया जिस नियम से प्रभु इस ब्रह्माण्ड की रचना

किये हैं / वह कौन सा नियम है जो प्रकृति को बनाए हुए है ? - यह खोज थी आइन्स्टाइन की लेकिन

पूरी न हो सकी /

राम , कृष्ण , क्राइस्ट , मोहमद साहिब तथा अन्य पैगम्बर , पीर – फकीर जो भी आये सब

फेल हो कर गए हैं , यहाँ आजतक कोई पास नहीं हुआ , पता नहीं क्या कारण है ?

गीता में प्रभु कहते हैं------

मोह – भय के साथ वैराज्ञ नहीं मिलता और बिना वैराज्ञ प्रभु की हवा नहीं लगती और

नित्झे कहते हैं … ...

भगवान शब्द भयभीत लोगों की देन है , अब आप सोचिये कि … ..

क्या आप के मन मे भी प्रभु के लिए कोई संदेह है ?



=====ओम=======




Wednesday, May 25, 2011


किधर चले ?




जब जिंदगी तम में डूबती स्वयं को दिख रही हो …...


दुःख के घनें बादलों से दर्द की बूंदे टपक रहीं हों …...


जब रह – रह कर जिंदगी के आखिरी किनारे कि झलक मिलती हो …..


जब सभीं अपनें पराये बन चुके हों …...


तब …..


एक अब्यक्त भाव की लहर दौड़ती है , ह्रदय में …..


यह लहर आती तो है लेकिन हम बेहोशी में इसे पहचान नहीं पाते ….


जीवन भर जब बेहोशी भरा जीवन गुजरा हो …..


अंत समय में होश आये तो कैसे आये ?


ह्रदय की अब्यक्त भाव की लहर मिला सकती है …..


उस अब्यक्त से


जो परमानंद नाम से जाना जाता है …..


लेकिन ….


इस तम की बेला में ….


होश को पकड़ना पड़ता है //




====ओम======






Thursday, May 19, 2011

वह क्या चाहता है?


हम तो रात – दिन उस से मांगे जा रहे हैं

लेकिन

क्या कभीं यह भी सोचा

कि

वह हमसे क्या चाहता है?


बेटा मांगो,बेटी मिले

जीवन मांगो,मौत मिले

धन मांगो,निर्धनता मेले

लेकिन फिर भी हम उसे नहीं छोड़ना चाहते

आखिर क्यों?


क्या हम उस से भयभीत हैं?

या हम उस से प्यार करते हैं?


हमारा उस से क्या रिश्ता है कि

चाहे सुख हो या दुःख हम उसे याद जरुर करते हैं,

आखिर क्या कारण हो सकता है?


याद रखना

भय में किया गया प्यार,प्यार नहीं वासना होता है

हम स्वयं को तो धोखा देते ही हैं लेकिन उसे नहीं दे सकते

चाहे हम उसे भय बश याद करते हों लेकिन वह हमसे

प्यार करता ही है

जिस दिन

जिस घडी

तन,मन,बुद्धि की ऊर्जा का रुख बदला

पता चल जाएगा कि

वह केवल प्यार चाहता है


=========


Monday, May 16, 2011

कौन खीच रहा है पीछे …....

इस आसरे पर जीवन आगे सरकता रहता है कि जो हम कर रहे हैं उसका

परिणाम ठीक वैसा होगा जैसी हमारी सोच है/धीरे-धीरे हमारा वह कार्य

पूरा हो जाता है लेकिन क्या हमारा अंजादा ठीक निकलता है?क्या हम

उस खुशी को प्राप्त कर पाते हैं जिसकी कल्पना कार्य के प्रारम्भ में की थी?

क्या हमारी तनहाई और गहरी हो जाती है?


कौन देगा इन तमाम प्रश्नों के जबाब?हम करनें वाले हैं,हमें पता है कि हम क्या कर रहे हैं?

हम अंदाजा लगा रहे हैं कि इस कर्म से हमें क्या मिलेगा?लेकिन-------

जब असफलता नज़र आती है तब हम किसी और को उस असफलता के खूंटे से बाध कर हम

स्वयं को बाहर – बाहर से आजाद कर लेते हैं लेकिन हमारे अंदर कोई है जो कोसता रहता है,

यह क्या कर रहे हो?लेकिन हमारा अहंकार अंदर की आवाज को हमारे कानों तक पहुंचनें

नहीं देता/


मनुष्य जीवन भर संग्रह करता रहता है लेकिन जब उसकी श्वास बंद हो जाती है तब उसे घर से बाहर

निकाल कर दरवाजे के ऊपर नीचे जमीन पर लिटा दिया जाता है और इन्तजार किया जाता है

अपनें सभीं सगे-सम्बन्धियों का/जब सब आजाते हैं तब उस देह को उठा कर दाह संस्कार के लिए

ले जाते हैं/क्या कारण है कि लोग सभीं-सगे सम्बन्धियों का इन्तजार करते हैं?

बहुत गहरा कारण है--------

यह वह मौक़ा होता है जब सब यह देख सकते हैं कि उनकी अपनीं-अपनीं औकातें भी

श्वास के साथ जुडी हैं;श्वास निकली और लोग दो कदम पीछे हो लिए/यह परम्परा लोगों को

जगाना चाह्ती है लेकिन हम भी कम नहीं;कौन उस जमीन पर पड़े मुर्दे में स्वयं को देखता है?

कहते हैं …...

बुद्ध दीक्षा देनें के पहले अपनें भिक्षुक को छह माह के लिए स्मशान घाट पर बसाते थे,क्या कारण रहा होगा?कारण सीधा था,जिससे भिक्षुक वहाँ जल रहे मृतकों मीन स्वयं को देख कर

वैराग्यावस्था में आ जाए/संसार के सफर को हम भोग का सफर समझते हैं लेकिन यह सफर

भोग से वैराग्य का होता है;वह जो भोग में समाप्त हो जता है वह सीधे पहुंचता है किसी गर्भ में

और जो भोग को समझ कर योग में पहुंचता है एवं योग में बैराग्य का मजा लेता हुआ अपनें

देह को स्वयं त्यागता है वह सीधे प्रभु में पहुंचता है//


====ओम======







Saturday, May 14, 2011

सब कुछ तो है लेकिन ….....

आज इंसान के पास क्या नहीं है?

लेकिन कल के इंसान से आज का इंसान ज्यादा परेशान है/

कल ठीक ठाक घर बहुत कम लोगों के पास हुआ करते थे पर आज

एक से अधिक घर सभीं सुविधाओं के साथ,लोगों के पास हैं लेकिन

उनका चेहरा ऐसे मुरझाया होता है जैसे डाल से अलग किया गया फूल हो/

एक अच्छा घर है …...

एक गाडी है …...

बच्चे पढ़े लिखे हैं और देश से बाहर रहते हैं ….

लाखों रुपये हर माह आते हैं …..

लेकिन जनाब का चेहरा ऐसे लटका रहता है जैसे पेड़ से टूटी डाल

लटक रही हो,आखिर ऐसा क्यों?

आइये सुनते हैं एक कथा------

बादशाह अपनें मंत्री से पूछा,मंत्रीजी मैं सम्राट हूँ लेकिन फिरभी इतना चिंतित

रहता हूँ और एक मेरा नाइ है रात भर ढोल बजा कर अपनें घर में गाना गाता रहता है,कैसे वह इतना खुस रह पाता है?मंत्रीजी बोले सरकार आप कहें तो उसकी खुशी को बिना कुछ दुःख दिए

उससे छीन लूं/बादशाह बोले,लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है?मंत्रीजी बोले,

मैं आप को दिखाता हूँ/

नाइ को रोजाना एक असर्फी हजामत बनानें के लिए राज कोष से मिलती

थी और उस एक असर्फी में वे सब बहुत खुश थे/मंत्री एक राज99असर्फियों का एक थैला

उसके आँगन में गिरवा दिया/सुबह – सुबह वह थैला उसकी पत्नी को मिला और वह तो पागल सी हो गयी और अपने पति को उठाया और बोला,सुनते हो,जल्दी तैयार हो कर राज महल जाओ और

हजामत बना कर सीधे वापिस आना फिर एक बात बताउंगी,आप बहुत खुश होंगे/

इस तरह कई दिन गुजर गए,उसकी खुशियाँ समाप्त हो गयी थी,अब कोई गाना-बजाना

घर में नहीं चल रहा था/अब सब खाना भी खाना कम कर दिए थे क्यों कि पत्नी

बोली,जल्दी-जल्दी असर्फियों को इकठा करके महल खरीदना है/

यह निन्यानबे का चक्कर मनुष्य से उसका आज छीन लेता है/

देखना कहीं हम – आप भी तो उस नाइ की तरह निन्यानबे के चक्कर में

तो नहीं अपनें आज को भूल बैठे हैं?

====ओम=====


Wednesday, May 11, 2011


वह कहाँ नहीं हैं ?




कोई कहता है …..


God dwells in all




कोई कहता है …...


सबका मालिक एक




कोई कहता है …..


अलाह ओ अकबर




कोई कहता है …..


अहम् ब्रह्माष्मि




कोई कहता है …..


ला इलाही इल अलाह




कोई कहता है ….


नासतो विद्यते भावो


नाभावो विद्यते सत: [गीता- 2.16 ]




सबको इतनी होश तो है लेकिन फिर …....


हिंदू का मंदिर अलग है,मुस्लिम का मस्जिद अलग है,गिरिजा घर अलग है,गुरू द्वारा अलग है


यहूदियों का मंदिर अलग है,बुद्धों के मंदिर अलग हैं,जैनिओं के मंदिर अलग हैं,ऐसा क्यों है?




अनगिनत मार्ग हैं,अनगिनत दर्शन हैं,सब कुछ अनगिनत हैं लेकिन सब किस से और किसमें हैं?




गीता कहता है …...


असत्य सत्य की छाया है;छाया सत्य नहीं,चाँद की छाया चाँद नहीं है लेकिन चाँद की छाया से उलटी दिशा में यदि कोई यात्रा करे तो वह एक दिन सत्य चाँद को प्राप्त कर लेगा/


संसार की सभीं सूचनाएं उस से एवं उसमें हैं,जब उनमें वह दिखनें लगता है तब वह उस


ब्यक्ति के लिए निराकार नहीं रह पाता//


संसार का बोध ही परमात्मा को दिखाता है




======ओम=======


Sunday, May 8, 2011

जरा सोचना --------

ऐसा क्यों हुआ ?

ईशा बाद पहली शताब्दी में यूनान से एक खोजी भारत आए और वापिस जा कर उन्होंनें भारत के सम्बन्ध में यह बात लिखी .................
In India I found a race of mortals living upon the earth , but not adhering
to it.........possessing everything but possessed by nothing .
Apolloneous Tyanaeus.
यह समय था महाबीर एवं बुद्ध के प्रभाव का ; महाबीर यूनान के थेल्स से लगभग 25 वर्ष छोटे थे और बुद्ध
जब शरीर छोड़ा तब सुकरात 16-17 वर्ष के थे ।
पश्चिम में थेल्स से अरिसटोटल [from Thales to Aristotle ] तक जो विचारधारा बही उस से
आधुनिक विज्ञान का जन्म हुआ लेकिन भारत में महाबीर - बुद्ध के बाद ऐसा हो न पाया , जबकि बुद्ध , महाबीर , थेल्स और
सुकरात के दर्शनों में कोई मौलि संघर्ष क अंतर न था /
पश्चिम में दर्शन के गर्भ से विज्ञान की उत्पत्ति हुयी घोर संघर्ष के बाद लेकिन भारत में दर्शन को कहानियों में धालानें का काम शुरू हो गया और भारतीय दार्शनिक अपनें - अपनें तर्क की क्षमता को विज्ञान का रूप न दे सके /
गैलीलियो का बक्तब्य , पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर काटती रहती है , धर्म गुरुओं की नीद हराम कर दी ;
गैलीलियो को क्या - क्या नहीं सहना पड़ा लेकिन वे अपनीं बात पर अड़े रहे , उनकी बात बाइबिल के
पक्ष मे न थी ,लेकिन तमाम परेशानियों के बाद भी गैलीलियो को कोई हिला न सका और आज का विज्ञान
गलीलियो द्वारा विकशित बीज से तैयार हुआ /
गैलिलियो की मृत्यु [ सन 1642 में हुयी ] और न्यूटन जन्म का वर्ष एक है । सन 1879 में मैक्सवेल की मृत्यु हुई और
आइंस्टाइन का जन्म हुआ , जो काम मैक्सवेल कर रहे थे उसी काम को आगे बढ़ाया आइन्स्टाइन नें / जो काम
गैलीलियो का था वही काम था न्यूटन का और इस प्रकार पश्चिम में विज्ञान की धारा बह निकली
लेकिन भारत में बुद्ध – महाबीर के बाद विज्ञान की धारा न बह सकी , जबकि बहनें को तैयार ही थी /

Max Planck, Erwin Schrodinger, Prof. Einstein सभी नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक गीता तथा
उपनिषद् प्रेमी थे , ये सभीं वैज्ञानिक गीता - उपनिषद से विज्ञान निकाला लेकिन भारत में ऐसा न हो
सका , क्यों की भारत पह्चिम की ओर देखनें का अभ्यासी हो गया और सूर्य पूर्व में निकलता है / भारत में जब घर-घर में तुलसी के रामायण को ढोल बजा - बजा कर गाया जा रहा था तब केप्लर ,
टैको ब्राह्मे तथा गैलिलियो आकाश में तारों को देख कर गणित की रचना कर रहे थे ।
भारत में 10 CCE के बाद भारत भूमि पर भक्ति की ऎसी ऊर्जा बही कि लोग सब कुछ भूल गए और
बाहरी लुटेरों को एक अच्छा मौक़ा मिला यहाँ आकर लूटनें का /
गजनी से ईस्ट इंडिया कम्पनी तक [ 10 CCE से 1947 AD तक ] भारत लगातार गुलाम बना रहा ।
अंगरेजों के समय कुछ लोग जैसे रमन,
सत्येन्द्र नाथ बोस , रामानुजन तथा जगदीश चन्द्र बोस यहाँ अवतरित तो हुए लेकिन पश्चिम कि तरफ वैज्ञानिक
हवा न चल पायी / सत्येन्द्र नाथ बोसे क्या मामूली वैज्ञानिक थे , Bose - Einstein super condensate theory पिछले सौ साल से विज्ञान में शोध का बिषय बनी हुयी है जिसके प्रमुख करता बोस ही थे /
आखिर ऐसा क्यूँ हुआ ?
==== ॐ ========

Wednesday, May 4, 2011


प्राणायाम से प्राण




मनुष्य के तीन तल हें ;देह , मन और ह्रदय जो द्वार हैं जहां से परम में प्रवेश मिलता है/


देह से योगाभ्यास किया जाताहै , मन से ध्यान में उतरना होता है और ह्रदय से परम


भक्ति में डूबा जाता है /




पिछले अंक में बताया गया … .....


आत्मा को साधना की दृष्टि से दो रूपों में देखा जाता है;एक आत्म वह है जो परम सत्य है ,


जो प्रभु का अंश है , जो सबके ह्रदय में स्थित है और वहाँ से मनुष्य को उर्जा देता रहता है /


आत्मा का दूसरा स्वरुप वह है जो द्रष्टा नहीं,जो अकर्ता नहीं वल्कि वह आत्मा है जिसके ऊपर


विकारों का कवर चढा हुआ होता है /




मनुष्य के देह में नौ द्वार हैं जिसमें दस प्रकार की श्वासें चलती रहती हैं जिनमें प्राण वायु


एवं अपान वायु प्रमुख है/वह श्वास जिसको हम नाक से अंदर लेते हैं उसे अपां वायु कहते है


और जिस वायु को हम बाहर फेकते हैं उसे प्राण वायु कहते हैं /


प्राण वायु से ज्ञानेन्द्रियों के कर्म नियंत्रित होते हैं /




प्राण वायु और अपान वायुओं को हर समय सम रखना एक सहज योग है


और सभीं योगों का


प्रारम्भ है/




अपान वायु को प्राण वायु में अर्पित करना रेचक योग कहलाता है और …...


दोनों वायुयों को रोक कर समाधि में उतरनें के योग को कुम्भक योग कहते हैं/


// कुछ और बातें अगले अंक में देखें //






Saturday, April 30, 2011

प्राणायाम


प्राणायाम क्या है?

पतंजलि योग सूत्रों में एक नहीं एनेक ध्यान की विधियाँ बताई गयी है जैसे शिव योग सूत्रों में

और सब का एक विज्ञान है जिसका आधार है श्वास के माध्यम से तन,मन और बुद्धि को

निर्विकार बनाना/

प्राणायाम दो शब्दों से मिल कर बना है;प्राण और आयाम/वह आयाम जहां हम यह

अनुभव करनें लगते हैं की प्राण नाम की कोई चीज हमारे देह में है जिसके होनें से हम हैं/


तंजलि - योग विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है , कुछ इस प्रकार … ......

देह मे स्थित जीवात्मा को निर्विकार बनाना//

जीवात्मा के लिए आत्म,जीवात्मा,परागात्मा और प्रत्यागात्मा ये चार शब्द दिए गए हैं/

आत्मा वह निर्विकार माध्यम है जिसको परमात्मा का अंश कहा गया है,प्रभु श्री कृष्ण

कहते हैं[गीता- 10 . 20 ] …....

अहम् आत्मा गुणाकेश

जब जीवों के देह में यह आत्मा प्राण के रूप में आता है तब उसको जीवात्मा कहते हैं/

जीवात्मा इन्द्रियों एवं मन के कारण विकार यक्त हो जाता है और इस जीवात्मा को परागात्मा

कहते हैं/

विकारों से मुक्त जीवात्मा को योग विज्ञान में प्रत्यागात्मा कहते हैं/

दस प्रकार की श्वासें हैं;जिनके नियोजन को प्राणायाम कहते हैं/

श्वासों के माध्यम से परागात्मा को प्रत्यागात्मा में बदलना ही पतंजलि योग का मुख्य लक्ष है/

भोक्ता आत्मा को द्रष्टा आत्मा में वापिस ले आना ही प्राणायाम है//


======ओम========



Tuesday, April 26, 2011

दर्द का रिश्ता

दर्द , परम - धाम एवं नर्क , दोनों का द्वार है ।
दर्द में रुक जाना नर्क की ओर ले जाता है और दर्द की मैत्री परम - धाम की यात्रा है ।
मीरा में दर्द उठा , मीरा उस दर्द को स्वीकारा , जीवन भर उसके साथ रही और कहते हैं
मीरा द्वारिका धीश की मूर्ति में समा गयी । कहानियाँ अपनें में परम सत्य को छिपाए होती
हैं , उन सत्यों को खोजना ही साधना है ।
कहानियो को मनोरंजन का साधन बनाना नर्क की ओर की यात्रा है और कहानियों में
सत्य को खोजना ही परमात्मा की खोज है ।
कहानियो का एक छोर नर्क की ओर होता है और दूसरा छोर निर्वाण की ओर इशारा करता है ।
मीरा [1498 -1546] नानक [ 1469 -1539] कबीर [ 1398 -1518] भारत भूमि पर एक साथ
20 वर्षों तक रहे मीरा अपनें दर्द को मथुरा से द्वारिका तक फैलाया,उनका केन्द्र था कन्हैया ।
मीरा अपनें दर्द में प्रभु को महशूश किया और दर्द तो बाहर रह गया पर मीरा प्रभु मे समा गयी /
कबीर अपनी भूख की दर्द को राम से जोड़ कर काशी के अहंकारी तर्क - शास्त्रिओं के मध्य
सरल भाषा में वेदान्त की ऊर्जा को भरना चाहा और लगभग एक सौ बीस सालों तक लोगों
को खूब पियाया वेदान्त /
नानक कहते हैं , नानक दुखिया सब संसार और अपनें इस मूल - मंत्र के साथ पंजाब से करबला ,
मक्का और जेरुसलेम तक की यात्रा करते रहे ।
नानक - कबीर के दर्द के केन्द्र राम थे और मीरा का केन्द्र कन्हैया थे ,
आप के दर्द का केन्द्र क्या है ?
वृन्दाबन में जब मीरा का रहना सम्भव न हो सका तब उनको द्वारका में शरण लेनी पड़ी थी ।
मीरा के आखिरी वक्त के समय उनके खानदान का एक सदस्य मेवार का राजा था जिस को
मीरा से बहुत था । राजा अपनें सेना का एक दल द्वारका मीरा को लेने केलिए भेजा सेनापति के
आग्रह के सामनें मीरा ना न कह पायी और बोली-- मैं चलूंगी लेकिन पहले कन्हैया से पूछ तो लू तबतक आप लोग यही विश्राम करें । कहानी कहती है की मीरा गयी कन्हैया के सामनें और कन्यैया की मूर्ती में समा गयी ।
आप क्या समझ रहे हैं , क्या यह बात सही है ? सही होनी ही चाहिए परम - भक्त
तो हर समय कन्हैया में रहता ही है , चाहे वह कन्हैया की मूर्ती हो या स्वयं कन्हैया /
मीरा का दर्द मीरा को परम - धाम में पहुंचाया और आप आप का दर्द आप को कहाँ ले जा रहा है ?
==== ॐ ======

Sunday, April 24, 2011

मनुष्य की स्थिति

मनुष्य अपनें को सबसे अधिक धोखा देता है , क्या आप जानते हैं ?
मनुष्य स्वयं को सर्बोच्च शिखर पर देखना चाहता है और उसकी यह चाह उसे बेचैन बना कर रखती है ।
मनुष्य सभीं जीवों का सम्राट है लेकिन वह स्वयं से भी भयभीत रहता है , ऐसा क्यों ?
हम मुट्ठी खोलना नही चाहते पर जो मुट्ठी में नहीं है उसे भरना भी चाहते हैं ,
क्या यह सम्भव है ?
बंद मुट्ठी में भरनें की चाह को कामना कहते हैं और कामना में धनात्मक अंहकार होता है ।
जो चीज मुट्ठी में है वह कहीं सरक न जाए, इसकी सोच मोह उपजाती है
मोह भी कामना है जिसमें सिकुड़ा हुआ नकारात्मक अंहकार होता है
मोह में मनुष्य लोगों से दूर भागना चाहता है , अकेला रहना चाहता है और सहारा खोजता है
कामना की एक और स्थिति होती है जिसको लोभ कहते हैं
लोभ में भी भय के साथ - साथ कमजोर अंहकार होता है
सामान्यत : लोभ बूढों को होता है और जवान कामना में जीता है
गीता कहता है , काम, क्रोध,लोभ और मोह परमात्मा के राह के मजबूत अवरोध हैं ।

===== ओम =======

Monday, April 18, 2011

दिया आज भी जल रही थी


घोर जंगल में दरिया उस पार एक इतना छोटा झोपडा कि जिसमें मुश्किल से एल ब्यक्ति गुजारा कर सकता था रह – रह कर मेरे ध्यान को अपनी ओर खीच रहा था


मैं आदिबासी इलाके में अपनें प्राचीन भारत की स्मृति ताजी करनें के इरादे से उस इलाके में गया हुआ था



मैं अपनें नाविक से पूछा , क्या आप मुझे उस झोपड़े तक ले जा सकते हैं ? जो मांगेगे , मैं आप को दूंगा अभी मेरी बात पूरी भी न हो पायी थी कि नाविक झट से बोल पड़ा , नहीं साहिब , मैं तो वहाँ दरिया उस पार नहीं जा सकता नाविक की आवाज में कुछ सम्मोहन सा था , वह डर रहा सा लग रहा था , मैं उस से पूछा , भाई ! बात क्या है , मैं तो इस इलाके के लिए नया हूँ , यदि कोई बात हो तो मुझे बता दो ? नाविक बोला , साहिब ! वहाँ उस झोपड़े में एक बाबा रहता है जो रात को इंशान रूप में झोपड़े में रहता है और सूरज छिपते ही जानवर बन कर शिकार करता है


मैं क्या बस्ती का कोई भी ब्यक्ति उधर नहीं जा सकता , वह न जानें कितनों को खा चुका है और जो वहाँ पहुंचा वह वापिस न् आ सका



मेरी जिज्ञासा और बढनें लगी और मैं सोच बैठा कि चाहे जो कुछ भी क्यों न घटित हो लेकिन मैं वहाँ जाउंगा गा जरुर मैं किसी तरह उस नाविक को तैयार किया और पहुंचा दरिया उस पार ------



दरिया के उस पार , उस झोपड़े को देखनें से ऐसा लग रहा था कि यहाँ काफी दिनों से कोई इंसान नही आया होगा मैं हिम्मत करके झोपड़े के अंदर गया , वहाँ एक इंसान का कंकाल पड़ा था जो


अबतक मम्मी बन चुका था झोपड़े के अंदर एक अधूरी पत्थर पर बनायी जा रही मूर्ति पडी थी , जिस पर लिखा था ,


प आओगे जरुर एक दिन लेकिन तबतक शायद मैं न रह सकूं


यह देख कर ताज्जुब हो रहा था कि झोपड़े में एक दिया आज भी जल रहा था



बाहर जब हम निकले , आगे एक इंसान , बुढा इंशान खडा था , हम सब को देख रहा था मैं उनसे पूछा , बाबा ! यहाँ कौन रहता था ? और आज भी इसके अंदर एक दिया जल रहा है , कौन जलाया होगा ?


बाबा बोले , बेटा इस राज को कोई नहीं जानता लेकिन यहाँ कुछ रात गए कोई आता जरुर है जो दिया जला कर लुप्त हो जाता है , यह एक राज है और राज ही रहेगा



कौन था वह बाबा?कौन रहता था उस झोपड़े में?


किसका इंतजार था उसे?और वह किसके इन्तजार में वहाँ उस झोपड़े में रहता था?मैं गया तो था जिज्ञासा बश लेकिन जब आया तो ऐसा लगनें लगा


जैसे मैं एक दम खाली हो चुका हूँ



====== ओम =======



Wednesday, April 13, 2011

प्रभु की तलाश जारी है

मनुष्य प्रभु को खोजनें में क्या - क्या नहीं कर रहा -------

मनुष्य को प्रभु से क्या काम है ?

वह जो भूखा है …......

वह जो महलों में रहता है …...

वह जो खुशी में है ….........

वह जो दुःख में है …........

सभीं लोग प्रभु को खोज रहे हैं , आखिर क्यों ?

क्या हम प्रभु को जानते हैं ?

क्या हमें प्रभु की पहचान है ?

जब हम प्रभु के रूप – रंग , उनकी आवाज को , उनकी खुशबू को

उनकी संवेदनशीलता को नहीं जानते फिर यदि प्रभु मिलते भी हों तो

हम उनको अपनी इन्द्रियों से या मन से कैसे समझें ? लेकिन फिरभी हमारी तलाश जारी है , आखिर कोई तो कारण होगा ही |

एकांत में अकेले बैठ कर कभीं सोचना कि प्रभु को आप क्यों पाना चाहते हैं?

प्रभु सब कुछ तो दे रखा है,लेकिन बस्तुओं से हमारी तृप्त नहीं होती,आखिर क्यों?

बस्तुओं से हमारी तृप्ति नहीं और प्रभु को हम बस्तुओं की तरह प्रयोग करना चाहते हैं फिर

प्रभु कैसे मिलेगा ?

गीता कहता है-------

तन , मन , बुद्धि को रिक्त करो और उस रिक्तता में तेरी चेतना जिसकी ज्योति को देखेगा वह है परमात्मा | गीता का अर्जुन प्रभु के नाना प्रकार के रूपों को देखा लेकिन

एक तरफ से देखता रहा और दूसरी ओर से भूलता रहा अंत में थक कर कहनें लगा ,

प्रभु आप अनंत हैं , अब मैं आप की शरण में हूँ , मैं अपनी स्मृति को पा ली है जो

आप को पहचानती है अत ; आप मुझे यथा उचित मार ्ग दिखाएँ |

समर्पण प्रभु के द्वार को खोलता है , लेकिन समर्पण का भाव पाना

इतना आसान नहीं |

प्रभु को खोजो , खूब खोजो और जब आप थक जायेंगे , आप भी अर्जुन बन जायेंगे ||


========== ओम ===============



Saturday, April 9, 2011

चन्दन लगाना ही ध्यान विधी है


ललाट का चन्दन


माथे या ललाट पर लगा चन्दन दूर से दिखता है और इसके लगाने के

पीछे कुछ बातें हैं;


पहली बात है कि माथे का चन्दन दूर से दिखता है और इसका आकार – प्रकार उस

परम्परा को दर्शाती है जिस परम्परा का वह ब्यक्ति होता है|

भारतीय प्राचीनतम परम्परा में शिष्य और गुर ू परम्परा साधना में अपनी एक अलग

जगह रखती है|माथे पर लगाया हुआ चन्दन यह बताता है कि यह ब्यक्ति

किस गुरू का शिष्य है?

दूसरी बात जो माथे का चन्दन बताता है वह है …......

यह ब्यक्ति की साधना में कौन सी स्थिति है?


माथे का चन्दन चन्दन लगानें वाले का ध्यान अपनें ऊपर रहता है अर्थात ध्यान

तीसरी आँख पर हर पल रखना अपनें में स्वयं ही एक सहज ध्यान है|

चन्दन जैसे-जैसे सूखता जाता है वैसे-वैसे यह वहाँ की त्वचा को सिकोड़ता रहता है

और यह उसका कृत्य चन्दन लगानें वाले के ध्यान को अपनी ओर खीचता रहता है|


माथे पर लगा चन्दन अपनी ओर अर्थात तीसरी आँख पर ध्यान को खीच कर मन को

विचार शून्यता की स्थिति में रखनें का प्रयाश करता है और मन – विचार शून्यता परम्

ध्यान की स्थिति होती है |


अगले अंक में माथे के चन्दन के बिषय पर कुछ और बातें देखनें को मिल सकती हैं||


===========ओम=================



Tuesday, April 5, 2011

चन्दन साधना टूल है



चन्दन साधना का एक टूल है


चन्दन के ऊपर आप पहले दो अंक देख चुके हैं अब आज आप को चन्दन साधना का एक टूल

[ tool ] है , इस बात पर चर्चा करते हैं |


मूलाधार.काम,नाभि,ह्रदय,कंठ,तीसरी आंख[ललाट का मध्य भाग]और

सहस्त्रार[जहां हिंदू लोग चोटी रखते हैं]ये सात चक्र हैं जिनके माध्यम से आत्मा[देही]

देह से जुड़ा होता हैऔर --------------------

गीता कहता है …................

आत्मा को देह में तीन गुण रोक कर रखते हैं और … ................

परम् हंस रामकृष्ण जी कहते हैं-----------------

गुनातीत[मयामुक्त]योगी तीन सप्ताह से अधिक समय तक अपनें देह में नहीं रह सकता|

यहाँ चक्रों को हम इस लिए देख रहे हैं कि------

चक्र साधना सबसे पुरानी साधना है और इसका रहस्य चन्दन प्रयोग रहस्य से मिलता भी है|

मूलाधार से सहस्त्रार के मध्य काम,नाभि दो चक्र महान और मजबूत साधना के अवरोध हैं जो

मूला धार की ऊर्जा को ऊपर उठनें नहीं देते|

मूलाधार की ऊर्जा को ही कुण्डलिनी कहते हैं जो ऊर्जा का मूल श्रोत है[निर्विकार ऊर्जा का] |

अब आप उन स्थानों को देखें जहां चन्दन लगाया जाता है और चक्रों की स्थितियों को देखो,क्या इनमें आप को कोई समानता दिखती है?

एक बात याद रखना----------------

आज कुण्डलिनी जागरण के नाम पर लोग बहुत से ध्यान सिखा रहे हैं लेकिन याद रखना---------

काम,कामना,क्रोध,लोभ,मोह,भय,आलस्य और अहंकार कुण्डलिनी जागरण के शत्रु हैं|

कुण्डलिनी स्वयं जाग्रति हो उठती है जब हम गुण – तत्त्वों की ग्रेविटी से बाहर निकलते हैं|


आज आप मूलाधार चक्र को देखें और रीढ़ की हड्डी के निचले कमर के साथ के भाग को देखें जहां चन्दन लगाया जाता है|चन्दन एक ऐसा एजेंट है जो चक्रों की ऊर्जा को गति देता है और

ऊर्जा को निर्विकार भी बनाता है|

अगले अंक में कुछ और बातें देखनें को मिलेंगी


============ओम================



Friday, April 1, 2011






चन्दन कहाँ लगाएं



चन्दन लगाने के निम्न स्थान हैं और चन्दन लगानें के ढंग भी अलग – अलग हैं



ललाट का मध्य भाग …......


सर में जहां हिदू लोग चोटी रखते हैं [सहस्त्रार चक्र] …....


दोनों आँखों की पलकों के ऊपर …......................................


दोनों कानों पर ….......................


नाक …................


गला ….............


दोनों भुजाओं का मध्य भाग …...........


ह्रदय …...................


गर्दन …..................


नाभि ….................


रीढ़ की हड्डी का नीचला भाग नाभि के ठीक पीछे लगभग एक इंच नीचे की ओर …....



आप पहले इन अंगों को ठीक ढंग से देखें और इनको साधना की दृष्टि से समझें



न्यूरोलोजी की द्रष्टि से यदि आप इन स्थानों को देखते हैं तो चन्दन का सीधा सम्बन्ध


इस तंत्र के उन भागों से हैं


जो----------------


या तो सूचनाओं को इक्कठी करते हैं या इक्कठी की गयी सूचनाओं की एनेलिसिस करते हैं


विज्ञान अभीं तक यह समझता रहा है कि स्पाइनल कार्ड मात्र सूचनाओं को इक्कठी करनें


के तंत्र का एक प्रमुख भाग है लेकिन अभीं हाल में पता चला है कि यह सूचनाओं की


एनेलिसिस भी कर्ता है जैसे ब्रेन करता है



आगे के अंक में चन्दन के सम्बन्ध में कुछ और अहंम बातों को देखेंगे



======ओम==============





Tuesday, March 29, 2011

चन्दन लगाना




चन्दन लगाना



चन्दन लगाना,हिदू परंपरा में एक विशेष स्थान रखता है|


जब भी कोई हिंदू प्रभु को याद करता है तब चन्दन के बिना यह संभव नहीं हो पाता ,

आखिर चन्दन लगाने का राज है , क्या ?

चन्दन लगाने के राज के सम्बन्ध में हम बाद में देखेंगे यहाँ इस सम्बन्ध में निम्न कुछ अहंम

बातों को पहले देखते हैं -----------


[]चन्दन के प्रकार


**चन्दन बृक्ष की लकडी;जो सफ़ेद या मैरून रंग कि हो सकती है

**हल्दी

**दही

**चावल

**जल

**मिटटी

**केसर

**शहद


सूफी परम्परा में लोबान और हिन्दू परपरा में चन्दन दोनों गंध आधारित माध्यम हैं जो

साधना को आगे बढनें में मदद करते हैं |


चन्दन का सम्बन्ध आज्ञा चक्र और सहस्त्रार चक्र से भी है लेकिन इन बातों को हम

आगे चल कर देखेंगे |

चन्दन लगाना एक साश्वत परम्परा है जो मनुष्य के स्मृति को प्रभु कि ओर रखता है |

अगले अंक में हम देखेंगे चन्दन और लोबान सम्बंधित कुछ और बातें



===== ओम ======


Wednesday, March 23, 2011

प्रभु की अनुभूति कैसे हो




प्रभु की अनुभूति कैसे हो?


पहले बताया गया की-------

साधना एक खोज है जिसमें साधक[स्त्री या पुरुष]कुछ खोजता है;जो यह समझते हैं की मै

अमुक को खोज रहा हूँ , वे साधक नहीं हैं वे गुण प्रभावित जिज्ञासु हैं , उनका प्रभु से जुड़ना

भी भोग आधारित ही होता है ; ऐसे लोगों का जीवन भोग - केंद्र के चारों ओर चक्कर

लगाता रहता है और ये लोग प्रभु को भी भोग का एक माध्यम समझते हैं ।

एक बात ध्यान में रखनी होगी की ….....

गीता का प्रभु न तो कुछ देता है और न ही कुछ लेता है------

गीता का प्रभु न तो किसी के पाप कर्मों को ग्रहण करता है न ही पुण्य कर्मों को ।

गीता का प्रभु न तो भावों में है और न ही मन – बुद्धि तक सिमित है ।

गीता का प्रभु उसके साथ है जो …...

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रभु के फैलाव रूप में देखता है और सभी सूचनाएं उसकी ओर इशारा

कर रही हैं - कुछ ऐसा समझता है ।

अर्ध नारीश्वर की मूर्ती के सामनें आप बैठे ; यदि स्त्री हैं तो उस तरफ बैठें

जिधर से शिव दीखते हो

और यदि पुरुष हैं तो उधर बैठें जिधर से पार्वती दिखती हों । साधना मात्रा भाव रहित होनें की

प्रक्रिया है इसके बाद जो होता है वह सब स्वतः घटित होता रहता है ।

इस ध्यान [साधना] में जब कोई साधक स्थिर मन – बुद्धि वाला हो जाता है , द्रष्टा हो जाता है,

तब उसके हार्मोन्स में बदलाव आजाता है , पुरुषत्व की ऊर्जा पुरुष में कम हो उठती है और

नारी में नारीत्व की ऊर्जा कम हो उठती है ; यह बात भावात्मक रूप में नहीं है

यह काम ऊर्जा की केमिस्ट्री है जो साधना में बदलती रहती है ।

कहते हैं परम हंस रामकृष्ण जी साधना के माध्यम से अपनें को पूर्ण रूपेण

स्त्री में बदल दिया था

उनके स्तन भारी हो गए थे और मासिक धर्म भी आनें लगा था यह सब साधनाओं में

नहीं होता मात्र उनमें होता है जिनका आधार तंत्र होता है ।

तंत्र – साधना बिना गुरु खतरनाक हो सकता है

अतः इसे बिना सिद्ध गुरु न अपनाएं तो उत्तम रहेगा ।



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