- दस गुरुओं के साधनाओं का फल है
- सत्रह भक्तों की अनुभूतियों का रस है
- पंद्रह परम भक्तों की वाणियों का सुर है
- भाई मरदाना जैसे परम भक्त की धुनें है
- 1जो चौदह सौ तीस पृष्ठों में फैला हुआ है
- तीसरे गुरु श्री अमर दास की नौ सौ चौहत्तर वाणियों का संग्रह है
- दूसरे गुरु श्री अंगदजी साहिब की तिरसठ वाणियों की गंगा प्रवाहित होती हैं
- आखिरी गुरु श्री गोबिंद जी साहिब का निर्देशन है और भाई मणि सिंह की बुद्धि है जिनके द्वारा यह लिपिबद्ध हुआ
- सन चौदह सौ से सत्रह सौ के मध्य के संतों फकीरों की वाणियों का संग्रह है
- दस गुरुओं सत्तरह भक्तों एवं पन्द्रह परम सिद्धों की ऊर्जा है
- ऐसे परम पवित्र को छोड़ कर आप और कहाँ और क्या खोज रहे हैं
- एक ओंकार
Sunday, November 25, 2012
गुरु प्रसाद - 1
Friday, November 23, 2012
कोई तो सुनता ही होगा
- कौन क्या बोल रहा है , यह महत्वपूर्ण नहीं , आप क्या सुन रहे हैं , यह महत्वपूर्ण है
- बोलनें वाला कभी यह नहीं समझता कि सुननें वाला क्या सुन रहा है
- सुननें वाला कभी यह नहीं सोचता की बोलनें वाला क्या बोलना चाह रहा
- बुद्धि स्तर की समझ बहुत कमजोर समझ होती है
- ह्रदय की समझ , गहरी समझ है
- जिस से हमारा कोई खास मतलब होता है उसकी हर बात हमें स्वीकार होती है
- जिससे हमारा कोई मतलब नहीं उसकी बात को सुननें के हमारे कान और होते हैं
- प्रकृति अब सिकुड़ने लगी है और मनुष्य का अहंकार फ़ैल रहा है
- विज्ञान के आविष्कारों का प्रकृति को सिकोड़ने में हो रहे प्रयोग घातक हो सकते हैं
- विज्ञान संदेह आधारित है और संदेह की रोशनी में सत्य को देखना संभव नहीं
- संदेह जब श्रद्धा में बदलता है तब उस ऊर्जा से सत्य दिखता है
विज्ञान का केन्द्र मन - बुद्धि हैं और ज्ञान का केन्द्र है ह्रदय
निर्विकार मन - बुद्धि का सीधा सम्बन्ध ह्रदय से होता है
ह्रदय में चेतना की ऊर्जा तब प्रभावी होती है जब मन - बुद्धि निर्विकार हो जाते हैं
हमेशा औरों के सम्बन्ध में ही क्यों सोचते रहते हो कभीं अपनें बाते में भी सोचा करो
- आज औरों के ऊपर कफ़न डाल रहे हो एक दिन और तुम पर कफन डालेंगे
==== ओम् ======
Saturday, November 17, 2012
हम इनके मध्य हैं - - - - -
- एक परमात्मा ......
- अनेक देवता ........
- एक माया ............
- अनेक जीव .........
- दो प्रकृतियाँ ........
- ऊपर आकाश .....
- नीचे एक काल्पनिक संसार , पाताल .....
- सप्त सिंधु ......
- सप्त ऋषि .....
- सप्त दिन [ सप्ताह ] .....
- नौ ग्रह .......
- देव - दानव .....
- सच - झूठ ......
- अपना - पराया .....
- सास - ससुर , पति - पत्नी , पुत्र - पुत्री , समाज
- समाज की जरूरतें और स्वयं की चाह
- स्वर्ग - नर्क का भय
हमारे रहनें के आयाम तो अनेक हैं , हम उनमे कैसे रहते हैं , यह हमारे जीवन की दिशा को तय करता है
जीवन वह है जो न अपनें लिए जीया जाए , न पराये के लिए ,जीवन चाह रहित एक दरिया की धार जैसे बहते रहना चाहिए जहाँ किसी अवरोध की कोई फ़िक्र न रहे और धीरे - धीरे ऐसा जीवन जहाँ पहुँचता है उसी का नाम है.........
परम धाम
==== ओम् ======
Saturday, November 10, 2012
मनुष्य और पशु
भोग - भोजन की खोज में पशु आखिरी श्वास भरता है
मनुष्य भोग में होश उठा कर परम गति प्राप्त करता है
परम गति अर्थात जहाँ समय की छाया नहीं पड़ती
जहाँ सूर्य - चन्द्र - अग्नि प्रकाश का श्रोत नहीं
जो स्व प्रकाशित है
पशु का मूल स्वभाव है भोग और ....
मनुष्य का मूल स्वभाव है अध्यात्म
गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं [ श्लोक - 8.3 ] .....
स्वभावः अध्यात्मं उच्यते
पशु कभीं आकाश नहीं देखता और मनुष्य आकाश में भी घर बननें को सोच रहा है
वह जो काम को न समझा , वह जो कामना को नहीं समझा , वह जो क्रोध को नहीं समझा ...
वह जो मोह को नहीं समझा , वह जो अहँकार को नहीं समझा .....
वह पशु है और वह भी भोग - भोजन की तलाश में कहीं मध्य मार्ग के चौराहे पर दम तोड़ देगा और पुनः पशुवत योनि में पैदा हो कर भोग - भोजन में भागता रहेगा ,
लेकिन ----
जो काम से राम की यात्रा कर लिया , जो भोग में भगवान की छाया देख ली , वह आवागमन से मुक्त हो कर प्रभु में बसेरा बना लेता है /
=== ओम् =====
Saturday, November 3, 2012
होश में या बेहोशी में ----
मैनें अमुक पराये को अपना लिया है , क्या यह सत्य है ?
क्या पराये को अपनाया जा सकता है ?
क्या अपनों को पराया बनाया जा सकता है ?
अपनों को पराया बनाना ------
परायों को अपना बनाना ------
दोनों बातों में समान वजन है ; जो एक को कर लिया दूसरा उसके लिए कठिन नहीं
जो यह कहता है कि हमनें अमुक को अपना लिया लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ,
यह बात दिल की बात नहीं बाहर - बाहर की बात है ----
जो दिल से किसी को अपनाता है उसके पास मैं और तूं दो नहीं रहते , अपनानें के साथ ही मैं तूं में बिलीन हो जाता है , फिर कौन बचा रहता है जो यह कहे कि , उसको मैं अपना लिया था लेकिन उसनें मुझे धोखा दिया ?
अपनाना कोई कृत्य नहीं , यह एक घटना है जो स्वतः घटती , पता तक नहीं चल पाता और जब यह पता चलता है कि मैनें अपना लिया है उसी घडी उसमें अपनानें की ऊर्जा बदल जाती है / अपनाना एक प्रकार की साधना का फल है जिस पर कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय एवं अहँकार की छाया तक नहीं पड़ती और जहाँ ऐसा आयाम हो वह स्थान तीर्थ होता है और वहाँ प्रभु को खोजा नहीं जाता , वहाँ सर्वत्र प्रभु ही प्रभु दिखता है /
आप न कुछ अपनानें की कोशिश करे न त्यागानें की , आप मात्रा उसे देखें जो आप के साथ घटित हो रहा हो और ----
आप का जब यह अभ्यास सघन होगा तब आप कुछ और हो गए होंगे , मेरे जैसे बैठ कर ब्लॉग नहीं लिखेंगे , ब्लॉग में स्वय को घुला दिए होंगे जैसे गंगा गंगा सागर में स्वयं को घुला कर मुक्त हो जाती है /
==== ओम् ======
Wednesday, October 31, 2012
आइये देखते हैं स्वयं को -------
लेकिन ----
जो हमनें स्वयं ले रखा है उसका क्या होगा ?
जो गट्ठर हमारी पीठ पर रखा गया है वह तो समझो उतर ही रहा है
लेकिन -----
जो हमनें स्वयं रखा है उसका क्या होगा ?
हम चिंतित हैं क्यों ?
इसलिए नहीं कि हमारे पास वह नहीं जिसे हम चाहते हैं
लेकिन----
इस लिए कि वह उनके पास क्यों है ?
मनुष्य दूसरे की गलती पर स्वयं को ताडित करता है , क्यों ?
जैसे यदि कोई हमें गाली दे दे तो हमारा खून खौलनें लगता है , ऐसा क्यों ?
यदि वह गाली दे रहा है हम उसे ले क्यों रहे हैं ,
उसे यदि न लिया जाए तो वह वापिस जा कर उस ब्यक्ति के सीनें में चोट मारेगा
लेकिन----
हम ऐसा करनें का अभ्यास नहीं करते
==== ओम् =====
Saturday, October 27, 2012
कभीं अकेले में ही सही सोचना ----
जीवन कितना चौड़ा है ....
जीवन कितना गहरा है ....
जीवन की चौड़ाई को हम नित पल खीच - खीच कर बढानें में लगे हैं लेकन जब जीवन की लम्बाई की सोच आती है तब हम बेचैन से होनें लगते हैं , ऐसा क्यों ?
जीवन की गहराई के सम्बन्ध में हमारा मन कभीं नही सोचता और हम अपनें जीवन के इन तीन आयामों में से मात्र एक पर टिके हुए जीवन गुजार रहे हैं /
सभीं यहाँ परम आनंद के आशिक हैं लेकिन जीवन का मात्र एक तिहाई आयाम को पकडे हुए चल रहे हैं , भला ऎसी स्थिति में कैसे परम आनंद की झलक मिल सकती है ? ऐसा जीवन तो तनहा जीवन ही रहेगा /
परम आनंद प्रभु का द्वार है , जो जीवन की गहराई में कहीं अनंत में जा कर परम प्रकाश के माध्यम से दिखता है और वह भी कई शताब्दियों में किसी - किसी को और एक हम हैं जो जीवन की गहराई के सम्बन्ध में कभीं सोचते ही नहीं , फिर हमें परम आनंद कैसे मिल सकता है ?
जीवन की गणित आम गणित से भिन्न है , इस गणित पर गुरजिएफ के एक महान शिष्य एवं महान गणितज्ञ ओस्पेंसकी खूब सोचे हैं और सोचते - सोचते वे जरुर परम आनंद में पहुंचे होंगे /
जीवन की लम्बाई हमारे दो श्वासों के बीच की दूरी के एक अंश के बराबर होती है , जिसको हम कभीं नहीं देखना चाहते , क्योंकि बुद्ध कहते हैं - एक घंटा जो रोजाना अपनी प्राण - अपान वायुओं को देखता रहता है उसे निर्वाण प्राप्त हो सकता है और निर्वाण परम आनंद का द्वार है जहाँ से परम प्रकाश की अनुभूति होती है /
हम अपनें जीवन की चौड़ाई को अपनें अहँकार की रस्सी से मापते हैं ; जितना बड़ा अहंकार उतना चौड़ा
जीवन ; यह एक ऐसा भ्रम है जो सीधे नरक के द्वार पर ले जा कर कहता है - जा , अब तेरी मंजिल आगयी /
जीवन का मजा लेना चाहते हो तो -----
आज से रोजाना कुछ समय के लिए अपनी यातो प्राण वायु को या फिर अपान वायु को विचार रहित मन - बुद्धि से देखनें का अभ्यास प्रारम्भ करें , क्या पता यही आप को निर्वाण में पहुंचा दे ?
===== ओम् =====
Tuesday, October 23, 2012
जरा समझना ------
- वे आप के साथ हैं या आप उनके ......
- पुत्र आप के साथ है या आप पुत्र के साथ .....
- पत्नी आप के साथ है या आप पत्नी के साथ ......
- परिवार आप के साथ है या आप परिवार के साथ .....
- आप अपनी सोच के गुलाम हैं या आप की सोच आप की ......
- आप इंद्रियों के गुलाम हैं या इन्द्रियाँ आप की ......
- आप अपनें मन के संग हैं या मन आप के संग ......
- आप परमात्मा को खोज रहे हैं या परमात्मा आप को ......
- आप से परमात्मा है या परमात्मा से आप ......
- आप के संग परमात्मा है या परमात्मा के संग आप .......
- आप प्रकृति से हैं या प्रकृति आप से .......
वहाँ जो दिखेगा , उस से और उस में यह ब्रह्माण्ड है
==== ओम् ========
Sunday, October 7, 2012
जरा रुकना बश दो घडी
- कौन दुखी रहना चाहता है ?
- यहाँ कितने सुखी हैं , तन एवं मन से ?
- कितनें अपने दुःख का कारण स्वयं को समझते हैं ?
- कितनें अपनें दुःख को समझते हैं ?
- कितनें औरों के दुःख को समझते हैं ?
- कितनें औरों के दुःख को देख कर आनंदित होते हैं ?
- कितनें दुःख की मूल को देखना चाहते हैं ?
- कितनें सच्चाई को समझना चाहते हैं ?
- कितनें दूसरों को दुखी कर के सुख का अनुभव करते हैं ?
- कितनें दूसरों के दुःख को अपनें दुःख की भांति देखते हैं ?
जो सब पर बराबर नजर डाले हुए है और जहाँ एक दिन सबको पहुँचना है और पहुँच कर अपनें किये गए का जबाब भी देना है , जहाँ कोई तर्क - वितर्क की कोई संभावना नहीं , जहाँ चेहरा देख कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया जाता है /
समय किसी का इन्तजार नहीं करता , दो घडी कभीं अकेले में बैठ कर सोचना कि ........
जिनके लिए इतनी गति से भाग रहे हो क्या वे आप के साथ चिता जलनें तक भी रुक पायेंगे ?
==== ओम् =======
Tuesday, October 2, 2012
जीवन दर्शन - 58
क्रोध - ऊर्जा की आवृति प्रति सेकण्ड अधिक होती है
मोह - उर्जा इन्द्रियों को सुखाता है
क्रोध - उर्जा नाश की ओर ले जाता है
कामना में जब गहरा अहँकार होता है तब जब वह कामना दूटती है , क्रोध उठता है
कमजोर अहँकार की कामना - ऊर्जा मोह में बदल जाती है
कामना देह की कोशिकाओं में फैलाव लाता है
मोह कोशिकाओं को सिकोड़ता है
मोह का अहंकार बाहर से नही दिखता , यह अंदर सिकुड़ा रहता है
कामना का अहँकार बाहर परिधि पर छाया रहता है
==== ओम् ========
Friday, September 21, 2012
Kabhi - kabhi inko bhi samajhe
1- kaun khush nahi rahana chaahataa
2- kaun chaahataa hai ki uski aankho se boonde tapakatii rahen
Lekin--------
Yahaan kitane log aur kitanii ghadii khushii me gujaar rahe hain
Psnnch logo se khushii kii paribhashaa poochhana , ho sakta hai aap ko paanch se bhii kuchh adhik paribhaashaayen mile .
Manushya apane man kaa gulasm hai aur man ke paas sandeh ke alawaa aur kuchh nahiin
Atah ....
Apane man ko pahale samajhe aur jb man kii samajh pakki hojaayegi tb aap ko kisii kii paribhshaa kr sambsndh me nahi sochana hogaa
Kyonk.....
Tb aap datya me honge
##### OM #####
Tuesday, September 11, 2012
Jaraa Dekhana
Sansaar me kyaa nahi jo manushya ki pakad se pare ho lekin itanii samarth ke baawajood bhi manushya kiskii koj me khoyaa huaa hai ?
:::::: om :::::
Thursday, July 26, 2012
जीवन दर्शन - 55
- क्रोध एवं मोह दोनों में देह में कंपन होता है
- क्रोध के कंपन की आबृति मोह के कंपन की आबृति से अधिक होती है
- क्रोध का केंद्र मुह में जबड़ों में होता है
- मोह का केन्द्र है नाभि
- मोह जोडनें की उर्जा रखता है
- क्रोध में तोड़ने की उर्जा होती है
- कामना , क्रोध में धनात्मक अहँकार होता है
- मोह में नकारात्मक अहँकार होता है
- मोह एक प्रकार की कामना ही है लेकिन इसका केंद्र है तामस गुण
- कामना काम ऊर्जा का रूपांतरण है और इसका केंद्र है राजस गुण
Monday, June 11, 2012
जीवन दर्शन 54
बुद्ध पुरुष सुख एवं दुःख दोनों का चिकित्सक होता है
बुद्ध पुरुष न सुख देते हैं न दुःख
बुद्ध पुरुष उस आयाम में पहुंचाते हैं जहाँ से एक तरफ सुख औए एक तरफ दुःख दिखते हैं
बुद्ध पुरुष सुख एवं दुःख दोनों का द्रष्टा बनाते हैं
बुद्ध पुरुष वह रोशनी देते हैं जिससे सुख एवं दुःख दिखते हैं
बुद्ध पुरुष को खोजा नही जा सकता
बुद्ध पुरुष कहीं नहीं हैं और सर्वत्र हैं
बुद्ध पुरुष को देखनें की रोशनी ध्यान से मिलती है
ध्यान की गहराई में जब चेतना आत्मा को छूटी है तब उस घडी कोई बुद्ध वहाँ दिखते हैं
बुद्ध बताना तो वह सब चाहते हैं जिनकी अनुभूति उनको हुयी होती है
लेकिन …....
**इंद्रियों के माध्यम से अपनी अनुभूति ब्यक्त करनें की कोशिश अधूरी ही रहती है
**परम अनुभूति को इंद्रियों से ब्यत किया नही जा सकता
**परम सत्य ब्यक्त होते ही असत्य बन जाता है
**सत्य में वह जीता है जो गुणातीत होता है
**गुणातीत परम तुल्य होता है
**परम तुल्य योगी को जो समझता है वह स्वयं गुणातीत योगी ही होता है
**दो बुद्ध कभीं आपस में बातें नहीं करते
वे धन्य हैं जो बुद्ध - ऊर्जा क्षेत्र में रहते हैं
बुद्ध ऊर्जा क्षेत्र हैं - जैसे - कर्बला , काशी , मक्का , मानसरोवर , कैलाश , जेरुसलेम , द्वारका , उज्जैन , हरिद्वार , केदारनाथ , बद्रीनाथ , 51 शक्ति पीठें , 11 ज्योतिर्लिंगम के स्थान आदि
====ओम्=======
Sunday, June 3, 2012
जीवन दर्शन 53
आत्मा यदि मात्र बुद्धि की उपज है तो फिर उस ब्यक्ति की बुद्धि कैसी रही होगी जिसनें आत्मा के सम्बन्ध में सोचा होगा?
गीता में श्री कृष्ण कहते हैं,आत्मा के रूप में मैं सबके दृदय में रहता हूँ और इसके माध्यम से सब का आदि मध्य एवं अंत मैं ही हूँ
गीता में प्रभु यह भी कहते हैं,आत्मा मेरा ही अंश है
अगर आत्मा शब्द का जन्म न हुआ होता तो परमात्मा शब्द भी न होता
प्रभू का एक जीव-माध्यम सर्वत्र फैला हुआ है,सम्पूर्ण ब्रहांड में जो प्राण ऊर्जा का माध्यम है
प्रभु का यह माध्यम तीन गुणों के माध्यम माया के साथ है
माया से माया में दो प्रकृतिया हैं;अपरा एवं परा
अपरा साकार प्रकृति है जिसमें पञ्च महाभूत,मन,बुद्धि एवं अहँकार होते हैं
परा प्रकृति आत्मा माध्यम का बाहरी झिल्ली होती है जिसको चेतना कहते हैं और जिसके माध्यम से जीव एवं प्रकृति का मिलन होता है और यह मिलन ही नये जीव को संसार में ले आता है
यदि प्रकाश का अति शूक्ष्म कण फोटान हो सकता है तो फिर परमात्मा का अति शूक्ष्म कण आत्मा क्यों नहीं हो सकता?
विज्ञान के पास आज तक कोई कैसा ऊर्जा का श्रोत नहीं उपलब्ध जो अनादि हो और आत्मा जीव के देह में ऊर्जा का एक ऐसा श्रोत है जो अनादि है और जो देह समाप्ति पर मन एवं इंद्रियों को ले कर अन्य नया देह की तलाश भी करता है
देह में स्थित यह आत्मा का एक सीमित रूप जीवात्मा कहलाता है
आत्मा निर्गुणी है और जीवात्मा को निर्गुणी नहीं कह सकते क्योंकि यह मन एवं इंद्रियों के माध्यम से बिषयों सम्बंधित रहता है
जिसकी जीवात्मा इतनी निर्विकार हो गयी होती है जिसको जीवात्मा न कह कर आत्मा कहना असंगत न होगा,वह परा भक्त परम-गति प्राप्त करता है और वह देह में निर्गुण परम तुल्य होता है
भोगी जो भी करता है उसका हर कृत्य उसकी जीवात्मा को और विकारों से भरता रहता है और योगी के सभीं कृत्य उसकी जीवात्मा को और निर्मल करते रहते हैं
योग – साधना का अर्थ है जीवात्मा को निर्मल करना और निर्मल स्थिति में जीवात्मा वह दर्पण होता है जिसपर प्रभु दिखते हैं लेकिन देखनें वाला भोगी नहीं योगी ही होता है
=====ओम्======
Tuesday, May 29, 2012
जीवन दर्शन 52
हमारी स्मृतियाँ हमें गुमराह होनें से बचा सकती हैं
हमारी स्मृतियाँ हमें आसुरी मार्ग पर ले जा सकती हैं
हमारी स्मृतियाँ हमें प्रभु से जोड़ सकती हैं
इस पल से पहले की स्मृतियाँ ही हमारे इस पल की रूप-रेखा बनाती हैं
स्मृतियों किसी को प्रिय – अप्रिय बनाती हैं
स्मृतियाँ हँसाती-रुलाती हैं
जैसे कल का संचित धन आज के भोजन का साधन बनता है वैसे कल की स्मृतियाँ आज के मन की भोजन – माध्यम हैं
बुद्ध सिखाते थे,आलय विज्ञान;इस विज्ञान में मनुष्य के जन्म – जन्मान्तर की स्मृतियों में वापिस ले जानें की ब्यवस्था है और इस प्रकार सृष्टि के प्रारम्भ से ले कर आजतक की स्मृतियों से गुजरनें वाला अंत में स्मृति रहित हो जाता था और उसका मन एक दर्पण सा बन जाता था जिस पर प्रकृति का निर्माता प्रभु दिखनें लगता था और वह योगी तब आंखे बंद करके ध्यान में डूबा प्रभु में हुआ करता था
स्मृतियाँ एक तरफ मुक्ति के द्वार हैं और दूसरी तरफ नर्क का द्वार भी
भोग – तत्त्वों के सम्मोहन में बसे ब्यक्ति की स्मृतियाँ उसे नर्क में बसानें का यत्न करती रहती हैं
और भोग तत्त्वों का सम्मोहन जिस पर नहीं होता उसकी स्मृतियाँ प्रभु के मार्ग को दिखाती हैं
==== ओम्======
Saturday, May 26, 2012
जीवन दर्शन 51
क्या कभीं आप ऐसा सोचते हैं कि …....
आज आप जिन गलियों में किसी की उंगली पकड़ कर उसे घुमा रहे हैं [ अपनें बेटे को / बेटी को ] उन गलियों में कभीं आप को भी आपकी उंगली पकड़ कर कोई घुमाता रहा है /
जिस घर में आज आप किसी को दुल्हन [ पुत्र की पत्नी ] शब्द से संबोधित करते हैं उसी घर में किसी दिन उसी शब्द से कोई आप को संबोधित करता रहा है /
जिस घर में आप किसी को पानी लानें को कह रहे हैं उसी घर में किसी दिन कोई आप को पानी लानें को कहता था /
जिस घर का मालिक कल कोई और था आज उसी घर का मालिक आप है /
आज जिस संपदा का मालिक आप हैं कल उस का मालिक कोई और होगा /
कल आप किसी के पुत्र / पुत्री थे , आज को आप का पुत्र / पुत्री है और आनें वाला कल आप को किसी का दादा / दादी बनानें वाला है /
किसी दिन किसी की गोदी में आप होते थे और आज आप की गोदी में कोई और है /
ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जो आप को आकर्षित कर सकते हैं , आप की सोच की दिशा बदल सकते हैं लेकिन आप इब संवेदनशील तथ्यों की ओर पीठ किये हुए हैं / आप ज़रा सोचना ऎसी बातों को यदि आप समयानुकूल सोचते रहे को क्य आप में कभीं अहँकार आ सकता है ?
ऊपर की स्मृतियाँ आप को समभाव में रखती हैं
और
गीता कहता हैं-------
समभाव मुक्ति का द्वार है//
===== ओम्======
Thursday, May 17, 2012
जीवन दर्शन 50
देह की और ब्रहमांड की बनावटें एक सी हैं,वेद कहते हैं
देह,ह्रदय में बसे ब्रह्म की तलाश का माध्यम है और ब्रह्माण्ड की तलाश मन की तलाश है
ब्रह्माण्ड की रिक्तता में ब्रह्म प्रतिबिंबित होता है
मन की रिक्तता में ह्रदय में बसा ब्रह्म दिखता है
मन में कभीं दो सूचनाएं एक साथ नहीं रह सकती
मन कभीं स्वयं के संबंधमें नहीं विचार करता
मन जिस घडी स्व पर केंद्रित हो जाता है वह घडी रूपांतरण की घडी होती है
वह जो इस घडी को चूक गया , चूक गया और जो पकड़ लिया वह पार गया
भोग और भगवान एक साथ एक मन में नहीं बस सकते
लेकिन भोग के प्रति उठा होश प्रभु से परिपूर्ण कर देता है
मन को बाहर से अंदर की दिशा देना ही ध्यान है
जब मन बाहर न भाग कर अंदर रमता है तब वैराज्ञ आगमन होता है
वैराज्ञ निर्वाण का द्वार है
निर्वाण प्राप्ति ही परम गति है
परम गति का अर्थ है आवागमन स मुक्त हो कर प्रभु में समा जाना
=====ओम्======
Tuesday, May 15, 2012
जीवन दर्शन 49
यहाँ सभीं अपनें को आजाद समझते हैं , लेकिन … ...
हैं सभीं गुलाम , जैसे … ...
कोई ममता का गुलाम है
कोई कामना का गुलाम ही
कोई अहँकार का गुलाम है
कोई सौन्दर्यता का गुलाम है
कोई भोजन का गुलाम है
कोई लोभ का गुलाम है
कोई भय का गुलाम है
कोई पत्नी का गुलाम है
कोई पति का गुलाम है
कोई अपनें धार्मिक गुरु का गुलाम है इसलिए की जो संपदा उसके पास है वह कहीं सरक न जाए
कोई अपनें ब्यापार का गुलाम है
कोई मंदिर का गुलाम बन कर धन का स्वामी कुबेर बनना चाहते है
धन – धान्य , परिवार , वासना , अहँकार और सात्त्विक , राजस एवं तामस गुणों के तत्त्वों के सभीं गुलाम है लेकिन स्वयं को आजाद समझ कर सीना तान कर रह रहे हैं और उनका यहीं भ्रम उनको ज़िंदा भी रख रखा है / जिस दिन यह बोध हो जाता है कि हम उसकी गुलामी कर रहे हैं जो दो कौडी के हैं , जो मुझे नरक की ओर खीच रहे हैं उसी घडी रुपानारण हो उठता है और सत्य की किरण उस मनुष्य केसभीं नौ द्वारों को प्रकाशित कर देती हैंऔर वह ब्यक्ति परम आजाद हो कर चल पड़ता है परम धाम की ओर /
वह जिसकी पीठ भोग – संसार की ओर हो और नजरें अनंत में ठहरी हों वह है तिर्थंकर/ /
====ओम्=====
Thursday, May 10, 2012
जीवन दर्शन 48
बुद्धि से उपजी बात को प्रकट करनें के एक नहीं अनेक ढंग हैं
ह्रदय में उपज रही बात को प्रकट करनें का कोई ढंग नहीं
बुद्धि की बात को लोग सुनते से दिखते हैं और उसमें अपनें स्वार्थ की बात खोजते रहते हैं
ह्रदय की बात कहनें - सुननें की नहीं यह तो एक धारा है जो इसमें उतरा , बह गया
ह्रदय के भाव को जो भाषा में ढालना चाहा दुखी हुआ
मीरा को भी कहना ही पड़ा,अब मैं नाचैव बहुत गोपाल
आप मंदिर जा रहे हैं ? क्या कुछ देना है ? या कुछ लेना है ? इस बात को भी सोचना
जो आप देनें के लिए अपनें पास रखे हैं उसको देखना और जो पाना चाहते हैं उसको देखना
एक कौडी दे कर सम्राट बनना चाहते हो?
मनुष्य क्यों प्रभु को इतना बेवकूफ समझता है ?
मनुष्य प्रभु को भी क्यों धोखा देता रहता है?
इस पृथ्वी पर प्रभु के नाम का जितना फैला हुआ ब्यापार है उतना और किसी बस्तु का नहीं
पुरानें मंदिर पृथ्वी में समा रहे हैं और नये सर उठाये ऊपर उठ रहे हैं
नये मंदिर पुरानों को क्यों नही देखते?
एक तरफ लोग नयी मूर्तियों की रचना में लगे हैं और दूसरी तरफ लोग पुरानी मूर्तियों की तस्करी कर रहे हैं
एक तरफ कुछ लोग मंदिरों के आकार प्रकार को नया रूप दे रहे हैं और दूसरी तरफ कुछ लोग शास्त्रों को रूपांतरित करने में लगे हुए हैं
मनुष्य धर्म – कर्म सब को बदल रहा है लेकिंन स्वयं को?
===== ओम् ======