* जीवनके हर पलको रंगों नहीं , उसके हर पलके रंग को देखो और जब प्यारसे देखनेंका गहरा अभ्यास हो उठेगा तब जीवनके हर पलसे टपकते रंगों के प्रति होश उठनें लगेगा जो अन्तः करण में निर्विकार ऊर्जा को भरनें लगेगाऔर वह पल दूर न होगा जब आप की पीठ भोग संसार की ओर होगी तथा आँखों में जो होगा उसकी ही तो खोज केलिये मनुष्य योनि मिली
हुयी है ।
# जीवन सभीं जी रहे हैं : कुछका जीवन उनकी पीठ पर लदा हुआ है और जो ऐसे हैं , वे अपनें जीवनको देख नहीं पाते एवं कुछको उनका जीवन प्रभुके प्रसाद रूप में मिला होता है । प्रसाद रूप में मिला जीवन वाला जहाँ एक पलके लिए भी खड़ा हो जाता है, उड़ घडीके लिए वह स्थान तीर्थ जैसा हो उठता है।
* जिसको जैसा जीवन मिलता है ,उसे उसका मजा लेना चाहिये , दूसरे जैसा जीवन जीनें की चाह कभीं चैन से न रहनें देगी ।।
~~~ॐ ~~~
Monday, April 13, 2015
कतरन -11
Tuesday, April 8, 2014
हमें सोचना है
● संसार एक ऐसा मंदिर है जिसकी मूर्तियाँ हर पल बदल रही हैं ।
● संसार एक पाठशाला है जहाँ कर्म एक ऐसा माध्यम है जो भोगमें योगका संगीत सुनाता है और योग परम धामका मार्ग दिखाता है ।
● संसार में मनुष्य से एक कण तक में ऐसा नहीं की संगीत न हो ,पर उस संगीत को कौन सुनना चाहता
है ?
● संसार रिश्तों की जाल है जिसमें फसनें के सभीं आसार हैं लेकिन इन रिश्तों को समझ कर कुछ उस परम रिश्ते में पहुँच जाते हैं जिसकी खोज ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
● फूल आपस में अपनें -अपनें परम विचारों का आदान -प्रदान करते रहते हैं लेकिन उनके इस विचारों के आदान -प्रदान को सुनता कौन है ?
● मंदिर में मूर्ति जो देखनें सभीं जाते हैं लेकिन मूर्ति के अन्दर जो है उसे देखनेंका प्रयाश करनें वाले दुर्लभ हैं ।
● ऐसा ब्यक्ति होना संभव नहीं जो चाह रहित हो लेकिन चाह रहित जो हो गया ,वह ब्रह्म वित् होता है । ● क्रोध समय - समय पर अपना रंग एक गिरगिट की भांति बदलता रहता है ,पर इसके इस कुशलता को कौन समझता है ?
● आप लोगों द्वारा क्यों सम्मानित हो रहे हैं ,क्या कभीं इस बिषय पर आप का ध्यान गया है ?
● जब भी हम सूर्य की पहली किरण देखते हैं ,हमारा एक नया जीवन प्रारम्भ होता है लेकिन इस नए जीवन को नए ढंग से जीनें की सोच कितनों में होती है ? ~~ ॐ ~~