Sunday, April 27, 2014

क्या कहूँ ?

1- क्या कहूँ ? किससे कहूँ ? और कैसे कहूँ ? मुह खोलनें से पहले इन प्रश्नों पर विचार करलो वर्ना बाद में पछताना पड़ेगा ।
2- पेड़ से टपका फल और मुह से टपकी बात मे समानता है ।
3- अभीं तक वे आपके अपनें ही थे लेकिन दो बातें आपकी सुनते ही उनका रंग क्यों वदल गया ?
4- आप सोच रखे थे कि वे आपके अभिन्न मित्र हैं लेकिन जब आप उनको बरतना चाहा तो आपकी सोच खरी न निकल सकी और आपको जहाँ खुश होना था , दुखी हो उठे ।
5- प्रभु सबको देख रहा है , यह बात सब जानते हैं पर इसे समझनें वाले दुर्लभ हैं ।
6- जीवन प्रकृति की ओर से रंगीन है उसे और रंगीन बनानें की कोशिस उसकी खूबसूरती को छीन लेता है।
7- देहके दर्द को तो कहा जा सकता है लेकिन दिल के दर्द को किससे और कैसे कहूँ ?
8- दूसरों की कमजोरियों को बता - बता कर जीवन गुजार दी पर अपनी कमजोरियों को किससे और कैसे कहूँ ?
9- औरों से जो मिला उसे तो सबको बता दिया पर अपनों से जो मिला उसे किससे और कैसे बताऊँ ? 10- संसार में सबकुछ कहा जा सकता है ,सबकुछ गाया जा सकता है लेकिन जो प्यार मिलता है उसे कैसे कहा या गाया जा सकता है ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Saturday, April 26, 2014

जीवन इसका नाम है

1- कुछ ऐसी जीवन की घटनाएँ होती हैं जो रह -रह कर ह्रदय -मंथन करती रहती हैं ; न उनको चैन है और न हमें चैन से रहनें देती , आखिर उनका मुझसे कुछ तो सम्बन्ध होगा ही ।
2 - शरीर में जब अथाह उर्जाका संचार हो रहा होता है तब बिना सोचे कदम उठते रहते हैं और इस स्थिति में उठा हर कदम आपको मुसीबतोंमें उलझा सकता
है ।
3- जीवनमें बश एक कदम भी अगर सही न पडा तो जीवन का रुख ही बदल सकता है और एक हम हैं जो हर कदम गलत रख रहे हैं ।
4- मनुष्य हो और जी रहे हो पशु जैसा ? आखिर इस जीवन से क्या मिलनें वाला है ? कुछ घडी अपनें मूल जीवन में गुजार कर देखो ,क्या पता वहाँ ज्यादा सकून मिले ।
5- सबको अपना बनाना संभव नहीं और वनाया हुआ अपना दों कौड़ी का होता है । अगर किसी को तुम अपना बना लिया है तो उसे कोई और अपना बना लेगा फिर क्या करोगे ? क्योंकि दूसरों का बनना उसका स्वभाव बन चूका है । वह अपना है और रहेगा जो बिनु बनाए बन गया हो ।
6- जबतक ' मेरा ' शब्द है , ' तेरा ' शब्द भी रहेगा और ज्योंही मेरा की जगह उसका ले लेता है , तेराका स्वतः अंत हो जाता है । तेरा और मेरा दोनों उसका सागर में विलीन हो जाते हैं ।
7- कठपुतलियों का खेल देखे हो ? वे आपस में प्यार करते हैं और लड़ते भी हैं लेकिन वे स्वयं कुछ नहीं कर सकते , उनका ओपरेटर कोई और बाहर होता है । हम सब भी कठपुतलियाँ हैं और हम सबका ओपरेटर हम सब के अन्दर ही बैठा है ,मात्र उनमें और हम में इतना सा फर्क है ; उनका ओपरेटर दिखता है और हमें अपनें ओपरेटरको देखनें केलिए ध्यान से गुजरना पड़ता है ।
8- पप्पू कब पापा बन गए , पता न चला और पापा कब दादा बन गए यह भी सोचनें का बिषय है और इसके आगे दादा जी कब और कैसे अपनें से पराये हो गए ,यह भी समझनें की बात है ।है एक पर समयांतर में वह बदलता रहा या देखनें वाला बदलता रहा ,इस पर आप सोचें !
9- वह कौन इंसान है जो प्रभु की ओर पीठ किये जी रहा है ? शायद कोई नहीं है ; ऐसा इन्सान पाना कठिन है जिसके अन्दर प्रभु की सोच न हो ।
10- जीवन का केंद्र दो हो नहीं सकते , इंसान एक केंद्र पर टिकता नहीं और यही कारण है की मनुष्य सम्राट होते हुए भी हसते -हसते रो पड़ता है ।
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~

Friday, April 18, 2014

पढो और मनन करो

●● पढो और मनन करो ●●
1- प्रभु ! किसी की नज़र आप पर टिके या न टिके पर आपकी नज़र सब पर समभाव से टिकी होती है । 2-सत्यकी खोज इन्द्रियोंसे प्रारम्भ होती है और इन्द्रियोंकी समझ संदेह आधारित होती है , संदेहको भ्रममें रूपांतरित न होनें देना , ध्यान - मार्ग है , ध्यानमें संदेहको श्रद्धामें रूपांतरित होते देखना ध्यानको पकाता है और ध्यान जब पकता है तब जो दिखता है वह सत्य ही होता है ।
3- जिस घडी तन - मन दोनों प्रभुको समर्पित हो जाते हैं उसी घडी अनन्य भक्तिकी लहर परम गति की ओर चला देती है ।
4- चलना तो है ही , सभीं चल भी रहे हैं , लेकिन ज्यादातर लोग एक जगह पर कदमताल कर रहे हैं और सोचते हैं कि चल रहे हैं ।
5-सभीं जल्दीमें हैं , सबको फ़िक्र है कि इतना सारा काम इस छोटे से समयमें कैसे हो सकेगा क्योंकि जीवन छोटा है और काम अनंत है , आप समझाये हैं कि यह फ़िक्र हमारे जीवन - अवधिको और छोटा कर रही है ।
6- वेश - भूषासे चाहे जो बना लो , लोगों द्वारा चाहे जो उपाधि प्राप्त कर को जैसे जगत गुरु , योगाचार्य  कृपाचार्य या शंकराचार्य लेकिन हृदय रूपांतरण बिना भक्ति - रस पाना संभव नहीं और हृदयका रूपांतरण ही प्रभुका प्रसाद है जो किसी - किसी को मिल पाता है ।
7 - सबकी खोज एक है -सुख की प्राप्ति लेकिन उनमें कितनें सुखमें जी रहे हैं , ज़रा आँख उठा कर देखाना ?
8 - रात को भोजनका पहला कौर उठाते समय ज़रा सोचना कि आज दिन भर आप जो भी किये क्या वह यही दे सकता है ?
9 - यह न सोचो कि लोग आप से प्यार करें ,आप प्यार करनें का अभ्यास करते रहें ।
10 - कुछ करनें की सोच पर कबतक रुके रहोगे , उसे करनें की हिम्मत करो , आज जो आपके खिलाफ हैं ,कल आपके मित्र बन जायेंगे लेकिन यह काम इतना आसान नहीं ।
11 - जिसे पानें केलिए तुम सबकुछ खोना चाह रहे हो क्या वह आपको भी इतना ही चाहता है ,ज़रा सोचना इस बिषय पर ?
12- भोग उर्जाकी ऑंखें जो देखती हैं ,वह भ्रम ही होता है और योगकी आँखों में सत्य समाया हुआ होता है ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, April 8, 2014

हमें सोचना है

● संसार एक ऐसा मंदिर है जिसकी मूर्तियाँ हर पल बदल रही हैं ।
● संसार एक पाठशाला है जहाँ कर्म एक ऐसा माध्यम है जो भोगमें योगका संगीत सुनाता है और योग परम धामका मार्ग दिखाता है ।
● संसार में मनुष्य से एक कण तक में ऐसा नहीं की संगीत न हो ,पर उस संगीत को कौन सुनना चाहता
है ?
● संसार रिश्तों की जाल है जिसमें फसनें के सभीं आसार हैं लेकिन इन रिश्तों को समझ कर कुछ उस परम रिश्ते में पहुँच जाते हैं जिसकी खोज ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
● फूल आपस में अपनें -अपनें परम विचारों का आदान -प्रदान करते रहते हैं लेकिन उनके इस विचारों के आदान -प्रदान को सुनता कौन है ?
● मंदिर में मूर्ति जो देखनें सभीं जाते हैं लेकिन मूर्ति के अन्दर जो है उसे देखनेंका प्रयाश करनें वाले दुर्लभ हैं ।
● ऐसा ब्यक्ति होना संभव नहीं जो चाह रहित हो लेकिन चाह रहित जो हो गया ,वह ब्रह्म वित् होता है । ● क्रोध समय - समय पर अपना रंग एक गिरगिट की भांति बदलता रहता है ,पर इसके इस कुशलता को कौन समझता है ?
● आप लोगों द्वारा क्यों सम्मानित हो रहे हैं ,क्या कभीं इस बिषय पर आप का ध्यान गया है ?
● जब भी हम सूर्य की पहली किरण देखते हैं ,हमारा एक नया जीवन प्रारम्भ होता है लेकिन इस नए जीवन को नए ढंग से जीनें की सोच कितनों में होती है ? ~~ ॐ ~~

Sunday, March 23, 2014

किनारा

* जीवन सरक रहा है और हम किनारे की खोज में उसे देखनें में पूर्ण रूपसे असमर्थ हैं जो हमारा वर्तमान है ।
 * प्रकृति हमें आँखे दी है ,आगे देखनें हेतु लेकिन मनका बसेरा है स्मृतियों में । मन हमारे इन्द्रियोंका नियंत्रक है और इन्द्रियाँ अपनें -अपनें बिषयों की खोज में रहती हैं ।यह बिषय ,मन और इन्द्रिय समीकरण को समझना ही ध्यान या योग कहलाता है ।
 * क्या करोगे ?, मन स्मृतियों में सीमित रहना चाहता है और इन्द्रियाँ खोज रही हैं उस नए को जिसको पा कर वे तृप्त हो सकें लेकिन उनपर मन का नियंत्रण उनको नए तक पहुंचनें नहीं देता।
 * मनुष्य हो ,कोई अन्य जीव नहीं ,सोचो कि ---- 
> इन्द्रियाँ कैसे उस नए की खोज में सक्रीय हो सकें ?
 > मनको कैसे उसके बसेरे (स्मृतियों ) से बाहर निकाला जाय ? > और < 
बिषय से मन तक के अभ्यास योग से समभाव की स्थिति में पहुँचा जाय ,जहाँ बसता है ----- 
< परमानन्द > जिसकी खोज के लिए ही मिला है मनुष्य का 
जीवन । 
~~~ हरे कृष्ण ~~~

Monday, February 24, 2014

मन की गणित

# मन की उत्पत्ति सात्त्विक अहंकार से है और इन्द्रयाँ एवं बुद्धि राजस अहंकार से हैं ।मन विकारों का पुंज है और मन के बृत्तियों का द्रष्टा बन जाना ब्रह्म से एकत्व स्थापित करता है और ऐसे योगी को कृष्ण गीता में ब्रह्मवित् योगी कहते हैं ।
# भागवत कहता है कि मन की उत्पत्ति सात्त्विक अहंकार से है और गीता में प्रभु कृष्ण कहते हैं - इन्द्रियाणां मनः अस्मि लेकिन मनुष्य और ओर परमात्मा के मध्य यदि कोई झीना पर्दा है तो वह है मन रूपी पर्दा । मन जब गुणोंके सम्मोहन में होता है तब मनुष्यकी पीठ प्रभुकी ओर रखता है और जब गुणातीत होता है तब एक ऐसे दर्पण का काम करता है जिस पर जो तस्बीर होती है वह प्रभुकी तस्बीर होती है ।
# मन को निर्मल रखना ध्यान कहलाता है औए ध्यान बिधियों के अभ्यास के माध्यम से मन को निर्मल रखा जाता है । ध्यान के दो चरण हैं ,पहले चरण में इन्द्रियों एवं उनके बिषयों के सम्बन्ध को समझना होता है । इन्द्रिय -बिषय संयोग भोग है और गुणों के प्रभाव में जो भी होता है उसे भोग कहते हैं । भोग सुख क्षणिक सुख होता है जिसमें दुःख का बीज पल रहा होता है ।
~~~ ॐ ~~~

Monday, February 17, 2014

तेरी मेरी कहानी

1- तेरी , मेरी और सबकी एक ही कहानी है हम लोग इसे समझ नहीं पाते और इसे अलग - अलग रंग देनें लगते हैं ,ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इस लिए होता है कि हम सब माया सम्मोहित ब्यक्ति हैं । योगी इस माया रहस्य को समझता है और इस रहस्य के माध्यम से मायापति से एकत्व बनाए रहता है ।
2- कभीं एकांत में बैठ कर सोचना , क्या खोज रहे थे और क्या मिला ? इस बिषय पर गहरी सोच आपको वहाँ पहुँचा सकती है जहाँ भोग - योग का संगम है और जिसके आगे परम सत्य की गंगा बहती हैं ।
3- जो कोई आपको याद करता है ,उसमें उसका अपना गहरा स्वार्थ होता है , जब आपको इस सत्यका पता चलता है तबतक काफी देर हो गयी होती है और आप मायूस हो कर रह जाते हैं ।
4- हम अपनें जीवन को खूब फैला रहे हैं कभीं -कभीं फैलाते -फैलाते ऐसा लगनें लगता है कि हम तो इसे फैला रहे है पर यह फैलनें की जगह सिकुड़ता जा रहा है और जब यह सोच आती है तब हमारे ऊपर जो गुजरती है उसे सोचनें की हिम्मत मुझमें नहीं आपाती ।वह जो हिम्मत जुटा पाता है वह माया संचालित जीवन -रहस्य को समझ जाता है और प्रभु केन्द्रीय हो उठता है ।
~~ हरि ॐ ~~

Monday, February 10, 2014

संसार और हम

** संसारकी हवाको कौन पहचानता है **
1- संसार एक रंगमंच है जहाँ सबको एक बराबर मौका मिलता है ,स्वयंके असली चहरे को पहचाननेंको और स्वयंकी जब ठीक - ठीक पहचान हो जाती है तब वह ब्यक्ति उस परमको समझ जाता है जिससे और जिसमें इस संसार रंगमंचका अस्तित्व है ।
2 - हम संसारका किनारा खोजनेंमें अपनें जीवनके आखिरी किनारे पर जा पहुँचते हैं पर संसारका किनारा कहाँ मिलता है ? मिले तो तब जब हो ।
3- यहाँ कुछ खोजनें की क्या जरुरत , जो मिला हुआ है क्या वह कम है ? भविष्य की खोज में हम जीवित वर्तमान को मुर्दा बना देते हैं ।
4- खोज चाह की रस्सी है , जितनी बड़ी चाह होगी उसकी रस्सी ( खोज ) भी उतनी लम्बी होगी ।
5- कामना में रस है जो अग्नि का रुप लेलेता है उस समय जब कामना टूटने का भय होता है।
~~~ ॐ ~~~

Thursday, January 30, 2014

संसार एक रंग मंच है

** संसारकी हवाको कौन पहचानता है ?
1- संसार एक रंगमंच है जहाँ सबको एक बराबर मौका मिलता है ,स्वयंके असली चहरे को पहचाननेंको और स्वयंकी जब पहचान हो जाती है तब वह उस परमको समझ जाता है जिससे और जिसमें इस संसार रंगमंचका अस्तित्व है ।
2 - हम संसारका किनारा खोजनेंमें अपनें जीवनके आखिरी किनारे पर जा पहुँचते हैं पर संसारका किनारा कहाँ मिलता है ,मिले तो तब जब हो ।
3- यहाँ कुछ खोजनें की क्या जरुरत , जो मिला हुआ है क्या वह कम है ?
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, December 24, 2013

25 दिसंबर

● वे कौन हैं जो सुनते हैं ? ●
1- वे , जिनकी जीवन- यात्रा प्रकृति दर्शनके सिद्धांतो पर आगे बढती रहती है ,वे सुनते हैं - अपनें और दूसरोंके दिल की आवाजको।
2- वे सुनते हैं , उस आवाजको जिस आवाज को संत जोसेफ बाइबिक में शब्द कहते हैं और भारतीय दर्शन कहता है शब्दः ब्रह्मः ।
3- ज़रा सोचना - Pythagoras of Samosa ( 570-495BC ) उस समय बोले कि सभीं ग्रहों की अपनीं -अपनीं आवाजें हैं जबकि उस समय विज्ञान तर्क शास्त्रके गर्भ में था । पाइथागोरसकी बात को आजके वैज्ञानिक पकड़ने में सफल हुए
हैं ।पाइथागोरस ,महाबीर और बुद्ध लगभग समकालीन कहे जा सकते हैं और तीनों बुद्ध पुरुष थे जो प्रकृतिको सुनते थे और प्रकृतिकी भाषा को मनुष्य को सुनाते थे लेकिन सुनता कौन है ?
4- जब कोई नौजवान ऐसी स्थिति में फस जाता है जैसे मकड़ी अपनें द्वारा निर्मित जाल में फस कर दम तोड़ जाती है , तब वह नौजवान बड़े -बुजुर्गों की बातको तबतक केलिए सुनता है जबतक वह उस स्थितिसे निकल नहीं लेता , फिर कौन किसकी सुनता है ?
5- मनुष्यको छोड़ कर अन्य सभीं जीव अन्य जीवों के गंध , आवाज और इशारों को सुनते हैं और मनुष्य खुदके आत्मा की भी आवाज नहीं सुनता , पता नहीं किसके लिए और कहाँ गुम रहता है ?
6- मनुष्य एक्टिंग करनें में स्वयं को इतना दक्ष कर लिया है की अब जानवरों को भी एक्टिंग का प्रशिक्षण देनें लगा है और इस एक्टिंग से सम्मोहित मनुष्य स्वयं के दूर होता चला जा रहा है ।
7- दूसरों को सुननेंकी रीति जिसनें चलाई , वह एक सिद्ध योगी रहा होगा । दूसरोंको सुननें का गहरा अभ्यास इन्द्रियों के रुख को बदल सकता है और बाह्य गामी इन्द्रियाँ अन्तः गामी हो कर परम पर केन्द्रित हो सकती हैं जहाँ से शूक्ष्म शरीर परमगति की यात्रा पर निकलता है ।
8- कबीर कहते हैं , अपनीं पुतलियों को उल्टा करो और जिसे Turning in कहते हैं झेन रहस्यदर्शी , क्या है इन बातों का रहस्य ? कबीर जी के कहनें का भाव है कि इन्द्रियों के बाहर भ्रमण करनेंकी आदत को बदलो ,उनको अन्तः गामी बनानें का अभ्यास करो अर्थात दूसरोंको सुननें के अभ्यासके माध्यम से स्वयंको सुननेंका अभ्यास करना ।
9- दो घडी ही सही ,एकांत में बैठकर सामनें एक मोमबती जला कर उस योगीके उस समय की दिल की आवाजको सुनना जब उसके अपनें लोग ही उसे चांदी के चंद टुकड़ों की लालच में बेच दिया था और उस परम पुरुष को शूली पर लटका दिया गया था । 10- 440 AD December 25th begins to be celebrated as the birthdate of Jesus Christ.
<> जेससकी आखिरी आवाज को सुनकर जुदाद ,  उनका बुद्धिजीवी शिष्य जो उनकी ओर पीठ कर लिया था और उनके अंत का कारण बना , वह अपनें को सम्हाल न सका और आत्म हत्या कर लिया ।
<> जेसस का आखिरी बचन था : हे प्रभु ! मेरा गुनाह क्या था ?
~~ ॐ ~~

Sunday, December 8, 2013

ध्यानकी दो बातें

1- अहंकार और पीपल बृक्षको निर्मूल करना असंभव तो नहीं पर है कठिन और अहंकार रहित जीवन समाधि का मार्ग है ।
2- जो इस संसारमें चंद घडी का मेहमान है उससे पूछना -क्या जो आप खोज रहे थे वह मिला ? वह अपनीं बंद आँखें थोड़ी सी खोलेगा ,उत्तरमें दो बूँदें आंसूके टपकेंगे और फिर आँखें बंद हो जायेंगी ।
3- भोग वह जो आपको तृप्त करनेंकी लालच में और अतृप्त बनाता है और ध्यान वह जो लालच क्या है ? को समझा कर तृप्त करता है ।
4- सूर्यकी प्रातः कालीन किरणें कह रही हैं : खोज लो उसे जिसे कल न खोज पाए थे , देखना कहीं आज भी न चूक जाना ।
5- सुबह सूर्यकी किरणें उतरनें ही वाली हैं ,उनके आगमनमें चिड़ियों का झुण्ड वैदिक मन्त्रोंका गान कर रहा है , जितनें भी जड़ - चेतन हैं सबमें एक नयी उर्जा दिख रही है ,सब चल पड़े हैं ,लग रहा है आज सभीं जरुर उसे हासिल कर लेंगे जिससे अभीं तक हासिल नहीं कर पाए हैं ।
6- जब परमात्मा पूछेगा , तुम अपना संसार का अनुभव ब्यक्त करो ? क्या कहोगे , वहाँ ? तुम इतना तो समझते ही हो कि वहाँ झूठ नहीं बोला जा सकता और यहाँ झूठको ही तुम सत्य समझते / समझाते रहे हो ।
7- सत्यकी हमें पहचान नहीं और कभीं उसे पहचाननें की कोशिश भी नहीं की और सर्वत्र सत्य ही सत्य है झूठ तो एक भ्रम है फिर हम इस संसार में भ्रमित जीवन गुजार रहे हैं और भ्रम /संदेह /अहंकार वहाँ के द्वार तक पहुंचनें ही नहीं देते , फिर हमारा क्या होगा ? हम संसार और उस द्वार तकके आवागमन में तबतक फसे रहेंगे जबतक हमारा परिचय सत्य से नहीं हो जाता ।
8- बस्तुओं में हो रहा रूपांतरण सत्यकी परछाई है , परछाई को पकड़ कर अपनी यात्रा का रुख बदल कर सत्य तक पहुँचा जा सकता है लेकिन परछाई पर ही रुके रहना सत्य से दूर रखेगा ।
9- दुःख सत्य की परछाई है और सुख सत्य है । दुःख सत्य तक पहुंचनें का सुगम मार्ग है और इन्द्रिय भोग - सुख , सत्य मार्ग से विचलित करनें का आसान कारण है ।
10- भोगकी यात्रा जब विश्राम अवस्था में आ जाती है तब प्रभुका द्वार वैराग्यकी चाभी से खुलता है ।
~~ ॐ ~~

Tuesday, December 3, 2013

सांख्य योग का आधार

● सांख्य योगका आधार ●
1- निर्मल चित्त कैवल्यको आमंत्रित करता है ।
2- कैवल्य समाधि अनुभवके बादकी स्थिति होती
है ।
3- कैवल्यमें उतरा योगी कहता है -
अहम् ब्रह्माष्मि ।
4- तामस - राजस गुणोंके सम्मोहनसे मुक्त निर्मल चित्त वालेको भगवानका बोध स्वतः हो जाता है ( भागवत :1.2.19 -20 ) ।
5- गुण तीन प्रकार के हैं -सात्त्विक ,राजस और तामस ।
6- अहंकार भी गुणोंके आधार पर तीन प्रकार के हैं । 7- सात्त्विक गुणकी उर्जा में तन , मन और बुद्धि प्रभुमय होते हैं और उस ब्यक्तिको कण -कण में प्रभु ही प्रभु दिखता है ।
8- राजस गुणकी उर्जा आसक्ति ,काम ,कामना ,क्रोध और लोभके माध्यमसे बाधती है ।
9- तामस गुणकी उर्जा मरण मोह ,आलस्य और भयके लक्षण दिखते हैं ।
10 - सात्त्विक अहंकार से मन ,राजस अहंकार से 10 इन्द्रियाँ ,बुद्धि और प्राण तथा तामस अहंकारसे पांच महाभूत और पांच तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है । ~~ ॐ ~~

Friday, November 29, 2013

मूर्ति से

● मूर्ति से ●
1- दर्पणके सामनें खड़े हो कर सभीं अपनेंको अभिनेता समझते हैं , कुछ क्षण केलिए लेकिन कभीं किसी मंदिरकी मूर्तिके सामनें खड़े हो कर आप अपनें को आँखें बंद करके देखना , वहाँ आपको अपना असली चेहरा दिखेगा और आप बेचैन होनें लगेंगे । 2- एक वह है जो सबकुछ होते हुए भी अतृप्त है और एक वह है कुछ न होनें पर भी आनन्दित है ।
3- भक्त सबकुछ खोकर उसे पा लेता है और आनंदित रहता है और भोगी सबकुछ होते हुए भी उसकी ओर पीठ किये मुह लटकाए जीता है ।
4- सभीं उसके द्वार तक पहुँचते हैं लेकिन हजारों साल गुजर जानें के बाद कोई एक ऐसा मिलता है जो द्वार खुलनेंका इन्तजार करता है।
5-जितनें द्वार खुलनें का इन्तजार करते होते हैं उनमें कोई एक - दो ऐसे होते हैं जो द्वारमें प्रवेश कर पाते हैं अन्यको माया अपनी ओर खीच लेती है , पीछे ।
6- मंदिरके दरवाजे तक पहुँचना , अति सरल तो नहीं पर सुगम जरुर है लेकिन पूर्तिके सामनें खड़ा रहना इतना सरल नहीं , मूर्तिवत होना अपनें बशमें नहीं और जो मूर्तिवत हो गया , वह उसका हो गया । 7- ध्यानसे हृदय- कपाट खुलता है ।
8- हृदयमें परम बसता है ।
9- हृदय -कपाट खुलते ही वह उर्जा जो अन्दरसे बाहर बह रही थी थम जाती है और बाहरसे परम उर्जा अन्दरकी और आती स्पष्ट रूपसे दिखने लगती है ।
10- जब यह उर्जा नाभिसे हृदयमें पहुँचती है तब वह ध्यानी अब्यक्त से जुड़ जाता है और अब्यक्त हो उठता है ।
~~ ॐ ~~

Monday, November 25, 2013

दर्द और रिश्ता

● दर्द और रिश्ता ●
1- प्रतिदिन दर्द और रिश्ताके अनुभवसे हम गुजरते हैं लेकिन दर्द इए रिश्ता को समझनें की कोशिश हम नहीं करते ।
2- दर्दमें रिश्ते और रिश्तेमें दर्द दोनों का अनुभव एक दुसरे से थीक उल्टा होता है , दर्द में रिश्तेकी तलाशमें मन होता है और रिश्ते में दर्दका अनुभव वैराग्य की ओर चलता है ।
3- दर्दसे रिश्ता है ? या रिश्तेसे दर्द है ? बहुत कठिन है इस समीकरणको समझना ।
4- दर्दमें जो रिश्ता बनता है वह परम रिश्ता होता है जैसे माँ और औलादका रिश्ता जो प्रसव पीड़ासे सम्बंधित रिश्ता है लेकिन अब यह रिश्ता भी कमजोर होता दिख रहा है क्योंकि अब शिशुका जन्म बिना प्रसव पीड़ा संभव  है ।
5- भक्त और भगवानके मध्य दर्दका रिश्ता है जहां भक्त रोता - रोता नाचनें भी लगता है जैसे मीरा और परमहंस श्री परमहंस जी ।
6- भक्तिमें उठी दर्द जब भक्तके हृदयको पिघलाती है तब उसके तरल हृदयमें भगवान दिखता है और तब उसका सम्बन्ध संसारसे टूट जाता है और वह शुद्ध परा भक्तिकी समाधिमें पहुँच कर प्रभु ही बन जाता है । 7- रिश्ते में जो दर्द उठता है वह दो प्रकारका होता
है ; एक वह दर्द जो जुदाईके कारण उठता है और दूसरा दर्द कृतिम दर्द होता है जो बुद्धि - अहंकारके सहयोगसे उठता है । जुदाई का दर्द प्राकृतिक दर्द होता है जिसके तार हृदय से जुड़े होते हैं लेकिन कृतिम दर्द बुद्धि एवं अहंकार की उपज है ।
8- प्राकृतिक दर्द हृदय का दर्द है और कृतिम दर्द अहंकारकी उपज है । अहंकारका दर्द नर्क में पहुंचता है और प्राकृतिक दर्दमें परमकी खुशबू मिलती रहती
है ।
~~ ॐ ~~

Sunday, November 24, 2013

एक सोच

●● एक सोच - 1 ●●
1- सत्य भोगीके लिए एक भ्रम है और भोग उनके लिए परम सत्य है ।
2- योगीके लिए सत्य उनका बसेरा है और भोग सत्यका द्वार ।
3- भोगी भोगकी सुरक्षा हेतु भ्रमित मनसे सत्यको देखता है , और काम उसका परम सत्य है ।
4- प्रकृतिमें मनुष्यको छोड़ कर अन्य सभीं जीवोंका केंद्र भोग है पर मनुष्यके जीवनके दो केंद्र हैं ( bipolar life ) - एक भोग और दूसरा योग ।
5 - गणितमें अंडाकार आकृति जिसे इलिप्स कहते
हैं , उसके दो केंद्र होते हैं ।
6 - मनुष्य जब भोगकी ओर कदम उठता है तब उसे योग अपनी ओर आकर्षित करता है और जब योग में होता है तब उसे भोग खीचता है ।इस प्रकार मनुष्य कभी संतुष्ट नही हो पाता ।
7 - अपनें अनुकुल औरोंको बदलनें की सोच दुःखके सिवाय और क्या दिया ? लेकिन स्वयंको बदलनेंका अभ्यास ध्यान प्रक्रिया है जो परम से जोडती है ।
8 - संसारकी सोच आपको सिकोड़ती चली जाती है और प्रभुकी सोच आपको फैलाती रहती है । पहली स्थिति में दुःखकी और दूसरी स्थितिमें आनंदकी उर्जा तन-मन में भरती है ।
9 - जैसे हो वह आपका अपना अर्जित किया हुआ
है , जहाँ लोगो केलिए आप सुखी दिखते हैं और अपनें लिए दुखी रहते हैं पर यदि आप स्वयंको अपनें कृत्यों में देखनें का अभ्यास करें तो एक दिन आप अन्दर - बाहर से सुखी ही सुखी होंगे ।
10 - भोगकी यात्रामें जब हम दो कदम चल लेते हैं और देखते हैं अपनीं स्थितिको तो पहली जगहसे चार कदम अपनेंको पीछे पाते हैं लेकिन योगी योग की यात्रामें पीछे मुड़ कर देखता ही नहीं और जहाँ भी होता है जैसे भी होता है , खुश रहता है ।
11- अपनेंको दूसरोंकी तुलनामें देखनेंका अभ्यास आपको अपनेंसे दूर करता जाता है।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, November 16, 2013

ध्यान सूत्र

मेरी नज़र में - 1
1- कर लो इकठ्ठा जितना चाहो लेकिन साथ ही साथ यह न भूलना कि अंतमें खाली हाँथ ही जाना होगा ।
2- मनुष्य योनि स्वयंमें एक तीर्थ है और हर मनुष्य तीर्थंकर , तीर्थंकर अहंकार - गुण अप्रभावित ब्रह्मवित् होता है , यह सोच बना कर जीना स्वयंसे मिला देता है ।
3- कामना - अहंकार रहित जीवन परम अनुभवका द्वार है ।
4- जीवनको जीनें वाला लाखोंमें एक हो सकता है लेकिन अन्य सभीं जीवनको पीठ पर ढोनें वाले हैं । 5- गहरी कामना अहंकारकी छाया है ।
6- मोह तामस अहंकारकी पहचान है ।
7- लोभ असंतोष की झलक है ।
8- मेरा और तेरा का भाव फैलनें नहीं देता और बिना फैले प्रकृति से एकत्व स्थापित नहीं हो सकता । 9- प्रकृतिसे एकत्व स्थापिर होते ही प्रभुकी खुशबू मिलने लगती है ।
10- साधनाकी डगर है बहुत कठिन लेकिन इस डगर की यात्राके लिए ही तो मनुष्य योनि मिली हुयी है । ~~~ ॐ ~~~