1 - जन्मसे जो कर्म मिला है वह तो परिवर्तनीय है लेकिन कर्म से जो जन्म मिला है उसे तो जीना ही
पडेगा ।
2 - जो जहाँ से आता है उसे देर - सबेर वहीँ लौटना ही पड़ता है । उस स्थानको गीत : 2.28 अब्यक्तकी संज्ञा देता है ।
3 - हमसब का वर्तमान एक यात्रा है पर ऐसी सोच रखता कौन है ? जो ऐसी सोच से तृप्त है , वह है ,
बैरागी ।
4 - जो मजा रिश्ता बनानें में मिलता है वह मजा रिश्ता बना कर जीनें में नहीं रह पाता लेकिन ऐसी बात उनसे सम्बंधित है जो बासनाके सम्मोहन में रिश्ते जोड़नें में जल्दी करते हैं । भक्त और मालिक का आपसी संबंध जिसे रिश्ता तो नहीं कहा जा सकता , तबतक बना रहता है जबतक दोनों आमनें - सामनें होते हैं लेकिन वह वक़्त भी आ ही जाता है जब भक्त अपनें मालिक में समा जाता है ।
5 - दूसरे के जीवन पर अपनीं आँख न गड़ाओ , तुझे जो मिला है , इसका मज़ा लो ।
~~~ ॐ ~~~
Friday, June 5, 2015
कतरन - 15 जन्म से जो कर्म ...
Saturday, May 23, 2015
कतरन - 14 ( संसारकी हवा हमें कहाँ से कहाँ ले जाती है )
* मनुष्यके माथेसे पसीना टपकने लगता है और धीरे - धीरे भोगकी सोचकी सघनता गहरानें लगती है ।
* मनुष्यके अपनें भोग - सुखमें परम सुखको पकड़ने की प्यास हर भोग - क्षणके साथ और तिब्र हो जाती है । * अपनें और परायेके बीचकी दूरी बढ़नें लगती है ।
* अहंकार कामना पूर्तिके लिए कहाँ - कहाँ चक्कर नहीं लगवाता ।
* जैसे दुःख निवारण हेतु जल्दी - जल्दी दवा और हकीम बदले जाते हैं वैसे कामना पूर्ति हेतु देवताओं एवं गुरुओंको हम बदलनें लगते हैं ।
<> और यह भ्रमित भोग - सुख में परम सुख की तलाश हमें कहाँ - कहाँ नहीं भगाती ? जितना हम भागते हैं - परम सुख मुझसे उतना और दूर होता दिखनें लगता है ।
* हम आँखें बंद करने अपनीं हर कामयाबी पर स्वयं अपनीं पीठ ठोकने में कभीं नहीं चूकते ।
* हम यह समझनें में कभीं नहीं चूकते कि हमारी कामयाबी हमारे अथक श्रमका फल है और नाकामयाबीका कारण मैं नहीं वह है ।
* संसारकी हवाके प्रभावमें हम इतनीं बेहोशीमें आ जाते हैं कि लोगोंको धोखा देते - देते इतने आदी हो जाते हैं कि फिर अपनेंको भी धोखा देनें लगते हैं ।
* हम जब स्वयंको धोखा देनें में पक जाते हैं तब परमात्माको भी धोखा देनें लगते हैं ।
* संसारकी हवा हमारे होशके ऊपर बेहोशीकी चादर धीरे - धीरे ऐसे चढ़ाती चली जाती है कि आगे चल कर यही चादर कफ़न बन जाती है और हम होश खोजते - खोजते बेहोशी में दम तोड़ देते हैं ।
* भोगके क्षणिक सुखमें परम सुखकी तलाश की यात्रा भोगके सम्मोहन के कारण अधूरी ही रह जाती है और पुनः जन्म से यह यात्रा फिर शुरू हो जाती है ।
~~~ॐ ~~~
Wednesday, May 13, 2015
कतरन - 13
* दूसरोंके घरके दरवाजोंमें वे झाँकनेका प्रयत्न करते रहते हैं , जिनके लिए उनके अपनें घरका दरवाजा बंद हो गया होता है ।
* अपनीं गन्दगी छिपानेंके चक्करमें हम दूसरों को गंदा बनानें में कोई कसर नहीं छोड़ते।
* किसी की हिम्मत नहीं जो मेरे सामनें मेरी बुराईकी किताब खोल सके लेकिन जो खोलनें में समर्थ दिखते हैं , उनसे हम दूरी बनाकर रहते हैं ।
* सच्चाई को कहना बहुत आसान है लेकिन सुनना बहुत कठिन ।
* प्रकृति की तरफसे सबको सरल जीवन मिला हुआ है लेकिन मनुष्य सरल जीवन जीनें का आदी नहीं । ~~~ ॐ ~~~
Friday, May 8, 2015
कतरन - 12
कतरन -12
जरा सोचना :----
# नदियोंके साथ ---- # पहाड़ोंके साथ --- # जंगलोंके साथ --- # पेड़ोंके साथ ---- # समुद्रके साथ ---- # पशुओंके साथ ---
और अब
अंतरिक्षके साथ --- अपनें परिवार के साथ एवं स्वयं अपनें साथ --- हम सब क्या कर रहे हैं ?
# प्रकृति प्रभुको देखनेंका आइना है ।
* वैज्ञानिक , दार्शनिक , कवि , लेखक , ऋषि और अन्य सत्यके खोजी एक प्रभुके अनेक रूपों में देखा और उपनिषद्के ऋषियोंनें यह भी नहीं , वह भी नहीं अर्थात नेति - नेति के माध्यम से सबको ऐसे मार्ग पर रखना चाहा जो प्रकृति दर्पण पर ही हम सबका ध्यान केंद्रित रखती है।
# और#
आज हम सब इस प्रकृति - दर्पणके अस्तित्व को ही समाप्त करनें पर जुटे हुये हैं । # फ्रेडरिक नितझे आज से 60 साल पहले मनुष्यके मनोविज्ञानके रुखको भाफ गया और एक दिन बोल उठा कि :----
" प्रभु मर चुका है , उसे हम सब मार चुके हैं अब वह कभीं नहीं उठेगा और हम सब आजाद हैं ।
~~~ ॐ ~~~
Monday, April 13, 2015
कतरन -11
* जीवनके हर पलको रंगों नहीं , उसके हर पलके रंग को देखो और जब प्यारसे देखनेंका गहरा अभ्यास हो उठेगा तब जीवनके हर पलसे टपकते रंगों के प्रति होश उठनें लगेगा जो अन्तः करण में निर्विकार ऊर्जा को भरनें लगेगाऔर वह पल दूर न होगा जब आप की पीठ भोग संसार की ओर होगी तथा आँखों में जो होगा उसकी ही तो खोज केलिये मनुष्य योनि मिली
हुयी है ।
# जीवन सभीं जी रहे हैं : कुछका जीवन उनकी पीठ पर लदा हुआ है और जो ऐसे हैं , वे अपनें जीवनको देख नहीं पाते एवं कुछको उनका जीवन प्रभुके प्रसाद रूप में मिला होता है । प्रसाद रूप में मिला जीवन वाला जहाँ एक पलके लिए भी खड़ा हो जाता है, उड़ घडीके लिए वह स्थान तीर्थ जैसा हो उठता है।
* जिसको जैसा जीवन मिलता है ,उसे उसका मजा लेना चाहिये , दूसरे जैसा जीवन जीनें की चाह कभीं चैन से न रहनें देगी ।।
~~~ॐ ~~~
Wednesday, March 18, 2015
कतरन - 10
Saturday, March 14, 2015
कतरन - 9
सोच - सोच कर ----
* सोच - सोच कर जब बुद्धि - मन उपराम की स्थिति में आते हैं तब उसकी मामूली सी झलक मिलती है ।
* उसकी परीक्षा में कोई - कोई और कभीं - कभीं औअल आता है ज्यादातर लोग असफल ही होते हैं पर कुछेक कक्षोन्नति दर्जे में सफल होनें में कामयाब हो पाते हैं ।
* उसकी परीक्षा ऐसी होती है जिसकी कोई पूर्व सूचना नहीं होती और ज्यादातर लोग बिना तैयारी इम्तहान देते हैं तथा इम्तहानके बाद भी बहुत कमको यह पता चलता है कि उसका इम्तहान हो चूका है ।
* यात्राका मज़ा तब मिलता है जब तन यात्रा पर हो और मन शांत हो कर यात्राका द्रष्टा बन गया हो ।
* संसारमें भोगकी यात्रा सुख - दुःखकी यात्रा है और इन दो तत्त्वोंके मध्यसे जो समभावकी यात्रा है ,वह है परमकी यात्रा ।
●~~~ ॐ ~~~●
Saturday, March 7, 2015
कतरन - 8
* मुझे 16 सालसे अधिक यह समझनें और महसूश करनें में लगे कि खूनके रिश्ते रेशमके धागे जैसे मजबूत और सूक्ष्म बंधन हैं जो ध्यानकी गहराई में उतरनें नहीं देते ।
* जब सोचता हूँ कि बुद्ध आधी रातको पत्नीके प्रसव वेदनाकी चीख सुन कर और नवजात पुत्रकी पहली आवाज सुनकर कैसे वैराज्ञ में उतरे होंगे ? तब मुझे कुछ - कुछ ऐसा लगनें लगता है कि उस समय वे अपनें जन्मकी स्मृति में पहुँच गए होंगे जहाँ एक जंगल में उनकी माँ प्रसव वेदना में चीख रहे होंगी और प्रसवके बाद शिशु रूपमें बुद्ध रो रहे होंगे ।बुद्ध बाद में आलय विज्ञानकी खोज की जिसे महावीर जाति स्मरण नाम दिया था ।यह विज्ञान एक ध्यानकी विधि है जिसमें अपनीं चेतनाको अपनें पिछले जन्मों तक के अनुभवों में पहुँचाया जाता है ।वर्तमान जीवनके अनुभव से गर्भके अनुभव तक और गर्भके अनुभवसे गर्भमें आनेंके अनुभव तक और इस प्रकार अपनें पिछले जन्मोंनके जीवनोंके अनुभवोंमें पहुँचना ही आलय विज्ञान है ।बुद्ध का बेटा 16 साल इंतजारके बाद पैदा हुआ , ऐसी परिस्थिति में बुद्धको उसका जन्म रेशम के सूक्ष्म धागे जैसे स्नेहके बंधनसे बध जाना था लेकिन हुआ उल्टा , वे बंधन मुक्त होकर वैराग्य में पहुँच गए ।
* वक़्त या काल की अपनीं नज़ाकत है ; एक तरफ ख़ुशीके लड्डू रख देता है और दूसरी तरह दिलको गमकी आँसू से भर देता है ,ऐसी स्थिति में जो होता है , वह क्या करे ?
* आये दिन शुभ कामनाएं मिलती रहती हैं जैसे होली ,दशहरा , दीपावली , शिव रात्रि ,बसंत पंचमी ,गुरु पर्व , ईद , बड़ा दिन आदि -आदि । आखिर इतनी सारी शुभ कामनाएं जाती कहाँ हैं , हम तो दिन प्रति दिन घटते ही जा रहे हैं ?
* भारत दुनिया भरके पर्वोंको मनाता है ,जितनें पर्व भारत में मनाये जाए हैं उतनें पर्व संभवतः पृथ्वीके किसी और भागमें नहीं मनाये जाते होंगे लेकिन इन पर्वोंका लोगोंके दिल पर कोई असर नहीं दिखता ।
* पर्वों का मनाना ध्यानका एक माध्यम हुआ करता था पर अब क्षणिक मनोरंजनका साधन बन कर सिकुड़ सा गया है ।
●~~~ ॐ ~~~●
Wednesday, March 4, 2015
कतरन - 07
* मनुष्यके अन्दर दो ऐसे स्पेस हैं जहां भाव पैदा होते रहते हैं - मन और हृदय ।
* मनके भावको जो भाषा में ढ़ालनेका यत्न करते हैं ,कवि बन कर रह जाते हैं
> और <
* जो हृदयके भावोंकी धारामें बहनेंका अभ्यास कर लेते हैं , वे नानक -मीरा जैसे भक्त बन कर एक दिन बहते - बहते परम सागरमें पहुँच कर स्वयं परम सागर बन जाते हैं ।
●~~~ ॐ ~~~~●
Monday, March 2, 2015
कतरन - 6
Monday, February 16, 2015
कतरन - 5
* मनुष्यके पास आज क्या नहीं हैं ? लेकिन फिरभी वह दिन प्रति दिन बाहर से फैलता और अन्दरसे सिकुड़ता जा रहा है , आखिर यह घटना मनुष्यको कहाँ पहुचाना चाह रही है ?
* आज जितनी दुकानें योग -ध्यान से सम्बंधित खुलती जा रही हैं , आयुर्वेदका जितना फैलाव हो रहा है और इन सब में मनुष्यकी जितनी दिलचस्बी बढ़ती सी दिख रही है , उसके हिसाब से तो :--
** मनुष्यको अन्दर से फैलना चाहिए था और बाहरसे सिकुड़ना चाहिए था पर हो रहा है सब उल्टा ,आखिर क्यों ?
** जब अहंकारकी सघनता बढती है ,तब मनुष्य बाहर से फैलता है और जब मनुष्यकी बुद्धि निश्चयात्मिका बुद्धि न रह कर अनिश्चयात्मिका बुद्धि हो जाती है तब मनुष्य अन्दरसे सिकुड़नें लगता है --- अर्थात -
# इस समय मनुष्य अहंकार और संदेहका गुलाम होता जा रहा है और मोह एवं भयमें अपनी पक्की बस्ती वना रहा है और यदि ऐसा है तो आयुर्वेद एवं ध्यान का बढ़ता विस्तार बाहर - बाहरसे तो प्रभावी सा दिखता रहेगा पर मनुष्य उनको दिल से स्वीकारनें में समर्थ नहीं हो सकेगा ।ऐसी परिस्थिति में योग , ध्यान और आयुर्वेद क्या कर सकते हैं जब मनुष्य स्वयंको बदलना ही नहीं चाह रहा ? # जैसे - जैसे भौतिक ज्ञान बढ़ रहा है ,मनुष्य की बेचैनी बढती जा रही है जबकि बेचैनी घटनी चाहिए थी ।ऐसी जानकारी जो बेचैनी को बढाती हो , उसे ज्ञान नहीं अज्ञान कहते हैं ।
# जैसा बीजोगे , वैसा काटोगे ।
~~~ ॐ ~~~
Wednesday, December 10, 2014
कतरन - 4
Saturday, November 22, 2014
कतरन भाग - 3
Sunday, November 16, 2014
कतरन भाग - 2
Monday, November 10, 2014
कतरन भाग - 1
● कतरन भाग - 1●
# कबतक सहारेके इन्तजार में बैठे और उसके बारे में सोचते हुए समय को बर्बाद करते रहोगे ? क्या तुम्हें अपनें पर भरोषा नहीं कि अकेले कुछ कर
सको ? उठो और कदम बढाओ आगे , समय की गति को कौन जानता है , कहीं देर न हो जाए ।
# तुम भी उनकी तरह ही हो,एक इंच भी उनसे छोटे नहीं , फिर क्यों अपनें को सिकोड़ते चले जा रहे हो ? उठो , उनको प्रणाम करो ,जिनका तुम इंतज़ार कर रहे हो और अहंकार रहित भाव दशा में अपनें भविष्य निर्माण का पहला कदम भरो ।
# सच्ची लगन से तुम अपना पहला कदम तो उठाओ, दूसरा सही कदम स्वतः उठेगा, तुम संदेह क्यों करते हो , संदेह में सत्य असत्य सा दिखने लगता है ।
# पराश्रित रहना स्वयं को जीते जी कब्र में रखनें जैसा है ,मनुष्य हो ; मात्र मनुष्य एक ऐसा प्रकृति का उपहार है जिसके आश्रित संपूर्ण जड़ -चेतन हैं और यदि वह किसी के आश्रय जीना चाहता है तो वह जियेगा सही लेकिन मुर्दे जैसी जिंदगी उसे
मिलेगी ।परमात्मा के सहारे पर भरोषा मजबूत करो। क्या किसी ब्यक्ति के सहारे के भिखारी बनें बैठे हो ? एक भिखारी दुसरे भिखारी को क्या दे सकता है ? ज़रा गंभीर हो के सोचो तो सही ?
# क्या कभीं इस बात पर सोचते हो कि तुम जिससे सहारा चाह रहे हो , वह स्वयं किसी के सहारे का भिखारी है , तुम इतना तो जानते हो कि तुम्हारे अन्दर परमात्मा रहता है जो सभीं सहारों का सहारा है , फिर क्यों बाएं - दायें देख रहे हो कि कोई मिल जाय , उससे बड़ा और कौन है ?
~~ ॐ ~~
Sunday, November 2, 2014
कुछ तो सुनते ही हैं
# पृथ्वी के पास क्या नहीं है ? पेट्रोल , कोयल ,
गैस , सोना ,चांदी , हीरे और वह सब कुछ जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं पर क्या कभीं पृथ्वी सीना तान कर कुछ कहती भी है ?
# अब ज़रा अपनें को देखते हैं । क्या हमारे पास कोई ऐसी चीज है जिसको हम पृथ्वी से न चुराए हों ? सोचना पड़ेगा और यह कहते मुह नहीं दुखता कि हमारे पास यह है ,वह है आदि -आदि ,अरे भाई ! जो हमारे पास है ,वह हमारा कैसे हुआ ? क्या किसी चीज पर अपनीं मोहर लगानें से अपनीं हो जाती है ,क्या ?
# क्या पृथ्वी कुछ कहती भी है ? मनुष्य कहेगा जी नहीं , पृथ्वी क्या कहेगी ? लेकिन पृथ्वी भी कहती है जिसकी आवाज मनुष्यको छोड़ अन्य सभीं जीव सुनते हैं और उसकी बात को मानते भी हैं ,ऐसे जीव जिनका सम्बन्ध पृथ्वी से है ।
#अब एक नज़र इस पर भी :
* जब भूकप्प आता है ...
* जब तूसामी अपना जलवा दिखाती है ...
* या कोई अन्य प्राकृतिक आपदा आती है ..
°° तब कौन मरते हैं ?
1- मनुष्य और पालतू जीव जिनको मनुष्य अपनें स्वार्थ - सिद्धिके लिए गुलाम बना रखा है ।
~ पर ~
2- जंगल में प्रकृति की गोद में बसेरा करनें वाले आदि बासी और अन्य जीवोंके मरनें की संभावना बहुत कम रहती हैं ,क्यों ? क्योंकि वे आपदा आनें से पहले पृथ्वी की आवाज को सुन लेते हैं और अपनीं सुरक्षाका बंदोबस्त आपदा आनें से पहले कर लेते
हैं ।
^^ मनुष्य जैसे - जैसे प्रकृति से दूर होता जा रहा है , उसकी तन्हाई बढती जा रही है और प्रकृति जो समझने के लिए उपकरणों का निर्माण करनें में अपनी ऊर्जा लगा रहा है । उपकरणों का निर्माण करो पर स्वयं को प्रकृति से दूर न रखो
# विज्ञान तर्क आधारित है ....
# तर्क संदेह आधारित है ....
~~~ और ~~~
● सत्य तर्क - वितर्क और संदेह से परे है ● ………ॐ ………
Monday, October 13, 2014
पर सुनता कौन है
Monday, September 22, 2014
प्यारे ! यह संसार है ---
Sunday, September 14, 2014
जो जानते हो , वह क्या कम है ?
Thursday, September 11, 2014
जीवन एक परम प्रसाद है
Sunday, September 7, 2014
यह क्या है , उनका दुःख मेरे लिए सुख है ?
* संसार में कौन सुखी है और कौन दुखी ?
आप इसे अपनें बुद्धि -योगका बिषय बना सकते हैं । * बुद्धके ध्यानका मूल बिषय था दुःख की सत्यता और उन्हें सात साल लग गए दुःख को समझनें में ।
* ऐसे कितनें हो सकते हैं जो अपनें दुःखका कारण स्वयंको मानते हों ? ऐसा हजारों - लाखों में कोई एकाध मुश्किल से मिलेगा । ज्यादातर लोग अपनें दुःखका कारण दूसरों को बनाते हैं ।
* भोग - तत्त्वों की रस्सियाँ जितनी मजबूत होती है ,वह ब्यक्ति उतना ही गहरा दुखी रहता है ।
* कामना ,मोह ,राग - द्वेष , क्रोध , लोभ और अहंकार - ये सात भोगके मूल तत्त्व हैं ।
* भोगकी रस्सियों से बधा ब्यक्ति पूरी तरह से न तो भोग से जुड़ पाता है और न योगकी ओर रुख कर पाता है ; बिचारा ! भोग और भगवानके मध्य एक पेंडुलम सा लटकता रहता है ।
* दुःख से भागो नहीं , दुःखको समझो ।
* दुःख की दवा जबतक बाहर खोजते रहोगे , दुखी रहोगे ।
* आपके दुःखका वैद्य कोई और नहीं , आप स्वयं हैं , इस बात को समझो ।
~~ ॐ ~~
Saturday, September 6, 2014
कैसे और किससे कहूँ ?
Sunday, August 10, 2014
जीवन सार
1- जैसे - जैसे उम्र बढ़ती जाती है जिस्म - बुद्धि कमजोर होती जाती है और मन बढ़ता जाता है ।
2- जैसे - जैसे उम्र बढती जाती है मोह ,ममता ,कामना ,क्रोध ,लोभ और अहँकार सघन एवं तीब्र होते जाते हैं और मंदिर जाना , कथा सुनना आदि में रूचि बढ़ी सी दिखनें लगती है ।
3- अहंकार अपना रंग गिरगिट से भी अधिक तीब्र गति से बदलता है और मोह के अन्दर छिप कर रहनें वाला अहंकार घी जैसा सरकनें वाला होता है ।
4- मोह में अहंकार सिकुड़ कर अन्दर केंद्र पर जा बैठता है और वक़्त का इन्तजार करता है । जब अच्छे दिन आजाते हैं वह तुरंत फ़ैल जाता है और केंद्र से परिधि पर डेरा जमा लेता है ।
5- कामना में अहँकार परिधि पर होता है पर अपनें रंगको ऐसे छिपा कर रखता है कि पहचानना बहुत कठिन होता है ,लेकिन ध्यानी इसे पहचानता है ।
6- परिधि पर स्थित कामनाका अहँकार उस समय लाल रंग में बदल जाता है जब कामना टूटती सी दिखती है ।
7- बसुधैव कुटुम्बकम् का नारा सभीं भारतीय लगाते हैं और यह भी कहते नहीं थकते कि हम , हमारी भाषा , हमारा देश , हमारा इतिहास और हमारी सोच दुनिया में सर्बोपरी है ।
8- गाय की पूजा केवल भारत में होती है ,गाय में सभीं देवता बसते हैं , ऐसी धारणा हम भारतीयों की है लेकिन गौओंके अनाथ आश्रण भी केवल भारत में मिलते हैं । गौओं को बस्ती से बाहर निकालनें वाले कौन हैं ? ज़रा अपनें चारो तरफ नज़र डालकर देखना तो सही ।
9- पत्थर ,पेड़ ,पहाड़ और नदियों की पूजा हम भारतीय करते हैं , सभीं हिन्दू तीर्थ पहाडों पर या नदियों के तट पर हैं फिर हम पहाड़ों और नदियों की पवित्रता की चिंता क्यों नहीं करते ? क्यों इनको बेमौत मार रहे हैं ?
10- पिछले 15-20 सालों नें एक कला का प्यारा फैलाव हुआ है वह कला क्या है ? प्रश्नका उत्तर प्रश्न से देना , हैं न मजे की कला और हम सब सुनकर मस्त रहते हैं ।
~~ हरे राम ~~
Sunday, August 3, 2014
पुरानी आँख और नया आयाम
पुरानी आँख और नया आयाम ( भाग - 1 )
● लाख कोशिश करलें पर असफलता और हमारा रिश्ता टूट नहीं पाता ,क्या कारण हो सकता है ?
°° पुरानी आँख और नया आयाम ; यह समीकरण हमारी असफलताका एक मजबूत कारण है ।
^^ दूसरा कारण है कि हम अपनें को इतना कमजोर बना रखे हैं कि अपनें पर इतबार कम करते हैं और औरों पर अधिक ।आइये ! अब देखते हैं इन पर आधारित कुछ पहलुओं को :---
1- नया आयाम -पुरानी आँख समीकरण क्या है ?
* वर्तमान ( present ) का अर्थ है नया , जीवंत । वर्तमान में हमारा जीवन है और हमारा मन भूत काल की घटनाओं में समय गुजारता है इस परिस्थिति में हमारा वर्तमान बेहोशी में सरक रहा होता है और जहाँ बेहोशी है वहाँ असफलता तो होगी ही । आपको ताजुब होगा यह जानकर कि हमारी क्रियाएं मन से नियंत्रित हैं और मनका स्वाभाव है भूतकाल की घटनाओं में भ्रमण करते रहना अर्थात वर्तमान से दूर रहना फिर ऐसी परिस्थिति में जो हमसे हो रहा है , उसका परिणाम क्या हो सकता है ?
* मन बिषयों में ऐसे भ्रमण करता है जैसे भौरा फूलों में लेकिन भौरा बाहरी आकर्षण में न उलझ कर सार को चूसता है और मन बाहरी आकर्षण से आगे सार की ओर रुख भी नहीं कर पाता ।भौर सत्य की खोज में कहाँ कहाँ नहीं पहुँचता ; एक फूल पर भी मडराता है और गन्दगी के ढेर पर भी और दोनों जगहों से सार को पकड़ने में सफल होता है और मन ?
* नया आयाम ( New Frame of Action ) :मनुष्यका हर पल उसके लिए नया पल है जो चाहता है नयी सोच पर मनुष्य का मन इस नए कैनवास पर पुरानी तस्बीर बना देता। है और ज्यों ही तस्बीर तैयार होती है , मन में उसके प्रति ऊब आजाती है और वह पुनः चल पड़ता है , नए की तलास पर लेकिन अपनें स्वभाव के कारण हर बार धोखा खाता हैं।
* जिस समय नए आयाम को नयी आँखे देखती है , उस घडी सत्य कहीं दूर नहीं होता , वही आयाम सत्य का आयाम होता है और तब :---
● मन की दौड़ रुक जाती है ....
● मन उस आयाम में रम जाता है ....
● मन गुण उर्जा से बनें पिजड़े से मुक्त हो जाता है ... और :---
स्थिर मन सत्य को ढूढ़ता नहीं ,वह स्वयं प्रज्ञा में रूपांतरित होकर सत्य हो गया होता है ।
और :---
* ऐसे मन वाले को गीता ब्रह्म् वित् कहता है । ~~~ ॐ ~~~
Monday, July 21, 2014
बुद्धम् शरणम् गच्छामि
Saturday, July 19, 2014
मैं और तूँ
● मैं एक माध्यम है तूँ को समझनें केलिए ।
मैं का अर्थ है अहंकार । भागवत में यदि आप मैत्रेय ,नारद , प्रभु कृष्ण और प्रभु कपिल जी के
तत्त्व - रहस्य को गंभीरता से देखें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ब्यक्त सूचनायें तीन प्रकारके अहंकारों से हैं । गुण आधारित सात्त्विक ,राजस और तामस ये हैं तीन अहंकार , जिनकी उत्पति महतत्त्वसे काल के प्रभाव में होती है ।
● मैं को कोई समझना नहीं चाहता और तूँ को समझनें में सारा जीवन गुजर जाता है पर सच्चाई यो यह है की जबतक मैं की गहरी परख नहीं हो जाती ,तूँ की परख करनी संभव नहीं ।
● अपनीं गलतियों को दूसरों से सुननें पर सारी उर्जा क्रोध में रूपांतरित हो उठती है और यदि अपनीं गलतियों को हम अकेले में प्रभुको साक्षी मानकर देखनें का अभ्यास करे तो यह होता है ,
अभ्यास -योग तो मैं के प्रति होश उठा कर परममें पहुँचाता है ,पर करनें की कोशिश करनें वाले
दुर्लभ हैं ।
** आज इतना ही **
~ हरि ॐ ~~