Wednesday, April 20, 2022

सांख्य दर्शन के पांच बिषय

ईश्वरकृष्ण रचित सांख्य दर्शन की 72 कारिकाओं को ठीक से समझने के लिए उन्हें 05 भागों में निम्न प्रकार से विभाजित किया जा रहा है ।
ऊपर व्यक्त1 सांख्य के पांच बिषयों में कारिकाओं की संख्या निम्न प्रकार से है
आगे आपको इन पांच बिषयों के सम्बन्ध में विस्तार से बताया जाएगा। ~~ ॐ ~~

Monday, April 18, 2022

सृष्टि उत्पत्ति के दो सनातन तत्त्वों को अनुमान से समझा जा सकता है

गीता श्लोक :13.15 प्रभ्य श्री कृष्ण का श्लोक है जिसमें ब्रह्म को शब्दों में व्यक्त कर रहे हैं । यहाँ जो बात ब्रह्म के सम्बन्ध में प्रभु कह रहे हैं वही बात सांख्य कारिका : 07 में कही गयी है

Wednesday, April 13, 2022

सांख्य में पुरुष को जब मैं कौन का बोध हो जाता है तब भी वह कैवल्य में नहीं पहुँचता

सांख्य दर्शन में प्रकृति - पुरुष रहस्य सम्बंधित 28 कारिकाओं में से आज 21 कारिकाओं की श्रंखला में यह अंतिम प्रस्तुति है । अभीं तक आप 21 कारिकाओं के सार को 16 स्लाइड्स के माध्यम से देख रहे हैं । आगे 07 और कारिकाओं के सम्बन्ध में हम आप से मिलेंगे और फिर इसके बाद पतंजलि योग दर्शन के आधार पर प्रकृति - पुरुष रहस्य को स्लाइड्स के माध्यम से दिया जायेगा ।

Tuesday, April 12, 2022

सात भावों से मुक्त प्रकृति को ज्ञान प्राप्ति

प्रकृति और पुरुष का प्रत्यक्ष बोध संभव नहीं केवल अनुमान से संभव है क्योंकि दोनों अति सूक्ष्म हैं । 16 स्लाइड्स में सांख्य दर्शन के प्रकृति - पुरुष से परिचय कराने की इस शृंखला के अंतर्गत अब हम आगे की यात्रा में तीन और स्लाइड्स को देखरहे हैं । यहाँ 07 भावों से बधी हुयी प्रकृति को ज्ञान प्राप्ति सम्बंधित सांख्य - ज्ञान को देख रहे हैं । ध्यान रहे जी जड़ प्रक्रियी जिसे स्वयं का ज्ञान नहीं , वह पुरुष से जूझने से स्व बोधी बन जाती है आत् पुरुष को अपनीं जाल से मुक्त होनें मरण मदद करती है।

Wednesday, April 6, 2022

प्रकृति - पुरुष संयोग से जीव कण की रचना होती है

सांख्य दर्शन में तत्त्व ज्ञान से कैवल्य प्राप्ति की ऊर्जा मिलती है और कैवल्य प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिलती है । प्रकृति - पुरुष संयोग क्यों होता है ? इस प्रश्न के लिए देखे आगे दी जा रही स्लॉइड को । प्रकृति - पुरुष संयोग से 18 सूक्ष्ण तत्त्वों एवं 05 महाभूतों की उत्पत्ति होती है । इस बात को और अधिक स्पष्ट आगे दी जा रही स्लॉइड - 3 में दिखाया गया है । अब देखते हैं , ऊपर बतायी गयी 03 स्लाइड्स को ⬇️

Saturday, April 2, 2022

सगुण - निर्गुण और सक्रिय - निष्क्रिय दो ऊर्जाओं जिनसे यह संपूर्ण व्यक्त हैं , वे दोनों अव्यक्त हैं

प्रकृति - पुरुष या माया - ब्रह्म या क्षेत्र ( हमारा स्थूल देह ) और क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा से क्रमशः सांख्य दर्शन और एंड 05 वैदिक दर्शनों के आधार पर सभीं जड़ - चेतन हैं , थे , हो रहे हैं और हो - हो करः अव्यक्त हिट जा रहे हैं । गीता श्लोक : 2.28 में प्रभु श्री कृष्ण कहते भी हैं , " हे अर्जुन ! जो यह राजा - महाराजा आज यहाँ दिख रहे हैं , तुम और अन्य सभीं अव्यक्त से व्यक्त हुए हैं और सभीं मृत्यु के बाद पुनः अव्यक्त हो जाने वाले हैं । हम का वर्तमान दो अव्यक्तो का मध्य है फिर तुम इन सबकी मौत के लिए क्यों व्याकुल हो रहे हो? अब तीन स्लाइड्स के माध्यम से अभी तक जो कुछ भी इन दो ऊर्जाओं के सम्बन्ध में बताया गया हैं , उनके संबंध में सांख्य की 21 कारिकाओं को विस्तार से समझते हैं 👇

Sunday, March 27, 2022

संसार का अस्तित्व प्रकृति - पुरुष आधारित है

यहाँ गीता श्लोकों के आधार पर बनायीं गयी दो स्लाइड्स दी जा रही हैं । इन दो स्लाइड्स से प्रभु श्री कृष्ण के द्वारा समर्थित सांख्य दर्शन की बुनियादी तत्त्व प्रकृति - पुरुष और इन दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति - रहस्य को स्पष्ट किया जा रहा है । आगे चल कर हम इसी तरह की 10 स्लाइड्स में माध्यम से प्रकृति - पुरुष सांख्य रहस्य से सम्बंधित 21 सांख्य कारिकाओं के सार को भी देखेंगे ।

Friday, March 25, 2022

दुःख संयोग वियोगम् योगः

प्रभु श्री कृष्ण गीता : 6.23 में जो परिभाषा योग की देते हैं ( जिसे स्लॉइड में दिया गया है ) , उस सन्दर्भ में दुःख उत्पन्न करने वाले तत्त्वों ( कर्म बंधन , चित्त वृत्तियां और क्लेषों ) को अब समझते हैं ⬇️ 1 - कर्म बंधन क्या हैं ? आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य और अहँकार को कर्म बंधन तत्त्व कहते हैं । प्रभु श्री कृष्ण गीता श्लोक - 6.23 में योग को परिभाषित करते हुए कहते हैं , " ऐसे तत्त्व जो दुःख उत्पन्न करते हैं , उनमें वियोग पैदा करना , योग है " । अब देखना होगा उन तत्त्वों को जो दुःख के हेतु हैं । गीता में प्रभु श्री कृष्ण 08 कर्म बंधनों को दुःख के हेतु बताते हैं जिन्हें ऊपर स्लॉइड में दिखाया गया है । मूलतः ये तत्त्व राजस और तामस गुणों की वृत्तियां हैं । बिषय - इंद्रिय संयोग (जिसे गीता : 5.22 में भोग बताया गया है ) से मन में बिषय के प्रति मनन पैदा होता है , मनन से बिषय के प्रति आसक्ति पैदा होती है , आसक्ति से कामना उठती है और कामना टूटनें से क्रोध पैदा होता है जो नाश के द्वार पर पहुँचाता है ( देखें गीता : 2.62 - 2.63 ) । मोह , भय और आलस्य तामस गुण की वृत्तियां हैं । लोभ का अर्थ है लालच अर्थात जो है , उसे और पाने की चाह , लोभ है । 2 - पञ्च चित्त वृत्तियां क्या हैं ? ऊपर स्लॉइड में पतंजलि योग सूत्र आधारित 05 प्रकार की चित्त - वृत्तियों को बताया गया है जो क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो रूपों में प्रकट होती हैं । क्लिष्ट दुःख से जोड़ती हैं और अक्लिष्ट सुख से । ध्यान रखें यहाँ दुःख और सुख भोग आधारित नहीं हैं , योग आधारित हैं । राजस और तामस गुणों के प्रभाव में आसुरी सम्पदा और सात्त्विक गुण से दैवी सम्पदा मिलती है । पहली दुःख से जोड़ती है और दूसरी सुख से जोड़ती है ( यहाँ देखें गीता अध्याय : 16 ) । प्रमाण चित्त वृत्ति बिषय - ज्ञान इंद्रियों के जुड़ने से उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम , तीन प्रकार की होती है । प्रत्यक्ष में बिषय - इंद्रिय संयोग से बिषय बोध होता है । जब बिषय अनुपस्थित हो तब उसके चिन्ह के आधार पर उस बिषय के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जाता है जैसे दूर कहीं उठ रहे धुंआ को देख कर वहां आग होने का अनुमान लगाना , अनुमान प्रत्यक्ष चित्त वृत्ति कहलाती है । जब प्रत्यक्ष और अनुमान से बिषय बोध होना संभव न हो सके तब शास्त्रों में उस बिषय के प्रति उपलब्ध ज्ञान से जो वृत्ति उठती है उसे आगम प्रत्यक्ष चित्त वृत्ति कहते हैं । विपर्यय वृत्ति : अविद्या का दूसरा नाम विपर्यय है । सत्य को असत्य समझना , विपर्यय है । विकल्प वृत्ति : जब बिषय अनुपस्थित हो और उसके बारे में उपलब्ध सूचनाओं के जानने से जो वृत्ति उत्पन्न हो उसे विकल्प वृत्ति कहते हैं । निद्रा वृत्ति : स्वप्न के थीक विपरीत निद्रा है जहाँ बिषय शून्यता में चित्त होता है लेकिन इस शून्यता का भी कोई साक्षी वृत्ति होती है जो उठने पर आभास कराती है कि आज बहुत गहरी नींद आयी , समय का पता तक न चला । इस साक्षी चित्त वृत्ति को निद्रा वृत्ति कहते हैं । स्मृति वृत्ति : पूर्व अनुभवों को ठीक समय पर स्मृति पटल पर जो वृत्ति ला देती है , उसे स्मृति वृत्ति कहते हैं । 3 - पञ्च क्लेष क्या हैं ? अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेष पञ्च क्लेष हैं । अविद्या शेष चार क्लेषों की जननी है । विपर्यय का ही दूसरा नाम अविद्या या अज्ञान है । अस्मिता अहं भाव को कहते हैं । सुख की तलाश में राग की ऊर्जा रखती है । द्वेष दुःख की ऊर्जा पैदा करता है । अभिनिवेष अर्थात मृत्यु - भय की ग्रंथि दुःख की ऊर्जा का श्रोत है । इस प्रकार 08 कर्म बंधन , पांच चित्त वृत्तियां और पांच क्लेषों को दुःख - संयोग तत्त्वों के रूप में देखा गया । अब अगले अंक में यह देखा जाएगा कि सुख - दुःख का भोक्ता कौन है और कर्म बंधनों , चित्त की वृत्तियों तथा क्लेषों की जननी कौन है ? ~~ ॐ ~~

Wednesday, March 2, 2022

पुनर्जन्म का हेतु लिङ्ग शरीर

बिस्तर से लिङ्ग और भाव सृष्टियों सहित्त लिङ्ग शरीर को देखें अगके अंक में । सांख्य में पुनर्जन्म रहस्य पूर्ण रूपेण स्पष्ट है । ~~ ॐ ~~

Tuesday, March 1, 2022

श्रीमद्भगवद्गीता गीता अध्याय - 13 सात तत्त्व

गीता अध्याय - 13 मूलतः सांख्य दर्शन आधारित है । बिना सांख्य दर्शन ज्ञान , इस अध्याय को ठीक - ठीक समझना आसान नहीं । क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ , प्रकृति - पुरुष , ज्ञान - ज्ञानी और कार्य - करण को इस अध्याय में बताया गया है ।