Sunday, March 12, 2023

पञ्च कोष साधना और पञ्च कोसी तीर्थ परिक्रमा

पञ्च कोष - साधना
पञ्च कोष , वेदांत दर्शन तथा इसके सहयोगी दर्शनों का शब्द है । जैसे सांख्य - पतंजलि दर्शनों में प्रकृति - पुरुष बोध से मैं कौन हूं ? प्रश्न का उत्तर मिल जाता है वैसे पञ्च कोष बोध से मैं कौन हूं ? प्रश्न का उत्तर मिल जाता है । दर्शन कोई भी क्यों न हो चाहे वह आस्तिक जो या नास्तिक , चाहे वह अद्वैत्यवादी हो या द्वैत्यवादी , चाहे वह नेति - नेति से चल रहा हो या सबको स्वीकार करते हुए चल रहा हो , सबके सब अंततः वहीं पहुंच कर रुक जाते हैं , जिसके आगे और चलना संभव नहीं हो पाता और जहां पहुंचने पर एक तख्ती लटकती दिखती है जिस पर लिखा होता है , तुम्हारी यह यात्रा यही समाप्त होती है । अब तुम अगर चाहो तो सामने उस पार पहुंच सकते हो लेकिन उसके लिए तुम्हें अपनी नाव छोड़नी पड़ेगी और अनंत में छलांग लगानी पड़ेगी । यदि तुम स्व बोधी हो तो देर मत करो , भर लो छलांग , कहीं तुम्हारे संस्कार के बीज पुनः अंकुरित न हो जाएं वर्ना वे तुम्हें पीछे लौटा ले जायेंगे। ऐसा समझें , ऊपर व्यक्त 05 कोष , हमारे अस्तित्व के 05 आवरण हैं जिनके बोध से मनुष्य को स्व बोध हो जाता है । पंच कोष साधना सिद्धि से विवेक की धारा बहने लगती है , अविद्या का नाश हो जाता और जिसे कैवल्य कहते हैं । कैवल्य के लिए पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र : 34 को यहां देखें पुरुषार्थ शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसव: कैवल्यमं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति " पुरुषार्थ का शून्य होना एवं गुणों का प्रतिप्रसव होना कैवल्य है " अथवा (वा ) " चित्ति शक्ति का अपनें मूल रूप में हो जाना , कैवल्य है " अर्थात कैवल्य प्राप्त योगी पुरुषार्थ शून्य होता है , गुणातीत होता है और उसकी चित्त शक्ति ( पुरुष ) अपनें मूल स्वरुप में स्थित हो गया होता है । पुरुषार्थ ( पुरुष +अर्थ )के निम्न 04 अंग हैं धर्म +अर्थ + काम + मोक्ष ध्यान रखना होगा कि पुरुषार्थ भी एक मजबूत बंधन है । योग साधना के पंच कोष साधना की 05 सीढियां हैं जैसे अष्टांगयोग की 08 सीढियां हैं । अन्नमय कोष की सिद्धि प्राणमय कोष का द्वार है । प्राणमय कोष की सिद्धि से मन किसी एक सात्त्विक आलंबन से जुड़ जाता है और मन आलंबाकार बन जाता है फलस्वरूप स्थिर प्रज्ञाता मिलती है । मनमय कोष सिद्धि से विज्ञान मय कोष में प्रवेश मिलता है जहां ब्रह्म से ब्रह्म में सारी सूचनाएं दिखने लगती है । विज्ञानमय कोष सिद्धि से इंद्रियातीत आनंद मिलने लगता है क्योंकि इंद्रियों का मूल स्वभाव परमानंद है । आनंदमय कोष सिद्धि में कैवल्य का द्वार खुलता है । 1 - अन्नमय कोष 【स्थूल शरीर】 भोजन से स्थूल शरीर का और भोजन एवं संगति से चित्त का निर्माण होता है और ऐसे चित्त को निर्माण चित्त कहते हैं । चित्त बंधन और मोक्ष दोनो का माध्यम है । चित्त प्रकृति - पुरुष की संयोग भूमि है । पुरुष चित्त मध्यम से विषय को समझता है ; जिस रंग में चित्त रंगा होता है , उसी रंग में चित्त रंग जाता है । पुरुष की चित्त मुक्त स्थिति ही कैवल्य है । गीता : 17.7 - 17.10 में गुणों के आधार पर तीन प्रकार के लोगों के उनके अपने - अपने भोजनों के संबंध में बताया गया है । सात्त्विक भोजन से चित्त में सात्त्विक ऊर्जा भरती है जो सात्त्विक आलंबन से जोड़ती है। राजसी भोजन भोग से जोड़ने की ऊर्जा उत्पन्न करता है और तामसी भोजन से भय , मोह , आलस्य आदि को उत्पन्न करने की ऊर्जा बनती है । यह स्थूल शरीर पांच भूतों से निर्मित है और विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थों के सेवन से इन पंच महाभूतों की यथावत स्थिति बनी रहती है । जरा सोचना! हमें क्यों भूख - प्यास लगती रहती है ? , वह कौन है , हमारे अंदर जो पांच भूतों की कमी को समझता है और इस कमी को पूरा करने के लिए कर्म करता है ? अन्नमय कोष साधना , स्थूल शरीर को साधना की अगली सीढ़ी पर पहुंचाती है । वेदांत दर्शन में अन्न को ब्रह्म कहा गया है । अन्न से स्थूल देह , मांस , रक्त , मज्जा और हड्डियों का ढांचा आदि निर्मित होते रहते हैं । अन्नमय कोष शेष 04 कोषों का आश्रय है अतः इसके प्रति होशमय रहना , सत्य साधक की प्राथमिकता होती है । अब शरीर के प्रकार को देखते हैं ⬇️ शरीर के प्रकार ⬇
स्त्री - पुरुष संयोग के फलस्वरूप गर्भ से मिला हुआ साकार शरीर , स्थूल शरीर है जो अनित्य है । शरीर के स्थूल अंग , चर्म , मांस , मज्जा , रक्त एवं हड्डियों का ढांचा आदि स्थूल शरीर के निर्माण - तत्त्व हैं । पञ्च भूतों से निर्मित स्थूल शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए भोजन रूप में पंचभूतों का सेवन हम सब के लिए अनिवार्य है । प्रकृति - पुरुष संयोग से हम सब हैं । प्रकृति त्रिगुणी है और पुरुष निर्गुण । पंचभूत प्रकृति के कार्य हैं अतः वे भी त्रिगुणी ही हैं क्योंकि हर कार्य में कारण होता है । तीन गुणों की मात्राओं को यथावत बनाए रखने के लिए मनुष्य सात्त्विक , राजसी और तामसी वस्तुओं का अपनें भोजन में प्रयोग करता है । स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर का आश्रय है , बिना स्थूल शरीर , सूक्ष्म ( लिङ्ग शरीर ) शरीर अस्थिर रहता है । सूक्ष्म या लिंग शरीर के संबंध में आगे बताया जाएगा। बुद्धि , अहंकार और 11 इंद्रियों की सृष्टि के बिना पञ्च तन्मात्रो के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती क्योंकि प्रकृति - पुरुष संयोग से बुद्धि की उत्पत्ति है , बुद्धिंसे तीन अहंकारों की उत्पत्ति है । सात्त्विक अहंकार से 11 इंद्रियों की उत्पत्ति है । तामस अहंकार से पञ्च तन्मात्र और तन्मात्रों से उनके अपने -अपने महाभूतों की उत्पति होती है । महाभूत स्थूल शरीर की रचना करते हैं । सूक्ष्म शरीर नित्य है , त्रिगुणी प्रकृति या त्रिगुणी माया से निर्मित होता है । यह तबतक नए - नए स्थूल शरीर धारण करता रहता है जबतक पुरुष ( सांख्य और पतंजलि दर्शन में ) या जीवात्मा ( वेदांत दर्शन में ) कैवल्य नहीं प्राप्त कर लेता । विभिन्न दर्शनों में लिंग शरीर की बनावट को यहां निम्न स्लाइड में देख सकते हैं ⤵️ सांख्य दर्शन में लिङ्ग शरीर 1- लिङ्ग शरीर नित्य और सनातन है जबकि माता - पिता से मिला स्थूल शरीर अनित्य है । 2 - महत् , अहंकार , 11 इन्द्रियाँ तथा 05 तन्मात्र लिङ्ग शरीर के अंग हैं । 3 - लिङ्ग शरीर निर्मल और नित्य है । 4 - बिना पञ्च भूत आश्रय लिङ्ग शरीर अस्थिर है। 5 - लिङ्ग शरीर के तत्त्वों में महत् से तन्मात्र तक 18 तत्त्व जड़ हैं और महत् , अहँकार और मन अर्थात चित्त में कैद हुआ पुरुष चेतन है । पुनर्जन्म पुरुष का नहीं होता , अन्य 18 सगुणी तत्त्वों का होता है । चित्ताकार पुरुष के लिए लिङ्ग शरीर का पुनर्जन्म , मोक्ष प्राप्ति के लिए एक और अवसर है । पुरुष का मोक्ष उसका अपनें मूल स्वरूप में लौटनें का नाम है । 5 - लिङ्ग शरीर पुरुष मोक्ष प्राप्ति हेतु अलग - अलग शरीर धारण करता रहता है। 6 - लिङ्ग शरीर प्रकृति का स्वामी है। 7 - लिङ्ग शरीर आवागमन चक्र में तबतक रहता है जबतक उसके आश्रित पुरुष को मोक्ष नहीं मिल जाता। 8 - लिङ्ग शरीर 08 भावों से अधिवासित ( सुगन्धित ) रहता है । 08 भाव निम्न हैं ⤵️ 1 - धर्म 2 - अधर्म 3 - ज्ञान 4 - अज्ञान 5 - वैराग्य 6 - राग 7 - ऐश्वर्य 8 - अनैश्वर्य √ कारण शरीर वेदांत दर्शन का शब्द है जबकि कारण शब्द सांख्य - पतंजलि दर्शनों का है । सांख्य दर्शन में कारण - कार्य एक प्रमुख सिद्धान्त है । उत्पत्ति करता को कारण और उत्पन्न हुए को कार्य कहते हैं , देखे इस उदाहरण को ⬇️ सरसो से तेल निकलता है , यहाँ तेल , सरसोका कार्य है और तेल का कारण सरसो है । सांख्य दर्शन में प्रकृति - पुरुष दो सनातन एवं स्वतंत्र तत्त्व हैं । प्रकृति प्रसवधर्मी जड़ है और पुरुष शुद्ध चेतन । प्रकृति - पुरुष संयोग से बुद्धि , बुद्धि से अहँकार , अहँकार से 11 इंद्रियं एवं पञ्च तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है । तन्मात्रों से उनके अपनें - अपनें महाभूतों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार प्रकृति से निर्मित 23 तत्त्व भी जड़ एवं त्रिगुणी हैं । प्रकृति पुरुष - कैवल्य का माध्यम है ।√ पुरुष ऊर्जा प्राप्त करने से पहले प्रकृति अपनें मूल स्वरूप में होती है जो तीन गुणों की साम्यावस्था है । इस मूल प्रकृति को वेदांत में कारण शरीर कहा गया है । जब मूल प्रकृति पुरुष प्रकाश प्राप्त करती है तब वह विकृत हो उठती है और 23 तत्त्वों की उत्पत्ति प्रारम्भ हो जाती है जैसा ऊपर व्यक्त किया गया है । 2 - प्राणमय कोष प्रकृति - पुरुष दो तत्त्व हैं लेकिन दोनों को अलग करना संभव नहीं क्योंकि प्रकृति - पुरुष का संबंध एक अंधे और एक लंगड़े के संबंध जैसा है । प्रकृति अंधी है जो देख नहीं सकती और पुरुष लंगड़ा है जो चल नहीं सकता अतः पुरुष अंधी प्रकृति के कंधे पर सवार हो कर उसे मार्ग दिखाते हुए यात्रा करता है । प्रकृति परोपकारिणी है और पुरुष को समझना चाहती है। पुरुष प्रकृति को देखना चाहता है । प्रकृति पुरुष दर्शन के बाद उसे मुक्त कर स्वयं भी अपनें मूल स्वरूप में लौट जाती है जिसे वेदांत कारण शरीर और सांख्य में साम्यावस्था कहता है । प्रकृति - पुरुष संबंध जैसा श्वास और जीवन का भी संबंध है । श्वास और जीवन समझने के लिए दो हैं लेकिन इन दो तत्त्वों को एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं । जबतक श्वास का आवागमन चल रहा है तबतक जीवन है । जैसे ही श्वास बंद हो जाती है , व्यक्त जीवन अव्यक्त हो जाता है । ऐसा समझें कि श्वास ही जीवन ऊर्जा है । अपने जीवन को समझने के लिए अपनी श्वास से मैत्री स्थापित करनी पड़ती है , उसके साथ हर पल बने रहने का अभ्यास करना होता है और ऐसा करने से को सिद्धि मिलती है तब अव्यक्तातीत परम सत्य दिखने हथेली पर रखे आवले की भांति दिखने लगता है । देह में 10 प्रकार की वायु हैं जिनको प्राण कहते हैं। 10 प्रकार के प्राणों और स्थूल देह के संबंध को निम्न स्लाइड में दिखाया गया है । ऊपर स्लाइड में प्रभु की 16 कलाओं में 11 इंद्रियों और 05 प्राणों को बताया गया है । ये 10 प्राणों में प्रथम 05 प्राण हैं जो क्रमशः हृदय स्थित प्राण वायु , गुदा स्थित अपान वायु नाभि स्थित समान वायु , कंठ स्थित उदान वायु और देह में सर्वत्र व्याप्त ब्यान वायु हैं । मूलतः पतंजलि योग दर्शन श्वास की साधना का विज्ञान है । श्वास नियंत्रण , चित्त की स्थिरता और सत्य बोध के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट किया गया है । पतंजलि योग दर्शन में पूरक , अंतः कुंभक , रेचक और बाह्य कुंभक अभ्यास , प्राणमय कोष के तत्त्व हैं जिसे पतंजलि प्राणायाम कहते हैं । आगे देखिए महर्षि पतंजलि की प्राणायाम की परिभाषा को । आसन सिद्धि में श्वास - प्रश्वास का स्वत रुक जाना , प्राणायाम है । 3 - मनोमय कोष वेदांत दर्शन में ब्रह्म की माया से काल के प्रभाव में दृष्टि रचना का प्रारंभ बताया गया है । पतंजलि योगसूत्र और सांख्य दर्शनों में प्रकृति - पुरुष के योग से सृष्टि की रचना बताई गयी है । प्रकृति - पुरुष की संयोग भूमि चित्त है और मन , बुद्धि एवं अहँकार के समूह को पतंजलि - सांख्य चित्त कहते हैं जबकि वेदांत में चित्त एक अलग तत्त्व माना जाता है । चित्त को कर्माशय भी कहते हैं अर्थात यह वह तत्त्व है जहाँ पिछले जन्मों एवं वर्तमान जन्म के कर्मों का सूक्ष्ण संग्रह होता है । सांख्य - पतंजलि दर्शनों में मन , बुद्धि और अहंकर एक दूसरे के संकेत को समझते हुए , परस्पर सहयोग से कार्य करते हैं । बुद्धि निर्णय लेती है , अहँकार करने की ऊर्जा देता है और मन पिछले अनुभवों पर भोरे की भांति मंडराता रहता है। मन पिछले अनुभवों के आधार पर अहँकार एवं बुद्धि को सहयोग करता रहता है । 4 - विज्ञानमय कोष सृष्टि रचना के तत्त्वों का बोध ज्ञान है और इन तत्त्वों को ब्रह्म के फैलाव के रूप में समझना , विज्ञान है । इस प्रकार वेदांत में माया बोध के आधार पर ब्रह्म बोध का होना तथा सांख्य में प्रकृति के 23 तत्त्वों के बोध से पुरुष बोध का होना विज्ञान है । यह अवस्था परा वैराग्य की होती है जहां विज्ञाननय कोष में चित्त में विवेक ऊर्जा भर जाती है , और साधक को परम सत्य की खुशबू मिलने लगती है। 5 - आनंदमय कोष आनंदमय कोष को समझने से पहले पतंजलि समाधि पाद सूत्र - 19 को देखते हैं , जो निम्न प्रकार है ⬇️ सबीज ( सम्प्रज्ञात ) समाधि 04 प्रकार की है ; वितर्क , विचार , आनंद और अस्मिता । साधना में आनंद शब्द का अर्थ है - इंद्रियातीत आनंद । तंत्र में चक्र साधना के अंतर्गत 07 चक्रों की साधना करनी होती है जिसमें चौथी साधना हृदय चक्र ( अनाहत ) की है । जब हृदय चक्र की साधना सिद्धि मिलती है तब अनाहद नाद सुनाई पड़ने लगता है जो परम् आनंद का नाद होता है । आनंदमय कोष का सीधा संबंध अनाहद नाद से ही है । जब बुद्धि , अहँकार , 11 इन्द्रियाँ सत्त्विक ऊर्जा के परिपूर्ण हो जाती हैं , विवेक की धारा बहने लगती है तब आनंदमय कोष की सिद्धि मिलती है । तीर्थों की पञ्च कोष या पञ्च क्रोसी परिक्रमा का सीधे संबंध पञ्च कोषी साधना से है जिसमें 05 दिन की परिक्रमा में प्रतिदिन 05 कोस की यात्रा की जाती है । इस 25 कोसीय परिक्रमा में अन्नमय , प्राणमय , मनमय , विज्ञानमय और आनंदमय कोषों की सिद्धि प्राप्त कर यात्री प्रभु केंद्रित हो जाता है जिसकी आंखें हर पल प्रभु के विकृतियों पर टिकी होती है और उसकी पीठ भोग की ओर रहती है । ऐसे यात्री के लिए गीता श्लोक : 2.69 को देखें जो निम्न प्रकार है या निशा सर्व भूतानाम् तस्याम् जागर्ति संयमी । यस्याम् जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यत: मुने : ।। जो सभी के लिए रात्रि जैसा है , जिसमें सभीं सोए हुए से रहते हैं , वह ज्ञानी के लिए दिन होता है जिसमें ज्ञानी जगा हुआ रहता है , अर्थात परमात्मा। काशी पञ्चकोषी ( पञ्च क्रोशी या पञ्च कोसी ) परिक्रमा यात्रा इस यात्रा में 108 शिवलिङ्ग , 56 मंदिर , 11 विनायक , 10 शिव मंदिर , 10 देवी , 4 विष्णु , 2 भैरव , 14 अन्य देवताओं के दर्शन करने होते हैं । यात्रा प्रारंभ करने से एक दिन पूर्व गंगा स्नान , काशी विश्वनाथ , अन्नपूर्णा एवं भैरव आदि देव - दर्शन तथा परिक्रमा के लिए संकल्प करना होता है । यात्रा का प्रारंभ मणिकर्णिका कुण्ड से यात्रा प्रारंभ होती है । यह कुंड मणिकर्णिका घाट के समीप में स्थित है । मणिकर्णिका से अस्सी आते हैं जहाँ से पांच कोषी परिक्रमा मार्ग प्रारम्भ होता है । पहला पड़ाव कर्मद ऋषि के मंदिर पर और पांचवां पड़ाव कपिल मुनि के मंदिर पर पड़ता है । कर्मद ऋषि के पुत्र कपिल मुनि हैं । पहला पड़ाव कर्मदेश्वर मंदिर पर यह शिव मंदिर कर्मद ऋषि द्वारा बनाया गया है । कर्मद ऋषि ब्रह्मा की छाया से उत्पन्न ऋषि हैं जो कपिल मुनि के पिता भी हैं । कर्मद ऋषि का ब्याह पहले स्वायंभुव मनु की कन्या देवहूति से हुआ था। कर्मद ऋषि का आश्रम विन्दुसर में था जो तीन तरफ से सरस्वती नदी से घिरा हुआ होता था । वर्तमान का विन्दुसर अहमदाबाद - उदयपुर मार्ग परअहमदाबाद से 130 किलो मीटर दूरी पर है । दूसरा पड़ाव भीमचण्डी मंदिर गन्धर्व सागर कुण्ड के समीप तीसरा पड़ाव रामेश्वर मंदिर वरुणा नदी के तट पर स्थित है । चौथा पड़ाव शिवपुर यहाँ द्रौपदी कुण्ड है । पांचवां पड़ाव कपिलधारा यहाँ कपिलेश्वर महादेव का मंदिर है जो कपिल मुनि द्वारा स्थापित है । कपिलधारा के आगे वरुणा - गंगा संगम के निकट केशव घाट के समीप विनायक मंदिर है । यहाँ गंगा में लोग गंगा में जौ बोते हैं । यहाँ से मणिकर्णिका घाट पहुँचते हैं । विश्वनाथ , अन्नपूर्णा , गणेश और काल भैरव दर्शन करके अपनी 05 दिन की 25 कोशीय यात्रा पूरी करते हैं। परिक्रमा में एक स्थान से दूसरे स्थान की दुरी 1 - मर्णकण्डिका - कर्मदेश्वर …….. 03 कोस 2 - कर्मदेश्वर - भीमचण्डी ………. 05 कोस 3 - भीमचण्डी - रामेश्वर …………. 07 कोस 4 - रामेश्वर - शिवपुर ……………. 04 कोस 5 - शिवपुर - कपिलधारा ………… 03 कोस 6 - कपिलधारा - मणिकर्णिका …… 03 कोस योग >>>>>>>>>>>>>>> 25 कोस 01 कोस = 3.2 किलो मीटर ~~ ॐ ~~

Wednesday, February 1, 2023

पतंजलि अष्टाङ्ग योगाभ्यास से वैराग्य और वैराग्य से परामानांद

पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 12 - 16 पतंजलि अष्टाङ्ग योगाभ्यास से वैराग्य और वैराग्य में गुणातीत की स्थिति पा कर परामानंदित होने का रहस्य # पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 12 - 13 " अभ्यास वैराग्य अभ्याम् तन्निरोधः " # अभ्यास - वैराग्य से चित्त - वृत्तियों का निरोध होता है। " तत्र स्थितौ यत्न: अभ्यासः " # चित्त वृत्ति निरोध हेतु किये जाने वाले यत्न को अभ्यास कहते हैं। # पतंजलि समाधि पाद सूत्र - 14 " स तु दीर्घकाल नैरंतर्य सत्कारा सेवितो दृढ़भूमि : " अभ्यास के दीर्घ काल तक निरंतर लंबे अवधि तक श्रद्धायुक्त अभ्यास करने से चित्त वृत्ति निरोध हेतु दृढ भूमि मिलती है । श्रद्धा क्या है ? श्रद्धा (ऋग +धा ) का अर्थ है ,सत्यको धारण करना । ध्यान रखें ! असत्यको धारण करना श्रद्धा नहीं लेकिन गीता अध्याय : 17 श्लोक : 2 - 5 में गुणों के आधार पर 03 प्रकार की श्रद्धा बतायी गयी है । # पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 15 " द्रष्ट अनुश्रविक - विषय वितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम् " बिषय - इंद्रियं संयोग से मिलनें वाले सभीं भोगों और शास्त्रों में वर्णित सभीं भोगों के प्रति वितृष्णा के भाव का उदय होना वैराग्य कहलाता है या इसे । पतंजलि समाधि पाद सूत्र - 16 "तत् परम् पुरुष ख्याते : गुणवैतृष्णयम् " सूत्र - 15 में बताये गए वैराग्य की जब सिद्धि होती है तब चित्त स्वरूपाकार पुरुष को अपनें मूल स्वरूप का बोध हो जाता है । योग में यह गुणातीत की स्थिति होती है । ~~ ॐ ~~

Sunday, January 8, 2023

सांख्य के 25 तत्त्व और इनसे दो प्रकार की सृष्टियां

25 सृष्टि रचना के तत्त्व , और दो प्रकार की सृष्टियों का रहस्य 【 मूलतः सांख्य आधारित 】 सांख्य द्वैत्यवादी दर्शन हैं जो यह मानता है कि जो भी व्यक्त हैं वे एक से नहीं दो अव्यक्त के संयोग से हैं । दोनों अव्यक्त सनातन और स्वतंत्र हैं । इन दो में एक जड़ प्रकृति है और दूसरा शुद्ध चेतन पुरुष है । प्रकृति का मूल स्वरूप तीन गुणों की साम्यावस्था है और पुरुष का मूल स्वरूप शुद्ध चेतन है । मूल प्रकृति का बोध योग सिद्धि से होता है जब योगी गुणातीत की अवस्था में कैवल्य के द्वार पर होता है । पुरुष प्रकाश से मूल प्रकृति विकृत हो कर 23 तत्त्वों वाली हो जाती है अर्थात इसकी साम्यावस्था विकृत हो जाती है और जड़ अवस्था स्व सक्रिय अवस्था में आ जाती है । पुरुष जबतक प्रकृति से नहीं जुड़ा होता तब तक वह अपने साक्षी , अकर्ता और शुद्ध चेतन मूल स्वरूप में होता है । जब पुरुष प्रकृति से जुड़ता है तब स्वयं को प्रकृति समझ बैठता है और तब यह चित्त केंद्रित हिट हुए स्वयं को करता और जरा - मृत्यु दुःख भोक्ता हो जाता है लेकिन इसे अपने मूल स्वरूप का हल्का बोध भी बन जाता है । प्रकृति अपने 23 तत्त्वों के माध्यम से अपने में स्थित पुरुष को उसके मूल स्वरूप में लौट जाने में मदद करती है । प्रकृति पुरुष को कैवल्य में पहुंचाना चाहती है और पुरुष की चेतन ऊर्जा को प्राप्त कर स्वयं भी अपने मूल स्वरूप में लौटना चाहती है । पुरुष जब प्रकृति और संसार के अनुभव को ठीक - ठीक समझ लेता है तब उसे स्व बोध होता है और तब वह अपने मूल स्वरूप में आ जाता है । सांख्य दर्शन का सूक्ष्म शरीर प्रकृति के 18 तत्त्व ( महत् , अहंकार , 11 इन्द्रियाँ , 05 तन्मात्र ) हैं । प्रकृति सूक्ष्म शरीर के माध्यम से अपने में स्थित पुरुष को मोक्ष दिलाने हेतु आवागमन करती रहती है । पञ्च महाभूत सूक्ष्म शरीर के आश्रय हैं , इनकी अनुपस्थिति में सूक्ष्म शरीर की कोई आकल्पन नहीं कि जा सकती और पञ्च भूतों के बिना सूक्ष्म शरीर अस्थिर होता है । जबतक योग साधना से योगी प्रकृति लय और विदेहलय की स्थिति नहीं प्राप्त कर लेता और इस बीच यदि उस योगी का भौतिक स्थूल पञ्च भूतीय शरीर किसी कारण बश समाप्त हो जाता है तब उस योगी का सूक्ष्म शरीर जिसमें पुरुष कैद होता है , पुरुष मोक्ष के लिए दूसरे पञ्च भूतीय देह को खोजता रहता है और इस खोज को ही आवागमन चक्र कहते हैं । 👉तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति कहते हैं जो अविकृति , अनादि एवं सनातन है । यह किसी से उत्पन्न नहीं होती , प्रसवधर्मी है तथा कार्य नहीं , कारण है । 💐 यहां संक्षेप में कार्य - कारण को समझते हैं । उत्पन्न होने वाला उत्पन्न करनेवाले का कार्य कहलाता है और उत्पन्न करता को कारण कहते हैं । कार्य में कारण का अंश रहता है । कारण दो प्रकार के हैं ; निमित्त और उपादान कारण , इसे एक उदाहरण से समझते हैं । मिट्टी के घड़े के निर्माण में घड़ा मिट्टी का कार्य है , मिट्टी घड़े का उपादान कारण है और घड़ा बनानेवाला घड़े का निमित्त कारण है । 💮मूल प्रकृति पुरुष ऊर्जा से विकृत होती है और विकृत होने से जो 23 तत्त्व उत्पन्न होते हैं उनमें से 07 तत्त्व ( महत् , अहँकार और 05 तन्मात्र ) कार्य - कारण हैं और अन्य 16 तत्त्व (11 इंद्रियाँ और 05 महाभूत ) केवल कार्य ( विकार ) हैं । पुरुष न तो किसी का कारण है और न ही किसी की कार्य है । प्रकृति अविवेकी , भोग्या , प्रसवधर्मी , सामान्य और अचेतन है और पुरुष प्रकृति के विपरीत है । पुरुष अनेक हैं , पुरुष का मूल स्वभाव साक्षी , शुद्ध चेतन और अकर्ता का है जबकि प्रकृति से जुड़ा पुरुष स्वयं को करता और भोक्ता समझता है । प्रकृति से जुड़ते ही पुरुष प्रकृति स्वरूपाकार हो जाता है और स्वयं को प्रकृति के 23 तत्त्वों के रूप में समझने लगता है । प्रकृति पुरुष संयोग में जड़ प्रकृति अपने को धर्म , अधर्म ,अज्ञान ,वैराग्य ,अवैराग्य , ऐश्वर्य और अनैश्वर - 07 भावों से बाध लेती है । प्रकृति जब जान जाती है कि पुरुष उसे देख लिया है तब वह अपने 23 तत्त्वों एवं 07 भाव - बंधनों से भी मुक्त हो कर अपने मूल स्वरूप में आ जाती है । यह तब घटित होता है जब प्रकृति में स्थित पुरुष को कैवल्य मिल जाता है । पुरुष को कैवल्य प्राप्ति और प्रकृति का अपने मूल स्वरूप में आना एक साथ घटित होते हैं । 👉 जैसे एक नर्तिकी नाना प्रकार के भावों - रसों से युक्त नृत्यको प्रस्तुत करके निवृत्त हो जाती है वैसे ही प्रकृति भी अपने 23 तत्त्वों से स्वयं की कलाओं को पुरुषको दिखा कर निवृत्त हो जाती है । 👉 जैसे उपकारी व्यक्ति दूसरों पर उपकार करते हैं तथा अपने प्रत्युपकार की आशा नहीं रखते उसी तरह गुणवती प्रकृति भी अगुणी पुरुषके लिए उपकारिणी है और प्रत्युपकार की आशा नहीं रखती । 👉 प्रकृति को जब यह बोध हो जाता है कि पुरुष उसे देख लिया है तब वह पुनः पुरुषका दर्शन नहीं करती । प्रकृति निःस्वार्थ परार्थ कार्य करती है । जैसे अचेतन दूध चेतन बछड़े का निमित्त होता है उसी तरह अचेतन प्रकृति , चेतन पुरुष के मोक्ष की हेतु है । जैसे लोग अपनी -अपनी उत्सुकताओं को पूरा करने हेतु अलग -अलग क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं वैसे ही प्रकृति भी पुरुष मोक्ष के लिए प्रवृत्त रहती है । 👉 पुरुष मोक्ष ही प्रकृति का मूल लक्ष्य है 👈 👉 मैं प्रकृति को देख लिया है - ऐसा सोच कर पुरुष प्रकृति की उपेक्षा करता है । 👉 मुझे पुरुष देख लिया है - इस सोच के कारण प्रकृति पुरुष से निवृत्त हो जाती है । ● ऐसी स्थिति में प्रकृति - पुरुष संयोग होने पर भी पुनः सृष्टि का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। 👉 प्रकृति - पुरुष को अलग करना संभव नहीं और जो दोनों को पृथक - पृथक देखते हैं , वे सिद्ध होते हैं । प्रकृति -पुरुष अव्यक्त एवं अलिंग ( सनातन - नित्य ) हैं । प्रकृति के 23 तत्त्व व्यक्त एवं लिङ्ग ( इनका लय होता है ) हैं । 👉प्रकृति - पुरुष का ज्ञान प्रकृति के 23 तत्त्वों से अनुमान द्वारा प्राप्त होता है । √ 👉 व्यक्त (प्रकृति के 23 तत्त्व ) से अव्यक्त ( मूल प्रकृति ) को जाना जाता है , यदि व्यक्त न हों तो अव्यक्त को जानना संभव नहीं । प्रकृति और उसके 23 तत्त्व त्रिगुणी हैं और उनसे जो भी निर्मित होता है , वह त्रिगुणी होता है । देवताओं सहित सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो गुणातीत हो पर पुरुष गुणातीत है । 👉 प्रकृति निर्मित महत् से लेकर पंच महाभतों तक कि सृष्टि ( सर्ग ) , पुरुष मोक्ष के साधन हैं । 👉25 तत्त्वों का अच्छी तरह ज्ञान हो जाने के बाद धर्म ,अधर्म , अज्ञान , वैराग्य , अवैराग्य , ऐश्वर्य और अनैश्वर मोक्ष के प्रति कारण नहीं हैं । 👌 ज्ञान प्राप्ति के बाद भी पुरुष मुक्त नहीं होता , कुम्हार की चाक की भांति संस्कार के कारण मृत्यु से पहले तक शरीर को धारण किये हुए स्थित रहता है । 👉 धर्म - अधर्म आदि के द्वारा अर्जित संस्कार का क्षय हो जाने पर जब पुरुष शरीर से भिन्न हो जाता है तब वह प्रधान तत्त्व - निवृत्ति से चरितार्थ ऐकान्तिक और आत्यन्तिक दोनों तरह से मोक्ष को प्राप्त करता है । 🐧 ऐसा बोध हो जाने के बाद भी कि 1 - धर्म , 2 - अधर्म , 3 - अज्ञान , 4 - वैराग्य , 5 - अवैराग्य , 6 - ऐश्वर्य और 7 - अनैश्वर - ये 07 भाव मोक्ष के प्रति कारण नहीं है , पुरुष मुक्त नहीं होता , ऐसा क्यों है ? इसे समझें ➡ पुरुष कुम्हार की चाक की भांति है जो घड़ा तैयार हो जाने के बाद भी चलती रहती है क्योंकि वह आगे चलते रहने की ऊर्जा से युक्त होती है ठीक इसी तरह संस्कार रूपी ऊर्जा के कारण पुरुष शरीर -मृत्यु से पहले तक शरीर को धारण करता हुआ स्थित रहता है। धर्म - अधर्म आदि के द्वारा अर्जित संस्कार का क्षय हो जाने पर जब पुरुष शरीर से भिन्न हो जाता है तब वह प्रधान तत्त्व की निवृत्ति से चरितार्थ ऐकान्तिक और आत्यन्तिक दोनों तरह से मोक्ष को प्राप्त करता है अर्थात पहले पुरुष प्रकृति बोध प्राप्ति करके प्रकृति के 23 तत्त्वों से मुक्त हित और फिर अपने मूल स्वरूप में लौट आता है जिसे मोक्ष कहते हैं । पुरुष मोक्ष के बिना प्रकृति अपने मूल स्वरूप में न आ कर आवागमन चक्र में रहती है जैसा पहले बताया जा चुका है । पुरुष और प्रकृतिका संयोग क्यों और कैसे ? 💐 पुरुष , प्रकृति दर्शनार्थ प्रकृति से जुड़ता है और प्रकृति , पुरुष - कैवल्यार्थ पुरुष से जुड़ती हैं । " पुरुष प्रकृति का दर्शन करना चाहता है और प्रकृति पुरुष को कैवल्य में पहुँचाना चाहती है इस तरह दोनों अपनीं सोच को पूरा करने के लिए एक दूसरे से आकर्षित होते हैं " 👉 पुरुष - प्रकृति संयोग ऐसे होता है जैसे एक पंगु (लंगड़े )और एक अंधे का संयोग होता है । अँधा , लंगड़े के कंधे पर बैठ कर मार्ग दिखाता है । यहां पंगु पुरुष है और प्रकृति अंधी है । प्रकृति - पुरुष के संयोगसे सृष्टि - उत्पत्ति होती है। 👉 पुरुष न बद्ध है और न ही मुक्त है तथा न ही बहुत से आश्रयों से संसरण (एक जन्म से दूसरे जन्म में जाना ) करता है । प्रकृति महत् आदि अनेक आश्रयोंमें बद्ध होती है , मुक्त होती है और संसरण करती है । ऊपर व्यक्त सांख्य तत्त्व ज्ञान जे आधार और भाव और भौतिक सृष्टियों को भी यहाँ समझ लेना चाहिए 👇 प्रकृति के 23 तत्त्वों में से महत् (बुद्धि ) , अहंकार और 11 इन्द्रियाँ ( मन , 05 ज्ञान इन्द्रियाँ और 05 कर्म इन्द्रियाँ ) भाव सृष्टि ( इसे प्रर्याय या बुद्धि सृष्टि भी कहते हैं ) के तत्त्व हैं और 05 तन्मात्र तथा इनसे उत्पन्न 05 महाभूत प्रकृति ( लिङ्ग ) सृष्टि के तत्त्व हैं । लिङ्ग का अर्थ है ऐसे तत्त्व जिनका लय होता है और अलिङ्ग तत्त्व वे तत्त्व हैं जिनका लय नहीं होता । भाव सृष्टि के 13 तत्त्व और लिङ्ग सृष्टि के पञ्च तन्मात्र सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहलाते हैं जो पुनर्जन्म का कारण है या कहें बीज है । 👉भाव सृष्टि ( बुद्धि , अहंकार और 11 इन्द्रियाँ ) के बिना लिङ्ग सृष्टि ( पंच तन्मात्र ) के होने की कल्पना भी संभव नहीं और बिना लिङ्ग सृष्टि , भाव सृष्टि की निष्पत्ति ( उत्पत्ति ) संभव नहीं । लिङ्ग सृष्टि ( भौतिक सृष्टि ) सांख्य के आधार पर 14 प्रकार की बताई गई है जो 03 भागों में विभाजीत है । पहली सृष्टि में 08 प्रकार के देवताओं की सृष्टि है जिनमें ब्रह्मा , इंद्र , प्रजापति , सौम्य , गंधर्व , यक्ष , पिशाच , राक्षस आते हैं । दूसर लिङ्ग सृष्टि तिर्यक सृष्टि है जिसमें पशु , पक्षी , सरीसृप , स्थावर आदि 05 प्रकार की है । तीसर सृष्टि में मनुष्य आते हैं । श्रीमद्भागवत पुराण 3.10 में 43 प्रकार की सृष्टि में 08 प्रकार की देवताओं की सृष्टि , 06 प्रकार की स्थावर की सृष्टि , 28 प्रकार की तिर्यक सृष्टि और 01 प्रकार की मनुष्य की सृष्टि बताई गई है । 👌👌👌यह रहा , अव्यक्त से व्यक्त , सूक्ष्म से साकार की उत्पत्ति का सांख्य रहस्य ~~ ॐ ~~

Thursday, January 5, 2023

मन - बुद्धि और परमात्मा

साधन साध्य नहीं बन सकता । बुद्धि , 11 इन्द्रियां , अहँकार , तीन गुण , पञ्च तन्मात्र और पञ्च महाभूत , स्थूल देह में स्थित देही अर्थात पुरुष या जीवात्मा को बंधन मुक्त कराने के tools है। बुद्धि ,अहँकार और मन शेष तत्त्वों के केंद्र रूप में हैं । बुद्धि , अहँकार और मन कर्म योग , ज्ञानयोग , भक्तियोग एवं अन्य साधनों के प्रमुख बिषय है । साधना के माध्यम से इन तत्त्वों को तामस एवं राजस गुणों के प्रभाव से मुक्त बनाया जाता है और इन्हें सत्त्विक गुण केंद्रित बनाया जाता है । सत्त्विक गुण से भी अंततः चित्त को विमुक्त कराया जाता है तब कहीं स्व बोध होता है जो ईश्वर के अनंत स्वरुपो की झलक देखने में समर्थ होता है । ॐ ।

Tuesday, November 29, 2022

उद्धव की ब्रज यात्रा , गोपियों से वार्ता और भ्रमर गीत भागवत आधारित

उद्धवजी कौन हैं ? 👍ब्रह्मा पुत्र ऋषि अंगिरा के पुत्र एवं देवताओं के पुरोहित बृहस्पति जी के शिष्य हैं , उद्धव जी। बृहस्पतिजीकी पत्नी तारा और ब्रह्मा पुत्र ऋषि अत्रि के पुत्र चन्द्रमा से बुध का जन्म होता है । बुध से त्रेतायुग के प्रारम्भ में पुरुरवा का जन्म होता है । पुरुरवा से चंद्र बंश प्रारम्भ होता है । इस कुल में 28 वे द्वापर के अंत में प्रभु श्री कृष्ण और बलराम जी का जन्म होता है । 👍उद्धव जी वृष्णि बंशी हैं और कृष्ण से उम्रमें बड़े हैं । कृष्ण अवतार पूर्व उद्धवजी जब 05 वर्ष के थे , कृष्ण की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाया करते थे । √ 👍उद्धवजी जब बृहस्पति जी से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तब बृहस्पति बता दिए थे कि निकट भविष्यमें तुम्हाते ही कुल में कृष्ण अवतार होने वाला है । तुम शौभाग्यशाली हो कि तुमको उनके संग रहने का सुअवसर मिलेगा ।√ 👌 उद्धव जी जो निर्गुण , निराकार उपासक हैं , कृष्ण के मथुरा के साथी और परम मित्र एवं सलाहकार हैं । देखने में उद्धब कृष्ण जैसे ही दिखते भी हैं । उद्धव जी की स्मृति में गुरु बृहस्पति जी की यह बात कि कृष्ण जो तुम्हारे कुल में अवतरित होनेवाले हैं वे परम् ब्रह्म हैं , हर पल बनी रहती है अतः अपने मित्र एवं सखा , साकार - सगुण कृष्ण में निराकार - निर्गुण परब्रह्म दिखते रहते हैं । उद्धवकी ब्रज यात्रा कान्हा जी उद्धव को संबोधित करते हुए कहते हैं , उद्धव भैया ! आप ब्रज जाओ , वहाँ मेरे पिता - माता ; नंदबाबा और यशोदा मैया हैं । इस समय मेरी अनुपस्थिति के कारण वे दुःखी हैं । आप अपनें ब्रह्म - ज्ञान से उन्हें मोह बंधन स्व मुक्त करा सकते हैं । दूसरी तरफ ब्रज की गोपियाँ मेरे विरह –पीड़ा में डूबी हुई हैं । तुम उन्हें भी अपनें ब्रह्म - ज्ञान एवं मेरा सन्देश सुनाकर वेदनामुक्त कर सकते हैं । गोपियाँ मुझे अपनी आत्मा समझती हैं । मैं अक्रूरजी के संग मथुरा आते समय उन सबको कहा था कि मैं अपना कार्य पूरा करके लौट आऊंगा लेकिन यह अभीं संभव नहीं दिख रहा । इस समय उन्हें मेरा यह दिया गया बचन ही उनके जीने का आधार बना हुआ है । वे केवल इस लिए जी रही हैं कि एक दिन मैं उनसे मिलने ब्रज अवश्य आऊँगा । प्रातः काल में उद्धव जी कान्हा का सन्देश ले कर अपनें स्वर्ण रथ से गोकुल से ब्रज की यात्रा करते हैं और सायंकाल गोधूलि के समय नन्द बाबा के घर पहुंचते हैं । यहाँ आप समझ सकते हैं कि मथुरा से गोकुल की दूरी क्या रही होगी जबकि वर्तमान में यह दूरी लगभग 10 किलो मीटर है । उद्धव जी की नन्द बाबा - माँ यशोदा के संग ब्रज की पहली रात.. नन्द बाबा वार्ता प्रारम्भ करते हुए कहते हैं , कृष्ण कभी हम सबको स्मरण करते हैं ? यशोदा जी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं - यह , उनकी माँ हैं जो हर पल अपने कान्हा की स्मृति में डूबी रहती हैं । कान्हा के स्वजन संबंधी , सखा और अन्य ब्रज बासी उनको अपना स्वामी और सर्वस्व मानते हैं और उनकी स्मृति से बहार निकलना नहीं चाहते । क्या कान्हा वहाँ मथुरा में ब्रज की गौओं को , वृन्दाबन और गिरिराज को कभीं स्मरण करते हैं ? आप यह तो बताइए कि क्या हमारे गोविंद अपने सुहृद - बांधवों को देखने के लिए एक बार भी यहाँ आएंगे ? यदि वे यहाँ आ जाते तो हम सब उनकी सुघड़ नासिका , मधुर हास्य , और मनोहर चितवन से युक्त मुख - कमल देख तो लेते ! कान्हा एक बार नहीं अनेक बार हम सबकी रक्षा की है । उद्धवजी ! उनका हृदय उदार और शक्ति अनंत है । इस प्रकार नन्द बाबा सारी रात कृष्णकी सारी लीलाओं को सुनाते रहे । उद्धवजी ! अब हम सब उनकी स्मृतियों में इतने तन्मय रहते हैं कि हम सबसे कोई काम - काज होता ही नहीं । जब हम देखते हैं कि यह वही नदी है जिसमें कृष्ण जल - क्रीड़ा करते थे , यह वही गिरिराज है जिसे कृष्ण 7 वर्ष की उम्र में इंद्र कोप के कारण अति बृष्टि से हम सब ब्रज बासियों की रक्षा करने हेतु अपनी एक उंगली पर 07 दिन उठाये रखे थे , यह वही वन प्रदेश हैं जहाँ कृष्ण गौएँ चराते हुए बासुरी बजाया करते थे , और ये वे ही स्थान हैं , जहाँ वे अपने मित्रों के साथ अनेकों प्रकारके खेल खेला करते थे , तब उनकी स्मृतियों में हम ब्रज बासी खो जाया करते हैं । उद्धव जी ! आपको आश्चय होगा यह देख कर कि कान्हा के पैरों के निशान आज भी ब्रज की धरती पर वैसे ही पड़े हैं जैसे मानों कान्हा आज ही यहाँ चले हों और इन चिन्हों को देखने से हम सब का मन कृष्णमय बना रहता है । निःसंदेह हम बलराम - कृष्णको देवशिरोमणि मानते हैं और यह भी मानते हैं कि यहाँ देवताओं के बहुत बड़े प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु अवतरित हुए हैं , स्वयं गर्गाचार्य जी मुझे यह बात बताई थी । रात भर नंदबाबा उद्धव जी को कान्हा की बाल लीलाओं को सुनाते रहे और वहाँ माँ यशोदा जी पूर्ण शांत भाव में बातें सुनती रही । बाल लीलाओं को सुनते हुए माँ के आंसू टपक रहे थे । माँ यशोदा और नंदबाबा के कृष्ण अनुराग को देखते हुए उद्धव जी कहते हैं , इसमें कोई संदेह नहीं कि आप दोनों जीवधारियों में परम् भाग्यवान हैं । कृष्ण तो परम् ब्रह्म परमात्मा है , सबका आदि , मध्य और अंत हैं और समस्त ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए है । उसके प्रति आप दोनों का वात्सल्य भाव - पुत्र भाव का होना , आप दोनों को भाग्यवान बनाता है । जो जीव अपने अंत समय में शुद्ध मन से कृष्ण पर केंद्रित हो जाता है , वह परमगति को प्राप्त करता है । √ कान्हा भगवान् हैं ; जो भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करते हैं , जो सबकी आत्मा हैं और जो इस समय मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी का भार उतारने हेतु हम सबके मध्य लीलाएँ कर रहे हैं । उद्धवजी आगे कहते हैं , कंस बध के ठीक बाद , वे आप दोनों एवं अन्य ग्वालों को मथुरा से ब्रज लौटने को कहे थे और यह भी कहे थे की मैं यहाँ मथुरा में अपना कार्य पूरा करके शीघ्र ही आप सब से मिलने ब्रज आऊँगा अतः वे निकट भविष्य में आप सबसे मिलने के लिए यहाँ आनेवाले हैं । अब कुछ ही दिनों की ही तो बात है , जब कान्हा आप सबके मध्य होंगे और आप सब को आनंदित करेंगे । उनका कोई प्रिय - अप्रिय नहीं । वे सबमें और सबके प्रति समान हैं । उनकी दृष्टि में कोई न तो उत्तम है और न कोई अधम । उनकी कोई माता नहीं , पिता नहीं , पत्नी नहीं और कोई पुत्र नहीं । न कोई अपना है न पराया है । वे देह रहित , जन्म - मृत्यु से परे हैं । प्रभु तो अजन्मा हैं , निर्गुण हैं , गुणातीत होते हुए भी लीला के लिए खेल - खेल में गुणों को स्वीकारते हैं । कर्म करता तो गुण हैं पर अहँकार के प्रभाव में मनुष्य स्वयं को करता समझता रहता है । संपूर्ण ब्रह्मांड की सूचनाएं उन्ही से तो हैं ! बातों - बातों में रात सरक गयी और सूर्योदय होने को है । कुछ गोपियों को नंद बाबा के द्वार पर एक स्वर्ण रथ दिखाई देता है । वे आपस में उस रथ के संबंध में एक दूसरे से पूछती हैं । एक कहती है , हो न हो वह अक्रूर ही क्यों न हो ! वे आपस में इस प्रकार बातें कर ही रही थी कि उद्धव जी नंद द्वार पर खड़े उन्हें दिख गए । उद्धव - गोपियों की बातचीत और भ्रमर गीत गोपियाँ यह देख कर विस्मृत हो गयी कि इस व्यक्ति की आकृति - भेषभूसा कान्हा से मिलती - जुलती है ; घुटनो तक लंबी भुजाएँ , नूतन कमलदल के समान कोमल नेत्र शरीर पर पीताम्बर गले में कमल पुष्प माला धारण किये हुए , कानों में मणि जटित कुंडल झलक रहे हैं । गोपियाँ कहती है , यह पुरुष तो कान्हा जैसा ही दिखता है , आखिर है , कौन ? कहाँ से आया होगा ! इस उत्सुकता में गोपियाँ उन्हें घेर लेती हैं । जब गोपियों को पता चला कि ये कान्हा के दूत हैं और कान्हा के सन्देश को लाये हैं तब सभी गोपियाँ विनम्र भाव में उनका सत्कार करती हैं , एकांत में उद्धव को बैठा कर उनसे बाते करती हैं । उद्धवजी ! ऐसा पता चला है कि आप कान्हा के पार्षद हैं और उनका कोई संदेश ले कर आप यहां पधारे हैं । गोपियाँ उद्धव से बात करते - करते कान्हा की स्मृति में सुध -बुध खो बैठती हैं । भ्रमर का आगमन >कान्हा के बचपन की लीलाओंका गुणगान करती - करती गोपियाँ कृष्ण प्रेम में डूब जाती हैं। एक गोपिका के पैरों के चारों तरफ एक भौरा गुनगुनाते हुए चक्कर लगाते हुए दिख पड़ता है । वह गोपिका सोचती है , हो सकता है कान्हा मुझे रूठी हुई समझकर मुझे मनाने हेतु भौरे के रूप में कोई दूत भेजा हो ! वह गोपी भौरे से कहती है - रे मधुप ! तूँ कपटी का सखा है , तूँ हमारे पैरों को न छू । तुम्हारा और कान्हा का रंग एक सा है । जैसे तूँ पुष्प - रस ले कर उड़ जाया करता है , पुष्पों से प्यार नहीं करता वैसे ही तेरा मित्र भी है । अरे भ्रमर ! हम तो ठहरी वनवासिनी , हमारे पास तो घर - द्वार भी नहीं है । तूँ हम सबके सामने यदुबंश शिरोमणि श्रीकृष्ण का बहुत - सा गुणगान क्यों कर रहा है ? यह सब हम सबको मनानेके लिए ही तो है ? परंतु नहीं - नहीं , वे हमारे लिए कोई नए नहीं हैं , हमारे लिए तो जाने पहचाने पुराने हैं । तेरी चापलूसी हम सबके सामने नहीं चलेगी , तूँ यहाँ से चला जा । तूँ कान्हा की मथुरा की सहेलियों के सामने जा कर उनका गुणगान कर , वे नयी हैं , कान्हा की लीलाओं के परिचित कम हैं और इस समय वे कृष्ण की प्यारी भी हैं । कान्हा उनके हृदय की पीड़ा को मिटा चुके हैं अब वे तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी । तुम्हारी चापलूसी से प्रसन्न हो कर तुम्हें मुहमागा पुरस्कार भी देंगी । भौरे! तूँ ऐसा क्यों कह रहा है कि कान्हा हमारे लिए छटपटा रहे हैं ? त्रिलोक में ऐसी कौन सी स्त्री है जो उन्हें नहीं चाहती होगी ? स्वयं लक्ष्मी जी भी उनकी चरणरज की सेवा करती है फिर कान्हा के सामने हम वनवासिनियाँ किस गिनती में आती हैं । तूँ उनके पास जा कर कहना कि तुम्हारा नाम उत्तमश्लोक है । अच्छे - अच्छे लोग तुम्हारी कीर्ति का गुणगान करते हैं , परंतु इसकी सार्थकता तो इसी में है कि तुम हम दीनों पर दया करो , यदि तुम ऐसा नहीं करते तो तुम्हारा उत्तमश्लोक नाम झूठा पड़ जायेगा । अरे मधुप ! तुम मेरे पैरों पर अपना सिर मत टेक । में जानती हूँ कि तुम अनुनय - विनय करने में क्षमा - याचना करने में बड़ा निपुण है । मालूम होता है , तुम कान्हा से ही यह सब सीखा है कि रूठे को कैसे मनाया जाता है ? पूरा प्रशिक्षण दे कर श्री कृष्ण तुमको यहाँ भेजा है । तुम इतना समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेवाली । तूँ हमें देख , हमने कान्हा के लिए ही अपनें पति , पुत्र - पुत्रियाँ एवं परिवार का त्याग कर रखा है ! लेकिन वह कान्हा निर्मोही हमें त्याग कर मथुरा चला गया । रे मधुप ! जब वे राम बने थे , तब कपिराज बालि को छिप कर बड़ी निर्दयता से मारा था । बेचारी शूर्पणखा कामबश उनके पास आई थी और वे अपनी स्त्री के बश में हो कर उसके नाक - कान काट दिए थे । हमें कान्हा क्या किसी भी कालू वस्तु से कोई प्रयोजन नहीं । अब तुम कहोगे की फिर तुमलोक उसे क्यों चाहती हो , क्यों नहीं छोड़ देती ? तो सुन ! एक बार जो उसका हो गया , वह उसे नहीं छोड़ सकता ।जैसे कृष्णसार मृग की पत्नी भोली - भाली हरिनियाँ व्याध के सुमधुर गान का विश्वास कर लेती हैं और उनके जाल में फँस कर मारी जाती हैं वैसे हम भोली - भाली गोपियाँ भी उस छलिये कृष्ण की कपतभरी मीठी - मीठी बातों में आकर उन्हें सत्य समान मान बैठीं और उससे बध गयी । रे भौरे ! अब तुम इस विषय पर आगे और कुछ न कह । उद्धव कहते हैं , अहो गोपियों ! तुम कृत्य - कृत्य हो । तुम्हारा जीवन सफल है । तुम पूजनीय हो । तुम सभीं प्रेमा भक्ति से वह सब पा लिया है जिसे बड़े - बड़े ऋषि - मुनि के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है । कितने सौभाग्य की बात है कि तुमने अपने पुत्र , पति , देह , स्वजन और घरों को छोड़ कर पुरुषोत्तम कृष्ण को जो सबके परम् पति हैं , उन्हें अपने पति के रूप में वरण किया है । महाभाग्यवती गोपियों ! कृष्ण वियोग से , तुम इन्द्रियातीत परमात्मा के प्रति वह भाव प्राप्त कर लिया है जो सभीं बस्तुओं के रूप में उनका दर्शन करता है । उद्धव गोपियों को प्रभु का संदेश सुनाते हैं प्रभु श्री कृष्ण अपनें सन्देश में कह रहे हैं , " मैं सबका आत्मा हूँ और सबमें अनुगत हूँ , इसलिए मुझसे किसी का वियोग होना संभव नहीं । जैसे संसार की सभीं वस्तुओं में पांच भूतों की उपस्थिति है वैसे मैं मन , प्राण , पांच भूत , इन्द्रिय और बिषयों का आश्रय हूँ , वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ । मैं अपनी माया द्वारा भूतों , बिषयों और इंद्रियों आदि का आश्रय और उनका निमित्त भी बन जाता हूँ । आत्मा , माया और माया के कार्य से पृथक है । कोई गुण आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकता ( गीता 14.5 : तीन गुण आत्मा को देह में बाध कर रखते हैं )। मनुष्य को इन्द्रिय बिषयों से आसक्त नहीं होना चाहिए ,भक्ति , तप , योग और ज्ञान का लक्ष्य है मेरी प्राप्ति । मैं तुम सबसे दूर इसलिए हूँ जिससे तुम सबका मन वियोग माध्यम से मुझसे जुड़ा रहे । गोपियाँ उद्धव की कृष्ण संदेश को सुनते - सुनते सविकल्प समाधि में उतर जाती हैं " गोपियाँ उद्धव द्वारा प्रभु के संदेश को सुनाने के बार कह रही हैं , उद्धवजी ! एक बात आप हमें बतलाइए कि जिस प्रकार हम सब उनके प्यार में डूबी रहती हैं , क्या वे भी हमसे इतना ही प्यार करते हैं और क्या हम जैसा कृष्ण प्यार मथुरा की स्त्रियों में भी है ? √√√ उद्धवजी ! क्या कभी कृष्ण उस रात्रि का स्मरण भी करते हैं जब वे हम सबके साथ वृन्दाबन में रास - महारास की लीला खेल रहे थे ? √√ उद्धवजी ! हम सब तो उनकी ही विरह की अग्नि में जल रहे है । इंद्र जैसे बन को जल बरसा कर हरा भरा करते हैं वैसे क्या कृष्ण अपनें स्पर्श से हमें जीवन दान देंगे ? √√√ गोपियों में से एक गोपी कह रही है , अरी सखी ! अब तो वे दुश्मन को मार कर राज्य पा लिए हैं । सभीं उनके सुदृढ़ बने हुए हैं । अब वे बड़े - बड़े नरपतियों की कुमारियों से ब्याह करेंगे , अब हम गँवारिनो के पाद क्यों आएंगे ?√√√ एक अन्य गोपी कह रही है , नहीं सखी , महात्मा कृष्ण तो स्वयं लक्ष्मी पति हैं हैं ग्वालिनों एवं अन्य राजकुमारियों से उनका क्या प्रयोजन ,? वे तो कामना मुक्त महात्मा हैं । गोपियाँ कह वही हैं , वेश्या पिंगला कहती है , संसार में किसी से आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है पर यह जानते हुए भी हम कृष्ण के लौटने की आशा को नहीं त्याग सकते ! हमारे प्यारे श्यामसुंदर हमसे एकांत में जो मीठी - मीठी प्रेम की बातें की हैं उन्हें छोड़ने का , भुलाने की बात हम सोच भी कैसे कर सकती हैं ! स्वयं। लक्ष्मी जी उनके अंग - अंग में लिपटी पड़ी हैं , उन्हें पल भर के लिये नहीं छोड़ती । √√√ गोपियाँ उद्धव को ब्रज दर्शन करा रही हैं और कह रही हैं , उद्धवजी ! यह वह नदी है जिसमे वे विहार करते थे । यह वह पर्वत है जिसके शिखर पर चढ़ कर वे बासुरी बजाते थे , वे ही ये बन हैं जिनमें रात्रि के समय रास लीला किये थे । ये वे गौएँ हैं जिनको चराने के लिए वे सुबह - शाम हम लोगों को देखते हुए जाते - आते थे । यहाँ के कण - कण पर उनके हस्ताक्षर हैं । उद्धव जी हम सबको क्या उन्हें भूलना संभव हो सकता है ? कान्हा की हँस जैसी चाल , उन्मुक्त हास्य , विलास पूर्ण चितवन , मधुमयी वाणी - आह ! उन सब ने हमारा चित चुरा लिया है । हमारे मन बश में नहीं फिर हम उन्हें कैसे भूलें ! उद्धव जी गोपियीं की विरह- व्यथा मिटाने हेतु वहाँ कई माह रहते हैं , और अकेले ब्रज भ्रमण करते हैं । प्रभु के परम् प्रिय उद्धव जी कभीं नदी तट पर जाते , कभीं बनो में विहरते और कभीं गिरिराज पर भ्रमण करते और कभीं फूलों से भरे वृक्षों में ही रम जाते । उद्धव गोपियों को ब्रह्म ज्ञान से प्रेमा भक्ति से मुक्त कराने मथुरा से ब्रज आये हुए हसीन लेकिन गोपियों की संगति से उनका ब्रह्म ज्ञान गोपियों के कृष्ण प्रेमाभक्ति में बदल जाता है ब्रज भूमि और कान्हा के पद चिह्नों को खोजते फिर रहे हैं । उद्धव कह रहे हैं , इस धरा पर केवल इन गोपियों के शरीर धारण करना ही सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि ये सर्वात्मा प्रभु श्री कृष्ण के परम् प्रेममय दिव्य भाव में स्थित हैं । प्रेम की यह उच्चतम स्थिति सभी साधनाओं का परम् लक्ष्य है । कहाँ ये बनचरी आचार - ज्ञान और जाति से हीन गाँव की गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानंद भगवन् श्री कृष्ण में यह उनका अनन्य प्रेम ! बुद्धि से नहीं हृदय से कृष्ण के परम् विधुद्ध प्रेम - रस टपकता है। मेरे लिए तो सबसे उत्तम बात यही होगी कि मैं इस वृन्दाबन में कोई झाड़ी , कोई औषधि , कोई जड़ी - बूटी और कोई लता ही बन जाऊँ । अहा ! यदि ऐसा संभव हुआ तो मुझे इन व्रजांगनाओं की चरण धूलि निरंतर सेवन करने हेतु मिलती रहेगी । धन्य हैं , ये गोपियाँ । ज्ञानयोग साधना में जब बुद्धि हृदय में लीन हो जाती है तब गोपियों जैसी प्रेमा भक्ति हृदय में अंकुरित होती है । ज्ञान योग , कर्म योग अथवा साधना के अन्य श्रोतों का प्रारम्भ तो बुद्धि आधारित होता है जिसे अपरा साधना कहते हैं । जब अपरा साधना गहराती है तब बुद्धि हृदय में ऐसे अपनें को लीन कर लेती है जैसे सागर में गंगा स्वयं को लीन कर लेती हैं और यहाँ से परा साधना प्रारम्भ हो कर कैवल्य में पहुँचाती है । परा अर्थात जिसे मन सहित 11 इंद्रियों और बुद्धि - अहँकार के पकड़ना संभव न हो । कई माह ब्रजमें रह करअब उद्धव मथुरा लौट रहे हैं उद्धव जी गोपियों , ग्वालों , नंदबाब और माँ यशोदा को प्रणाम करके मथुरा लौटने की आज्ञा प्राप्त करते हैं । जब उद्धव आये थे तब ब्रह्म ज्ञानी थे और जब कई माह ब्रज में रहने के बाद लेत रहे हैं तब भक्त उद्धव बन कर लौट रहे हैं । माँ यशोदा तो चुप थी लेकिन अपनें आंसू को छिपा नहीं पा रही थी पर नन्द बाबा , कृष्ण के प्रेमी ग्वाले एवं गोपियाँ कहती हैं , उद्धवजी ! हमें मोक्ष की चाह नहीं , हम सदैव कृष्ण - भक्ति में डूबे रहना चाहते हैं । उद्धवजी मथुरा लौट आते हैं और प्रभु श्री को प्रणाम करके ब्रज निवासियों की कृष्ण - भक्ति को स्पष्ट करना चाहते हैं , पर कर नहीं पाते , उनका गला भर रहा होता है और अपनी आंसू से अपनें ब्रज अनुभव को व्यक्त करते हैं । ~~ ॐ इति ~~ ब्रह्मा पुत्र ऋषि अंगिरा के पुत्र एवं देवताओं के पुरोहित बृहस्पति जी के शिष्य हैं , उद्धव जी। बृहस्पतिजीकी पत्नी तारा और ब्रह्मा पुत्र ऋषि अत्रि के पुत्र चन्द्रमा से बुध का जन्म होता है । बुध से त्रेतायुग के प्रारम्भ में पुरुरवा का जन्म होता है । पुरुरवा से चंद्र बंश प्रारम्भ होता है । इस कुल में 28 वे द्वापर के अंत में प्रभु श्री कृष्ण और बलराम जी का जन्म होता है । 

👍उद्धव जी वृष्णि बंशी हैं और कृष्ण से उम्रमें बड़े हैं । कृष्ण अवतार पूर्व उद्धवजी जब 05 वर्ष  के थे , कृष्ण की मिट्टी की मूर्तियाँ बनाया करते थे । √

👍उद्धवजी जब बृहस्पति जी से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तब बृहस्पति बता दिए थे कि  निकट भविष्यमें तुम्हाते ही कुल में कृष्ण अवतार होने वाला है । तुम शौभाग्यशाली हो कि तुमको उनके संग रहने का सुअवसर मिलेगा  ।√

👌 उद्धव जी जो निर्गुण , निराकार उपासक हैं , कृष्ण के मथुरा के साथी और परम मित्र एवं सलाहकार हैं । देखने में उद्धब कृष्ण जैसे ही दिखते भी हैं । उद्धव जी की स्मृति में गुरु बृहस्पति जी की यह बात कि कृष्ण जो तुम्हारे कुल में अवतरित होनेवाले हैं वे परम् ब्रह्म हैं , हर पल बनी रहती है अतः अपने मित्र एवं सखा , साकार - सगुण कृष्ण में निराकार - निर्गुण परब्रह्म दिखते रहते हैं । 

उद्धवकी ब्रज यात्रा

कान्हा जी उद्धव को संबोधित करते हुए कहते हैं , उद्धव 

भैया ! आप ब्रज जाओ , वहाँ मेरे पिता - माता ; नंदबाबा और यशोदा मैया हैं । इस समय मेरी अनुपस्थिति के कारण वे दुःखी हैं । आप अपनें ब्रह्म - ज्ञान से उन्हें मोह बंधन स्व मुक्त करा सकते हैं । दूसरी तरफ ब्रज की गोपियाँ मेरे विरह –पीड़ा में डूबी हुई हैं । तुम उन्हें भी अपनें ब्रह्म - ज्ञान एवं मेरा सन्देश सुनाकर वेदनामुक्त कर सकते हैं । गोपियाँ मुझे  अपनी आत्मा समझती हैं । मैं अक्रूरजी के संग मथुरा आते समय उन सबको कहा था कि मैं अपना कार्य पूरा करके लौट आऊंगा लेकिन यह अभीं संभव नहीं दिख रहा । इस समय उन्हें मेरा यह दिया गया बचन ही उनके जीने का आधार बना हुआ है । वे केवल इस लिए जी रही हैं कि एक दिन मैं उनसे मिलने ब्रज अवश्य आऊँगा । 

प्रातः काल में उद्धव जी कान्हा का सन्देश ले कर अपनें स्वर्ण रथ से गोकुल से ब्रज की यात्रा करते हैं और सायंकाल गोधूलि के समय नन्द बाबा के घर पहुंचते हैं । यहाँ आप समझ सकते हैं कि मथुरा से गोकुल की दूरी क्या रही होगी जबकि वर्तमान में यह दूरी लगभग 10 किलो मीटर है ।

उद्धव जी की  नन्द बाबा - माँ यशोदा के संग ब्रज की पहली रात..

नन्द बाबा वार्ता प्रारम्भ करते हुए कहते हैं , कृष्ण कभी हम सबको स्मरण  करते हैं ? यशोदा जी की ओर इशारा करते हुए कहते हैं - यह , उनकी माँ हैं जो हर पल अपने कान्हा की स्मृति में डूबी रहती हैं । कान्हा के  स्वजन संबंधी , सखा और अन्य ब्रज बासी उनको अपना स्वामी और सर्वस्व मानते हैं और उनकी स्मृति से बहार निकलना नहीं चाहते । क्या कान्हा वहाँ मथुरा में ब्रज की गौओं को , वृन्दाबन और गिरिराज को कभीं स्मरण करते हैं ? 

आप यह तो बताइए कि क्या हमारे गोविंद अपने सुहृद - बांधवों को देखने के लिए एक बार भी यहाँ आएंगे ?

 यदि वे यहाँ आ जाते तो हम सब उनकी सुघड़ नासिका , मधुर हास्य , और मनोहर चितवन से युक्त मुख - कमल देख तो लेते ! कान्हा एक बार नहीं अनेक बार हम सबकी रक्षा की है । उद्धवजी ! उनका हृदय उदार और शक्ति अनंत है ।

इस प्रकार नन्द बाबा सारी रात कृष्णकी सारी लीलाओं को सुनाते रहे । 

उद्धवजी ! अब हम सब उनकी स्मृतियों में इतने तन्मय रहते हैं कि हम सबसे कोई काम - काज होता ही नहीं ।

जब हम देखते हैं कि यह वही नदी है जिसमें कृष्ण जल - क्रीड़ा करते थे , यह वही गिरिराज है जिसे कृष्ण 7 वर्ष की उम्र में इंद्र कोप के कारण अति बृष्टि से हम सब ब्रज बासियों की रक्षा करने हेतु अपनी एक उंगली पर  07 दिन उठाये रखे थे , यह वही वन प्रदेश हैं जहाँ कृष्ण गौएँ चराते हुए बासुरी बजाया करते थे , और ये वे ही स्थान हैं , जहाँ वे अपने मित्रों के साथ अनेकों प्रकारके खेल खेला करते थे , तब उनकी स्मृतियों में हम ब्रज बासी खो जाया करते हैं । उद्धव जी ! आपको आश्चय होगा यह देख कर कि कान्हा के पैरों के निशान आज भी ब्रज की धरती पर वैसे ही पड़े हैं जैसे मानों कान्हा आज ही यहाँ चले हों और इन चिन्हों को देखने से  हम सब का  मन कृष्णमय बना रहता है । 

निःसंदेह हम बलराम - कृष्णको देवशिरोमणि मानते हैं और यह भी मानते हैं कि यहाँ देवताओं के बहुत बड़े प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु अवतरित हुए हैं , स्वयं गर्गाचार्य जी मुझे यह बात बताई थी । रात भर नंदबाबा उद्धव जी को कान्हा की बाल लीलाओं को सुनाते रहे और वहाँ माँ यशोदा जी पूर्ण शांत भाव में बातें सुनती रही । बाल लीलाओं को सुनते हुए माँ के आंसू टपक रहे थे ।

माँ यशोदा और नंदबाबा के कृष्ण अनुराग को देखते हुए उद्धव जी कहते हैं , इसमें कोई संदेह नहीं कि आप दोनों जीवधारियों में परम् भाग्यवान हैं । कृष्ण तो परम् ब्रह्म परमात्मा है , सबका आदि , मध्य और अंत हैं और समस्त ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए है । उसके प्रति आप दोनों का वात्सल्य भाव - पुत्र भाव का होना , आप दोनों को भाग्यवान बनाता है । 

जो जीव अपने अंत समय में  शुद्ध मन से कृष्ण  पर केंद्रित हो जाता है , वह परमगति को प्राप्त करता है । √

 कान्हा भगवान् हैं ; जो भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करते हैं , जो सबकी आत्मा हैं और जो इस समय मनुष्य देह धारण करके पृथ्वी का भार उतारने हेतु हम सबके मध्य लीलाएँ कर रहे हैं । उद्धवजी आगे कहते हैं , कंस बध के ठीक बाद , वे आप दोनों एवं अन्य ग्वालों को मथुरा से ब्रज लौटने को कहे थे और यह भी कहे थे की मैं यहाँ मथुरा में अपना कार्य पूरा करके  शीघ्र ही आप सब से मिलने ब्रज आऊँगा अतः वे 

निकट भविष्य में आप  सबसे मिलने के लिए यहाँ आनेवाले 

हैं । अब कुछ ही दिनों की ही तो बात है , जब कान्हा आप सबके मध्य होंगे और आप सब को आनंदित करेंगे ।

उनका कोई प्रिय - अप्रिय नहीं । वे सबमें और सबके प्रति समान हैं । उनकी दृष्टि में कोई न तो उत्तम है और न कोई अधम । उनकी कोई माता नहीं , पिता नहीं , पत्नी नहीं और कोई पुत्र नहीं । न कोई अपना है न पराया है । वे देह रहित , जन्म - मृत्यु से परे हैं ।  प्रभु तो अजन्मा हैं , निर्गुण हैं , गुणातीत होते हुए भी लीला के लिए खेल - खेल में गुणों को स्वीकारते हैं । कर्म करता तो गुण हैं पर अहँकार के प्रभाव में मनुष्य स्वयं को करता समझता रहता है । 

संपूर्ण ब्रह्मांड की सूचनाएं उन्ही से तो हैं ! बातों - बातों में रात सरक गयी और सूर्योदय होने को है । 

कुछ गोपियों को  नंद बाबा के द्वार पर एक स्वर्ण रथ दिखाई देता है । वे आपस में उस रथ के संबंध में एक दूसरे से पूछती हैं । एक कहती है , हो न हो वह अक्रूर ही क्यों न हो ! वे आपस में इस प्रकार बातें कर ही रही थी कि उद्धव जी नंद द्वार पर खड़े उन्हें दिख गए । 

उद्धव - गोपियों की बातचीत और भ्रमर गीत

गोपियाँ यह देख कर विस्मृत हो गयी कि इस व्यक्ति की आकृति - भेषभूसा कान्हा से मिलती - जुलती है ; घुटनो तक लंबी भुजाएँ , नूतन कमलदल के समान कोमल नेत्र शरीर पर पीताम्बर गले में कमल पुष्प माला धारण किये हुए , कानों में मणि जटित कुंडल झलक रहे हैं । 

गोपियाँ कहती है , यह पुरुष तो कान्हा जैसा ही दिखता है , आखिर है , कौन ? कहाँ से आया होगा ! इस उत्सुकता में गोपियाँ उन्हें घेर लेती  हैं । 

जब गोपियों को पता चला कि ये कान्हा के  दूत हैं और कान्हा के सन्देश को लाये हैं  तब सभी गोपियाँ विनम्र भाव में उनका सत्कार करती हैं , एकांत में उद्धव को बैठा कर उनसे बाते करती हैं ।

उद्धवजी ! ऐसा पता चला है कि आप कान्हा के पार्षद हैं और उनका कोई संदेश ले कर आप यहां पधारे हैं । गोपियाँ उद्धव से बात करते - करते कान्हा की स्मृति में सुध -बुध खो बैठती हैं । 

भ्रमर का आगमन >कान्हा के बचपन की लीलाओंका गुणगान करती - करती गोपियाँ कृष्ण प्रेम में डूब जाती हैं। एक गोपिका के पैरों के चारों तरफ एक भौरा गुनगुनाते हुए चक्कर लगाते हुए दिख पड़ता है । वह गोपिका सोचती है , हो सकता है कान्हा मुझे रूठी हुई समझकर मुझे मनाने हेतु भौरे के रूप में कोई दूत भेजा हो ! 

वह गोपी भौरे से कहती है - रे मधुप ! तूँ कपटी का सखा है , तूँ हमारे पैरों को न छू । तुम्हारा और कान्हा का रंग एक सा है । जैसे तूँ पुष्प - रस ले कर उड़ जाया करता है , पुष्पों से प्यार नहीं करता वैसे ही तेरा मित्र भी है । अरे भ्रमर ! हम तो ठहरी वनवासिनी , हमारे पास तो घर - द्वार भी नहीं है । तूँ हम सबके सामने यदुबंश शिरोमणि श्रीकृष्ण का बहुत - सा गुणगान क्यों कर रहा है ? यह सब हम सबको मनानेके लिए ही तो है ? परंतु नहीं - नहीं , वे हमारे लिए कोई नए नहीं हैं , हमारे लिए तो जाने पहचाने पुराने हैं । तेरी चापलूसी हम सबके सामने नहीं चलेगी , तूँ यहाँ से चला जा । तूँ कान्हा की मथुरा की  सहेलियों के सामने जा कर उनका गुणगान कर , वे नयी हैं , कान्हा की  लीलाओं के परिचित कम हैं और इस समय वे कृष्ण की प्यारी भी  हैं । कान्हा  उनके हृदय की पीड़ा को मिटा चुके हैं अब वे तेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगी । तुम्हारी चापलूसी से प्रसन्न हो कर तुम्हें मुहमागा पुरस्कार भी देंगी ।

भौरे! तूँ ऐसा क्यों कह रहा है कि कान्हा  हमारे लिए छटपटा रहे हैं ? त्रिलोक में ऐसी कौन सी स्त्री है जो उन्हें नहीं चाहती होगी ? स्वयं लक्ष्मी जी भी उनकी चरणरज की सेवा करती है फिर कान्हा के सामने हम वनवासिनियाँ किस गिनती में आती हैं ।

तूँ  उनके पास जा कर कहना कि तुम्हारा नाम उत्तमश्लोक 

है । अच्छे - अच्छे लोग तुम्हारी कीर्ति का गुणगान करते हैं , परंतु इसकी सार्थकता तो इसी में है कि तुम हम दीनों पर दया करो , यदि तुम ऐसा नहीं करते तो तुम्हारा उत्तमश्लोक नाम झूठा पड़ जायेगा । 

अरे मधुप ! तुम मेरे पैरों पर अपना सिर मत टेक । में जानती हूँ कि तुम अनुनय - विनय करने में क्षमा - याचना करने में बड़ा निपुण है । मालूम होता है , तुम कान्हा से ही यह  सब सीखा है कि रूठे को कैसे मनाया जाता है ? पूरा प्रशिक्षण दे कर श्री कृष्ण तुमको यहाँ भेजा है । तुम इतना समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेवाली । 

तूँ हमें देख , हमने कान्हा के लिए ही अपनें पति , पुत्र - पुत्रियाँ एवं परिवार का त्याग कर रखा है ! लेकिन वह कान्हा निर्मोही हमें त्याग कर मथुरा चला गया । 

रे मधुप ! जब वे राम बने थे , तब कपिराज बालि को छिप कर बड़ी निर्दयता से मारा था । बेचारी शूर्पणखा कामबश उनके पास आई थी और वे अपनी स्त्री के बश में हो कर उसके नाक - कान काट दिए थे । हमें कान्हा क्या किसी भी कालू वस्तु से कोई प्रयोजन नहीं । अब तुम कहोगे की फिर तुमलोक उसे क्यों चाहती  हो , क्यों नहीं छोड़ देती ?

 तो सुन ! एक बार जो उसका हो गया , वह उसे नहीं छोड़ सकता ।जैसे कृष्णसार मृग की पत्नी भोली - भाली हरिनियाँ व्याध के सुमधुर गान का विश्वास कर लेती हैं और उनके जाल में फँस कर मारी जाती हैं वैसे हम भोली - भाली गोपियाँ भी उस छलिये कृष्ण की कपतभरी मीठी - मीठी बातों में आकर उन्हें सत्य समान मान बैठीं और उससे बध गयी ।

रे भौरे ! अब तुम इस विषय पर आगे और कुछ न कह । 

उद्धव कहते हैं , अहो गोपियों ! तुम कृत्य - कृत्य हो । तुम्हारा जीवन सफल है । तुम पूजनीय हो । तुम सभीं प्रेमा भक्ति से वह सब पा लिया है जिसे बड़े - बड़े ऋषि - मुनि के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है । कितने सौभाग्य की बात है कि तुमने अपने पुत्र , पति , देह , स्वजन और घरों को छोड़ कर पुरुषोत्तम कृष्ण को जो सबके परम् पति हैं , उन्हें अपने पति के रूप में वरण किया है । महाभाग्यवती गोपियों ! कृष्ण वियोग से , तुम इन्द्रियातीत परमात्मा के प्रति वह भाव प्राप्त कर लिया है  जो सभीं बस्तुओं के रूप में उनका दर्शन करता है । 

उद्धव गोपियों को प्रभु का संदेश सुनाते हैं 

प्रभु श्री कृष्ण अपनें सन्देश में कह रहे  हैं , "  मैं  सबका आत्मा हूँ और सबमें अनुगत हूँ , इसलिए मुझसे किसी का वियोग होना संभव नहीं । जैसे संसार की सभीं वस्तुओं में पांच भूतों की उपस्थिति है वैसे मैं मन , प्राण , पांच भूत , इन्द्रिय और बिषयों का आश्रय हूँ , वे मुझमें हैं और मैं उनमें 

हूँ । मैं अपनी माया द्वारा भूतों  , बिषयों और इंद्रियों आदि का आश्रय और उनका निमित्त भी बन जाता हूँ । आत्मा , माया और माया के कार्य से पृथक है । कोई गुण आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकता ( गीता 14.5 : तीन गुण आत्मा को देह में बाध कर रखते हैं )।  मनुष्य को इन्द्रिय बिषयों से आसक्त नहीं होना चाहिए ,भक्ति , तप , योग और ज्ञान का लक्ष्य है मेरी प्राप्ति । मैं तुम सबसे दूर  इसलिए हूँ जिससे तुम सबका मन वियोग माध्यम से मुझसे जुड़ा रहे । गोपियाँ उद्धव की कृष्ण संदेश को सुनते - सुनते सविकल्प समाधि में उतर जाती हैं " 

गोपियाँ उद्धव द्वारा प्रभु के संदेश को सुनाने के बार कह रही हैं , उद्धवजी ! एक बात आप हमें बतलाइए कि जिस प्रकार हम सब उनके प्यार में डूबी रहती हैं , क्या वे भी हमसे इतना ही प्यार करते हैं और क्या  हम जैसा कृष्ण प्यार मथुरा की स्त्रियों में भी है ? √√√

उद्धवजी ! क्या कभी कृष्ण उस रात्रि का स्मरण भी करते हैं जब वे हम सबके साथ वृन्दाबन में रास - महारास की लीला खेल रहे थे ? √√

उद्धवजी ! हम सब तो उनकी ही विरह की अग्नि में जल रहे है । इंद्र जैसे बन को जल बरसा कर हरा भरा करते हैं वैसे क्या कृष्ण अपनें स्पर्श से हमें जीवन दान देंगे ? √√√

गोपियों में से  एक गोपी कह रही है , अरी सखी ! अब तो वे दुश्मन को मार कर राज्य पा लिए हैं । सभीं उनके सुदृढ़ बने हुए हैं । अब वे बड़े - बड़े नरपतियों की कुमारियों से ब्याह करेंगे , अब हम गँवारिनो के पाद क्यों आएंगे ?√√√

एक अन्य  गोपी कह रही  है , नहीं सखी , महात्मा कृष्ण तो स्वयं लक्ष्मी पति हैं हैं ग्वालिनों एवं अन्य राजकुमारियों से उनका क्या प्रयोजन ,? वे तो कामना मुक्त महात्मा हैं । गोपियाँ कह वही हैं , वेश्या पिंगला कहती है , संसार में किसी से आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है पर यह जानते हुए भी हम कृष्ण के लौटने की आशा को नहीं त्याग सकते !

हमारे प्यारे श्यामसुंदर हमसे एकांत में जो मीठी - मीठी प्रेम की बातें की हैं उन्हें छोड़ने का , भुलाने की बात हम सोच भी कैसे कर सकती हैं ! स्वयं। लक्ष्मी जी उनके अंग - अंग में लिपटी पड़ी हैं , उन्हें पल भर के लिये नहीं छोड़ती । √√√

गोपियाँ उद्धव को ब्रज  दर्शन करा रही हैं और कह रही 

हैं , उद्धवजी ! यह वह नदी है जिसमे वे विहार करते थे । यह वह पर्वत है जिसके शिखर पर चढ़ कर वे बासुरी बजाते थे , 

वे ही ये बन हैं जिनमें रात्रि के समय रास लीला किये थे । ये वे गौएँ हैं जिनको  चराने के लिए वे सुबह - शाम हम लोगों को देखते हुए जाते - आते थे । यहाँ के कण - कण पर उनके हस्ताक्षर हैं । उद्धव जी हम सबको क्या उन्हें भूलना संभव हो सकता है ?

कान्हा की हँस जैसी चाल , उन्मुक्त हास्य , विलास पूर्ण चितवन , मधुमयी वाणी - आह ! उन सब ने हमारा चित चुरा लिया है । हमारे मन बश में नहीं फिर हम उन्हें कैसे भूलें ! 

उद्धव जी गोपियीं की विरह- व्यथा मिटाने हेतु वहाँ कई  माह रहते हैं , और अकेले ब्रज भ्रमण करते हैं ।

प्रभु के परम् प्रिय उद्धव जी कभीं नदी तट पर जाते , कभीं बनो में विहरते और कभीं गिरिराज पर भ्रमण करते और  कभीं फूलों से भरे वृक्षों में ही रम जाते । 

उद्धव गोपियों को ब्रह्म ज्ञान से प्रेमा भक्ति से मुक्त कराने मथुरा से ब्रज आये हुए हसीन लेकिन गोपियों की संगति से उनका ब्रह्म ज्ञान गोपियों के कृष्ण प्रेमाभक्ति में बदल जाता है ब्रज भूमि और कान्हा के पद चिह्नों को खोजते फिर रहे हैं ।

उद्धव कह रहे हैं , इस धरा पर केवल इन गोपियों के शरीर धारण करना ही सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि ये सर्वात्मा प्रभु श्री कृष्ण के परम् प्रेममय दिव्य भाव में स्थित हैं । प्रेम की यह उच्चतम स्थिति सभी साधनाओं का परम् लक्ष्य है । 

कहाँ ये बनचरी आचार -  ज्ञान और जाति से हीन गाँव की गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानंद भगवन् श्री कृष्ण में यह उनका अनन्य प्रेम ! बुद्धि से नहीं हृदय से कृष्ण के परम् विधुद्ध प्रेम - रस टपकता है। 

मेरे लिए तो सबसे उत्तम बात यही होगी कि मैं इस वृन्दाबन में कोई झाड़ी , कोई औषधि , कोई जड़ी - बूटी और कोई लता ही बन जाऊँ । अहा ! यदि ऐसा संभव  हुआ तो मुझे इन व्रजांगनाओं की चरण धूलि निरंतर सेवन करने हेतु मिलती रहेगी । धन्य हैं , ये गोपियाँ । 

ज्ञानयोग साधना में जब बुद्धि हृदय में लीन हो जाती है तब गोपियों जैसी प्रेमा भक्ति हृदय में अंकुरित होती है । ज्ञान योग  , कर्म योग अथवा साधना के अन्य श्रोतों का प्रारम्भ तो बुद्धि आधारित होता है जिसे अपरा साधना कहते हैं । जब अपरा साधना गहराती है तब बुद्धि हृदय में ऐसे अपनें को लीन कर लेती है जैसे सागर में गंगा स्वयं को लीन कर लेती हैं और यहाँ से परा साधना प्रारम्भ हो कर कैवल्य में पहुँचाती है । परा अर्थात जिसे मन सहित 11 इंद्रियों और बुद्धि - अहँकार के पकड़ना संभव न हो । 

कई माह ब्रजमें रह करअब उद्धव मथुरा लौट रहे हैं

उद्धव जी गोपियों , ग्वालों , नंदबाब और माँ यशोदा को प्रणाम करके मथुरा लौटने की आज्ञा प्राप्त करते हैं । जब उद्धव आये थे तब ब्रह्म ज्ञानी थे और जब कई माह ब्रज में रहने के बाद लेत रहे हैं तब भक्त उद्धव बन कर लौट रहे हैं ।

माँ यशोदा तो चुप थी लेकिन अपनें आंसू को छिपा नहीं पा रही थी पर नन्द बाबा , कृष्ण के प्रेमी ग्वाले एवं गोपियाँ कहती हैं , उद्धवजी ! हमें मोक्ष की चाह नहीं , हम सदैव कृष्ण - भक्ति में डूबे रहना चाहते हैं । उद्धवजी मथुरा लौट आते हैं और प्रभु श्री को प्रणाम करके ब्रज निवासियों की कृष्ण - भक्ति को स्पष्ट करना चाहते हैं , पर कर नहीं पाते , उनका गला भर रहा होता है और अपनी आंसू से अपनें ब्रज अनुभव को व्यक्त करते हैं । 

~~ ॐ इति ~~

Thursday, November 10, 2022

सांख्य दर्शन और पतंजलि दर्शन में चित्त का स्वरुप क्या है ?

" चित्त की 05 अवस्थाएँ हैं - क्षिप्ति , मूढ़ , विक्षिप्त , एकाग्रता और निरु । सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त एकाग्रता भूमि में होता है लेकिन ज्योंही चित्त निरु अवस्था में आता है असम्प्रज्ञात समाधि घटित हो जाती है । असम्प्रज्ञात समाधि में संस्कार बच रहते हैं । धर्ममेघ समाधि से संस्कारों का प्रतिप्रसव हो जाता है । यह अवस्था कैवल्य का द्वार खोलती है । " 👌 भोग , वैराग्य , समाधि और कैवल्य प्राप्ति का हेतु , चित्त है अतः चित्त को ठीक - ठीक समझना चाहिए । 👌 पुरुष प्रकाश से त्रिगुणी प्रकृति की साम्यावस्था विकृत होने से सृष्टि उत्पत्ति के पहले तत्त्व महत् ( बुद्धि ) की उत्पत्ति होती है । 👌 बुद्धि से सात्त्विक , राजस और तामस अहंकारों की उत्पत्ति होती है । 👌 सात्त्विक अहंकार से मन सहित 05 कर्म और 05 ज्ञान इंद्रियों की उत्पत्ति होती है । तामस अहंकार से पञ्च तन्मात्र और तन्मात्रों से उनके अपने - अपने महाभूतों की उत्पत्ति होती हैं । 👌 बुद्धि , अहंकार और मन को अंतःकरण तथा चित्त कहते हैं और 10 इन्द्रियाँ बाह्य करण कहलाती हैं । 💐 इस प्रकार ब्रह्मांड की सभीं जड़ - चेतन सूचनाएं प्रकृति - पुरुष और प्रकृति के 23 तत्त्वों के योग से होती है । 💐 चित्त अर्थात बुद्धि , अहंकार और मन माध्यम से अकर्ता पुरुष प्रकृति से जुड़ते ही कर्ता बन जाता है । चित्त , वह प्रकृति निर्मित पिजड़ा है जिसमें शुद्ध चेतन पुरुष अपने मूल स्वरूप से चित्त स्वरूपाकार हो जाता है । प्रकृति , पुरुष को देखने के बाद उसे मुक्त करना चाहती है और स्वयं भी अपने विकृत स्वरूप से मूल स्वरूप (गुणों की साम्यावस्था ) में लौट आना चाहती है । पुरुष ऊर्जा मुक्त चित्त पूर्ण रूप से अचेतन ( जड़ ) होता है जिसके कारण वह स्वयं को भी नहीं जानता । जब पुरुष को बोध हो जाता है कि वह चित्त नहीं , अपितु शुद्ध चेतन है तब वह कैवल्य मुखी हो जाता है । 💐 प्रकृति से जुड़ने से लेकर कैवल्य प्राप्ति तक की योगी के अंदर स्थित पुरुष की यात्रा योगी के एक जन्म में भी तय हो सकती है और अनेक जन्म भी लेने पड़ सकते हैं । प्रकृति के 23 तत्त्वों में पंच महाभूतों को छोड़ कर शेष 18 तत्त्वों को लिङ्ग या सूक्ष्म शरीर कहते हैं । यही लिङ्ग शरीर , पुरुष कैवल्यार्थ बार - बार शरीर धारण करता रहता है । बिना पंच महाभूत लिङ्ग शरीर सुक्षं और अस्थिर होता है । अब आगे ⤵️ 1 - चित्त प्रकृति - पुरुष संयोग भूमि है । 2 - चित्त प्रकृति के तीन तत्त्वों (बुद्धि अहंकार और मन ) से है । 3 - प्रकृति त्रिगुणी और जड़ है अतः चित्त भी त्रिगुणी एवं जड़ है । 4 - प्रकृति जड़ , अविद्या , त्रिगुणी , विकारों की जननी , जगत का आदि कारण , सक्रिय , पुरुष बंधन का कारण , देश - काल में सीमित , भोग्या , सनातन और एक है जबकि पुरुष प्रकृति के ठीक विपरीय है । अब आगे ⤵️ कारिका : 29 - 31 ◆ चित्त के तत्त्व मन की असामान्य वृत्ति संकल्प है , बुद्धि की असामान्य वृत्ति ज्ञान है और अहंकार की असामान्य वृत्ति अभिमान है । ◆ जो इन्द्रिय अंतःकरण (चित्त ) से जुड़ती है उसे चतुष्टय कहते हैं। दृश्य बिषयों में इन चारों की वृत्ति कभीं एक साथ तो कभीं क्रमशः भी होती है । ◇ अदृश्य बिषयों में अंतःकरण ( चित्त ) की वृत्ति इंद्रिय आधारित होती है जैसे अदृश्य रूप के चितन में चक्षु आधारित वृत्ति होगी । अदृश्य गंध की अनुभूति घ्राण इन्द्रिय आधारित होती है । ◆ मन , बुद्धि और अहँकार परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय से अपनी -अपनी वृत्तियों को जानते हैं । ◆ इन सभीं वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य होता है । सांख्य कारिका : 32 - 33 > ★ जैसा पहले बताया जा चुका है 13 करणों में 10 इन्द्रियाँ , बाह्य कारण हैं और मन , बुद्धि एवं अहँकार अंतःकरण हैं । ● बाह्य करण (10 इन्द्रियाँ ) केवल वर्तमान काल के बिषयों को ग्रहण करते हैं । ● अंतःकरण ( बुद्धि , अहँकार , मन ) तीनों कालों के बिषयों को ग्रहण करते हैं । सांख्य कारिका : 23 ( बुद्धि ) महत् ( बुद्धि ) के सात्त्विक और तामस रूप ◆ 04 सात्त्विक रूप >धर्म , ज्ञान , वैराग्य , ऐश्वर्य ◆ 04 तामस रूप >अधर्म , अज्ञान , अवैराग्य , अनैश्वर ( बुद्धि के 04 सत्त्विक रूप और 04 तामस रूप भाव कहलाते हैं । प्रकृति इन 08 भावों में से 07 भावों से बधी होती है लेकिन जब उसे पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में ज्ञान प्राप्ति होती है तब इन 07 भावों से मुख्य हो कर अपनें मूल स्वरूप में लौट जाती है । कारिका : 24 +25 (अहँकार ) ● अभिमान ही अहँकार है । 11 इन्द्रियां और 05 तन्मात्र अहँकार के कार्य हैं । इनमें 11 इन्द्रियाँ सत्त्विक अहँकार के कार्य हैं और 05 तन्मात्र तामस अहँकार के कार्य हैं । राजस अहँकार कोई तत्त्व उत्पन्न नहीं करता अपितु शेष दो अहंकारों को तत्त्व उत्पत्ति में सहयोग करता है । ◆ प्रकृति के 23 तत्त्वों में हर पल सात्त्विक , राजस और तामस गुण होते हैं । जब एक गुण प्रभावी होता है तब अन्य दो गुण कमजोर हो गए होते हैं , इस प्रकार हर पल इन तीन गुणों की मात्राएं घटती - बढ़ती रहती हैं । ◆ मूलतः गुणों की साधना ही चित्त की साधना है । जब चित्त निर्गुणी होता है तब विवेक की लहर उठने लगती है और चित्ताकार पुरुष अपने मूल स्वरूप में आ जाता है । चित्त वृत्तियाँ ( पतंजलि समाधि पाद सूत्र : 5 - 11 ) > वृत्ति उन हेतुओं को कहते हैं जो चित्त में सोच की लहर उत्पन्न करते हैं । चित्त की 05 वृत्तियां हैं जो क्लिष्ट - अक्लिष्ट दो रूपों में होती हैं । क्लिष्ट दुःख से जोड़ती हैं और अक्लिष्ट सुख से । सात्त्विक गुण की वृत्तियों से प्रभावित चित्त - वृत्तियाँ सुख की जननी हैं और इन्हें अक्लिष्ट कहते हैं । राजस - तामस गुणों से प्रभावित चित्त - वृत्तियाँ , दुःख की जननी हैं जिन्हें क्लिष्ट कहते हैं । चित्त की पहली वृत्ति प्रमाण तीन प्रकार की होती है ; प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम ( शब्द और आप्त वचन भी कहते हैं )। पांच ज्ञान इंद्रियों से बिषय बोध का होना , चित्त की प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति कहलाती है । अनुमान में बिषय अनुपस्थित रहता है लेकिन उससे सम्बन्धित चिन्हों से उसे जानते हैं जैसे दूर कहीं धुआं देख कर वहां अग्नि होने का अनुमान लगाना । आगम को आप्त वचन और शब्द भी कहते हैं । जिस बिषय का बोध प्रत्यक्ष एवं अनुमान से संभव नहीं , उसके बारे में उपलब्ध सर्वमान्य ग्रंथों एवं संदर्भों के आधार पर उस बिषय पर सोचने से, आगम चित्त वृत्ति पैदा पैदा होती है । चित्त की दूसरी वृत्ति विपर्यय : विपर्यय का अर्थ है अज्ञान या अविद्या । जो बिषय जैसा है , उसे वैसा न समझ कर उसके विपरीत समझना , विपर्यय है अर्थात सत को असत , और असत्य को सत समझना , विपर्यय है । चित्त की तीसरी वृत्ति विकल्प : विकल्प के संबंध में समाधि पाद सूत्र : 09 को देखें - शब्द ज्ञान अनुपाती वस्तु शून्यो विकल्प: अर्थात वस्तु की अनुपस्थित में उस बिषय के सम्बन्ध में शब्द ज्ञान के आधार पर सोचने से चित्त में विकल्प वृत्ति पैदा होती है । देवता , भूत - प्रेत आदि के सम्बन्ध में जानना मात्र शब्द - ज्ञानसे संभव है । शब्द ज्ञान वह ज्ञान है जो शास्त्र आदि सर्वमान्य ग्रंथों से प्राप्त होता है । चित्त की चौथी और पांचवीं वृत्ति निद्रा और स्मृति के संबंध में निम्न समाधि पाद सूत्र : 10 +11को देखें👇 " अभाव प्रत्यय आलंबना वृत्ति : निद्रा " निद्रा में बिषय आलंबन का अभाव होता है । कभीं - कभीं हम जब सो कर उठते हैं तब कहते हैं कि आज बहुत प्यारी नींद आयी , समय का पता तक न चला अर्थात उस नींद में भी चित्त की कोई वृत्ति सक्रिय थी जो मीठी नींद की स्मृति को जगने के बाद प्रकट कर रही होती है , वही चित्त की निद्रा वृत्ति है । स्मृति चित्त वृत्ति > पूर्व अनुभव किये हुए विषयों के सम्बन्ध की सोच का समय पर चित्त पटल पर प्रगट हो जाना , स्मृति है । चित्त की भूमियाँ > चित्त की भूमियों को चित्त की अवस्थाएं भी कहते हैं । चित्त माध्यम से चित्ताकार पुरुष की यात्रा भोग से वैराग्य , वैराग्य में समाधि और समाधि से कैवल्य की है । पुरुष की इस यात्रा में चित्त की भूमियों की प्रमुख भूमिका होती है अतः अब चित्त की 05 भूमियों को समझते हैं । 1- क्षिप्ति : चित्त की यह भूमि योगमें एक बड़ी रुकावट है । विचारों का तीव्र गति से बदलते रहना , चित्त की क्षिप्त अवस्था होती है । 2 - मूढ़ :मूर्छा या नशा जैसी अवस्था मूढ़ अवस्था होती है । अज्ञान - अविद्या में डूबा हुआ चित्त , ज्ञान को अज्ञान , असत्य को सत्य समझने वाला चित्त मूढ़ अवस्था ( भूमि ) में होता है । इस अवस्था में चित्त तामस गुण से प्रभावित रहता है । 3 - विक्षिप्त : इस भूमि में चित्त सतोगुण में होता है पर रजो गुण भी कभीं - कभीं सतोगुण को दबाने की कोशिश करता रहता है है । इस प्रकार रजोगुण के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली चित्त की चंचलता अवरोध उत्पन्न करती रहती है लेकिन इस अवस्था में भी कभीं - कभीं समाधि लग जाती है । 4 - एकाग्रता : एकाग्रता भूमि में चित्त में निर्मल सतगुण की ऊर्जा बह रही होती है । किसी एक सात्त्विक आलंबन पर चित्त का समय से अप्रभावित रहते हुए स्थिर रहना , एकाग्रता है । एकाग्रता में चित्त तो एक सात्त्विक आलंबन पर टिक तो जाता है पर चित्त में उस आलंबन से सम्बंधित नाना प्रकार की वृत्तियाँ बनती रहती हैं और बन - बन कर समाप्त भी होती रहती हैं अर्थात विभिन्न प्रकार की सात्त्विक वृत्तियों का आना - जाना होता रहता है । 5 - निरु : एकाग्रता का गहरा रूप निरु है । जब सम्प्रज्ञात समाधि के बाद असम्प्रज्ञात समाधि मिलती है तब चित्त चित्त निरु भूमि में होता है । असम्प्रज्ञात समाधि आलंबन मुक्त समाधि होती है । यहां इस अवस्था तक संस्कार शेष रह जाते हैं जो धर्ममेघ समाधि मिलते ही नष्ट हो जाते हैं और ऐसा योगी कैवल्य में प्रवेश कर जाता है । यह अवस्था सिद्ध योगियों की होती हैं और इस अवस्था को चित्त की पूर्ण शून्यावस्था भी कहते हैं । चीत्त की 05 अवस्थाएँ हैं ; क्षिप्ति , मूढ़ , विक्षिप्त , एकाग्रता और निरु । सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त एकाग्रता भूमि में होता है लेकिन ज्योंही चित्त निरु अवस्था में आता है असम्प्रज्ञात समाधि घटित हो जाती है । असम्प्रज्ञात समाधी तब संस्कार रहते हैं जिनका प्रतिप्रसव होने रबधर्ममेघ समाधि लगती है जो कैवल्य का द्वार खोलती है । व्युत्थान और निरोध चित्त के 02 धर्म हैं : चित्त की 05 भूमियों (क्षिप्ति + मूढ़ + विक्षिप्त + एकाग्रता और निरु ) में प्रारंभिक तीन नीचे की या भोग की भूमियाँ हैं और अंतिम दो उच्च (योग सिद्धि की ) भूमियाँ होती हैं । योग साधना में चित का ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर की भूमियों में उतरना - चढ़ना या चढ़ना - उतरना चित्त का व्युत्थान धर्म है और चित्त का अंतिम दो भूमियों पर टिके रहना निरोध धर्म है । चाहे साधना का कोई मार्ग क्यों न हो सबका एक ही लक्ष्य होता है और वह है चित्त को व्युत्थान धर्म से निरोध धर्म पर स्थिर रखना । जब चित्त राजस - तामस गुणों की वृत्तियों से बधा रहता है तब वह अपने व्युत्थान धर्म में होता है और जब यह सात्त्विक गुण से बध जाता है तब निरोध धर्म में होता है । निरोध धर्म में स्थित चित्त में कुछ सात्त्विक आलंबन सम्बंधित वृत्तियां उठती रहती है और कुछ उठी हुई वृत्तियां समाप्त होती रहती हैं , इस प्रकार चित्त सात्त्विक गुण आलंबन में सक्रिय रहता है । यहाँ ध्यान में रखना होगा की तामस - राजस गुणों से मुक्त चित्त अब निरोध धर्म में स्थित रहता तो है लेकिन साधना जैसे - जैसे आगे चलती रहती है , यह सत्त्विक गुण रूपी बंधन से भी चित्त को मुक्त होना पड़ता है । धर्म के संबंध में विभूति पाद सूत्र - 14 में बताया गया है , " धर्म वह जो भूत , वर्तमान और भविष्य , तीनों कालों में रहता हो और तीन काल ही धर्म हैं । बिना धर्मी ,धर्म की कोई सत्ता नहीं और चित्त को धर्मी कहते हैं । विभूति पाद सूत्र - 11: जब चित्त एक आलंबन पर ऐसे स्थिर हो जाय कि उस पर देश - काल की पकड़ समाप्त हो जाय तब उस स्थिति को चित्तका समाधि परिणाम कहते हैं । चित्त के 03 परिणाम ; 1 - निरोध , 2 - समाधि 3 - एकाग्रता 1- निरोध : इसके संबंध में चित्त के धर्म में बताया जा चुका है । इस संदर्भ में अब देखते हैं विभूति पाद सूत्र :10 ⬇️ " तस्य प्रशांत वाहिता संस्कारात् " अर्थात निरोध संस्कार में जब चित्त स्थिर हो जाता है तब चित्तमें प्रशांत ऊर्जा की धारा बहने लगती है । ( निरोध , चित्त के 03 परिणामों में से एक परिणाम और 02 धर्मों में से 01 धर्म भी है ) 2 - समाधि :विभूति पाद सूत्र : 3 में समाधि की परिभाध देखें " तत् एव अर्थ मात्र निर्भासम् स्वरूप शून्यम् इव समाधि " साधना में जब आलंबन का स्वरूप शून्य हो जाय और आलंबन अर्थमात्र रह जाय तब इस स्थिति को सम्प्रज्ञात समाधि कहते है । कैवल्य पाद सूत्र : 01 में महर्षि सिद्धि प्राप्ति के 05 कारण बताते हैं ; जन्म , औषधि , मंत्र , तप और समाधि । 3 - एकाग्रता :एकाग्रता चित्त की 05 भूमियों में से एक भूमि और चित्त के 03 परिणाम में से एक परिणाम भी है । एकाग्रता में चित्त तो एक सात्त्विक आलंबन पर टिक तो जाता है पर चित्त में उस आलंबन से सम्बंधित नाना प्रकार की वृत्तियाँ बनती रहती हैं और बन - बन कर समाप्त भी होती रहती हैं अर्थात विभिन्न प्रकार की सात्त्विक वृत्तियों का आना - जाना लगा रहता है । चित्त जब किसी सात्त्विक आलंबन से बध कर समयातीत अवस्था में आ जाता है तब वह चित्त की स्थिति एकाग्रता परिणाम कहलाती है । चित्त की यह अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि से आगे की है जिसमें असम्प्रज्ञात समाधि मिलती है । पतंजलि समाधि पाद सूत्र 33 - 41 > चित्त शांत करने के उपाय 1 - भावनाओं पर नियंत्रण करना 2 - बाह्य कुम्भक का अभ्यास करना 3 - स्थूल सात्त्विक आलंबन पर ध्यान करने का अभ्यास 4 - ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास करना 5 - वीत रागियों की संगति में रहना या उनको सुनना 6 - सत्त्विक बिषय सम्बंधित स्वप्न पर चित को स्थिर रखने का अभ्यास 7 - स्वरूचि आधारित किसी सात्त्विक आलंबन पर ध्यान करना पूर्णशान्त चित्त वाला सूक्ष्म वस्तु से अनंत तक पर स्व संकल्प से चित्त को एकाग्र कर सकता है । शांत निर्मल चित्त पारिजात मणि जैसा पारदर्शी होता है। चित्त सम्बंधित साधन पाद के सूत्र सूत्र : 1 - 14 तक > क्लेष , कर्माशय की जड़ हैं और समाधि भाव उठते ही क्लेश तनु ( क्षीण ) अवस्था में आ जाते हैं । 👉कर्म आशय अर्थात कर्म जहाँ एकत्रित होते हैं अर्थात चित्त का अंग - मन । 👉कर्म से संस्कार बनते हैं जो कर्माशय ( मन ) में एकत्रित होते रहते हैं । 👉ध्यान से वर्तमान में तथा अगले जन्म में भोगे जानेवाले सभीं पाप - कर्म निर्मूल होते रहते हैं । ● क्लेश के प्रकार : अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष , अभिनिवेश ◆ सत् को असत् समझना ,अविद्या है । ◆ दृग - दृश्य का एक होना अस्मिता है ◆ सुख अनुशयी , राग है ◆ दुःख अनुशयी , द्वेष है ◆ मृत्यु भय को अभिनिवेश कहते हैं ● क्रियायोग से क्लेश नष्ट होते हैं ★ तप , स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधानि का अभ्यास , क्रियायोग है ● ध्यान से क्लेश नष्ट होते हैं ● जब तक क्लेशों की जड़े हैं ,आवागमन से मुक्त होना संभव नहीं ◆★ हृदय - संयम साधना से चित्त को जाना जाता है । संयम समाधि के बाद की स्थिति होती है । पतंजलि अष्टांग योग साधना में आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , ध्यान , धारणा और सम्प्रज्ञात समाधि सिद्धि के बाद संयम की स्थिति मिलती है । जब धारणा , शयन और समाधि एक साथ घटित होती हैं तो उसे संयम कहते हैं । संयम सिद्धि से असम्प्रज्ञात समाधि मिलती है जिसे निराकार समाधि ( निर्बीज समाधि ) कहते हैं । असम्प्रज्ञात समाधि के बाद कैवल्य और कैवल्य ही मोक्ष है । संयम सिद्धि से विभिन्न प्रकार की सिद्धियां मिलती हैं जिनको विभूति पाद में सूत्र : 16 - 49 में 45 सिद्धियों के सम्बन्ध में बताया गया है ◆ ऐसा योगी जिसे अपने चित्त का बोध हो चुका होता है , वह जब चाहे अपने चित्त को पर काया में प्रवेश करा सकता है। ◆ऐसा योगी जो अपनी इंद्रियों को जीत लिया है , वह अपने मन की गति से अपनी काया को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेज सकता है ।√√√££ कैवल्य पाद में चित्त ⬇️ कैवल्य पाद सूत्र : 4+ 5 > अस्मिता से निर्मित चित्त संकल्प अर्थात अस्मिता से निर्मित चित्त ,निर्माण चित्त कहलाता है । सूत्र : 4 +5 का सीधा संबंध सूत्र : 2 से हैं जहाँ महर्षि कहते हैं , " सिद्धि प्राप्त योगी अपनें संकल्प मात्र से कोई भी रूप धारण कर सकता है । वह एक समय में कई रूपों में स्वयं को प्रकट भी कर सकता है " ऐसी स्थिति में उसके हर देह में अलग - अलग चित्त होते हैं जो उसके मूल चित्त से नियंत्रित होते रहते हैं । कैवल्य पाद सूत्र : 6 ◆ ध्यान से निर्मित चित्त क्लेश - वासना मुक्त होता है । कैवल्य पाद सूत्र : 15 "चित्त भेद के कारण एक वस्तु अनेक रूपों में दिखती है " इस बात को ऐसे समझते हैं । एक वस्तु को यदि एक से अधिक लोग देखते हैं तो उस वस्तु के सम्बन्ध में उनकी अपनीं - अपनीं राय अलग - अलग उनके चित्तों के भेद के कारण होती है । कैवल्य पाद सूत्र : 17 : संसार और चित्त चित्त को संसार को समझने के लिए उसे संसार का प्रतिविम्ब चाहिए । बिना प्रतिविम्ब चित्त उसे समझ नहीं सकता । चित्त वस्तु को उसके प्रतिविम्ब से समझता है । कैवल्य पाद सूत्र : 18 > चित्त और पुरुष पुरुष अपरिणामी ( अपरिवर्तनीय ) है और चित्त परिणामी (परिवर्तनशील ) एवं वृत्तियों का स्वामी भी है । कैवल्य पाद सूत्र : 19+ 20 > चित्त जड़ है । चित्त को न स्वयं का और न अन्य किसी का बोध होता है । पुरुष के लिए चित्त एक दर्पण जैसा होता है । चित्त पर संसार की वस्तु / बिषय का प्रतिविम्ब बनता है जिसे देख कर पुरुष उन्हें समझता है । कैवल्य पाद सूत्र : 21:( इसे सूत्र : 4 - 5 के साथ देखें ) चित्त अनेक हैं । एक चित्त दूसरे चित्त का दृश्य होता है और अन्य का द्रष्टा भी होता है । 【 कैवल्य पाद सूत्र : 4+ 5 > अस्मिता से निर्मित चित्त संकल्प अर्थात अस्मिता से निर्मित चित्त ,निर्माण चित्त कहलाता है । सूत्र : 4 +5 का सीधा संबंध सूत्र : 2 से हैं जहाँ महर्षि कहते हैं , " सिद्धि प्राप्त योगी अपनें संकल्प मात्र से कोई भी रूप धारण कर सकता है । वह एक समय में कई रूपों में स्वयं को प्रकट भी कर सकता है " ऐसी स्थिति में उसके हर देह में अलग - अलग चित्त होते हैं जो उसके मूल चित्त से नियंत्रित होते रहते हैं ।】 कैवल्य पाद सूत्र : 24 अनेक वासनाओं से चित्त विचित्त होने के साथ संहत और परार्थ भी है । संहत अर्थात मिलजुल कर कार्य करनेवाला और परार्थ का अर्थ है , जो दूसरों के लिए कार्य करे । ~~~~|ॐ | ~~

Saturday, October 29, 2022

सांख्य दर्शन का कार्य , कारण और करण सिद्धान्त सृष्टि उत्पत्ति का मूल सिद्धांत भी है

सांख्य दर्शन में कार्य और कारण और करण सिद्धांत सर्ग ( संसार की उत्पत्ति ) का रहस्य है कार्य , कारण और करण को मिट्टी से निर्मित घड़े के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है । यहाँ घड़े के होने में मिट्टी कार्य और कारण दोनों है और घड़ा मिट्टी का कार्य है । जो पैदा करे उसे कारण और जो पैदा हो , उसे उस कारण का कार्य कहते हैं । कारण दो प्रकार के हैं ; निमित्त और उपादान ; मिट्टी के घडे के निर्माण के लिए मिट्टी और घड़ा बनानेवाला कुम्हाड दो प्रमुख तत्त्व हैं। इन दो में कुम्हाड निमित्त कारण है और मिट्टी उपादान कारण है । अब करण को विस्तार से समझते हैं 👇 सांख्य में करण : करण का शब्दार्थ है , कर्ता अर्थात करनेवाला , क्रिया का आश्रय या माध्यम । सांख्य दर्शन में निम्न 25 तत्त्व हैं जिनसे सृष्टि रचना है और उनमें 12 करण हैं । पुरुष , प्रकृति एवं प्रकृति के कार्य रूप में बुद्धि ( महत् ), अहंकार , मन , 05 ज्ञान इन्द्रियाँ , 05 कर्म इन्द्रियाँ , 05 तन्मात्र और तन्मात्रों के कार्य रूप में 05 महाभूत , सांख्य दर्शन के ये 25 तत्त्व हैं । इन 25 तत्त्वों में बुद्धि ,अहंकार , मन और 10 इंद्रियों को करण कहते हैं तथा 13 करणों में बुद्धि , अहंकार और मन को अंतः करण और शेष 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं। 13 करणों में बुद्धि और अहंकार कार्य - कारण भी हैं तथा 10 इन्द्रियाँ केवल कार्य हैं । 👌 करण के निम्न तीन कार्य 👇 1 - आहरण (लेना या ग्रहण करना ) 2 - धारण करना 3 - प्रकाशित करना ( ज्ञान देना ) 💮05 कर्म इन्द्रियाँ ग्रहण एवं धारण दोनों करती हैं 💮05 ज्ञान इंद्रियाँ केवल प्रकाशित करती हैं । 💐 इन 05 कर्म इन्द्रियों एवं ज्ञान इन्द्रियों के अपनें - अपनें कार्य हैं और ये कार्य ऊपर व्यक्त 03 भागों ( आहरण , धारण और प्रकाशित करना ) में विभक्त हैं । 👉मन , बुद्धि और अहंकार परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय से अपनीं - अपनीं वृत्तियों को जानते हैं । 👉मन , बुद्धि और अहंकार की सभी वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य है । करण स्वयं ही प्रवृत्त होते हैं , किसी से नियंत्रित होकर नहीं प्रवृत्त होते । 💐 बाह्य करण केवल वर्तमान काल के बिषयों को ग्रहण करते हैं जबकि अंतःकरण ( बुद्धि ,मन और अहंकार (तीनों कालों के बिषयों को ग्रहण करते हैं । 🐦 05 कर्म इन्द्रियों में वाक् इन्द्रिय का केवल शब्द बिषय है , शेष 04 कर्म इन्द्रियाँ , पांच बिषयों ( शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गंध ) वाली है । उदाहरण देखिए 👉 जैसे हाँथ एक घड़े को ग्रहण करता है जिसमें सभीं 05 बिषय हो सकते हैं और पैर सभीं 05 बिषयों से युक्त पृथ्वी पर चलता है । 💐 13 करणों ( बुद्धि + अहँकार + मन + 10 इंद्रियाँ ) में अंतःकरण ( बुद्धि , अहंकार और मन ) द्वारि (स्वामी ) हैं और अन्य 10 ( 10 इन्द्रियाँ ) द्वार हैं क्योंकि मन - अहंकार से युक्त बुद्धि तीनों कालों के बिषयों का अवगाहन ( गहरा चिंतन ) करती है । 💐 तीनों अंतःकरण स्वेच्छा से अगल - अलग द्वारों ( 10 इन्द्रियों ) से अलग - अलग बिषय ग्रहण करते हैं । 💐 सभीं इंद्रियाँ तथा अहंकार दीपक की भांति हैं और एक दूसरे से भिन्न गुण वाले हैं । जैसे दीपक अपनी परिधि में स्थित सभीं बिषयों को प्रकाशित करता है वैसे 12 करण ( 11 इंद्रियां + अहंकार ) सम्पूर्ण पुरुषार्थ ( धर्म + अर्थ + काम + मोक्ष ) को प्रकाशित करके बुद्धि को समर्पित करते हैं । 💐 पुरुष के सभीं उपभोग की व्यवस्था बुद्धि करती है और वही बुद्धि प्रधान ( प्रकृति ) और पुरुष के सूक्ष्म भेद को विशेष रूप से जानती है । 【यहाँ ध्यान रखना होगा कि पुरुष - प्रकाश के प्रभाव में प्रकृति की साम्यावस्था विकृत होती है और बुद्धि ( महत् ) पहले तत्त्व के रूप में उत्पन्न होती है / 05 महाभूत सात्त्विक गुण के प्रभाव में शांत स्वरूप और सुख स्वरूप में होते हैं । 🐥 पञ्च महाभूत राजस गुण के प्रभाव में घोर ( दुःख ) स्वरुप में होते हैं । 🐔 पञ्च महाभूत तामस गुण के प्रभाव में मूढ़ भाव स्वरूप में होते हैं । 【 ध्यान रखना होगा कि तीन गुण पञ्च भूतों के स्वभाव को परिवर्तित करते रहते हैं और ये तीन गुण हमारे देह में हर पल बदल रहे हैं । एक गुण अन्य दो को दबा कर प्रभावी होता है 】