● सुना और खूब सुना ●
1- जब परिवार में लोग इकठ्ठा होते हैं और जब कार्यक्रम समाप्त होने पर लोग अपनें -अपनें स्थानको वापिस चले जाते हैं तब जो वहाँ रहते हैं उनको सूना लगता है ।
2- जब कोई परिवार का सदस्य घर से दूर जाता है तब उसके जानें के बाद घर में सूना - सूना लगता
है ।
3- जब कोइ परिवार का सदस्य नाराज होकर घर छोड़ कर चला जाता है तब बहुत सूना लगता है ।
4- अकेलापनमें दो दरवाजे हैं ; एक पागलपन में खुलता है और दुसरा परममें ।
5- जीवन को क्या समझोगे वह तो बहती दरिया जैसा है बेहतर होगा तुम अपनी उर्जा स्वयं को समझनें में लगाओ ।
~~~ ॐ ~~~
Monday, July 7, 2014
सुना और खूब सुना
Saturday, July 5, 2014
भारत की आबादी भाग - 1
Tuesday, July 1, 2014
● क्या खोया ? - भाग - 1●
* बड़े प्यारे लोग थे पर उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।एक दिन लगभग 35 साल के बाद मुझे उनसे मिलना हुआ ,मैं हैरान हो गया ,उनको देख
कर ।
* थे तो गरीब ही लेकिन उनके बड़े भाई उनके लिए पिता तुल्य थे , उनको पढानें में कोई कसर न छोड़ी थी । उस जबानें में इंजीनियरिंग के स्नातक हुए जबकि दूर -दूर तक ऐसे लोग दुर्लभ हुआ करते थे।
* मैं उनको करीब से जानता हूँ लेकिन इधर बहुत दिनों से उनकी स्मृति कुछ धुधली सी जरुर हो गयी थी ।मैं उनको जानता हूँ तबसे जब वे केंद्र सरकार में कार्य रत थे ,जब वे विश्व विद्यालय में सहायक प्राध्यापक थे , जब वे किसी लिमिटेड कंपनी में सिनिअर ऑफिसर थे और जब वे विदेश यात्रा की थी लेकिन यह सब देखनें के बाद आज जब मैं उनसे मिला तो दंग रह गया ,उनको देख कर ।
* बाहर -बाहर से देखनें में उनका रंग तो बहुत लुभावनासा दिखता है पर वे अन्दर से अब एक कब्रिस्तान बन चुके हैं ,मुझे तो उनके साथ कुछ दिन रहनें से ऐसा ही दिखा ।
* दो बेटे हैं ,प्यारे हैं ,एक प्रथम पांच iit मेसे एक का विद्यार्थी रह चूका है और दूसरा देश के कुछ प्रमुख nit में से एक के शिक्षा लिया हुआ है । दोनों बेटो का कद अब इतना उचा हो चूका है की उनकी लम्बाई देखते बनती है । दोनों बेटे उनसे प्यार करते हैं लेकिन कुछ तो है जो उनको कब्रिस्तान बना रहा है। * आखिरी दिन आ गया , मैं उनसे बिदा होनें जा रहा था ,वे अन्दर घर में गए हुए थे , बोल गए थे कि जरा रुकना ,चले न जाना । मैं घर के बाहर उनके आनें का इन्तजार कर रहा था । वे आये , गले मिले ,और उनका गला भरा था ,अन्दर आंसू की धरा बह रही थी लेकिन बाहर बाहर से सामान्य दिख रहे थे ।
*जब मैं चलनें लगा ,मुझे कपडे में लिपटी कोई चीज दी और बोले , तुम तो उनसे बहुत प्यार करते थे पर हिम्मत न जुटा पाए ,उनके बारे में पूछनें को , इतना कह कर हस पड़े और बोले , अच्छे जा फिर मिलेंगे। * जब मैं कपडे को खोला तो दंग रह गया ,उस वस्तु को देख कर जो उस कपडे में लपेट के वे मुझे दिए
थे । वह फोटो थी ,उनकी पत्नी की ,उस समय की जब उनका बड़ा बेटा रहा होगा 2-3 साल का जो आज 35 साल का है ।
* वे मेरे कंधो पर अपना हाँथ रखे और धीरे से भरे हुए गले से बोले , अगर खुदा ने इजाजत दी और हम फिर कभीं मिले तो मैं इनके बारे में भी बताऊंगा , जो तुम पूछ न पाये । वे अब भी हैं ,न दूर हैं न नज़दीक लेकिन हैं , इतना कह कर आंसू पोछते हुए घर के अन्दर चले गए और दरवाजा बंद कर ली ।
* आप सोच सकते हैं कि मेरे पर क्या बीती होगी और उन पर क्या बीत रही थी ,यह तो आप समझ ही सकते है लेकिन इतना जरुर मैं कह सकता हूँ कि उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।। क्या खोया ? इस श्रृखला के अगले अंक में कुछ और दृष्यों को देखेंगे ।
* यह एक सत्य कहानी है *
~~ हरे हरे ~~
Monday, June 30, 2014
कैसा रहा यह सफ़र
# कभीं - कभीं ऐसा लगनें लगता है कि अब हम जिन्दा क्यों हैं ? और जो अभीं - अभीं इस संसार से जा रहे होते हैं , उनके न होनें पर दुख भी हो रहा होता है , आखिर ऐसा क्यों ? यह इसलिए हो रहा होता है कि हम जहाँ हैं इसके विपरीत हमारी दृष्टि जम जाती है , इस उम्मीदसे कि हो न हो वह ठीक हो । द्वैत्यकी उर्जा में लिपटा यह मनुष्य अपनें को एक पेंडुलम जैसा बना रखा है पर पेंडुलम से कुछ सीखता नहीं क्योंकि पेंडुलमके गतिका प्रारंभ और अंत जहाँ है वहाँ जो है वह समभाव है और समभाव में स्थित ब्यक्ति स्थिर प्रज्ञ होता है जिसकी आँखें प्रभुके प्यार से भरी होती
हैं ।
# जवानी में कदम रखते ही एक उबाल उठनें लगता है , कोई ऐसा ब्यक्ति जो अभीं - अभीं जवानी में कदम रखा हो और वह अपनें को दुनिया का सम्राट न समझता हो , ऐसा संभव नहीं लेकिन जवानी में देखे गए सारे सपनें एक - एक करके टूटते जाते हैं और वह ब्यक्ति जो आज लगभग 60 साल का हो चूका होता है , अपनें इस जीवनका एक अज्ञान द्रष्टा बना रह जाता है ।
# जो मिला है एक दिन उसे खोना होगा और मनुष्य पाना तो सारा संसार चाहता है पर खोना एक कौड़ी भी नहीं चाहता जो सम्भव नहीं । # एक बह रही दरिया में उसकी धारा के विपरीत जो बहना चाहेगा उसे दर्द तो होगा ही । हम प्रकृतिके विपरीत चलना चाहते हैं और यह हमारी चाह हमसे सुख छीन लेती है और हम कहीं एक कोने में बैठ कर किस्मत का इन्तजार कर रहे होते हैं ।क्या होगा इस रोने - धोने से ?
-- दुनिया का मेला --
Monday, June 16, 2014
यहाँ क्या हो रहा है ?
1- जहाँ हम हैं , वहाँ हर पल समझनें का पल है लेकिन हम और को क्या समझेंगे जब स्वयं को समझते की भी कोशिश नहीं करते ।
2- संसार एक ऐसा रंगमंच है जहाँ समझानें वाले अधिक और समझनें वाले न के बराबर हैं ।
3- संसार में लोग कामयाब होनें केलिए अपनेंको नहीं अपने रंगको बदलते रहते हैं पर सफलता पाना फिरभी कठिन ही दिखता है ।
4- इस संसार में झूठे ज्यादा कामयाब से दिखते हैं लेकिन उनके कामयाबी का रंग बहुत जल्दी फीका पढनें लगता है ।
5- इस संसारसे जितनें रोज जा रहे हैं ज़रा उनके मुह पर से कफ़न उठा कर देखना कि उनमें से कितनें मुस्कुराते हुए जा रहे हैं , शायद आपको कोई भी ऐसा न दिखे , आखिर ऐसा क्यों ? लोग प्रभुके पास पहुँचने केलिए लाख कोशिश करते हैं लेकिन जब जाना होता है तब सभींका मुह गिर जाता है ,क्यों ?
~~~ हरे कृष्ण ~~~
Friday, June 6, 2014
किधर - किधर देखूँ
# आइये आप और मैं दोनों एक साथ समझते हैं उसे जो घट रहा है पर हम सब अभीं तक उसकी ओर अपनी -अपनी आँखे बंद किये बैठे हैं ।अब जरा समझना , नीचे दी जा रही बातों को :---
* परिवार रचाया क्यों , क्या शांतिके लिए ?
* बस्ती बनाई क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* सम्बन्ध स्थापित किये क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* ब्यापार खडा किया , क्यों , क्या चैन से जीवन गुजारनें केलिए ?
* युद्ध लड़े ,क्यों , क्या शांतिसे रहनें केलिए ?
* मंदिर बनाए , क्यों , क्या शांति केलिए ?
* मंदिर में मूर्ति स्थापित किये ,क्यों ? क्या मन शांति केलिए ?
* खूबसूरत महल खडा किये ,क्यों , क्या दो घडी शांति से रहने केलिए ?
* जीवन गुजार दी ,भाग -दौड़ में ,आखिर क्यों , क्या शांति की खोज केलिए ?
** लेकिन अब ज़रा रुकना और सोचना :--
1- यहाँ इस संसार में हमारा सारा प्रयाश जो शांति और सुरक्षा से जीवन गुजारनें केलिए हुए ,क्या वे विफल नहीं हुए ?
2- यहाँ शांति सभीं चाहते हैं ,पर हैं , कितनें शांति
में ?
3- यहाँ सभीं प्यार में रहना चाहते हैं ,लेकिन हैं कितनें प्यार में ?
4- यहाँ सभीं प्रभुको दिल में बसाना चाहते हैं लेकिन कितनों के पास ऐसा दिल भी है ?
## कहना और सुनना तो बहुत हो चुका पर मिला कुछ नहीं ,क्योंकि कहनें और सुननें से होना
(बदलना ) था पर हम सबकुछ करनें को तैयार हैं पर बदलना नहीं चाहते , फिर क्या होना था ? न होना
था , न होगा कुछ ।
** जो भी हमनें किये , उनके करने से हमें बदल जाना था , पर :---
# हम स्वयंको बदलना नहीं चाहते और जैसे हैं उसी स्थिति में प्रभुको अपनें सामने लाना चाहते हैं , आखिर क्यों ?
# क्योंकि हम उसे भी अपनें अर्थ केलिए प्रयोग करना चाहते हैं ।
# हम जितनें गहरे अज्ञानी हैं , प्रभु को भी अपनें जैसा ही अज्ञानी क्यों समझते हैं ?
# हम संसार में लोगों को धोखा देते - देते इतने मज गए हैं की सब स्वयं को भी बड़ी बारीकी से धोखा दे बैठते हैं और प्रभु को भी खूब धोखा दे रहे हैं , है न नाजे की बात ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~
Wednesday, May 28, 2014
करलो इकठ्ठा पर ---
करलो इकठ्ठा पर ...
** यह भी हो ,वह भी हो ,ऐसा भी हो ,वैसा भी हो , ये ठीक रहेगा ,वह ठीक रहेगा - ऐसे बंधनों से जुड़े मनकी गति हर पल और तेज होती जाती है लेकिन हृदय सिकुड़ता चला जारहा है ।
** ऐसे लोग जिनके आँखों की पुतलियाँ कहीं रुकती नहीं , जो ऊपर बताये बंधनों से गहरी तन्मयता स्थापित कर रखी है , उनमें अधिकाँश लोग ब्लड प्रेसर , शुगर और हृदय रोग से ग्रसित हैं ।
** जैसे - जैसे इकठ्ठा करनें की उर्जा बढ़ रही है ,वैसे - वैसे लोग हृदय विहीन होते जा रहे हैं । भोगी अपनें हाँथ ऊपर उठा कर आकाश को पकड़नें की कोशिश में सुध - बुद्धि सब खो रहा है तो योगी बंद अपनीं आँखों से उसी आकाशकी शून्यता में बिना सोचे जो पाता है ,वह उसे तृप्त कर देता है और उसका शेष जीवन नाचते -नाचते गुजर जाता है ।
** योगी सब कुछ खो कर परनानंद को पा जाता है और भोगी सबकुछ पाते हुए भी भिक्षुक बना हुआ है । ** मनुष्य राज पथोंका निर्माण करवाता है लेकिन उनका जीवन राज पथ पर नहीं चलता , उसका हर कदम एक नए ऐसे मार्ग का निर्माण करता है जिस पर वह जैसे -जैसे आगे कदम बढाता जाता है वैसे - वैसे उसके पैरोंके निशान स्वतःमिटते चले जाते हैं । ** जीवन यात्रा एक पगडण्डी यात्रा है; ऐसी पगडण्डी यात्रा जिसको शब्दों में बाधना तो संभव नहीं लेकिन इस यात्राके हर पल रोमांचित जरुर करते रहते हैं । **यहाँ यह न देखो कि वह कैसे चल रहा है , यह देखो कि जैसे भी तुम चल रहे हो ,क्या वह तुमको आनंदित कर रहा है ।
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~
Wednesday, May 21, 2014
यह भी एक बात है
Monday, May 19, 2014
यह खेल है , जब आये हो तो खेलो
* खेल , खेल है , इसमें इतना तन्मय न हो जाओ कि भूल जाओ उसे जो खिला रहा है , उसे जो खेल रहा है और उसे जो इसका द्रष्टा है ।कैसी खेल है जिसमें खेलनें वाला , खिलानेवाला और द्रष्टा तीन नहीं एक
है ?
* अनेक योनियों से गुजरनेंके बाद जिसका अनुभव गहरा जाता है उसे मनुष्य योनि मिलती है और मनुष्य योनि में आया जीव यह समझ सकता है कि वह स्वयं क्या है ,यह संसार क्या है और इन सबके माध्यमसे उसका द्रष्टा बन सकता है जो इन सबके होनें का माध्यम है और जिसे प्रभु की माया कहते हैं । भागवत कहता है ,भक्त माया का द्रष्टा होता है ।वह मनुष्य जो माया का द्रष्टा बन जाता है ,निराकार प्रभु उसके लिए साकार हो उठता है और उस परम अप्रमेय ,सनातन और अब्यक्त में वह अपना बसेरा बना लेता है।
~~ रे मन कहीं और चल ~~
Wednesday, May 14, 2014
रे मन कहीं और चल
1-जीवन में आये दिन कुछ ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जिनसे मनुष्य कुछ ऐसी स्थिति में आ जाता है जैसे बीच दरिया में चल रही नाव किसी असामान्य तूफ़ानमें फस गयी हो ।ऐसी घटनाएँ मनुष्य को एक नयी उर्जा क्षेत्र में पहुँचाना चाहती हैं लेकिन होता क्या है ? जब एक ग्रह अपनें आर्बिट को छोड़ता है और अपनें आर्बिट से बाहर कदम रखता है तब वह या तो समाप्त हो जाता है या फिर धीरे -धीरे अपना एक नया आर्बिट बना लेता है लेकिन आर्बिट बदलना एक जोखिम भरा कदम है जिसके लिए कोई तैयार नहीं । वह जो इस जोखिम को स्वीकार करके अपनें पुरानें आर्बिट के बाहर कदम उठता है , वह अगर संसारके अस्तित्व में बना रहा तो पूज्यनीय बन जाता है ।
2- जीना कौन नहीं चाहता लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके अलावा कोई और भी जीये , आखित
क्यों ?
3- इस संसारका निर्माण कैसे हुआ और इसके निर्माणके पीछे कौन सा राज छिपा है ? यह एक तर्क शास्त्रका बिषय है लेकिन इतना तो स्पष्ट दिखता है कि यह संसार योगी ,भोगी ,देवता और साकार रूपमें अवतरित हुए स्वयं परम पुरुष तक को एक समान आकर्षित करता है ,क्यों औत कैसे ?
4- संसारकी रचना निर्मल प्यारकी उर्जा से हुयी होगी , इसमें भी कोई शक नहीं दिखता लेकिन यहाँ जो रहते हैं वे सभीं एक दुसरेके भोजन हैं और एक दुसरे को समाप्त करनें में लगे हुए हैं ,ऐसा क्यों ?
5- इस माया निर्मित संसार में सबका मुह खुला ही क्यों रहता है ,सभीकी रोजाना उम्र घटती जा रही है और उनकी अत्रिप्तता बढती जा रही है , आखिर
क्यों ?
6- यहाँ सभीं लगे हुए हैं चाहे भोगी हों ,चाहे योगी हों या फिर चाहे अन्य जीव हैं ,किसी न किसी रूप में तृप्त होनें में लेकिन सबके तृप्त होनें के साधन छोटे होते जा रहे हैं और उनकी अतृप्ता बड़ी होती जा रही हैं , ऐसा क्यों ?
~~ रे मन ! कहीं और चल ~~
Friday, May 9, 2014
सुनाऊ तो किसको और कैसे ?
1- किसी से यदि आप कुछ कहना चाह रहे हैं ? तो रुको, सोच लो , ठीक -ठीक कि जो आप कहना चाह रहे हो उसके लिए यह समय उचित भी है ?
2- आप जो कहना चाह रहे हो क्या वह आपके अपनें अनुभव की बात है या किसी और से आपको उधार में मिली है ?
3- इतनी सी बात याद रखना कि भोग संसारमें सबका अपना -अपना भिन्न - भिन्न अनुभव होता है , पर सतकी अनुभूति सबकी एक होती है ।
4- किसी और की बात हो तो औरों को सुनाऊ भी अब अपनी ही बात जिसे अभीं तक मैं छिपा रखा है ,उसे सुनाऊतो कैसे और किससे ?
5- कभीं -कभीं न कहनें वाली बात कही जाती है और जिस बात को कहना होता है उसे हम कह नहीं पाते ।
6- जो कहनें जा रहे हो इसे कहो लेकिन इतना तो देख ही लो कि आस - पास जो लोग हैं उनके सुननें लायक भी वह बात है या नहीं ।
7- गावों में अक्सर ऐसा होता है कि छोटे -छोटे बच्चों की उपस्थिति को बिना सोचे बड़े लोग ऐसी बातें कर बैठते हैं जिन बातों को बच्चे कई साल बाद समझ पाते हैं । बच्चों के अन्दर ऐसे बीज न रखो जो उनके बड़े होनें के साथ -साथ नासूर बनते हों ।
8- आये दिन गौवों की सेवा केलिए दान इकठ्ठा करनें वाले गलियों से गुजरते हैं । वे लाउस स्पीकरके माध्यम से बोलते हैं , " मेरे प्यारे सज्जनों , माताएं और बहनों ! जगह - जगह से लंगड़ी - लाचार गौओं को हम इकठ्ठा करते हैं ,उनका इलाज करते हैं और उनका पालन करते हैं । इस कार्य हेतु 33 करोड़ देवी -देवताओं को धारण करनें वाली गौ माता के पालन हेतु आप के सहयोग की जरुरत है " ।अब आप समझें की इन गौओं को अनाथ और अपाहिज कौन बना कर लावारिश छोड़ते हैं ? क्या वे हम - आप तो नहीं ? यदि हाँ तो समस्या बहुत जटिल है । हम उनको लावारिश बनाते हैं ,हम गो शाला बनाते हैं और हम इसके भरण -पोषण हेतु भीख भी माँगते हैं , है न मजे की बात ?
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~
Sunday, May 4, 2014
चिरकुट लाल - 1
Friday, May 2, 2014
ना तेरा ना मेरा
Sunday, April 27, 2014
क्या कहूँ ?
1- क्या कहूँ ? किससे कहूँ ? और कैसे कहूँ ? मुह खोलनें से पहले इन प्रश्नों पर विचार करलो वर्ना बाद में पछताना पड़ेगा ।
2- पेड़ से टपका फल और मुह से टपकी बात मे समानता है ।
3- अभीं तक वे आपके अपनें ही थे लेकिन दो बातें आपकी सुनते ही उनका रंग क्यों वदल गया ?
4- आप सोच रखे थे कि वे आपके अभिन्न मित्र हैं लेकिन जब आप उनको बरतना चाहा तो आपकी सोच खरी न निकल सकी और आपको जहाँ खुश होना था , दुखी हो उठे ।
5- प्रभु सबको देख रहा है , यह बात सब जानते हैं पर इसे समझनें वाले दुर्लभ हैं ।
6- जीवन प्रकृति की ओर से रंगीन है उसे और रंगीन बनानें की कोशिस उसकी खूबसूरती को छीन लेता है।
7- देहके दर्द को तो कहा जा सकता है लेकिन दिल के दर्द को किससे और कैसे कहूँ ?
8- दूसरों की कमजोरियों को बता - बता कर जीवन गुजार दी पर अपनी कमजोरियों को किससे और कैसे कहूँ ?
9- औरों से जो मिला उसे तो सबको बता दिया पर अपनों से जो मिला उसे किससे और कैसे बताऊँ ? 10- संसार में सबकुछ कहा जा सकता है ,सबकुछ गाया जा सकता है लेकिन जो प्यार मिलता है उसे कैसे कहा या गाया जा सकता है ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~
Saturday, April 26, 2014
जीवन इसका नाम है
1- कुछ ऐसी जीवन की घटनाएँ होती हैं जो रह -रह कर ह्रदय -मंथन करती रहती हैं ; न उनको चैन है और न हमें चैन से रहनें देती , आखिर उनका मुझसे कुछ तो सम्बन्ध होगा ही ।
2 - शरीर में जब अथाह उर्जाका संचार हो रहा होता है तब बिना सोचे कदम उठते रहते हैं और इस स्थिति में उठा हर कदम आपको मुसीबतोंमें उलझा सकता
है ।
3- जीवनमें बश एक कदम भी अगर सही न पडा तो जीवन का रुख ही बदल सकता है और एक हम हैं जो हर कदम गलत रख रहे हैं ।
4- मनुष्य हो और जी रहे हो पशु जैसा ? आखिर इस जीवन से क्या मिलनें वाला है ? कुछ घडी अपनें मूल जीवन में गुजार कर देखो ,क्या पता वहाँ ज्यादा सकून मिले ।
5- सबको अपना बनाना संभव नहीं और वनाया हुआ अपना दों कौड़ी का होता है । अगर किसी को तुम अपना बना लिया है तो उसे कोई और अपना बना लेगा फिर क्या करोगे ? क्योंकि दूसरों का बनना उसका स्वभाव बन चूका है । वह अपना है और रहेगा जो बिनु बनाए बन गया हो ।
6- जबतक ' मेरा ' शब्द है , ' तेरा ' शब्द भी रहेगा और ज्योंही मेरा की जगह उसका ले लेता है , तेराका स्वतः अंत हो जाता है । तेरा और मेरा दोनों उसका सागर में विलीन हो जाते हैं ।
7- कठपुतलियों का खेल देखे हो ? वे आपस में प्यार करते हैं और लड़ते भी हैं लेकिन वे स्वयं कुछ नहीं कर सकते , उनका ओपरेटर कोई और बाहर होता है । हम सब भी कठपुतलियाँ हैं और हम सबका ओपरेटर हम सब के अन्दर ही बैठा है ,मात्र उनमें और हम में इतना सा फर्क है ; उनका ओपरेटर दिखता है और हमें अपनें ओपरेटरको देखनें केलिए ध्यान से गुजरना पड़ता है ।
8- पप्पू कब पापा बन गए , पता न चला और पापा कब दादा बन गए यह भी सोचनें का बिषय है और इसके आगे दादा जी कब और कैसे अपनें से पराये हो गए ,यह भी समझनें की बात है ।है एक पर समयांतर में वह बदलता रहा या देखनें वाला बदलता रहा ,इस पर आप सोचें !
9- वह कौन इंसान है जो प्रभु की ओर पीठ किये जी रहा है ? शायद कोई नहीं है ; ऐसा इन्सान पाना कठिन है जिसके अन्दर प्रभु की सोच न हो ।
10- जीवन का केंद्र दो हो नहीं सकते , इंसान एक केंद्र पर टिकता नहीं और यही कारण है की मनुष्य सम्राट होते हुए भी हसते -हसते रो पड़ता है ।
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~
Friday, April 18, 2014
पढो और मनन करो
●● पढो और मनन करो ●●
1- प्रभु ! किसी की नज़र आप पर टिके या न टिके पर आपकी नज़र सब पर समभाव से टिकी होती है । 2-सत्यकी खोज इन्द्रियोंसे प्रारम्भ होती है और इन्द्रियोंकी समझ संदेह आधारित होती है , संदेहको भ्रममें रूपांतरित न होनें देना , ध्यान - मार्ग है , ध्यानमें संदेहको श्रद्धामें रूपांतरित होते देखना ध्यानको पकाता है और ध्यान जब पकता है तब जो दिखता है वह सत्य ही होता है ।
3- जिस घडी तन - मन दोनों प्रभुको समर्पित हो जाते हैं उसी घडी अनन्य भक्तिकी लहर परम गति की ओर चला देती है ।
4- चलना तो है ही , सभीं चल भी रहे हैं , लेकिन ज्यादातर लोग एक जगह पर कदमताल कर रहे हैं और सोचते हैं कि चल रहे हैं ।
5-सभीं जल्दीमें हैं , सबको फ़िक्र है कि इतना सारा काम इस छोटे से समयमें कैसे हो सकेगा क्योंकि जीवन छोटा है और काम अनंत है , आप समझाये हैं कि यह फ़िक्र हमारे जीवन - अवधिको और छोटा कर रही है ।
6- वेश - भूषासे चाहे जो बना लो , लोगों द्वारा चाहे जो उपाधि प्राप्त कर को जैसे जगत गुरु , योगाचार्य कृपाचार्य या शंकराचार्य लेकिन हृदय रूपांतरण बिना भक्ति - रस पाना संभव नहीं और हृदयका रूपांतरण ही प्रभुका प्रसाद है जो किसी - किसी को मिल पाता है ।
7 - सबकी खोज एक है -सुख की प्राप्ति लेकिन उनमें कितनें सुखमें जी रहे हैं , ज़रा आँख उठा कर देखाना ?
8 - रात को भोजनका पहला कौर उठाते समय ज़रा सोचना कि आज दिन भर आप जो भी किये क्या वह यही दे सकता है ?
9 - यह न सोचो कि लोग आप से प्यार करें ,आप प्यार करनें का अभ्यास करते रहें ।
10 - कुछ करनें की सोच पर कबतक रुके रहोगे , उसे करनें की हिम्मत करो , आज जो आपके खिलाफ हैं ,कल आपके मित्र बन जायेंगे लेकिन यह काम इतना आसान नहीं ।
11 - जिसे पानें केलिए तुम सबकुछ खोना चाह रहे हो क्या वह आपको भी इतना ही चाहता है ,ज़रा सोचना इस बिषय पर ?
12- भोग उर्जाकी ऑंखें जो देखती हैं ,वह भ्रम ही होता है और योगकी आँखों में सत्य समाया हुआ होता है ।
~~~ ॐ ~~~
Tuesday, April 8, 2014
हमें सोचना है
● संसार एक ऐसा मंदिर है जिसकी मूर्तियाँ हर पल बदल रही हैं ।
● संसार एक पाठशाला है जहाँ कर्म एक ऐसा माध्यम है जो भोगमें योगका संगीत सुनाता है और योग परम धामका मार्ग दिखाता है ।
● संसार में मनुष्य से एक कण तक में ऐसा नहीं की संगीत न हो ,पर उस संगीत को कौन सुनना चाहता
है ?
● संसार रिश्तों की जाल है जिसमें फसनें के सभीं आसार हैं लेकिन इन रिश्तों को समझ कर कुछ उस परम रिश्ते में पहुँच जाते हैं जिसकी खोज ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।
● फूल आपस में अपनें -अपनें परम विचारों का आदान -प्रदान करते रहते हैं लेकिन उनके इस विचारों के आदान -प्रदान को सुनता कौन है ?
● मंदिर में मूर्ति जो देखनें सभीं जाते हैं लेकिन मूर्ति के अन्दर जो है उसे देखनेंका प्रयाश करनें वाले दुर्लभ हैं ।
● ऐसा ब्यक्ति होना संभव नहीं जो चाह रहित हो लेकिन चाह रहित जो हो गया ,वह ब्रह्म वित् होता है । ● क्रोध समय - समय पर अपना रंग एक गिरगिट की भांति बदलता रहता है ,पर इसके इस कुशलता को कौन समझता है ?
● आप लोगों द्वारा क्यों सम्मानित हो रहे हैं ,क्या कभीं इस बिषय पर आप का ध्यान गया है ?
● जब भी हम सूर्य की पहली किरण देखते हैं ,हमारा एक नया जीवन प्रारम्भ होता है लेकिन इस नए जीवन को नए ढंग से जीनें की सोच कितनों में होती है ? ~~ ॐ ~~