Saturday, October 9, 2021

गीता में चित्त ( मन ) क्या है ?

 


गीता आधारित मन रहस्य 

अध्याय

श्लोक 

योग

3

6 , 7 , 40

3

5

13

01

6

6  + 10 - 21 तक +

26 , 27 + 35 - 37 तक

18

7

4

01

8

5 , 6

02

10

22

01

13

5 , 6 

02

15

8

01

योग

X

29

गीता श्लोक : 3.6 + श्लोक - 3.7

●हठात् इन्द्रिय नियोजन , मनको बिषय - मननसे नहीं रोक सकता ।

● इन्द्रिय नियोजन मनसे होना चाहिए ।

गीता श्लोक : 3.40 

इंद्रियाँ , मन और बुद्धि पर काम ( Sex )का 

सम्मोहन रहता है ।

गीता श्लोक : 5.13 

अंतःकरण (मन , बुद्धि , अहँकार और चित्त ) 

जिसका निर्मल है , वह 09 द्वारों वाले शरीर में सुखसे रहता है ।

गीता श्लोक : 6.6

मन सहित इंद्रियाँ जिसकी नियोजित हैं , वह स्वयं का मित्र है ।

श्लोक : 6.10 - 6.21 12 श्लोको का सार 

👌यहाँ  मन शांत के लिए एक ध्यान विधि दी जा रही है…

●मन सहित जब इंद्रियाँ नियोजित हो जाय तब उस आशा - संग्रह मुक्त योगी को एकांत में प्रभुसे एकत्व स्थापित करना चाहिए ।

ध्यान विधि 👇

◆ शुद्ध समतल भूमि पर कुश या मृगचर्म का बिछावन बिछा कर ..

> उस पर किसी आसान में बैठ कर ,मन एकाग्र करने का अभ्यास करना चाहिए …

【 1】 शरीर , सिर और गर्दन तनाव रहित एक सीधी रेखा में स्थिर रखें ...

【 2 】 नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि एकाग्र करने का अभ्यास करें..

सावधानियाँ

इस अभ्यासमें , सामान्य भोजन लेना चाहिए , उपवास रखना वर्जित है और सम्यक निद्रा लेनी चाहिए ।

◆ जैसे वायु रहित स्थान में दीपक की ज्योति स्थिर रहती है , वैसे योगारूढ़ योगी का मन स्थिर रहता है। 

गीता श्लोक 6.26 - 6.27

👉मनका पीछा करते रहो , वह जहाँ - जहाँ जाय , उसे वहाँ - वहाँ से प्रभुके विग्रह पर लौटा ले आना चाहिए ।

👉 राजस गुण , ब्रह्म - खोज मार्गी के लिए एक बड़ी रुकावट है।

गीता श्लोक : 6.35 - 6.37 

●चंचल मन , अभ्यास - वैराग्यसे बश में होता है ।

● शांत मन वाला , योगमें होता है ।

अर्जुन पूछते हैं , श्रद्धावान पर अनियमित योगीका अंत कालमें जब मन विचलित हो जाता है , तब उसे कौन सी योनि मिलती है ।

इस बिषय पर गीतामें दो बातें बताई गई हैं : बैराग्य में पहुंचे योगीका योग जब खंडित होता है तब वह 

स्वर्ग न जा कर किसी योगी कुल मे जन्म लेता है और पिछले जन्म की साधना जहाँ खंडित हुई होती है , वह उसे वहाँ से पुनः आगे बढ़ाता है ।

● ऐसे योगी जो वैराग्यवस्था तक नहीं पहुंच पाते ,  उनका योग खंडित हो जाता है और वे देह त्याग कर जाते हैं , वे श्रीमानों के कुल में जन्म न ले कर स्वर्ग जाते हैं और अपना भोग पूरा करते हैं । जब उनके भोग की अवधि समाप्त हो जाती  है तब वे पुनः जन्म लेते हैं और प्रारम्भ से साधना करते हैं ।

गीता श्लोक : 7.4

अपरा प्रकृति के 08 तत्त्व हैं >पंच महाभूत , बुद्धि , अहंकार और मन...

गीता श्लोक : 8.5 - 8.6

●अंत समयकी गहरी सोच उस मनुष्यके जीवात्मा को उसकी सोचके अनुसार यथा उचित योनि में ले जाती है ।

● जब जीवात्मा देह त्यागता है तब उसके संग

मन सहित 05 ज्ञान इंद्रियाँ भी होती हैं । मन और ज्ञान इन्द्रियों के समूह को 

लिंग शरीर ( cosmic body ) या सूक्ष्म शरीर कहते हैं ; यहाँ देखिये भागवत : 11.22।

गीता श्लोक : 10.22

इन्द्रियों में  मन और चेतना मैं हूँ ।

गीता श्लोक : 13.5 - 13.6

क्षेत्र की रचना : 05 महाभूत , 05 बिषय , 10 इंद्रियाँ , अहँकार , बुद्धि , विकार , सभीं द्वैत्य भाव , धृतिका और मन एवं चेतना  ।

गीता श्लोक : 15.8

जैसे वायु  गंध को अपनें साथ ले जाता है वैसे जीवात्मा देह त्याग के समय अपनें साथ मन सहित 05 ज्ञान इन्द्रियों को भी ले जाता है ।। यहाँ गीता श्लोक : 8.5 + 8.6 को भी देखें ।।


// ॐ //

Friday, October 8, 2021

चित्त क्या है ?

 मन , बुद्धि , अहँकार , चित्त 

और 

अंतःकरण 

मन , बुद्धि , अहँकार , चित्त और अंतःकरण तत्त्वों को श्रीमद्भगवद्गीता , श्रीमद्भगवत पुराण , सांख्य और पतंजलि योग दर्शन के आधार पर यहाँ समझने की कोशिश की जा रही है । मन को 11 वीं इन्द्रिय भी कहा जाता है । गीता : 10.22 में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ,

 " इंद्रियाणाम् मनः च अस्मि " अर्थात इंद्रियों में

 मन मैं हूँ ।

सांख्य दर्शन के मन , बुद्धि , अहँकार , चित्त और अंतःकरण समीकरण को पतंजलि भी स्वीकारते हैं जो निम्न प्रकार है ⬇️

जब पुरुष प्रकाश के प्रभाव में त्रिगुणी प्रकृति की साम्यावस्था विकृत होती है तब महत् या बुद्धि उत्पन्न होता है । बुद्धि से अहँकार की उत्पत्ति होती है । अहँकार गुण आधारित 03 प्रकार के होते हैं --

सात्त्विक , राजस और तामसअहँकार से  05 ज्ञान इन्द्रियाँ , 05 कर्म इन्द्रियाँ और मन की उत्पन्न होती हैं । मन , बुद्धि और अहँकार को सामूहिक रूप में एक नाम दिया गया है चित्त

मन , बुद्धि और अहँकार को अंतःकरण भी कहते हैं अर्थात चित्त और अंतःकरण एक दूसरे के संबोधन हैं और 10 इंद्रियों को बाह्य करण कहते हैं । 

चित्त जड़ है जो न तो स्वयं को समझता है और न अन्य को लेकिन जब पुरुष की ऊर्जा इसमें बहने लगती है तब यह प्रकृति - पुरुष की संयोग भूमि बन जाता है । चित्त के माध्यम से पुरुष 10 इंद्रियों , 05 तन्मात्र और 05 महाभूतों को समझता है । जिस वस्तु का प्रतिविम्ब चित्त पर उभड़ता है , उसे पुरुष देखता है । इसे ऐसे समझें , पुरुष अँधा होता है जो चित्त के माध्यम से देखता है । चित्त से जुड़ते ही पुरुष चित्ताकार हो जाता है । 

चित्त का स्वामी , पुरुष अपरिवर्तनीय है और चित्त परिवर्तनीय ।

अंतः करण स्वेच्छा से अलग - अलग बिषय ग्रहण करते हैं । मन एवं अहँकार के सहयोग से बुद्धि तीनों कालों के बिषयों पर गहरा चिंतन करती है।

मन , बुद्धि और अहँकार परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय से अपनी - अपनी वृत्तियों को जानते हैं और इन सभी वृत्तियों का पुरुषार्थ ( मोक्ष ) ही उद्देश्य होता है । 

मन , बुद्धि , अहँकार , चित्त को विस्तार से समझने के लिए अगले अंकों को देखें ।


~~◆◆ ॐ◆◆~~ अक्टूबर 08


Tuesday, October 5, 2021

उपनिषद् के सम्बन्ध में कुछ और

 



उपनिषद् - बोध भाग - 5

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य निम्न 10 उपनिषदों पर भाष्य लिखे हैं ……..

1 - ईश 2 - ऐतरेय 3 - कठ 4 - केन 5 - छान्दोग्य 6 - प्रश्न 7 - तैत्तिरीय 8 - बृहद आरण्य 9 - मांडूक्य 10 - मुण्डक

" सत्यमेव जयते " मुण्डक उपनिषद् की देन है ।

~~ ॐ ~~ 04 अक्टूबर


1⃣

~~◆◆ ॐ◆◆~~


2⃣

उपनिषद् के 04  महा वाक्य 2

1- तत्त्वमसि " तत् त्वम् असि "

सामवेद : छंदयोग्य उपनिषद् > 6.8.7

सूत्र भावार्थ ⬇️

1 - अद्वैत्य वेदांत के अनुसार > वह तूँ है 

2 - द्वैत्य वेदांत रामानुजाचार्य के अनुसार > तूँ उसका है 

2 - अहम् ब्रह्मास्मि > अहम्  ब्रह्म अस्मि 

यजुर्वेद : वृहद् आरण्य उपनिषद् : 1.4.10

सूत्र भावार्थ ⬇️

" मैं ब्रह्म हूँ "

3 - अयम् आत्मा ब्रह्म 

अथर्वेद माण्डूक्य उपनिषद् : 1/1

सूत्र भावार्थ ⬇️

#अद्वैत्य बाद > यह आत्मा , ब्रह्म है 

# द्वैत्य बाद > यह आत्मा वर्धनशील है 

4 - प्रज्ञानं ब्रह्म 

◆ ऋग्वेद : ऐतरेय उपनिषद् > 1 / 2

● सामवेद : छान्दोग्य उपनिषद् > 3.14.1

सूत्र भावार्थ ⬇️

प्रज्ञान ब्रह्म है अर्थात प्रकट ज्ञान , ब्रह्म है अर्थात ब्रह्म ज्ञान स्वरुप है अर्थात शुद्ध  ज्ञान ही ब्रह्म है 

~~ॐ ~~

Monday, October 4, 2021

उपनिषदों के 05 महा मन्त्र

 💐 आज प्रातः कालीन बेला में उपनिषदों के 05 महा मन्त्रों में अपनें को खो जाने दीजिए ।

💐 यदि आप ऐसा होनें में पूर्ण सहयोग देगें तो आप को जो मिलेगा , उसे औरों में बाटना न भूलें क्योंकि बाटने से वह और फैलता चला जाता है ।

💐 उपनिषदों के मंत्रों में उनके ऋषियों से भी आपका मिलन तब संभव हो सकता है जब आप उन मन्त्रों में स्वयं को नमक के पुतले की भांति उपनिषदों के 05 महा मन्त्रों के सागर में घुलने में सहयोग देंगे ।



Saturday, October 2, 2021

उपनिषद् कहते हैं भाग - 01

 वेद मर्मज्ञ सत् गुरु के चरणों बैठ कर पूर्ण समर्पित , श्रद्धायुक्त वेद जिज्ञासु शिष्य द्वारा वेद रहस्य को पीना उपनिषद् है ।

अब शेष देखें इस स्लाइड में ⬇️


Thursday, September 30, 2021

त्रिपदी गायत्री

 त्रिपदी गायत्री जाप जब पद्मासन में किया जाता है तब मूलाधार से सहस्त्रार तक की परम ऊर्जा की यात्रा स्वतः होती है । 


Sunday, September 26, 2021

क्षीर सागर और पुरुष सूक्त सम्बन्ध

 पहली स्लाइड यहाँ दुबारा दी जा रही है केवल क्षीर सागर की भौगोलिक स्थिति को स्पष्ट करने के लिए ।

स्लाइड - 2 और स्लाइड -3  क्षीर सागर और पुरुष सूक्त से सम्बंधित हैं । क्षीर सागर 18 पुराणों का केंद्र है और पुरुष सूक्त में प्रभु के पहले साकार स्वरुप का वर्णन है और जो सभीं साकार का अक्षय पात्र स्वरुप है । श्रीमद्भगवद्गीता में भी परम पुरुष का वर्णन किया गया है।



Saturday, September 25, 2021

भागवत स्कन्ध - 5 आधारित भुवन कोष के अन्य द्वीपों की चर्चा

 भुवन कोष की रचना सम्बंधित भागवत स्कन्ध - 5 आधारित सूचनाएं आज समाप्त हो रही हैं । अगले अंक में क्षीर सागर के सम्बन्ध में कुछ बातों को देखा जायेगा ।

भुवन कोष के 07 द्विप और  07 महासागरों की बातों में आज द्वीप - 2 और उसके बाद के द्वीपों के सम्बन्ध में जो सूचनाएं भागवत में उपलब्ध हैं , उनका सार आप यहाँ दो स्लाइड्स के माध्यम से देख रहे हैं । चलिये फिर देखते और समझते हैं इन सूचनाओं को ⬇️



Thursday, September 23, 2021

किम्पुरुष और भारत वर्ष

 किम्पुरुष ऐसे नर होते हैं जो बंदरों जैसे दिखते हैं जैसे हनुमान जी थे। संभवतः हनुमान जी किम्पुरुष वर्ष के रहे होंगे । किम्पुरुष श्रीराम के भक्त भी होते हैं ।

अब निम्न 02 स्लाइड्स को देखें 👇




Wednesday, September 22, 2021

जम्बू द्वीप के पश्चिम दिशा का भूगोल

 जम्बू द्वीप का केंद्र है मेरु पर्वत जो इलावृत्त वर्ष के मध्य में स्थित है। जम्बू द्वीप के भूगोल श्रंखला को हम 04 भागों में देखे ; उत्तर , दक्षिण , पूर्व और पश्चिम दिशाओं के भूगोल रूप में ।

आज इस श्रंखला का आखिरी भाग यहाँ निम्न स्लाइड के माध्यम से दिखाया जा रहा है जिसमें पश्चिम दिशा का भूगोल दिखाया गया है।

आइये देखते और समझते हैं ⬇️


Tuesday, September 21, 2021

जम्बू द्वीप के पूर्वी भाग का भूगोल

 भुवन कोष 07 द्वीपों में विभक्त है । केंद्र में स्थित है जम्बू द्वीप । पहले द्वीपों और सागरों की भौगोलिक स्थितियों को चित्त द्वारा दिखाया जा चुका है । 

जम्बू द्वीप का केंद्र है इलावृत्त वर्ष और उसके केंद्र में स्थित मेरु या सुमेरु पर्वत जो ज्योतिष का केंद्र है और जिसकी चोटियों पर स्थित हैं , देवताओं की पुरियाँ ।

अब आगे स्लाइड देखें ⬇️


Monday, September 20, 2021

भागवत पुराण आधारित भारत वर्ष की सीमाएं

 श्रीमद्भगवत पुराण स्कन्ध - 5 में भूमंडल का भूगोल दिया गया है । जितने भी कथा वाचक हैं , सब का केंद्र भागवत स्कन्ध - 10 है । क्या आप जानते हैं कि काशी में स्थित विद्वत सभा सन् 1940 के आस पास भागवत से स्कन्ध - 10 को हटाने का प्रस्ताव रखा था और आज वही स्कन्ध - 10 भागवत का मुख्य आधार बना दिया गया है। करपात्री जी के विरोध के कारण स्कन्ध - 10 को भागवत से नहीं हटाया जा सका ।

भागवत स्कन्ध - 5 पर कथा वाचक चुप रहते हैं , कारण क्या हो सकता है , मुझे पता नहीं । 

07 द्वीपों में बटे भूमंडल का केंद्र है जम्बू द्वीप जो चारो तरफ से खारे पानी के सागर से घिरा हुआ है । जम्बू का केंद्र है इलावृत्त क्षेत्र जिसके केंद्र में है - मेरु पर्वत । इलावृत्त पृथ्वी का केंद्र माना जाता है और यह शिव क्षेत्र होने के साथ ब्रह्मा - इंद्र आदि देवताओं का निवास भी है।

नीचे स्लाइड में आप हिमालय और भारत वर्ष की भौगोलिक स्थिति को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें और समझें कि इस सम्बन्ध में क्या आपकी पहले की सोच ठीक है ?

नाभि के पुत्र ऋषभ जी को हिन्दू लोग 08 वे अवतार के रूप में देखते हैं । ऋषभ देव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भी हैं । ऋषभ जी पहले मनु के पुत्र प्रियव्रत के पौत्र हैं । ऋषभ जी के बड़े पुत्र भरत हैं जिनके नाम पर अजनाभ वर्ष को भारत वर्ष की संज्ञा दी गयी।

अब स्लाइड को देखते हैं ⬇️



Sunday, September 19, 2021

कहाँ है मेरु ( सुमेरु ) पर्वत ?

 भूमंडल विस्तार के इस अंक में जो भागवत स्कंश - 5 पर आधारित है , जम्बू द्वीप में स्थित मेरु (सुमेरु ) पर्वत और गंगा जी की भौगोलिक स्थिति जो दिखाया गया है । गंगा ध्रुवलोक से उतर कर मेरु पर स्थित ब्रह्मा जी की सुवर्ण पूरी में आती हैं । यहाँ पहुंचते ही 04 भागो में विभक्त हो जाती हैं तथा चरों दिशाओं में बहती हुई पूर्वी , ओअश्चिमी , उत्तरी और दक्षिणी सागर में समा जाती हैं । स्लाइड - 1 में जम्बू द्वीप के उत्तर भागबक भूगोल दिखाया गया है ।

अब देखिये स्लाइड्स को ⬇️






Saturday, September 18, 2021

भागवत स्कंध -5 भूमंडल का विस्तार क्रमशः

 श्रीमद्भागवत पुराण स्कन्ध - 05 के सार रूप में भुवनकोष या भूमंडल विस्तार को यहाँ स्पष्ट करने का यत्न किया गया है ।

इस श्रृंखला के अंतर्गत पहले अंक में दो स्लाइड्स दी गयी थी । पहलू में स्कन्ध - 5 से परिचय कराया गया था । स्लाइड -2 में 07 द्वीपों और 07 सागरों के भौगोलिक स्थिति को दिखाया गया था । अब स्लाइड - 3 और स्लाइड - 4 के माध्यम से स्लाइड - 2 में दिए गए विवरण को और स्पष्ट किया जा रहा है।

स्सात द्वीपों का केंद्र है - जम्बू द्वीप और जम्बू द्वीप का केंद्र है शिव क्षेत्र इलावृत्त जिसके केंद्र में स्थित है मेरु पर्वत ( Mount Meru ) जो बौद्ध , जैन , जावा , हिन्दू तथा कुछ और मान्यताओं के ज्योतिष विज्ञान का केंद्र है ।

आगे व्हाल कर संक्षेप में हम सभीं द्वीपों के सम्बन्ध में देखेंगे।

हर द्वीप एक सागर से घिरा हुआ है अर्थात दी सागरों के मध्य में एक द्वीप है  । पिछले अंक की स्लाइड - 2 के साथ स्लाइड - 3 और स्लाइड - 4 को देखें ।  अब देखते हैं निम्न स्लाइड्स को ⬇️



Thursday, September 16, 2021

श्रीमद्भागवत पुराण आधारित भूमंडल की स्थिति

 श्रीमद्भगवत पुराण में भुवनकोष ( भूमंडल ) का नक्शा जो दिया गया है उसे समझने के लिए वैज्ञानिक सोच होनी चाहिए ।

आगे चल कर हम 07 द्वीपों और सागरों को विस्तार से देखा जायेगा लेकिन अभी निम्न स्लाइड को देखते हैं ⬇️



Wednesday, September 15, 2021

जिंदगी और किस्मत

यह जिंदगी एक अजीब पहेली है और किस्मत और भी अधिक गहरी पहेली है । बस !  एक कदम आगे निकालते ही जिंदगी की दिशा तय हो जाती है फिर उसे बदलने का कोई उपाय नहीं होता। मनुष्य की आँखे केवल और केवल आगे देखने के लिए बनायीं गयी हैं , पीछे देखने का कोई उपाय नहीं थीक इसी तरह जिंदगी में कभीं आगे चल कर पीछे लौटने का कोई उपाय नहीं क्योंकि जिंदगी का हर कदमकी दिशा को किस्मत तय करती है ।
जिंदगी का हर कदम किस्मत के बनाये मार्ग पर ही होता है , और कहीं हो भी नहीं सकता लेकिन अहँकार हमें यह महसूस कराता रहता है कि तुम्हारा यह कदम ठीक वहां पड़ा है जहाँ तुम चाहते थे ।
जिंदगी कई एक ऐसी रस्सियों से बधी होती है जिसका इल्म बुद्धि को नहीं होता । किस्मत अपनें द्वारा पूर्व निर्धारित दिशा में ले जा रही है लेकिन इसे हम समझ नहीं पा  रहे ।
हमारी सारी खोज सुख प्राप्ति केंद्रित हैं । दुःख मिलता भी है लेकिन वह क्षणिक होता है और उसका फल दुःख का होता है । हमारा हर यत्न सुख खोज रहा है और फिर भी हम दुखी हैं और सभीं जीवधारियों में अपने को सबसे अधिक विकसित बुद्धि वाला प्राणी मानते हैं - क्या यह एक भ्रम नहीं ?
~~ अगले अंक में क्रमशः ~~

Wednesday, July 7, 2021

श्रीमद्भागवत पुराण से - 1

 💐 प्रभु श्री कृष्ण - उद्धव वार्ता के अंतर्गत स्कन्ध : 11 , अध्याय : 21 और श्लोक - 15 के माध्यम से धर्म के सम्बन्ध में जो कहा गया है , उसे आप यहाँ स्लाइड में देख रहे हैं 

1# यहाँ देश का अर्थ है स्थान जहाँ हम हैं अर्थात जिस समय जहाँ हम रह रहे होते हैं , वह स्थान साधना की दृष्टि में हमारा देश कहलाता है।

2 # काल का भाव है समय अर्थात जिस घडी जिस देश में हम होएभिं , वह घडी काल कहलायगी ।

3 # पदार्थ का भाव है उपयोग की जा रही वस्तु ।

4 # कर्ता अर्थात हम स्वयं 

5 # मन्त्र अर्थात वेद - उपनिषद् के वचन जिसे हम उस समय  बोल रहे होते हैं ।

6 # कर्म ; कर्म वह जिसे हम अपनें जीवन को बनाये रखने के लिए उस घडी कर रहे होते हैं । श्वास लेने से लेकर अन्य सभीं क्रियाएं कर्म कहलाती हैं । हम दो के योग से हैं ; माया अर्थात 03 गुणों का एक अति सूक्ष्म अव्यक्त माध्यम जिससे बुद्धि , अहँकार , 11 इन्द्रियां , 05 तन्मात्र और 05 महाभूत अर्थात 23 तत्त्व हैं और इन 23 तत्त्वों से हम हैं । दूसरा तत्त्व है आत्मा । आत्मा प्रभु के ब्रह्म ऊर्जा का एक कण जैसा है जिसकी ऊर्जा संपूर्ण 23 तत्त्वों को  विकिरण माध्यम से ऊर्जा देती रहती है । इस प्रकार यह हृदय में स्थित आत्मा संपूर्ण 23 तत्त्वों को जड़ से चेतन और निष्क्रिय से सक्रीय बनाये रखता है । 

💐प्रभु श्री कह रहे हैं , ऊपर व्यक्त 06 तत्त्वों को शुद्ध बनाये रखना ही हम सबका धर्म है ।



// ॐ //