Thursday, April 14, 2022
Wednesday, April 13, 2022
सांख्य में पुरुष को जब मैं कौन का बोध हो जाता है तब भी वह कैवल्य में नहीं पहुँचता
सांख्य दर्शन में प्रकृति - पुरुष रहस्य सम्बंधित 28 कारिकाओं में से आज 21 कारिकाओं की श्रंखला में यह अंतिम प्रस्तुति है । अभीं तक आप 21 कारिकाओं के सार को 16 स्लाइड्स के माध्यम से देख रहे हैं । आगे 07 और कारिकाओं के सम्बन्ध में हम आप से मिलेंगे और फिर इसके बाद पतंजलि योग दर्शन के आधार पर प्रकृति - पुरुष रहस्य को स्लाइड्स के माध्यम से दिया जायेगा ।
Tuesday, April 12, 2022
सात भावों से मुक्त प्रकृति को ज्ञान प्राप्ति
प्रकृति और पुरुष का प्रत्यक्ष बोध संभव नहीं केवल अनुमान से संभव है क्योंकि दोनों अति सूक्ष्म हैं । 16 स्लाइड्स में सांख्य दर्शन के प्रकृति - पुरुष से परिचय कराने की इस शृंखला के अंतर्गत अब हम आगे की यात्रा में तीन और स्लाइड्स को देखरहे हैं । यहाँ 07 भावों से बधी हुयी प्रकृति को ज्ञान प्राप्ति सम्बंधित सांख्य - ज्ञान को देख रहे हैं । ध्यान रहे जी जड़ प्रक्रियी जिसे स्वयं का ज्ञान नहीं , वह पुरुष से जूझने से स्व बोधी बन जाती है आत् पुरुष को अपनीं जाल से मुक्त होनें मरण मदद करती है।
Sunday, April 10, 2022
Wednesday, April 6, 2022
प्रकृति - पुरुष संयोग से जीव कण की रचना होती है
सांख्य दर्शन में तत्त्व ज्ञान से कैवल्य प्राप्ति की ऊर्जा मिलती है और कैवल्य प्राप्ति से आवागमन से मुक्ति मिलती है ।
प्रकृति - पुरुष संयोग क्यों होता है ? इस प्रश्न के लिए देखे आगे दी जा रही स्लॉइड को ।
प्रकृति - पुरुष संयोग से 18 सूक्ष्ण तत्त्वों एवं 05 महाभूतों की उत्पत्ति होती है । इस बात को और अधिक स्पष्ट आगे दी जा रही स्लॉइड - 3 में दिखाया गया है ।
अब देखते हैं , ऊपर बतायी गयी 03 स्लाइड्स को ⬇️
Sunday, April 3, 2022
Saturday, April 2, 2022
सगुण - निर्गुण और सक्रिय - निष्क्रिय दो ऊर्जाओं जिनसे यह संपूर्ण व्यक्त हैं , वे दोनों अव्यक्त हैं
प्रकृति - पुरुष या माया - ब्रह्म या क्षेत्र ( हमारा स्थूल देह ) और क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा से क्रमशः सांख्य दर्शन और एंड 05 वैदिक दर्शनों के आधार पर सभीं जड़ - चेतन हैं , थे , हो रहे हैं और हो - हो करः अव्यक्त हिट जा रहे हैं ।
गीता श्लोक : 2.28 में प्रभु श्री कृष्ण कहते भी हैं , " हे अर्जुन ! जो यह राजा - महाराजा आज यहाँ दिख रहे हैं , तुम और अन्य सभीं अव्यक्त से व्यक्त हुए हैं और सभीं मृत्यु के बाद पुनः अव्यक्त हो जाने वाले हैं । हम का वर्तमान दो अव्यक्तो का मध्य है फिर तुम इन सबकी मौत के लिए क्यों व्याकुल हो रहे हो?
अब तीन स्लाइड्स के माध्यम से अभी तक जो कुछ भी इन दो ऊर्जाओं के सम्बन्ध में बताया गया हैं , उनके संबंध में सांख्य की 21 कारिकाओं को विस्तार से समझते हैं 👇
Wednesday, March 30, 2022
Sunday, March 27, 2022
संसार का अस्तित्व प्रकृति - पुरुष आधारित है
यहाँ गीता श्लोकों के आधार पर बनायीं गयी दो स्लाइड्स दी जा रही हैं । इन दो स्लाइड्स से प्रभु श्री कृष्ण के द्वारा समर्थित सांख्य दर्शन की बुनियादी तत्त्व प्रकृति - पुरुष और इन दोनों के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति - रहस्य को स्पष्ट किया जा रहा है ।
आगे चल कर हम इसी तरह की 10 स्लाइड्स में माध्यम से प्रकृति - पुरुष सांख्य रहस्य से सम्बंधित 21 सांख्य कारिकाओं के सार को भी देखेंगे ।
Friday, March 25, 2022
दुःख संयोग वियोगम् योगः
प्रभु श्री कृष्ण गीता : 6.23 में जो परिभाषा योग की देते हैं ( जिसे स्लॉइड में दिया गया है ) , उस सन्दर्भ में दुःख उत्पन्न करने वाले तत्त्वों ( कर्म बंधन , चित्त वृत्तियां और क्लेषों ) को अब समझते हैं ⬇️
1 - कर्म बंधन क्या हैं ?
आसक्ति , कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय , आलस्य और अहँकार को कर्म बंधन तत्त्व कहते हैं ।
प्रभु श्री कृष्ण गीता श्लोक - 6.23 में योग को परिभाषित करते हुए कहते हैं , " ऐसे तत्त्व जो दुःख उत्पन्न करते हैं , उनमें वियोग पैदा करना , योग है " । अब देखना होगा उन तत्त्वों को जो दुःख के हेतु हैं । गीता में प्रभु श्री कृष्ण 08 कर्म बंधनों को दुःख के हेतु बताते हैं जिन्हें ऊपर स्लॉइड में दिखाया गया है । मूलतः ये तत्त्व राजस और तामस गुणों की वृत्तियां हैं ।
बिषय - इंद्रिय संयोग (जिसे गीता : 5.22 में भोग बताया गया है ) से मन में बिषय के प्रति मनन पैदा होता है , मनन से बिषय के प्रति आसक्ति पैदा होती है , आसक्ति से कामना उठती है और कामना टूटनें से क्रोध पैदा होता है जो नाश के द्वार पर पहुँचाता है ( देखें गीता : 2.62 - 2.63 ) । मोह , भय और आलस्य तामस गुण की वृत्तियां हैं । लोभ का अर्थ है लालच अर्थात जो है , उसे और पाने की चाह , लोभ है ।
2 - पञ्च चित्त वृत्तियां क्या हैं ?
ऊपर स्लॉइड में पतंजलि योग सूत्र आधारित 05 प्रकार की चित्त - वृत्तियों को बताया गया है जो क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो रूपों में प्रकट होती हैं । क्लिष्ट दुःख से जोड़ती हैं और अक्लिष्ट सुख से । ध्यान रखें यहाँ दुःख और सुख भोग आधारित नहीं हैं , योग आधारित हैं । राजस और तामस गुणों के प्रभाव में आसुरी सम्पदा और सात्त्विक गुण से दैवी सम्पदा मिलती है । पहली दुःख से जोड़ती है और दूसरी सुख से जोड़ती है ( यहाँ देखें गीता अध्याय : 16 ) ।
प्रमाण चित्त वृत्ति बिषय - ज्ञान इंद्रियों के जुड़ने से उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष , अनुमान और आगम , तीन प्रकार की होती है । प्रत्यक्ष में बिषय - इंद्रिय संयोग से बिषय बोध होता है । जब बिषय अनुपस्थित हो तब उसके चिन्ह के आधार पर उस बिषय के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जाता है जैसे दूर कहीं उठ रहे धुंआ को देख कर वहां आग होने का अनुमान लगाना , अनुमान प्रत्यक्ष चित्त वृत्ति कहलाती है । जब प्रत्यक्ष और अनुमान से बिषय बोध होना संभव न हो सके तब शास्त्रों में उस बिषय के प्रति उपलब्ध ज्ञान से जो वृत्ति उठती है उसे आगम प्रत्यक्ष चित्त वृत्ति कहते हैं ।
विपर्यय वृत्ति : अविद्या का दूसरा नाम विपर्यय है । सत्य को असत्य समझना , विपर्यय है ।
विकल्प वृत्ति : जब बिषय अनुपस्थित हो और उसके बारे में उपलब्ध सूचनाओं के जानने से जो वृत्ति उत्पन्न हो उसे विकल्प वृत्ति कहते हैं ।
निद्रा वृत्ति : स्वप्न के थीक विपरीत निद्रा है जहाँ बिषय शून्यता में चित्त होता है लेकिन इस शून्यता का भी कोई साक्षी वृत्ति होती है जो उठने पर आभास कराती है कि आज बहुत गहरी नींद आयी , समय का पता तक न चला । इस साक्षी चित्त वृत्ति को निद्रा वृत्ति कहते हैं ।
स्मृति वृत्ति : पूर्व अनुभवों को ठीक समय पर स्मृति पटल पर जो वृत्ति ला देती है , उसे स्मृति वृत्ति कहते हैं ।
3 - पञ्च क्लेष क्या हैं ?
अविद्या , अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेष पञ्च क्लेष हैं । अविद्या शेष चार क्लेषों की जननी है । विपर्यय का ही दूसरा नाम अविद्या या अज्ञान है ।
अस्मिता अहं भाव को कहते हैं । सुख की तलाश में राग की ऊर्जा रखती है । द्वेष दुःख की ऊर्जा पैदा करता है । अभिनिवेष अर्थात मृत्यु - भय की ग्रंथि दुःख की ऊर्जा का श्रोत है ।
इस प्रकार 08 कर्म बंधन , पांच चित्त वृत्तियां और पांच क्लेषों को दुःख - संयोग तत्त्वों के रूप में देखा गया । अब अगले अंक में यह देखा जाएगा कि सुख - दुःख का भोक्ता कौन है और कर्म बंधनों , चित्त की वृत्तियों तथा क्लेषों की जननी कौन है ?
~~ ॐ ~~
Friday, March 18, 2022
Thursday, March 10, 2022
Monday, March 7, 2022
Saturday, March 5, 2022
Wednesday, March 2, 2022
पुनर्जन्म का हेतु लिङ्ग शरीर
बिस्तर से लिङ्ग और भाव सृष्टियों सहित्त लिङ्ग शरीर को देखें अगके अंक में । सांख्य में पुनर्जन्म रहस्य पूर्ण रूपेण स्पष्ट है ।
~~ ॐ ~~
Tuesday, March 1, 2022
श्रीमद्भगवद्गीता गीता अध्याय - 13 सात तत्त्व
गीता अध्याय - 13 मूलतः सांख्य दर्शन आधारित है ।
बिना सांख्य दर्शन ज्ञान , इस अध्याय को ठीक - ठीक समझना आसान नहीं ।
क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ , प्रकृति - पुरुष , ज्ञान - ज्ञानी और कार्य - करण को इस अध्याय में बताया गया है ।
Saturday, February 26, 2022
पतंजलि योग दर्शन का उपादान कारण सांख्य दर्शन है
पतंजलि योग दर्शन का उपादान कारण
सांख्य दर्शन है 👇
सांख्य दर्शन अगर न होता तो पतंजलि योग दर्शन का होना संभव न होता । सांख्य , पतंजलि योग दर्शन का प्राण है , ऐसा कहना अनुचित न होगा ।
सांख्य दर्शन की बुनियादी बातें
हम सब तीन प्रकार के दुखों से पीड़ित हैं। स्व निर्मित दुःख , दैवी दुःख और अन्य जीवों के मिलने वाला दुःख , ये दुःख की तीन श्रेणियाँ हैं । हम सब इन दुःखों से मुक्त होने के जिज्ञासु भी हैं । दुःखों से मुक्ति केवल तत्त्व ज्ञान से संभव है । तत्त्व ज्ञान के अतिरिक्त भी उपाय हैं , लेकिन उनसे क्षणिक दुःख दूर होते हैं। अन्य उपायों से दुःख दूर हो तो जाते हैं पर इन दुखों के बीज बचे रह जाते हैं, फलस्वरूप कुछ समय बाद वे पुनः अनुकूल परिस्थिति पाते ही अंकुरित होने लगते हैं । तत्त्व ज्ञान से दुखों के बीज नष्ट हो जाते हैं अतः तत्त्व ज्ञानी परमानंद में बसा हुआ होता है ।
अब प्रश्न उठता है कि तत्त्व ज्ञान क्या है ?
हम प्रकृति - पुरूष से हैं और प्रकृति और पुरुष का बोध , तत्त्व ज्ञान है ।
प्रकृति और पुरुष क्या हैं ? (आगे फोटो में देखे )
पूरी सृष्टि प्रकृति - पुरुष संयोग से है । प्रकृति और पुरुष का संयोग एक अंधे और एक लंगड़े ( पंगु ) , का संयोग है । प्रकृति अंधी है और पुरुष पंगु है । प्रकृति पुरुष के लिए है । प्रकृति , पुरुष की ऊर्जा प्राप्त करते ही विकृत हो उठती है और उससे 23 तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन , 10 इन्द्रियाँ , पांच तन्मात्र और पांच महाभूत ) की उत्पत्ति होती है । इन 23 तत्त्वों के योग से हम सब हैं । उपनिषदों का नेति - नेति सिद्धांत , अष्टावक्र का और रमन महर्षि का मैं कौन हूँ ? का बोध , वेदांत का ब्रह्म ज्ञान आदि - आदि सभीं अलग - अलग ढंगों से स्व बोध कराते हैं और स्व बोध ही मैं कौन हूँ का उत्तर है ।
यह सांख्य का परोक्ष ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे बने ? इस प्रश्न के लिए महर्षि पतंजलि योग की पूरी गणित देते हैं ।
जहाँ सांख्य की यात्रा पूरी होती है , वहाँ सामने महर्षि पतंजलि दिखने लगते हैं । महर्षि पतंजलि अपनें योग दर्शन के 04 पादों में विभक्त 195 सूत्रों के माध्यम से सांख्य साधक की उंगली पकड़ कर आगे की यात्रा पर ले जाते हैं ।
महर्षि पतंजलि प्रारम्भ में दुःख की बात नहीं कहते हैं , आगे चल कर क्लेषों की बात अवश्य करते हैं । पतंजलि योग अनुशासन की गणित में कहते हैं । पतंजलि योग अनुशासन को स्लॉइड में अंत में दिखाया गया है । सांख्य में प्रकृति - पुरुष संयोग से पहला तत्त्व महत्
( बुद्धि ) उत्पन्न होता है , बुद्धि से अहँकार और अहँकार से मन एवं 10 इन्द्रियों की उत्पत्ति होती हैं । बुद्धि , अहँकार और मन के समूह को पतंजलि चित्त कहते हैं । पतंजलि आगे कहते हैं , तुम पहले चित्त की वृत्तियों को समझो , उन्हें अभ्यास - वैराग्य से नियंत्रित करो और अष्टांगयोग का अभ्यास करो । जब चित्त की वृत्तियां क्षीण होती हैं तब वैराग्य मिलता है और वैराग्य से समाधि मिलती है । समाधि अष्टांगयोग का आखिरी अंग है (समाधि के सम्बन्ध में अलग से अगले लेखों में देखा जा सकेगा )। ध्यान , धारणा और समाधि जब एक साथ घटित होती है तो उसे संयम सिद्धि कहते हैं । संयम सिद्धि से सिद्धियां मिलती हैं जो साधना मार्ग की रुकावटें हैं । जब सिद्धि प्राप्त योगी सिद्धियों की रुकावटों से अप्रभावित रहते हुए अपनीं संस्कार की साधना में लीन रहने लगता है तब सम्प्रज्ञात समाधि के आगे असम्प्रज्ञात समाधि में पहुंचता है । असम्प्रज्ञात समाधि सिद्धि से धर्ममेघ समाधि में पहुंचता है । यहां से कैवल्य की ऊर्जा में वह साधक पूर्ण परमानन्द की लहरों में होशयुक्त अवस्था में बहने लगता है । इस प्रकार कैवल्य सिद्धि में जब देह त्यागता है तब वह आवागमन से मुक्त हो गया होता है जिसे मोक्ष कहते हैं । मोक्ष को सभीं भारतीय दर्शन मानते हैं । सार रूप में सांख्य दर्शन और पतंजलि दर्शन के पारस्परिक सम्बन्ध को यहाँ देखा गया अब आगे के अंकों में कुछ और रहस्यों को देखा जा सकेगा ।
Tuesday, February 22, 2022
पतंजलि योगसूत्र दर्शन और हम
महर्षि पतंजलि पूर्ण रूपेण सांख्य दर्शन के सिद्धांतों पर केंद्रित है। सांख्य सनातन प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वों से जड़ - चेतन के होनें का कारण मानता है और पतंजलि भी इसी सिद्धान्त पर सांख्य सुत्रों का ब्यवहारिक स्वरुप प्रस्तुत करते हैं । सांख्य में ईश्वर शब्द की अनुपस्थिति है लेकिन पतंजलि चित्त वृत्ति नीरोध के 09 उपायों में ईश्वर प्राणिधानि को भी बताते हुए ईश्वर को परिभाषित भी करते हैं । महर्षि कहते हैं ईश्वर कर्म , कर्म फल और चित्त मुक्त पुरुष विशेष है । इस प्रकार सांख्य के 25 तत्त्वों को यथावत स्वीकारते हुए पुरुष के अंतर्गत पुरुष विशेष का उल्लेख करते हैं ।
अब देखिये चित्त शांत रखने के 09 उपायों को ⬇️
Monday, February 14, 2022
Sunday, February 13, 2022
Saturday, February 12, 2022
Tuesday, February 8, 2022
Sunday, February 6, 2022
Thursday, February 3, 2022
पढ़ें और मनन करें
# कुछ को अपनें लोग छोड़ देते हैं और कुछ अपनों को छोड़ देते हैं ।
# मुहब्बत हार जाय तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन रिश्ता हार जाय तो जिंदगी बिगड़ जाती है ।
# इंसानी संसार में इज़्ज़त उतारने वालों की भीड़ है , इज़्ज़त बचाने वाले तो दुर्लभ ही हैं ।
# जिसके मुह पर कालिख पुती हो , वह नाराज़ नहीं होता , केवल मुह छिपाता है ।
◆ ख्वाबों में जीने वाली लड़कियां माँ बनते ही हकीकत में जीने लगती हैं और जो ऐसा नहीं कर पाती , उनका घर कभीं नहीं बसता ।
Wednesday, February 2, 2022
हमारे अंदर का खोजी कौन है ?
हमारे अंदर का खोजी कौन है ?
सभीं खोज रहे हैं , चाहे वे सम्राट हों या भिखारी , क्या आप कभीं इस बिषय पर सोचे हैं ?यदि नहीं तो अब सोचना प्रारंभ करें और निम्न को अपनीं सोच का केंद्र बनाएं 👇
1 - हम कौन हैं , और हमारे अंदर बसा खोजी कौन है ?
2 - वह खोजी क्या खोज रहा है ?
3 - उसे खोज में जो भी मिलता है वह उसे पूर्ण तृप्त क्यों नहीं कर पाता , और वह कैसे तृप्त होता है ?
4 - क्या अंदर के खोजी का अस्तित्व हमारी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है ?
5 - क्या इस खोजी और उसकी खोज का अंत भी है ?
सांख्य और पतंजलि दर्शन , दोनों मिलकर इस प्रकार के प्रश्नों के ऊपर से पर्दा उठाते हैं ।
~~◆◆ ॐ ◆◆~~
Tuesday, January 25, 2022
परमात्मा के होने की अनुभूति कब होती है ?
💐 परमात्मा कब दिखता है ?
● गरीबी की परिधि पर
● तन्हाई की चटाई पर
● अपनों में दिखते पराएपन पर
● अपनें दिल में बसे का एकाएक लुप्त हो जाने पर
● सुख - दुःख के संगम पर
◆ जीने की आस टूटने पर
◆ हर पल हो रहे बदलाव में
◆ दिन का रात में और रात को दिन में बदल रहे रहस्य में
◆ हर आती - जाती घटनाओं में
◆ हर आती - जाती साँसों में
■ अपनों का पराया बन जाने में
■ परायों का अपना बन जाने में
■ आखिरी सांस छोड़ने में
~~ॐ ~~
Thursday, January 20, 2022
Monday, January 17, 2022
Sunday, January 9, 2022
Monday, January 3, 2022
क्या पाया क्या खोया
क्या पाया क्या खोया
# जिंदगी से दो कदम आगे चलना ...
मौत से दो कदम पीछे - पीछे रहना ...
और संसार को मुट्ठी में बंद कर लेना ...
सब की चाह होती है ...
लेकिन क्या यह भी समझते हैं !
कि जिसने उसे पाया , उसे खाक बना दिया ..
और जो न पा सका ..
वह स्वयं को खाक बना दिया ।
चाह होनी जरूरी है , चाह बिना हम , हम नहीं ..
लेकिन चाह का गुलाम बन के जीना ..
कोई जीना नहीं ।।
~~ ●● ॐ ●●~~
Subscribe to:
Posts (Atom)




































