Monday, October 13, 2014

पर सुनता कौन है

●क्या हम योंही सदैव चूकते रहेंगे --
 * सत्यकी तलाश ही मनुष्य की परम तलाश है । हमारा सारा जीवन अनजानें में योंही गुजर रहा है , सत्य की खोज में , लेकिन जब और ज्योंही सत्यका सामना होना होता है , हम एकाएक झट से अपना रुख बदल लेते हैं ,और इस मौके पर भी हम चूक जाते
 है । 
 * ऐसा क्यों हो रहा है ? 
 ऐसा इसलिए हो रहा है कि हम जिसकी खोज में भाग रहे हैं , उसकी हमें कोई पहचान नहीं मालूम । हमें इतना इशारा मिला हुआ है कि वह सर्वत्र है और सबमें समभाव से हैं पर इतना जानते हुए भी हमारी उसकी खोज की भागा दौड़ी कहीं रुकनेंका नाम नहीं लेती और अंततः वह घडी आ ही जाती है जब हमारी श्वासे कहनें लगती हैं कि अब बश करो ,मेरे पास इतना भागा - दौड़ी के लिए वक़्त नहीं ,अब मैं तेरा साथ नहीं दे सकती और चल रहीं हूँ । 
 * फिर क्या होता है ?
 क्या होना है , जीवन भर जिनको परम समझ कर इकट्ठा करते रहे ,वे मुर्दे से दिखनें लगते हैं ।जिनको अपना समझ कर पाला था उनके कदम अब मुझसे उलटे चलते दिखनें लगते हैं ,जो मेंरे एक इशारे पर भागे हुये आते थे ,अब उनकी पीठ मेरी तरफ नज़र आती है , इस बेचारेकी स्थिति में मेरी आँखें इस दृश्यको देखनें में अपनें को असमर्थ समझती हैं और चुपके से हमेशा केलिए बंद हो जाती हैं । 
* फिर क्या होता है ?
 आप घरके बाहर जमीन पर लिटा दिए जाते हैं जिससे आनें -जानें वालों को हमारी असलियत का पता चल सके और जल्दी -जल्दी में आपको प्रकृति को सुपुर्द कर दिया जाता है । 
* फिर क्या होता है ? फिर क्या होता है , आपकी यात्रा कहीं और की होती है ,आपके अपनों की यात्रा घर की ओर होती है और जिस सम्पदाके मालिक अभी कुछ घडी तक आप थे ,उसका मालिक अब कोई और होता है । 
** फिर कुछ नहीं होता ,जो पहले हुआ है ,वही बार -बार घटता रहता है और हम :--- 
# इस नशे में रहते हैं कि --- 
* संसार हमारे सहारे चल रहा है * 
<> अहंकारकी मूछें कभी झुकती नहीं<> 
~~~ ॐ ~~~

Monday, September 22, 2014

प्यारे ! यह संसार है ---

* प्यारे यह संसार है , इसे समझनें के चक्कर में न उलझना , इसे प्यार से देखते रहो और भाव रहित स्थिति में मस्त रहो । 
* वह जो इस संसारको समझनेंके चक्कर में उलझा ,वह समझ तो पाया नहीं ,पर इसमें उलझता चला गया और जब यहाँ से बिदा लेनें का वक़्त आया तब बंद हो रही आँखों को ज़रा हिला भर पाया और दो बूँद आँसू धीरे से टपक पड़ी ; इन आँसुओं के माध्यम से वह शांत हो रहा ब्यक्ति जो कहना था , कह दिया , चाहे वहाँ इकट्ठे लोग समझे हों या न समझे हों ।
 * यह संसार अनंत है , इसमें स्थित सूचनायें अनंत हैं और इसको जो ऊर्जा चला रही है , वह भी अनंत है फिर इस अनंत से अनंत में स्थित अनंत संसार को क्या समझोगे ?
 * झरनें की लम्बाई , चौड़ाई ,गहराई और इसकी आवाज को जो मापनेके चक्कर में पड़ते हैं वे उससे निकल रही ओंकार-नाद से वंचित रह जाते हैं जो अविरल दिन -रात उससे निकल रही है पर जो इसके किनारे बैठ कर इस पर केन्द्रित होनें में सफल हो जाते
 हैं ,वे एक ओंकार की ऊर्जा से भर जाते हैं और उसे पा लेते हैं जिसे पानेंके लिए साधकको कई जन्म लेनें पड़ जाते हैं । 
* प्यारे ! देनें वालेनें कोई कमी न दी , उसका खजाना कभीं खाली नहीं होता लेकिन उसके खजानें की ओर हाँथ बढानें लायक तो बनना ही पड़ता है जिसके लिए हम तैयार नहीं फिर इस स्थिति में क्या हो सकता है ? 
<> दो धड़ी , बस दो घड़ी ही , अकेले एकांत में शान्त मनके आईने में ऊपर बताई गयी बातों को पढना ; एक दिन नहीं , रोज पढना , क्या पता किस दिन , किस घड़ी आपका उससे एकत्व स्थापित हो जाए जो इस संसारका अनाम , निर्माण कर्ता और साक्षी है । 
~~ ॐ ~~

Sunday, September 14, 2014

जो जानते हो , वह क्या कम है ?

● भागनें की क्या जरुरत है ? जो आपके पास है , क्या आप उसका भरपूर प्रयोग कर चुके हैं ? क्या वह आपकी मदद करनें में समर्थ नहीं कि आप और की तलाश में भाग रहे हैं ? ठहरिये 
जरा  ! कोई जल्दी नहीं , आराम से अकेले एकांत में बैठ कर इस बिषय पर मनन करें , क्या पता यह आपका मनन आपको कुछ ऐसी औषधि दे सके जो आपको हर पलकी भागा दौड़ी के रहस्यको स्पष्ट कर सके तथा शांति - रसका आनंद दिला सके । 
● आपकी तनहाई आपको न उधर जानें दे रही न इधर रुकने दे
 रही , आखिर आप इस तनहाई से डरते क्यों हैं ? क्यों , इसकी हवा लगते ही आपके शरीर में कम्पन पैदा होने लगता है ? आप इसकी एक झलक पाते ही क्यों सिकुड़नें लगते हैं ? 
क्या है , आपकी मजबूरी ? 
जब आप शांत मन में इन प्रश्नोंके उत्तरको खोजेंगे तब आप उस आयाम में पहुँच सकते हैं जहाँ आपका मन - बुद्धि तंत्र प्रश्न रहित परम स्थिरता में आपको परम शून्यताका रस पिला सकते हैं और उसी रस की खोज आपकी तनहाईका कारण भी है । 
● आज आप जिस जाल में उलझे हुए हैं , उसका निर्माण कर्ता भी तो आप ही हैं , क्या निर्माणके समय यह बात नहीं समझ में आई थी कि यह जाल एक दिन आपके गले की फास बन जायेगी ? अभीं भी आप इस जालको समझ सकते हैं और जिस घडी इसकी समझ की उर्जा आप में प्रवाहित होनें लगेगी , आप देखनें लगेगें कि यह जाल जो आपको उलझा रखी है वह मात्र एक आपका 
भ्रम था । 
 ● है न यह कमाल का बिषय कि काम ,कामना , क्रोध , लोभ , मोह ,भय , आलस्य और अहँकार रहित जीवनका होना हमारी कल्पना से बाहरका बिषय है ? हम यह मान बैठे हैं कि इन तत्त्वोंके बिना जीवनमें कोई रस नहीं और बात भी सही दिखती है । लेकिन क्या ऐसा संभव नहीं कि ऊपर बताये कर्म - तत्त्वों या भोग -तत्त्वों की गुलामी के बिना जीवन हो ? जीवन में कर्म तत्त्व तो रहेंगे ही लेकिन आपको उनका गुलाम नहीं बनाना है , वे आपके इशारे पर सक्रीय होते रहें , कोशिश करके देखो तो सही । 
 * प्रभु श्री कृष्ण गीतामें अपनें लगभग 575 श्लोकोंके माध्यम से अर्जुनको क्या ज्ञान देते हैं ? 
 * उनके ज्ञानका केंद्र यही तो है कि यह युद्ध एक अवसर है जिसमें तुम कर्म -तत्त्वों की गुलामी को समझ कर उनका द्रष्टा बन कर युद्ध करते -करते उस आयाम नें पहुँच सकते हो , जिस आयाम में मैं हूँ और इस प्रकार तुम मुझ जैसा बन सकते हो ।
 <> भोग -तत्त्व जीवनमें कांटे नहीं हैं , ये माध्यम हैं जो परम सत्य तक पहुँचा सकते हैं ।
 # अर्जुन और प्रभु कृष्ण में क्या अंतर है ?
 * प्रभु कर्म तत्त्वों के द्रष्टा हैं
 * और *
 * अर्जुन उनका गुलाम * 
~~ ॐ ~~

Thursday, September 11, 2014

जीवन एक परम प्रसाद है

* सच्चाई से भागना मनुष्यका स्वभाव बन गया है । 
 * सच्चाई से तुम भाग सकते हो लेकिन क्या तुम्हें पता है कि सच्चाई हमेशा तुमसे चिपकी रहती है , उसे अलग करना असंभव है ?
 * सच्चाई से भागना एक भ्रम है यह भ्रम आप के जीवनको धीरे - धीरे पीता चला जाता है और अंततः आप आम की गुठली बन कर तन्हाई में शरण लेते हो। 
* चाहे अपनें को जितना छिपा लो लेकिन लोगों को तुम्हारी असलियतका पता आज नहीं हो कल लग ही जाएगा ।
 * लोग तुम्हारी असलियत जानते तो हैं पर तुम्हारे सामने अपनें को अनभिज्ञ सा दिखाते हैं और जब तुम वहाँ से चले जाते हो तब उनके चहरे देखनें लायक होते हैं । 
<>सच्चाई से भागो नहीं उसे समझो । 
<> सच्चाई से आँख से आँख मिलानें की उर्जा पैदा करो ।
 <> सच्चाई के सामनें खडा होनें की ताकत पैदा करो।
 <> जिस दिन सच्चाई के साथ रहनें लगोगे , लोग धीरे - धीरे अपनीं नजरिया बदलनें लगेंगे और आप उनके प्यारे हो जाओगे । <> जीवन एक परम निर्मल सत्य है , उसकी निर्मलता आप के हांथों में है ।
 ~~ ॐ ~~

Sunday, September 7, 2014

यह क्या है , उनका दुःख मेरे लिए सुख है ?

* संसार में कौन सुखी है और कौन दुखी ?
आप इसे अपनें बुद्धि -योगका बिषय बना सकते हैं । * बुद्धके ध्यानका मूल बिषय था दुःख की सत्यता और उन्हें सात साल लग गए दुःख को समझनें में ।
* ऐसे कितनें हो सकते हैं जो अपनें दुःखका कारण स्वयंको मानते हों ? ऐसा हजारों - लाखों में कोई एकाध मुश्किल से मिलेगा । ज्यादातर लोग अपनें दुःखका कारण दूसरों को बनाते हैं ।
* भोग - तत्त्वों की रस्सियाँ जितनी मजबूत होती है ,वह ब्यक्ति उतना ही गहरा दुखी रहता है ।
* कामना ,मोह ,राग - द्वेष , क्रोध , लोभ और अहंकार - ये सात भोगके मूल तत्त्व हैं ।
* भोगकी रस्सियों से बधा ब्यक्ति पूरी तरह से न तो भोग से जुड़ पाता है और न योगकी ओर रुख कर पाता है ; बिचारा ! भोग और भगवानके मध्य एक पेंडुलम सा लटकता रहता है ।
* दुःख से भागो नहीं , दुःखको समझो ।
* दुःख की दवा जबतक बाहर खोजते रहोगे , दुखी रहोगे ।
* आपके दुःखका वैद्य कोई और नहीं , आप स्वयं हैं , इस बात को समझो ।
~~ ॐ ~~

Saturday, September 6, 2014

कैसे और किससे कहूँ ?

* लग गए पूरे 50 साल से भी कुछ अधिक , इस बात को समझनें में कि आखिर हमें यह मनुष्य-जीवन किस लिए मिला ? <> हर मनुष्यका शरीर तीर्थ है <> 
> और <
 <> हर मनुष्य तीर्थंक <>
 * इस बातको समझनें में हमारा तो सारा जीवन गुजर सा गया लेकिन हो सकता है आप इसे चंद घंटों में ध्यानके माध्यम से समझ सकें । 
* मैं जब अपनें जीवनको देखता हूँ तो स्वयंको एक वेहिकल (vehicle )जैसा पाता हूँ । 
* वह जो इस वेहिकल को ठीक से अपनाया , वह एक दिन पहुँच गया अपनें गन्तब्य पर और जो इसे ठीक से नहीं अपनाया ,वह क्या ख़ाक पहुँचेगा । 
* आज तक मुझे तीन लोग अपनाए और आज तीनों प्रभुके आशीर्वाद से अपनें -अपनें गन्तब्य पर पहुँच चुके हैं । 
* अकेलापन भी मजे का आयाम है जहाँ कुछ नहीं होता ,उनके लिए जो बाहर से देखते हैं और जो अकेलेपनसे मैत्री साध लिया
 है ,उसे उसके अकेलेपन में सब कुछ दिखता रहता है । 
● अकेलेपनकी मौनता एक ओंकारसे मिला सकती है। 
~~ ॐ ~~

Sunday, August 10, 2014

जीवन सार

1- जैसे - जैसे उम्र बढ़ती जाती है जिस्म - बुद्धि कमजोर होती जाती है और मन बढ़ता जाता है ।
2- जैसे - जैसे उम्र बढती जाती है मोह ,ममता ,कामना ,क्रोध ,लोभ और अहँकार सघन एवं तीब्र होते जाते हैं और मंदिर जाना , कथा सुनना आदि में रूचि बढ़ी सी दिखनें लगती है ।
3- अहंकार अपना रंग गिरगिट से भी अधिक तीब्र गति से बदलता है और मोह के अन्दर छिप कर रहनें वाला अहंकार घी जैसा सरकनें वाला होता है ।
4- मोह में अहंकार सिकुड़ कर अन्दर केंद्र पर जा बैठता है और वक़्त का इन्तजार करता है । जब अच्छे दिन आजाते हैं वह तुरंत फ़ैल जाता है और केंद्र से परिधि पर डेरा जमा लेता है ।
5- कामना में अहँकार परिधि पर होता है पर अपनें रंगको ऐसे छिपा कर रखता है कि पहचानना बहुत कठिन होता है ,लेकिन ध्यानी इसे पहचानता है ।
6- परिधि पर स्थित कामनाका अहँकार उस समय लाल रंग में बदल जाता है जब कामना टूटती सी दिखती है ।
7- बसुधैव कुटुम्बकम् का नारा सभीं भारतीय लगाते हैं और यह भी कहते नहीं थकते कि हम , हमारी भाषा , हमारा देश , हमारा इतिहास और हमारी सोच दुनिया में सर्बोपरी है ।
8- गाय की पूजा केवल भारत में होती है ,गाय में सभीं देवता बसते हैं , ऐसी धारणा हम भारतीयों की है लेकिन गौओंके अनाथ आश्रण भी केवल भारत में मिलते हैं । गौओं को बस्ती से बाहर निकालनें वाले कौन हैं ? ज़रा अपनें चारो तरफ नज़र डालकर देखना तो सही ।
9- पत्थर ,पेड़ ,पहाड़ और नदियों की पूजा हम भारतीय करते हैं , सभीं हिन्दू तीर्थ पहाडों पर या नदियों के तट पर हैं फिर हम पहाड़ों और नदियों की पवित्रता की चिंता क्यों नहीं करते ? क्यों इनको बेमौत मार रहे हैं ?
10- पिछले 15-20 सालों नें एक कला का प्यारा फैलाव हुआ है वह कला क्या है ? प्रश्नका उत्तर प्रश्न से देना , हैं न मजे की कला और हम सब सुनकर मस्त रहते हैं ।
~~ हरे राम ~~

Sunday, August 3, 2014

पुरानी आँख और नया आयाम

पुरानी आँख और नया आयाम ( भाग - 1 )
● लाख कोशिश करलें पर असफलता और हमारा रिश्ता टूट नहीं पाता ,क्या कारण हो सकता है ?
°° पुरानी आँख और नया आयाम ; यह समीकरण हमारी असफलताका एक मजबूत कारण है ।
^^ दूसरा कारण है कि हम अपनें को इतना कमजोर बना रखे हैं कि अपनें पर इतबार कम करते हैं और औरों पर अधिक ।आइये ! अब देखते हैं इन पर आधारित कुछ पहलुओं को :---
1- नया आयाम -पुरानी आँख समीकरण क्या है ?
* वर्तमान ( present ) का अर्थ है नया , जीवंत । वर्तमान में हमारा जीवन है और हमारा मन भूत काल की घटनाओं में समय गुजारता है इस परिस्थिति में हमारा वर्तमान बेहोशी में सरक रहा होता है और जहाँ बेहोशी है वहाँ असफलता तो होगी ही । आपको ताजुब होगा यह जानकर कि हमारी क्रियाएं मन से नियंत्रित हैं और मनका स्वाभाव है भूतकाल की घटनाओं में भ्रमण करते रहना अर्थात वर्तमान से दूर रहना फिर ऐसी परिस्थिति में जो हमसे हो रहा है , उसका परिणाम क्या हो सकता है ?
* मन बिषयों में ऐसे भ्रमण करता है जैसे भौरा फूलों में लेकिन भौरा बाहरी आकर्षण में न उलझ कर सार को चूसता है और मन बाहरी आकर्षण से आगे सार की ओर रुख भी नहीं कर पाता ।भौर सत्य की खोज में कहाँ कहाँ नहीं पहुँचता ; एक फूल पर भी मडराता है और गन्दगी के ढेर पर भी और दोनों जगहों से सार को पकड़ने में सफल होता है और मन ?
* नया आयाम ( New Frame of Action ) :मनुष्यका हर पल उसके लिए नया पल है जो चाहता है नयी सोच पर मनुष्य का मन इस नए कैनवास पर पुरानी तस्बीर बना देता। है और ज्यों ही तस्बीर तैयार होती है , मन में उसके प्रति ऊब आजाती है और वह पुनः चल पड़ता है , नए की तलास पर लेकिन अपनें स्वभाव के कारण हर बार धोखा खाता हैं।
* जिस समय नए आयाम को नयी आँखे देखती है , उस घडी सत्य कहीं दूर नहीं होता , वही आयाम सत्य का आयाम होता है और तब :---
● मन की दौड़ रुक जाती है ....
● मन उस आयाम में रम जाता है ....
● मन गुण उर्जा से बनें पिजड़े से मुक्त हो जाता है ... और :---
स्थिर मन सत्य को ढूढ़ता नहीं ,वह स्वयं प्रज्ञा में रूपांतरित होकर सत्य हो गया होता है ।
और :---
* ऐसे मन वाले को गीता ब्रह्म् वित् कहता है । ~~~ ॐ ~~~

Monday, July 21, 2014

बुद्धम् शरणम् गच्छामि

<> सिद्धार्थ गौतम बुद्ध <>
 ** बुद्धके सम्बन्ध में कुछ बातें **
 1- बुद्ध का ब्याह यशोधराके साथ 16 साल की उम्र में हुआ । 2- ब्याहके 13 साल बाद राहुलका जन्म हुआ ।
 3- घर त्यागके 5 साल बाद 35 साल की उम्रमें बोधगया में 49 दिन तक निर्जला ध्यान में डूब जानें पर बुद्धत्वकी प्राप्ति हुयी । 4- बुद्ध महल त्याग कर जब सत्य की खोज में राजागृह ( नालंदा के पास ) पहुँचे तब उनके साथ पांच और लोग उनसे जुड़ गए थे जिनमें वह वेदांती भी था जिसनें बुद्धके जन्मके समय स्पष्ट रूप से कहा था कि यह बुद्ध है और बुद्ध रहेगा , सम्राट नहीं बन सकता । 5- बुद्धत्व प्राप्ति के सात साल बाद बुद्ध कपिलवस्तु गए और बस्ती से बाहर एक बाग़ में अपनें कुछ भिक्षुओंके साथ रुके । यशोधरा बद्ध से मिली और पूछा , " क्या आप यह बताएँगे कि जिसकी प्राप्ति आपको घर - परिवार त्याग से मिली , क्या उसकी प्राप्ति यहाँ महल में रह कर नहीं की जा सकती थी ?"। रविन्द्रनाथ टैगोर जी इस सम्वन्ध में रचित कविता कहती है कि बुद्ध कुछ बोले नहीं , उनका मौन ही जबाब था । 
6- यशोधरा अपनें पुत्र राहुल को भेजा , पिता से मिलनें हेतु और राहुल जब बुद्ध की छाया में पहुँचे तब तन - मन दोनों बुद्ध को अर्पित हो गए और फिर लौट कर राज महल न आसके । 
<> वे जो जागने केलिए करवटें बदल रहे होते हैं , जब बुद्धके उर्जा क्षेत्र में पहुँचते हैं तब वे स्वतः बुद्ध में समा जाते हैं , उनके लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता और इस घटना को ही 
कहते हैं - 
" बुद्धम् शरणम् गच्छामि " । 
~~ ॐ ~~

Saturday, July 19, 2014

मैं और तूँ

● मैं एक माध्यम है तूँ को समझनें केलिए ।
मैं का अर्थ है अहंकार । भागवत में यदि आप मैत्रेय ,नारद , प्रभु कृष्ण और प्रभु कपिल जी के
तत्त्व - रहस्य को गंभीरता से देखें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ब्यक्त सूचनायें तीन प्रकारके अहंकारों से हैं । गुण आधारित सात्त्विक ,राजस और तामस ये हैं तीन अहंकार , जिनकी उत्पति महतत्त्वसे काल के प्रभाव में होती है ।
● मैं को कोई समझना नहीं चाहता और तूँ को समझनें में सारा जीवन गुजर जाता है पर सच्चाई यो यह है की जबतक मैं की गहरी परख नहीं हो जाती ,तूँ की परख करनी संभव नहीं ।
● अपनीं गलतियों को दूसरों से सुननें पर सारी उर्जा क्रोध में रूपांतरित हो उठती है और यदि अपनीं गलतियों को हम अकेले में प्रभुको साक्षी मानकर देखनें का अभ्यास करे तो यह होता है ,
अभ्यास -योग तो मैं के प्रति होश उठा कर परममें पहुँचाता है ,पर करनें की कोशिश करनें वाले
दुर्लभ हैं ।
** आज इतना ही **
~ हरि ॐ ~~

Friday, July 11, 2014

अपनें को पढ़ लो

** जीवन का हर पल किताब के पन्ने जैसा है जो स्वतः उलटता जा रहा है । जो इन पन्नों को होश में रहते हुये पढनें में सफल है , वह जीवनके परम रस से दूर नहीं और जो इन पन्नो को ठीक - ठीक पढनें में सफल नहीं ,वह जीवन का लुत्फ़ नहीं उठा पाता ।
** हिन्दू दर्शन में देह को जीव आत्मा का नौ द्वारों वाला महल कहा गया है और जब जीवात्मा इस महल को छोड़ कर चला जाता है तब लोग इस महल को जला देते हैं , देर नहीं करते , क्यों ? क्योंकि इस गिरे हुए महल में उनका अओअन महल दिखने लगता है । यदि देर तक किसी लाश को देखा जाए तो वैराग्य होना दूर नहीं । बुद्ध अपनें भिक्षुकों को प्रारम्भ में छः माह तक श्मसान में ध्यान कराते थे ।
** पशु जब तक अपनें बच्चों को पूर्ण स्वावलम्बी नहीं बना देते तबतक पुनः बच्चे पैदा नहीं करते लेकिन मनुष्य क्या कर रहा है ?
** मनुष्य के पास तरह - तरह के फंदे हैं , वह हर पल फंदों का निर्माण कर रहा है । मनुष्य निर्मित फंदे मनुष्य को बाधते चले जा रहे हैं और जब ये फंदे गले को बाधने लगते हैं तब वह ब्याकुल स्थिति में दम तोड़ देता है पर उस समय भी उसे स्वनिर्मित फंदों के राज का पता नहीं चल पाता ।
** क्या हो रहा है , इस स्वके संसार में ? अपना बनाते - बनाते जीवन सरक गया और अंत समय जब नज़दीक आया तो सभीं जिनको हम अपना बनानें में जीवन गुजार दिए , वे झट से पराये बन जाते है और मूह फेर लेते हैं ।
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Thursday, July 10, 2014

कहाँ से कहाँ तक

1- तुम हाँ - ना पर टिकते हो वह भी पल भर के लिए , फिर जब टिकने की आदत ही नहीं ,उस परम असीम पर कैसे टिकोगे ? वह तो हाँ और ना के मध्य है जिसे न हाँ कह सकते न ना और हाँ - ना को नकार भी नहीं सकते , काम है , कठिन , पर करना तो पड़ेगा ही , चाहे कितनें और जन्म लेनें पड़े ।
2- मनुष्य योनि में ऐसा कोई न होगा जिसे कभीं उसका सन्देश किसी न किसी रूप में न मिलता हो लेकिन मायासे सम्मोहित मनुष्य उस परम - सन्देश की अनदेखी करता रहता है ।
3- कल दादा जी गए , वह भी देखा , आज अम्मा जी गयी वह भी देख रहा हूँ और कल हमारी भी बारी है जिसे हम न देख पायेंगे , वे देखेंगे जिनको अगले समय में जाना है , यह आवागमनका चक्र ही तो माया का विलास है ।
4- बहुत से लोग आते हैं गीता सुननें पर उनका मकसद सुनना नहीं होता ,सुनाना होता है , समय गुजारना होता है । प्रवचन सुननें के बाद भीड़ जब जानें लगती है तब उन लोगों के पीछे लग कर उनकी बातों को सुनना ; कोई कहता है , संतजी बहुत बढियाँ बोलते हैं , कोई कहता है ,क्या ख़ाक बोलये हैं ,इससे अच्छा तो वे बोलते थे जो इनसे पहले आये थे ,वे तो मेरे घर भी गए थे ।हम स्वयं को जगत गुरु समझते हैं और शंकराचार्य जैसे संतों की लम्बाई ,चौड़ाई और गहराई मापते रहते हैं । अब जरा सोचना ,ऐसी जब हमारी मानसिकता है तब हम क्या ख़ाक बदलेंगे और बिना बदले कुछ होनें वाला नहीं चाहे जो कर लो । 5- परमात्मा है या नहीं हैं - यह भ्रम लोगों को न मनुष्य की तरह रख पा रहा न जानवर की तरह और मनुष्य सम्पूर्ण जीवों का सम्राट होते हुए भी एक लाचार सा जीवन गुजार रहा है । मनुष्य बिचारा ,न भोग में रुक पाता है न योग में ; जब भोगमें उतरता है तब उसे योग खीचता है और जब योग में उतरता है तब भोग उसे सम्मोहित करता है ,मनुष्य भोग - योग के मध्य पेंडुलम सा लटक रहा है ।
6- सृष्टि से पहले और प्रलयके बाद , Big bang से पहले और ,Big crunch के बाद इन दोनों का द्रष्टा रूप में कौन होता है ?
7- Lao Tzu और शांडिल्य कहते हैं , " ब्यक्त करनें पर सत्य असत्य बन जाता है " और जे कृष्ण मूर्ति कहते हैं ," Truth is pathless journey" और हम परमात्मा की लम्बाई , चौड़ाई और ऊँचाई मापना चाहते हैं और दो कौड़ी के चार सड़े बतासे को उन्हें दिखा कर प्रसन्न करना चाहते हैं जिससे हमें भोग के वे साधन उपलब्ध हो जाएँ जो हमारे पास अभीं तक नहीं हैं ।परमात्मा क्या हमारे अन्तः करण को नहीं देखता होगा ? मनुष्य औरों को धोखा देते -देते इतना मज जाता है की बाद में अपनें को भी धोखा फेने लगता है और जब अपनें को धोखा दे दे पर मार चुका होता है तब पहुँचता है मंदिर ,वहाँ परमात्मा को लालच दिखा दिखा कर धोखा देता रहता है और एक दिन ----
8- न इधर का हो पाता है न उधर का और मनुष्य योनि से पहुँच जाता है पशु योनि में ।
9- आये तो थे प्रभु में बसेरा बनानें पर संसार में ब्याप्त माया निर्मित भोग का ऐसा सम्मोहन छाया कि भूल गए अपनें मूलको और पहुँच गए कहाँ ?
10- मनुष्य मात्र एक जीव है जिसके अन्दर किसी न किसी रूप में परमात्मा की सोच का बीज होता है। बीसवीं शताब्दी के महान मनोवैज्ञानिक सी . जी . जुंग कहते हैं , 40 साल की उम्र के ऊपर वाले लोगों में ऐसे को खोजना कठिन काम है जिसके दिमाक में प्रभु की सोच किसी न किसी रूप में न हो ।
~~ ॐ ~~

Monday, July 7, 2014

सुना और खूब सुना

● सुना और खूब सुना ●
1- जब परिवार में लोग इकठ्ठा होते हैं और जब कार्यक्रम समाप्त होने पर लोग अपनें -अपनें स्थानको वापिस चले जाते हैं तब जो वहाँ रहते हैं उनको सूना लगता है ।
2- जब कोई परिवार का सदस्य घर से दूर जाता है तब उसके जानें के बाद घर में सूना - सूना लगता
है ।
3- जब कोइ परिवार का सदस्य नाराज होकर घर छोड़ कर चला जाता है तब बहुत सूना लगता है ।
4- अकेलापनमें दो दरवाजे हैं ; एक पागलपन में खुलता है और दुसरा परममें ।
5- जीवन को क्या समझोगे वह तो बहती दरिया जैसा है बेहतर होगा तुम अपनी उर्जा स्वयं को समझनें में लगाओ ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, July 5, 2014

भारत की आबादी भाग - 1

● भारत की आबादी भाग - 1● 
<> कैसा कौन सा वैज्ञानिक कारण हो सकता है कि भारत आबादी की दृष्टि से सदैव सर्पोपरि रहा है। आइये चलते हैं श्रीमद्भागवत पुराण में और देखते हैं कि उस समय भारतमें आबादी की क्या स्थिति रही होगी ?
 1-भागवत :10.50> जरासंध नालंदा बिहार से मथुरा पर श्री कृष्ण से युद्ध करनें हेतु 18बार आक्रमण किया । हर बार उसके पास 23 अक्षौहिणी सेना होती थी और सारी सेना मारी जाती
 थी । 18 बार में जरासंधके कुल 90,541,800 सैनिक मारे गए । अब आप इस गणित के बारे में सोचें । 
2-भागवत :10.50 > मलेक्ष राज कालयबन 03 करोड़ मलेक्षों की सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया था और सारी सेना मारी गयी थी ।यह बात इस समय की है जब 18वीं बार जरासंध अपनें 5,030,100 सैनिकों के साथ चढ़ाई किया था अर्थात एक समय में मथुरा में माते गए सैनकों की संख्या हुयी 3 करोड़ 50 लाख 30 हजार एक सौ। इतनी मौतें एक साथ एक शहर में !
 3-भागवत :9.30> शशि बिंदु की रानियों की संख्या थी 10,000। हर रानीसे पुत्र थे 100,000 अर्थात कुल पुत्रों की संख्या हुयी one billion ( एक अरब ) ।एक राजा के पुत्र जन एक अरब हैं तो पूरे भारत की आबादी जी क्या स्थिति रही होगी ? 
4- भागवत : 9.8> सम्राट सगर के 60,000 पुत्र गंगा सागर पर कपिल मुनि के तेज से भष्म हुये थे , एक ही समय ।
 5-भागवत :10.90 > सम्राट उग्रसेन के पास एक नील सेना थी और फ्वारका के आस पास की टापुओं पर रहती थी । द्वारका जा क्षेत्रफल था 45 वर्ग मील । (10,000,000,000,000) <> देखा आपनें ! अगले अंक में कुछ और ऐसे उदाहरण आप देख सकते हैं ।
 ~~हरे मुरारी ~~

Tuesday, July 1, 2014

● क्या खोया ? - भाग - 1●

* बड़े प्यारे लोग थे पर उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।एक दिन लगभग 35 साल के बाद मुझे उनसे मिलना हुआ ,मैं हैरान हो गया ,उनको देख
कर ।
* थे तो गरीब ही लेकिन उनके बड़े भाई उनके लिए पिता तुल्य थे , उनको पढानें में कोई कसर न छोड़ी थी । उस जबानें में इंजीनियरिंग के स्नातक हुए जबकि दूर -दूर तक ऐसे लोग दुर्लभ हुआ करते थे।
* मैं उनको करीब से जानता हूँ लेकिन इधर बहुत दिनों से उनकी स्मृति कुछ धुधली सी जरुर हो गयी थी ।मैं उनको जानता हूँ तबसे जब वे केंद्र सरकार में कार्य रत थे ,जब वे विश्व विद्यालय में सहायक प्राध्यापक थे , जब वे किसी लिमिटेड कंपनी में सिनिअर ऑफिसर थे और जब वे विदेश यात्रा की थी लेकिन यह सब देखनें के बाद आज जब मैं उनसे मिला तो दंग रह गया ,उनको देख कर ।
* बाहर -बाहर से देखनें में उनका रंग तो बहुत लुभावनासा दिखता है पर वे अन्दर से अब एक कब्रिस्तान बन चुके हैं ,मुझे तो उनके साथ कुछ दिन रहनें से ऐसा ही दिखा ।
* दो बेटे हैं ,प्यारे हैं ,एक प्रथम पांच iit मेसे एक का विद्यार्थी रह चूका है और दूसरा देश के कुछ प्रमुख nit में से एक के शिक्षा लिया हुआ है । दोनों बेटो का कद अब इतना उचा हो चूका है की उनकी लम्बाई देखते बनती है । दोनों बेटे उनसे प्यार करते हैं लेकिन कुछ तो है जो उनको कब्रिस्तान बना रहा है। * आखिरी दिन आ गया , मैं उनसे बिदा होनें जा रहा था ,वे अन्दर घर में गए हुए थे , बोल गए थे कि जरा रुकना ,चले न जाना । मैं घर के बाहर उनके आनें का इन्तजार कर रहा था । वे आये , गले मिले ,और उनका गला भरा था ,अन्दर आंसू की धरा बह रही थी लेकिन बाहर बाहर से सामान्य दिख रहे थे ।
*जब मैं चलनें लगा ,मुझे कपडे में लिपटी कोई चीज दी और बोले , तुम तो उनसे बहुत प्यार करते थे पर हिम्मत न जुटा पाए ,उनके बारे में पूछनें को , इतना कह कर हस पड़े और बोले , अच्छे जा फिर मिलेंगे। * जब मैं कपडे को खोला तो दंग रह गया ,उस वस्तु को देख कर जो उस कपडे में लपेट के वे मुझे दिए
थे । वह फोटो थी ,उनकी पत्नी की ,उस समय की जब उनका बड़ा बेटा रहा होगा 2-3 साल का जो आज 35 साल का है ।
* वे मेरे कंधो पर अपना हाँथ रखे और धीरे से भरे हुए गले से बोले , अगर खुदा ने इजाजत दी और हम फिर कभीं मिले तो मैं इनके बारे में भी बताऊंगा , जो तुम पूछ न पाये । वे अब भी हैं ,न दूर हैं न नज़दीक लेकिन हैं , इतना कह कर आंसू पोछते हुए घर के अन्दर चले गए और दरवाजा बंद कर ली ।
* आप सोच सकते हैं कि मेरे पर क्या बीती होगी और उन पर क्या बीत रही थी ,यह तो आप समझ ही सकते है लेकिन इतना जरुर मैं कह सकता हूँ कि उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।। क्या खोया ? इस श्रृखला के अगले अंक में कुछ और दृष्यों को देखेंगे ।
* यह एक सत्य कहानी है *
~~ हरे हरे ~~

Monday, June 30, 2014

कैसा रहा यह सफ़र

# कभीं - कभीं ऐसा लगनें लगता है कि अब हम जिन्दा क्यों हैं ? और जो अभीं - अभीं इस संसार से जा रहे होते हैं , उनके न होनें पर दुख भी हो रहा होता है , आखिर ऐसा क्यों ? यह इसलिए हो रहा होता है कि हम जहाँ हैं इसके विपरीत हमारी दृष्टि जम जाती है , इस उम्मीदसे कि हो न हो वह ठीक हो । द्वैत्यकी उर्जा में लिपटा यह मनुष्य अपनें को एक पेंडुलम जैसा बना रखा है पर पेंडुलम से कुछ सीखता नहीं क्योंकि पेंडुलमके गतिका प्रारंभ और अंत जहाँ है वहाँ जो है वह समभाव है और समभाव में स्थित ब्यक्ति स्थिर प्रज्ञ होता है जिसकी आँखें प्रभुके प्यार से भरी होती
हैं ।
# जवानी में कदम रखते ही एक उबाल उठनें लगता है , कोई ऐसा ब्यक्ति जो अभीं - अभीं जवानी में कदम रखा हो और वह अपनें को दुनिया का सम्राट न समझता हो , ऐसा संभव नहीं लेकिन जवानी में देखे गए सारे सपनें एक - एक करके टूटते जाते हैं और वह ब्यक्ति जो आज लगभग 60 साल का हो चूका होता है , अपनें इस जीवनका एक अज्ञान द्रष्टा बना रह जाता है ।
# जो मिला है एक दिन उसे खोना होगा और मनुष्य पाना तो सारा संसार चाहता है पर खोना एक कौड़ी भी नहीं चाहता जो सम्भव नहीं । # एक बह रही दरिया में उसकी धारा के विपरीत जो बहना चाहेगा उसे दर्द तो होगा ही । हम प्रकृतिके विपरीत चलना चाहते हैं और यह हमारी चाह हमसे सुख छीन लेती है और हम कहीं एक कोने में बैठ कर किस्मत का इन्तजार कर रहे होते हैं ।क्या होगा इस रोने - धोने से ?
-- दुनिया का मेला --

Monday, June 16, 2014

यहाँ क्या हो रहा है ?

1- जहाँ हम हैं , वहाँ हर पल समझनें का पल है लेकिन हम और को क्या समझेंगे जब स्वयं को समझते की भी कोशिश नहीं करते ।
2- संसार एक ऐसा रंगमंच है जहाँ समझानें वाले अधिक और समझनें वाले न के बराबर हैं ।
3- संसार में लोग कामयाब होनें केलिए अपनेंको नहीं अपने रंगको बदलते रहते हैं पर सफलता पाना फिरभी कठिन ही दिखता है ।
4- इस संसार में झूठे ज्यादा कामयाब से दिखते हैं लेकिन उनके कामयाबी का रंग बहुत जल्दी फीका पढनें लगता है ।
5- इस संसारसे जितनें रोज जा रहे हैं ज़रा उनके मुह पर से कफ़न उठा कर देखना कि उनमें से कितनें मुस्कुराते हुए जा रहे हैं , शायद आपको कोई भी ऐसा न दिखे , आखिर ऐसा क्यों ? लोग प्रभुके पास पहुँचने केलिए लाख कोशिश करते हैं लेकिन जब जाना होता है तब सभींका मुह गिर जाता है ,क्यों ?
~~~ हरे कृष्ण ~~~

Friday, June 6, 2014

किधर - किधर देखूँ

# आइये आप और मैं दोनों एक साथ समझते हैं उसे जो घट रहा है पर हम सब अभीं तक उसकी ओर अपनी -अपनी आँखे बंद किये बैठे हैं ।अब जरा समझना , नीचे दी जा रही बातों को :---
* परिवार रचाया क्यों , क्या शांतिके लिए ?
* बस्ती बनाई क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* सम्बन्ध स्थापित किये क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* ब्यापार खडा किया , क्यों , क्या चैन से जीवन गुजारनें केलिए ?
* युद्ध लड़े ,क्यों , क्या शांतिसे रहनें केलिए ?
* मंदिर बनाए , क्यों , क्या शांति केलिए ?
* मंदिर में मूर्ति स्थापित किये ,क्यों ? क्या मन शांति केलिए ?
* खूबसूरत महल खडा किये ,क्यों , क्या दो घडी शांति से रहने केलिए ?
* जीवन गुजार दी ,भाग -दौड़ में ,आखिर क्यों , क्या शांति की खोज केलिए ?
** लेकिन अब ज़रा रुकना और सोचना :--
1- यहाँ इस संसार में हमारा सारा प्रयाश जो शांति और सुरक्षा से जीवन गुजारनें केलिए हुए ,क्या वे विफल नहीं हुए ?
2- यहाँ शांति सभीं चाहते हैं ,पर हैं , कितनें शांति
में ?
3- यहाँ सभीं प्यार में रहना चाहते हैं ,लेकिन हैं कितनें प्यार में ?
4- यहाँ सभीं प्रभुको दिल में बसाना चाहते हैं लेकिन कितनों के पास ऐसा दिल भी है ?
## कहना और सुनना तो बहुत हो चुका पर मिला कुछ नहीं ,क्योंकि कहनें और सुननें से होना
(बदलना ) था पर हम सबकुछ करनें को तैयार हैं पर बदलना नहीं चाहते , फिर क्या होना था ? न होना
था , न होगा कुछ ।
** जो भी हमनें किये , उनके करने से हमें बदल जाना था , पर :---
# हम स्वयंको बदलना नहीं चाहते और जैसे हैं उसी स्थिति में प्रभुको अपनें सामने लाना चाहते हैं , आखिर क्यों ?
# क्योंकि हम उसे भी अपनें अर्थ केलिए प्रयोग करना चाहते हैं ।
# हम जितनें गहरे अज्ञानी हैं , प्रभु को भी अपनें जैसा ही अज्ञानी क्यों समझते हैं ?
# हम संसार में लोगों को धोखा देते - देते इतने मज गए हैं की सब स्वयं को भी बड़ी बारीकी से धोखा दे बैठते हैं और प्रभु को भी खूब धोखा दे रहे हैं , है न नाजे की बात ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Wednesday, May 28, 2014

करलो इकठ्ठा पर ---

करलो इकठ्ठा पर ...
** यह भी हो ,वह भी हो ,ऐसा भी हो ,वैसा भी हो , ये ठीक रहेगा ,वह ठीक रहेगा - ऐसे बंधनों से जुड़े मनकी गति हर पल और तेज होती जाती है लेकिन हृदय सिकुड़ता चला जारहा है ।
** ऐसे लोग जिनके आँखों की पुतलियाँ कहीं रुकती नहीं , जो ऊपर बताये बंधनों से गहरी तन्मयता स्थापित कर रखी है , उनमें अधिकाँश लोग ब्लड प्रेसर , शुगर और हृदय रोग से ग्रसित हैं ।
** जैसे - जैसे इकठ्ठा करनें की उर्जा बढ़ रही है ,वैसे - वैसे लोग हृदय विहीन होते जा रहे हैं । भोगी अपनें हाँथ ऊपर उठा कर आकाश को पकड़नें की कोशिश में सुध - बुद्धि सब खो रहा है तो योगी बंद अपनीं आँखों से उसी आकाशकी शून्यता में बिना सोचे जो पाता है ,वह उसे तृप्त कर देता है और उसका शेष जीवन नाचते -नाचते गुजर जाता है ।
** योगी सब कुछ खो कर परनानंद को पा जाता है और भोगी सबकुछ पाते हुए भी भिक्षुक बना हुआ है । ** मनुष्य राज पथोंका निर्माण करवाता है लेकिन उनका जीवन राज पथ पर नहीं चलता , उसका हर कदम एक नए ऐसे मार्ग का निर्माण करता है जिस पर वह जैसे -जैसे आगे कदम बढाता जाता है वैसे - वैसे उसके पैरोंके निशान स्वतःमिटते चले जाते हैं । ** जीवन यात्रा एक पगडण्डी यात्रा है; ऐसी पगडण्डी यात्रा जिसको शब्दों में बाधना तो संभव नहीं लेकिन इस यात्राके हर पल रोमांचित जरुर करते रहते हैं । **यहाँ यह न देखो कि वह कैसे चल रहा है , यह देखो कि जैसे भी तुम चल रहे हो ,क्या वह तुमको आनंदित कर रहा है ।
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~