Monday, July 21, 2014

बुद्धम् शरणम् गच्छामि

<> सिद्धार्थ गौतम बुद्ध <>
 ** बुद्धके सम्बन्ध में कुछ बातें **
 1- बुद्ध का ब्याह यशोधराके साथ 16 साल की उम्र में हुआ । 2- ब्याहके 13 साल बाद राहुलका जन्म हुआ ।
 3- घर त्यागके 5 साल बाद 35 साल की उम्रमें बोधगया में 49 दिन तक निर्जला ध्यान में डूब जानें पर बुद्धत्वकी प्राप्ति हुयी । 4- बुद्ध महल त्याग कर जब सत्य की खोज में राजागृह ( नालंदा के पास ) पहुँचे तब उनके साथ पांच और लोग उनसे जुड़ गए थे जिनमें वह वेदांती भी था जिसनें बुद्धके जन्मके समय स्पष्ट रूप से कहा था कि यह बुद्ध है और बुद्ध रहेगा , सम्राट नहीं बन सकता । 5- बुद्धत्व प्राप्ति के सात साल बाद बुद्ध कपिलवस्तु गए और बस्ती से बाहर एक बाग़ में अपनें कुछ भिक्षुओंके साथ रुके । यशोधरा बद्ध से मिली और पूछा , " क्या आप यह बताएँगे कि जिसकी प्राप्ति आपको घर - परिवार त्याग से मिली , क्या उसकी प्राप्ति यहाँ महल में रह कर नहीं की जा सकती थी ?"। रविन्द्रनाथ टैगोर जी इस सम्वन्ध में रचित कविता कहती है कि बुद्ध कुछ बोले नहीं , उनका मौन ही जबाब था । 
6- यशोधरा अपनें पुत्र राहुल को भेजा , पिता से मिलनें हेतु और राहुल जब बुद्ध की छाया में पहुँचे तब तन - मन दोनों बुद्ध को अर्पित हो गए और फिर लौट कर राज महल न आसके । 
<> वे जो जागने केलिए करवटें बदल रहे होते हैं , जब बुद्धके उर्जा क्षेत्र में पहुँचते हैं तब वे स्वतः बुद्ध में समा जाते हैं , उनके लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं रह जाता और इस घटना को ही 
कहते हैं - 
" बुद्धम् शरणम् गच्छामि " । 
~~ ॐ ~~

Saturday, July 19, 2014

मैं और तूँ

● मैं एक माध्यम है तूँ को समझनें केलिए ।
मैं का अर्थ है अहंकार । भागवत में यदि आप मैत्रेय ,नारद , प्रभु कृष्ण और प्रभु कपिल जी के
तत्त्व - रहस्य को गंभीरता से देखें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ब्यक्त सूचनायें तीन प्रकारके अहंकारों से हैं । गुण आधारित सात्त्विक ,राजस और तामस ये हैं तीन अहंकार , जिनकी उत्पति महतत्त्वसे काल के प्रभाव में होती है ।
● मैं को कोई समझना नहीं चाहता और तूँ को समझनें में सारा जीवन गुजर जाता है पर सच्चाई यो यह है की जबतक मैं की गहरी परख नहीं हो जाती ,तूँ की परख करनी संभव नहीं ।
● अपनीं गलतियों को दूसरों से सुननें पर सारी उर्जा क्रोध में रूपांतरित हो उठती है और यदि अपनीं गलतियों को हम अकेले में प्रभुको साक्षी मानकर देखनें का अभ्यास करे तो यह होता है ,
अभ्यास -योग तो मैं के प्रति होश उठा कर परममें पहुँचाता है ,पर करनें की कोशिश करनें वाले
दुर्लभ हैं ।
** आज इतना ही **
~ हरि ॐ ~~

Friday, July 11, 2014

अपनें को पढ़ लो

** जीवन का हर पल किताब के पन्ने जैसा है जो स्वतः उलटता जा रहा है । जो इन पन्नों को होश में रहते हुये पढनें में सफल है , वह जीवनके परम रस से दूर नहीं और जो इन पन्नो को ठीक - ठीक पढनें में सफल नहीं ,वह जीवन का लुत्फ़ नहीं उठा पाता ।
** हिन्दू दर्शन में देह को जीव आत्मा का नौ द्वारों वाला महल कहा गया है और जब जीवात्मा इस महल को छोड़ कर चला जाता है तब लोग इस महल को जला देते हैं , देर नहीं करते , क्यों ? क्योंकि इस गिरे हुए महल में उनका अओअन महल दिखने लगता है । यदि देर तक किसी लाश को देखा जाए तो वैराग्य होना दूर नहीं । बुद्ध अपनें भिक्षुकों को प्रारम्भ में छः माह तक श्मसान में ध्यान कराते थे ।
** पशु जब तक अपनें बच्चों को पूर्ण स्वावलम्बी नहीं बना देते तबतक पुनः बच्चे पैदा नहीं करते लेकिन मनुष्य क्या कर रहा है ?
** मनुष्य के पास तरह - तरह के फंदे हैं , वह हर पल फंदों का निर्माण कर रहा है । मनुष्य निर्मित फंदे मनुष्य को बाधते चले जा रहे हैं और जब ये फंदे गले को बाधने लगते हैं तब वह ब्याकुल स्थिति में दम तोड़ देता है पर उस समय भी उसे स्वनिर्मित फंदों के राज का पता नहीं चल पाता ।
** क्या हो रहा है , इस स्वके संसार में ? अपना बनाते - बनाते जीवन सरक गया और अंत समय जब नज़दीक आया तो सभीं जिनको हम अपना बनानें में जीवन गुजार दिए , वे झट से पराये बन जाते है और मूह फेर लेते हैं ।
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Thursday, July 10, 2014

कहाँ से कहाँ तक

1- तुम हाँ - ना पर टिकते हो वह भी पल भर के लिए , फिर जब टिकने की आदत ही नहीं ,उस परम असीम पर कैसे टिकोगे ? वह तो हाँ और ना के मध्य है जिसे न हाँ कह सकते न ना और हाँ - ना को नकार भी नहीं सकते , काम है , कठिन , पर करना तो पड़ेगा ही , चाहे कितनें और जन्म लेनें पड़े ।
2- मनुष्य योनि में ऐसा कोई न होगा जिसे कभीं उसका सन्देश किसी न किसी रूप में न मिलता हो लेकिन मायासे सम्मोहित मनुष्य उस परम - सन्देश की अनदेखी करता रहता है ।
3- कल दादा जी गए , वह भी देखा , आज अम्मा जी गयी वह भी देख रहा हूँ और कल हमारी भी बारी है जिसे हम न देख पायेंगे , वे देखेंगे जिनको अगले समय में जाना है , यह आवागमनका चक्र ही तो माया का विलास है ।
4- बहुत से लोग आते हैं गीता सुननें पर उनका मकसद सुनना नहीं होता ,सुनाना होता है , समय गुजारना होता है । प्रवचन सुननें के बाद भीड़ जब जानें लगती है तब उन लोगों के पीछे लग कर उनकी बातों को सुनना ; कोई कहता है , संतजी बहुत बढियाँ बोलते हैं , कोई कहता है ,क्या ख़ाक बोलये हैं ,इससे अच्छा तो वे बोलते थे जो इनसे पहले आये थे ,वे तो मेरे घर भी गए थे ।हम स्वयं को जगत गुरु समझते हैं और शंकराचार्य जैसे संतों की लम्बाई ,चौड़ाई और गहराई मापते रहते हैं । अब जरा सोचना ,ऐसी जब हमारी मानसिकता है तब हम क्या ख़ाक बदलेंगे और बिना बदले कुछ होनें वाला नहीं चाहे जो कर लो । 5- परमात्मा है या नहीं हैं - यह भ्रम लोगों को न मनुष्य की तरह रख पा रहा न जानवर की तरह और मनुष्य सम्पूर्ण जीवों का सम्राट होते हुए भी एक लाचार सा जीवन गुजार रहा है । मनुष्य बिचारा ,न भोग में रुक पाता है न योग में ; जब भोगमें उतरता है तब उसे योग खीचता है और जब योग में उतरता है तब भोग उसे सम्मोहित करता है ,मनुष्य भोग - योग के मध्य पेंडुलम सा लटक रहा है ।
6- सृष्टि से पहले और प्रलयके बाद , Big bang से पहले और ,Big crunch के बाद इन दोनों का द्रष्टा रूप में कौन होता है ?
7- Lao Tzu और शांडिल्य कहते हैं , " ब्यक्त करनें पर सत्य असत्य बन जाता है " और जे कृष्ण मूर्ति कहते हैं ," Truth is pathless journey" और हम परमात्मा की लम्बाई , चौड़ाई और ऊँचाई मापना चाहते हैं और दो कौड़ी के चार सड़े बतासे को उन्हें दिखा कर प्रसन्न करना चाहते हैं जिससे हमें भोग के वे साधन उपलब्ध हो जाएँ जो हमारे पास अभीं तक नहीं हैं ।परमात्मा क्या हमारे अन्तः करण को नहीं देखता होगा ? मनुष्य औरों को धोखा देते -देते इतना मज जाता है की बाद में अपनें को भी धोखा फेने लगता है और जब अपनें को धोखा दे दे पर मार चुका होता है तब पहुँचता है मंदिर ,वहाँ परमात्मा को लालच दिखा दिखा कर धोखा देता रहता है और एक दिन ----
8- न इधर का हो पाता है न उधर का और मनुष्य योनि से पहुँच जाता है पशु योनि में ।
9- आये तो थे प्रभु में बसेरा बनानें पर संसार में ब्याप्त माया निर्मित भोग का ऐसा सम्मोहन छाया कि भूल गए अपनें मूलको और पहुँच गए कहाँ ?
10- मनुष्य मात्र एक जीव है जिसके अन्दर किसी न किसी रूप में परमात्मा की सोच का बीज होता है। बीसवीं शताब्दी के महान मनोवैज्ञानिक सी . जी . जुंग कहते हैं , 40 साल की उम्र के ऊपर वाले लोगों में ऐसे को खोजना कठिन काम है जिसके दिमाक में प्रभु की सोच किसी न किसी रूप में न हो ।
~~ ॐ ~~

Monday, July 7, 2014

सुना और खूब सुना

● सुना और खूब सुना ●
1- जब परिवार में लोग इकठ्ठा होते हैं और जब कार्यक्रम समाप्त होने पर लोग अपनें -अपनें स्थानको वापिस चले जाते हैं तब जो वहाँ रहते हैं उनको सूना लगता है ।
2- जब कोई परिवार का सदस्य घर से दूर जाता है तब उसके जानें के बाद घर में सूना - सूना लगता
है ।
3- जब कोइ परिवार का सदस्य नाराज होकर घर छोड़ कर चला जाता है तब बहुत सूना लगता है ।
4- अकेलापनमें दो दरवाजे हैं ; एक पागलपन में खुलता है और दुसरा परममें ।
5- जीवन को क्या समझोगे वह तो बहती दरिया जैसा है बेहतर होगा तुम अपनी उर्जा स्वयं को समझनें में लगाओ ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, July 5, 2014

भारत की आबादी भाग - 1

● भारत की आबादी भाग - 1● 
<> कैसा कौन सा वैज्ञानिक कारण हो सकता है कि भारत आबादी की दृष्टि से सदैव सर्पोपरि रहा है। आइये चलते हैं श्रीमद्भागवत पुराण में और देखते हैं कि उस समय भारतमें आबादी की क्या स्थिति रही होगी ?
 1-भागवत :10.50> जरासंध नालंदा बिहार से मथुरा पर श्री कृष्ण से युद्ध करनें हेतु 18बार आक्रमण किया । हर बार उसके पास 23 अक्षौहिणी सेना होती थी और सारी सेना मारी जाती
 थी । 18 बार में जरासंधके कुल 90,541,800 सैनिक मारे गए । अब आप इस गणित के बारे में सोचें । 
2-भागवत :10.50 > मलेक्ष राज कालयबन 03 करोड़ मलेक्षों की सेना के साथ मथुरा पर आक्रमण किया था और सारी सेना मारी गयी थी ।यह बात इस समय की है जब 18वीं बार जरासंध अपनें 5,030,100 सैनिकों के साथ चढ़ाई किया था अर्थात एक समय में मथुरा में माते गए सैनकों की संख्या हुयी 3 करोड़ 50 लाख 30 हजार एक सौ। इतनी मौतें एक साथ एक शहर में !
 3-भागवत :9.30> शशि बिंदु की रानियों की संख्या थी 10,000। हर रानीसे पुत्र थे 100,000 अर्थात कुल पुत्रों की संख्या हुयी one billion ( एक अरब ) ।एक राजा के पुत्र जन एक अरब हैं तो पूरे भारत की आबादी जी क्या स्थिति रही होगी ? 
4- भागवत : 9.8> सम्राट सगर के 60,000 पुत्र गंगा सागर पर कपिल मुनि के तेज से भष्म हुये थे , एक ही समय ।
 5-भागवत :10.90 > सम्राट उग्रसेन के पास एक नील सेना थी और फ्वारका के आस पास की टापुओं पर रहती थी । द्वारका जा क्षेत्रफल था 45 वर्ग मील । (10,000,000,000,000) <> देखा आपनें ! अगले अंक में कुछ और ऐसे उदाहरण आप देख सकते हैं ।
 ~~हरे मुरारी ~~

Tuesday, July 1, 2014

● क्या खोया ? - भाग - 1●

* बड़े प्यारे लोग थे पर उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।एक दिन लगभग 35 साल के बाद मुझे उनसे मिलना हुआ ,मैं हैरान हो गया ,उनको देख
कर ।
* थे तो गरीब ही लेकिन उनके बड़े भाई उनके लिए पिता तुल्य थे , उनको पढानें में कोई कसर न छोड़ी थी । उस जबानें में इंजीनियरिंग के स्नातक हुए जबकि दूर -दूर तक ऐसे लोग दुर्लभ हुआ करते थे।
* मैं उनको करीब से जानता हूँ लेकिन इधर बहुत दिनों से उनकी स्मृति कुछ धुधली सी जरुर हो गयी थी ।मैं उनको जानता हूँ तबसे जब वे केंद्र सरकार में कार्य रत थे ,जब वे विश्व विद्यालय में सहायक प्राध्यापक थे , जब वे किसी लिमिटेड कंपनी में सिनिअर ऑफिसर थे और जब वे विदेश यात्रा की थी लेकिन यह सब देखनें के बाद आज जब मैं उनसे मिला तो दंग रह गया ,उनको देख कर ।
* बाहर -बाहर से देखनें में उनका रंग तो बहुत लुभावनासा दिखता है पर वे अन्दर से अब एक कब्रिस्तान बन चुके हैं ,मुझे तो उनके साथ कुछ दिन रहनें से ऐसा ही दिखा ।
* दो बेटे हैं ,प्यारे हैं ,एक प्रथम पांच iit मेसे एक का विद्यार्थी रह चूका है और दूसरा देश के कुछ प्रमुख nit में से एक के शिक्षा लिया हुआ है । दोनों बेटो का कद अब इतना उचा हो चूका है की उनकी लम्बाई देखते बनती है । दोनों बेटे उनसे प्यार करते हैं लेकिन कुछ तो है जो उनको कब्रिस्तान बना रहा है। * आखिरी दिन आ गया , मैं उनसे बिदा होनें जा रहा था ,वे अन्दर घर में गए हुए थे , बोल गए थे कि जरा रुकना ,चले न जाना । मैं घर के बाहर उनके आनें का इन्तजार कर रहा था । वे आये , गले मिले ,और उनका गला भरा था ,अन्दर आंसू की धरा बह रही थी लेकिन बाहर बाहर से सामान्य दिख रहे थे ।
*जब मैं चलनें लगा ,मुझे कपडे में लिपटी कोई चीज दी और बोले , तुम तो उनसे बहुत प्यार करते थे पर हिम्मत न जुटा पाए ,उनके बारे में पूछनें को , इतना कह कर हस पड़े और बोले , अच्छे जा फिर मिलेंगे। * जब मैं कपडे को खोला तो दंग रह गया ,उस वस्तु को देख कर जो उस कपडे में लपेट के वे मुझे दिए
थे । वह फोटो थी ,उनकी पत्नी की ,उस समय की जब उनका बड़ा बेटा रहा होगा 2-3 साल का जो आज 35 साल का है ।
* वे मेरे कंधो पर अपना हाँथ रखे और धीरे से भरे हुए गले से बोले , अगर खुदा ने इजाजत दी और हम फिर कभीं मिले तो मैं इनके बारे में भी बताऊंगा , जो तुम पूछ न पाये । वे अब भी हैं ,न दूर हैं न नज़दीक लेकिन हैं , इतना कह कर आंसू पोछते हुए घर के अन्दर चले गए और दरवाजा बंद कर ली ।
* आप सोच सकते हैं कि मेरे पर क्या बीती होगी और उन पर क्या बीत रही थी ,यह तो आप समझ ही सकते है लेकिन इतना जरुर मैं कह सकता हूँ कि उनको लोगों की नज़र लग गयी थी ।। क्या खोया ? इस श्रृखला के अगले अंक में कुछ और दृष्यों को देखेंगे ।
* यह एक सत्य कहानी है *
~~ हरे हरे ~~

Monday, June 30, 2014

कैसा रहा यह सफ़र

# कभीं - कभीं ऐसा लगनें लगता है कि अब हम जिन्दा क्यों हैं ? और जो अभीं - अभीं इस संसार से जा रहे होते हैं , उनके न होनें पर दुख भी हो रहा होता है , आखिर ऐसा क्यों ? यह इसलिए हो रहा होता है कि हम जहाँ हैं इसके विपरीत हमारी दृष्टि जम जाती है , इस उम्मीदसे कि हो न हो वह ठीक हो । द्वैत्यकी उर्जा में लिपटा यह मनुष्य अपनें को एक पेंडुलम जैसा बना रखा है पर पेंडुलम से कुछ सीखता नहीं क्योंकि पेंडुलमके गतिका प्रारंभ और अंत जहाँ है वहाँ जो है वह समभाव है और समभाव में स्थित ब्यक्ति स्थिर प्रज्ञ होता है जिसकी आँखें प्रभुके प्यार से भरी होती
हैं ।
# जवानी में कदम रखते ही एक उबाल उठनें लगता है , कोई ऐसा ब्यक्ति जो अभीं - अभीं जवानी में कदम रखा हो और वह अपनें को दुनिया का सम्राट न समझता हो , ऐसा संभव नहीं लेकिन जवानी में देखे गए सारे सपनें एक - एक करके टूटते जाते हैं और वह ब्यक्ति जो आज लगभग 60 साल का हो चूका होता है , अपनें इस जीवनका एक अज्ञान द्रष्टा बना रह जाता है ।
# जो मिला है एक दिन उसे खोना होगा और मनुष्य पाना तो सारा संसार चाहता है पर खोना एक कौड़ी भी नहीं चाहता जो सम्भव नहीं । # एक बह रही दरिया में उसकी धारा के विपरीत जो बहना चाहेगा उसे दर्द तो होगा ही । हम प्रकृतिके विपरीत चलना चाहते हैं और यह हमारी चाह हमसे सुख छीन लेती है और हम कहीं एक कोने में बैठ कर किस्मत का इन्तजार कर रहे होते हैं ।क्या होगा इस रोने - धोने से ?
-- दुनिया का मेला --

Monday, June 16, 2014

यहाँ क्या हो रहा है ?

1- जहाँ हम हैं , वहाँ हर पल समझनें का पल है लेकिन हम और को क्या समझेंगे जब स्वयं को समझते की भी कोशिश नहीं करते ।
2- संसार एक ऐसा रंगमंच है जहाँ समझानें वाले अधिक और समझनें वाले न के बराबर हैं ।
3- संसार में लोग कामयाब होनें केलिए अपनेंको नहीं अपने रंगको बदलते रहते हैं पर सफलता पाना फिरभी कठिन ही दिखता है ।
4- इस संसार में झूठे ज्यादा कामयाब से दिखते हैं लेकिन उनके कामयाबी का रंग बहुत जल्दी फीका पढनें लगता है ।
5- इस संसारसे जितनें रोज जा रहे हैं ज़रा उनके मुह पर से कफ़न उठा कर देखना कि उनमें से कितनें मुस्कुराते हुए जा रहे हैं , शायद आपको कोई भी ऐसा न दिखे , आखिर ऐसा क्यों ? लोग प्रभुके पास पहुँचने केलिए लाख कोशिश करते हैं लेकिन जब जाना होता है तब सभींका मुह गिर जाता है ,क्यों ?
~~~ हरे कृष्ण ~~~

Friday, June 6, 2014

किधर - किधर देखूँ

# आइये आप और मैं दोनों एक साथ समझते हैं उसे जो घट रहा है पर हम सब अभीं तक उसकी ओर अपनी -अपनी आँखे बंद किये बैठे हैं ।अब जरा समझना , नीचे दी जा रही बातों को :---
* परिवार रचाया क्यों , क्या शांतिके लिए ?
* बस्ती बनाई क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* सम्बन्ध स्थापित किये क्यों , क्या शांति से रहनें केलिए ?
* ब्यापार खडा किया , क्यों , क्या चैन से जीवन गुजारनें केलिए ?
* युद्ध लड़े ,क्यों , क्या शांतिसे रहनें केलिए ?
* मंदिर बनाए , क्यों , क्या शांति केलिए ?
* मंदिर में मूर्ति स्थापित किये ,क्यों ? क्या मन शांति केलिए ?
* खूबसूरत महल खडा किये ,क्यों , क्या दो घडी शांति से रहने केलिए ?
* जीवन गुजार दी ,भाग -दौड़ में ,आखिर क्यों , क्या शांति की खोज केलिए ?
** लेकिन अब ज़रा रुकना और सोचना :--
1- यहाँ इस संसार में हमारा सारा प्रयाश जो शांति और सुरक्षा से जीवन गुजारनें केलिए हुए ,क्या वे विफल नहीं हुए ?
2- यहाँ शांति सभीं चाहते हैं ,पर हैं , कितनें शांति
में ?
3- यहाँ सभीं प्यार में रहना चाहते हैं ,लेकिन हैं कितनें प्यार में ?
4- यहाँ सभीं प्रभुको दिल में बसाना चाहते हैं लेकिन कितनों के पास ऐसा दिल भी है ?
## कहना और सुनना तो बहुत हो चुका पर मिला कुछ नहीं ,क्योंकि कहनें और सुननें से होना
(बदलना ) था पर हम सबकुछ करनें को तैयार हैं पर बदलना नहीं चाहते , फिर क्या होना था ? न होना
था , न होगा कुछ ।
** जो भी हमनें किये , उनके करने से हमें बदल जाना था , पर :---
# हम स्वयंको बदलना नहीं चाहते और जैसे हैं उसी स्थिति में प्रभुको अपनें सामने लाना चाहते हैं , आखिर क्यों ?
# क्योंकि हम उसे भी अपनें अर्थ केलिए प्रयोग करना चाहते हैं ।
# हम जितनें गहरे अज्ञानी हैं , प्रभु को भी अपनें जैसा ही अज्ञानी क्यों समझते हैं ?
# हम संसार में लोगों को धोखा देते - देते इतने मज गए हैं की सब स्वयं को भी बड़ी बारीकी से धोखा दे बैठते हैं और प्रभु को भी खूब धोखा दे रहे हैं , है न नाजे की बात ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Wednesday, May 28, 2014

करलो इकठ्ठा पर ---

करलो इकठ्ठा पर ...
** यह भी हो ,वह भी हो ,ऐसा भी हो ,वैसा भी हो , ये ठीक रहेगा ,वह ठीक रहेगा - ऐसे बंधनों से जुड़े मनकी गति हर पल और तेज होती जाती है लेकिन हृदय सिकुड़ता चला जारहा है ।
** ऐसे लोग जिनके आँखों की पुतलियाँ कहीं रुकती नहीं , जो ऊपर बताये बंधनों से गहरी तन्मयता स्थापित कर रखी है , उनमें अधिकाँश लोग ब्लड प्रेसर , शुगर और हृदय रोग से ग्रसित हैं ।
** जैसे - जैसे इकठ्ठा करनें की उर्जा बढ़ रही है ,वैसे - वैसे लोग हृदय विहीन होते जा रहे हैं । भोगी अपनें हाँथ ऊपर उठा कर आकाश को पकड़नें की कोशिश में सुध - बुद्धि सब खो रहा है तो योगी बंद अपनीं आँखों से उसी आकाशकी शून्यता में बिना सोचे जो पाता है ,वह उसे तृप्त कर देता है और उसका शेष जीवन नाचते -नाचते गुजर जाता है ।
** योगी सब कुछ खो कर परनानंद को पा जाता है और भोगी सबकुछ पाते हुए भी भिक्षुक बना हुआ है । ** मनुष्य राज पथोंका निर्माण करवाता है लेकिन उनका जीवन राज पथ पर नहीं चलता , उसका हर कदम एक नए ऐसे मार्ग का निर्माण करता है जिस पर वह जैसे -जैसे आगे कदम बढाता जाता है वैसे - वैसे उसके पैरोंके निशान स्वतःमिटते चले जाते हैं । ** जीवन यात्रा एक पगडण्डी यात्रा है; ऐसी पगडण्डी यात्रा जिसको शब्दों में बाधना तो संभव नहीं लेकिन इस यात्राके हर पल रोमांचित जरुर करते रहते हैं । **यहाँ यह न देखो कि वह कैसे चल रहा है , यह देखो कि जैसे भी तुम चल रहे हो ,क्या वह तुमको आनंदित कर रहा है ।
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~

Wednesday, May 21, 2014

यह भी एक बात है

* जब तक संसारकी पूरी हवा नहीं लग जाती है तबतक एक युवाको जीवन रंगीन दिखता रहता है और उसके जीवनके हर पल एक नए आयाम जैसे होते है। धीरे -धीरे वही युवक समयके प्रभाव में वहाँ पहुँच चुका होता है जहाँ वही उसका जीवन उसे बोझ बन जाता है ,यह घटना नहीं है ,यह जीवन यात्रा के दो रंग हैं जो हमारी बंद आँखों को खोलना चाहते हैं पर हम अपनी आँखों को और बंद करते चले जाते हैं और एक दिन अपनीं आँखे थक कर हमेशा केलिए बंद होजाती हैं फलस्वरूप अपना भौतिक अस्तित्व सदैव केलिए समाप्त हो जाता है । 
* हर बेटा पिता बनता है हर पिता दादा बनता है । हर लड़की माँ बनती है ,हर माँ दादी बनती है यदि अन्य बाते सामान्य रहें तो लेकिन क्या इस परिवर्तनका किसी को पूर्वानुमान होता है ? पूर्वानुमान न होनें के कारण तरह -तरह की सामाजिक समस्याएं खड़ी होती रहती हैं और हम सब इन समस्याओं में उलझे -उलझे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से इस संसार को तन्हाई में छोड़ना पड़ता 
है । 
* यह मेरे कुल की मर्यादा है ,यह मेरे इज्जतका सवाल है , यह मेरे धर्म के प्रतिकूल है , ऐसा नहीं हो सकता ,वैसा नहीं हो 
सकता , ऐसे एक नहीं अनेक बंधनों में हम अपनें उत्तराधिकारी को बाद कर रखते हैं इन बंधनों की इतनी गहरी पकड़ होती है कि उस बिचारे के दिल के अरमा सिकुड़ते चले जाते हैं और उसके पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता कि वह भी अपनें पिता की बातोंको अपनें उत्तराधिकारियों के ऊपर थोपे । अप ज़रा अपनी निगाह समाजमें दौड़ाएं और देखें , क्या ऐसा ही नहीं हो रहा ? 
 <> ऐसी स्थिति में और क्या हो सकता है ? ऐसे कितनें दिखते हैं जो अपनी आगे की पीढ़ी के बच्चो को मौका दे रहे हो संसार के अनुभव को प्राप्त करने केलिए ? क्या बिना कुछ किये भी अनुभव मिलता है ? 
~~~ ॐ ~~~

Monday, May 19, 2014

यह खेल है , जब आये हो तो खेलो

* खेल , खेल है , इसमें इतना तन्मय न हो जाओ कि भूल जाओ उसे जो खिला रहा है , उसे जो खेल रहा है और उसे जो इसका द्रष्टा है ।कैसी खेल है जिसमें खेलनें वाला , खिलानेवाला और द्रष्टा तीन नहीं एक
है ?
* अनेक योनियों से गुजरनेंके बाद जिसका अनुभव गहरा जाता है उसे मनुष्य योनि मिलती है और मनुष्य योनि में आया जीव यह समझ सकता है कि वह स्वयं क्या है ,यह संसार क्या है और इन सबके माध्यमसे उसका द्रष्टा बन सकता है जो इन सबके होनें का माध्यम है और जिसे प्रभु की माया कहते हैं । भागवत कहता है ,भक्त माया का द्रष्टा होता है ।वह मनुष्य जो माया का द्रष्टा बन जाता है ,निराकार प्रभु उसके लिए साकार हो उठता है और उस परम अप्रमेय ,सनातन और अब्यक्त में वह अपना बसेरा बना लेता है।
~~ रे मन कहीं और चल ~~

Wednesday, May 14, 2014

रे मन कहीं और चल

1-जीवन में आये दिन कुछ ऐसी घटनाएँ घटती रहती हैं जिनसे मनुष्य कुछ ऐसी स्थिति में आ जाता है जैसे बीच दरिया में चल रही नाव किसी असामान्य तूफ़ानमें फस गयी हो ।ऐसी घटनाएँ मनुष्य को एक नयी उर्जा क्षेत्र में पहुँचाना चाहती हैं लेकिन होता क्या है ? जब एक ग्रह अपनें आर्बिट को छोड़ता है और अपनें आर्बिट से बाहर कदम रखता है तब वह या तो समाप्त हो जाता है या फिर धीरे -धीरे अपना एक नया आर्बिट बना लेता है लेकिन आर्बिट बदलना एक जोखिम भरा कदम है जिसके लिए कोई तैयार नहीं । वह जो इस जोखिम को स्वीकार करके अपनें पुरानें आर्बिट के बाहर कदम उठता है , वह अगर संसारके अस्तित्व में बना रहा तो पूज्यनीय बन जाता है ।
2- जीना कौन नहीं चाहता लेकिन कोई नहीं चाहता कि उसके अलावा कोई और भी जीये , आखित
क्यों ?
3- इस संसारका निर्माण कैसे हुआ और इसके निर्माणके पीछे कौन सा राज छिपा है ? यह एक तर्क शास्त्रका बिषय है लेकिन इतना तो स्पष्ट दिखता है कि यह संसार योगी ,भोगी ,देवता और साकार रूपमें अवतरित हुए स्वयं परम पुरुष तक को एक समान आकर्षित करता है ,क्यों औत कैसे ?
4- संसारकी रचना निर्मल प्यारकी उर्जा से हुयी होगी , इसमें भी कोई शक नहीं दिखता लेकिन यहाँ जो रहते हैं वे सभीं एक दुसरेके भोजन हैं और एक दुसरे को समाप्त करनें में लगे हुए हैं ,ऐसा क्यों ?
5- इस माया निर्मित संसार में सबका मुह खुला ही क्यों रहता है ,सभीकी रोजाना उम्र घटती जा रही है और उनकी अत्रिप्तता बढती जा रही है , आखिर
क्यों ?
6- यहाँ सभीं लगे हुए हैं चाहे भोगी हों ,चाहे योगी हों या फिर चाहे अन्य जीव हैं ,किसी न किसी रूप में तृप्त होनें में लेकिन सबके तृप्त होनें के साधन छोटे होते जा रहे हैं और उनकी अतृप्ता बड़ी होती जा रही हैं , ऐसा क्यों ?
~~ रे मन ! कहीं और चल ~~

Friday, May 9, 2014

सुनाऊ तो किसको और कैसे ?

1- किसी से यदि आप कुछ कहना चाह रहे हैं ? तो रुको, सोच लो , ठीक -ठीक कि जो आप कहना चाह रहे हो उसके लिए यह समय उचित भी है ?
2- आप जो कहना चाह रहे हो क्या वह आपके अपनें अनुभव की बात है या किसी और से आपको उधार में मिली है ?
3- इतनी सी बात याद रखना कि भोग संसारमें सबका अपना -अपना भिन्न - भिन्न अनुभव होता है , पर सतकी अनुभूति सबकी एक होती है ।
4- किसी और की बात हो तो औरों को सुनाऊ भी अब अपनी ही बात जिसे अभीं तक मैं छिपा रखा है ,उसे सुनाऊतो कैसे और किससे ?
5- कभीं -कभीं न कहनें वाली बात कही जाती है और जिस बात को कहना होता है उसे हम कह नहीं पाते ।
6- जो कहनें जा रहे हो इसे कहो लेकिन इतना तो देख ही लो कि आस - पास जो लोग हैं उनके सुननें लायक भी वह बात है या नहीं ।
7- गावों में अक्सर ऐसा होता है कि छोटे -छोटे बच्चों की उपस्थिति को बिना सोचे बड़े लोग ऐसी बातें कर बैठते हैं जिन बातों को बच्चे कई साल बाद समझ पाते हैं । बच्चों के अन्दर ऐसे बीज न रखो जो उनके बड़े होनें के साथ -साथ नासूर बनते हों ।
8- आये दिन गौवों की सेवा केलिए दान इकठ्ठा करनें वाले गलियों से गुजरते हैं । वे लाउस स्पीकरके माध्यम से बोलते हैं , " मेरे प्यारे सज्जनों , माताएं और बहनों ! जगह - जगह से लंगड़ी - लाचार गौओं को हम इकठ्ठा करते हैं ,उनका इलाज करते हैं और उनका पालन करते हैं । इस कार्य हेतु 33 करोड़ देवी -देवताओं को धारण करनें वाली गौ माता के पालन हेतु आप के सहयोग की जरुरत है " ।अब आप समझें की इन गौओं को अनाथ और अपाहिज कौन बना कर लावारिश छोड़ते हैं ? क्या वे हम - आप तो नहीं ? यदि हाँ तो समस्या बहुत जटिल है । हम उनको लावारिश बनाते हैं ,हम गो शाला बनाते हैं और हम इसके भरण -पोषण हेतु भीख भी माँगते हैं , है न मजे की बात ?
~~~ रे मन कहीं और चल ~~~

Sunday, May 4, 2014

चिरकुट लाल - 1

चिरकुट लाल को सम्मानित करनें के लिए देश - विदेशसे लोग आज गाँव में आनें वाले हैं । गाँवको एक नया रूप दिया जा रहा है लेकिन चिरकुटलालको इसका कोई इल्म नहीं ,वे मजे से दरवाजे पर अपनी टूटी खाट पर बैठे हुक्का पी रहे हैं । >> कौन चिरकुट लाल ? वही जो गाँव के दक्षिणी भाग में नीम के पेड़ के नीचे एक झोपड़ी में अकेले रहता है ? यह प्रश्न रमई काका का था जो उस ब्यक्ति से पूछ रहे थे जो ढोल बजा - बजा कर सारे गाँव में यह समाचार प्रसारित कर रहा था । >> वह चिरकुट लाल जिसे गाँव के लोग वास्तव में गाँव का चिरकुट ही समझते रहे , आज उसका नाम गाँव में गूँज रहा है ,यह बात वहाँ के लोगों को पच नहीं रही थी लेकिन आयोजन तो सरकार की ओर से हो रहा था लोग करते भी तो क्या करते ? >> कोई यह नहीं समझ पा रहा था कि वह चिरकुट लाल जिसे मुस्किल से रोटी नसीब हो पा रही थी , उसे सम्मानित किया जा रहा है ? बश ! यही प्रश्न गाँव के हर नुक्कड़ पर इकट्ठे हुए लोगों में रह -रह कर उठ रहा था ,पर इसका उत्तर न मिलनें से लोगों में बेचैनी साफ़ - साफ़ दिख रही थी। >> चिरकुट लाल अपना हुक्का दिवार से सटा कर रख दिया और उठायी अपनी डंडी और जा कर पास के अपनें एक बूढ़े ब्यक्ति से पूछ रहे थे कि भाई ! आज गाँव में यह सब क्या हो रहा है ? कोई बड़ा हाकिम आनें वाला है क्या ? अभीं चिरकुट लाल की बात पूरी भी न हो पायी थी कि पुलिश की एक जीप वहाँ रुकी और चिरकुट लाल को लेकर नौ दो इग्यारह हो गयी। सूरज डूबते -डूबते चिरकुट लालका गाँव जगमगा उठा ,गाँव के चौपाल पर एक बड़ा सामियाना लगा था , उसके नीचे हजारों लोग इकट्ठे थे ,सरकारकी ओर से मुख्या मंत्री जी सहित पूरा सरकारी तंत्र वहाँ इकठ्ठा हो चूका था और किसी का इन्तजार कर रहा था । >> कुछ ही पल में वहाँ एक हेलीकोप्टर उतरा , उसमें से कुछ लोग नीचे उतरे और आगये चौपाल पर जहाँ लोग उन सबका इन्तजार कर रहे थे । मुख्या मंत्री महोदय अपनें अल्प भाषण के बाद सामनें कुर्सी पर बैठे चिरकुट लाल की ओर इशारा करके बोले , आप लोग काका चिरकुट लाल को तो जानते ही होंगे । इसके साथ जो महोदय बैठे हैं वे हैं तो किसी और मुल्क के प्रधान मंत्री लेकिन इनका सीधा सम्बन्ध इस गाँव एवं चिरकुट लाल के खानदान से है। ये सज्जन आज हमाते अथिति हैं और हम इनका स्वागत करते हैं ।अब मैं इनसे गुजारिश करूँगा कि ये दो शब्द कहें । >> वहाँ आये अथिति महोदय कुछ बोल तो नहीं पाए लेकिन उनकी आँखों से टपकते आँसू सबकुछ कह रहे थे । > सैकड़ो साल बाद चिरकुट लाल के खानदान का कोई सदस्य अपनें पुर्बजों के गाँव को देखनें समुद्र पार के एक देशके प्रधान मंत्री की हैसियत से यहाँ आया हुआ है और गाँव एवं चिरकुट लाल के झोपड़े को देख कर यह अनुमान लगाकर रो रहा है की सैकड़ो साल पहले हमारे पूर्वज क्या रहे होंगे ? और वे यहाँ से क्यों गये थे ? >> लोग तो चले गए ,जलसा पूरा हो गया लेकिन चिरकुट लाल का क्या हुआ ? इस बात को हम देखेंगे अगले अंक में --- -- क्रमशः --

Friday, May 2, 2014

ना तेरा ना मेरा

<> एक फ़क़ीर , सम्राटके महल - द्वार पर खड़ा सुरक्षा कर्मी से ऊँची आवाज में कुछ पूछ रहे थे । फ़क़ीर की आवाज में कुछ ऐसी कशिश थी जो सम्राट को द्ववार पर आनें को मजबूर कर दी । सम्राटकी आँखें जब फ़क़ीर की आँखों से मिली तब वह भूल ही गया कि वह सम्राट है और एक भक्त की भांति फ़क़ीर को महलके अन्दर आनें को आमंत्रित किया । * सम्राट महलके अन्दर फ़क़ीरको उचित आसन देनें केबाद पूछे ,प्रभु ! आप द्वारपालसे किस बात पर बहस कर रहे थे ? फ़क़ीर बोले ," मैं कह रहा था कि इस सराय में आज मुझे रुकना है और वह कह रहा था कि यह सराय नहीं सम्राट का महल है । " मैं इसे महल के रूप में नहीं मान रहा था और वह इसे सराय माननें को तैयार न था ,बश इतनी सी बात थी । * सम्राट बोले ," प्रभु ! यह तो मेरा महल है जिसे आप एक सराय समझ रहे हैं ,फिर तो वह द्वारपाल ठीक कह रहा था लेकिन आप यहाँ जितनें दिन चाहें रुक सकते हैं , यह मेरा भाग्य है की मेरे महल में आप जैसे फ़क़ीर के पैर पड़े हैं । * फकीर कुछ बोले नहीं ,दीवारों पर लगी उन तस्बीरों को देखते रहे जो सम्राट के पूर्बजों की थी । फ़क़ीर तस्वीरों को देखते -देखते हसने लगे । फ़क़ीर कहते हैं ,देखो ,इस तस्बीर को , कुछ साल पहले ये कहते थे कि यह मेरा महल है , फिर इस तस्बीर को देखो ,ये भी यही बात कहते थे और आज तुम उनकी कही बात को दुहरा रहे हो ,आखिर बात क्या है ? जहां लोग रहते है वह महल या घर होता है और जहां लोग आते - जाते रहते हैं उसे सराय कहते हैं ,फिर तुम समझो कि यह महल है या फिर सराय । # सम्राट फ़क़ीर के चरणों में गिर पड़ा और अगले दिन अपनें सेनापति को राज्य सौप कर फ़क़ीर के साथ हो लिया । ** सोचिये इस कथा पर ** ~~~ सत नाम ~~~

Sunday, April 27, 2014

क्या कहूँ ?

1- क्या कहूँ ? किससे कहूँ ? और कैसे कहूँ ? मुह खोलनें से पहले इन प्रश्नों पर विचार करलो वर्ना बाद में पछताना पड़ेगा ।
2- पेड़ से टपका फल और मुह से टपकी बात मे समानता है ।
3- अभीं तक वे आपके अपनें ही थे लेकिन दो बातें आपकी सुनते ही उनका रंग क्यों वदल गया ?
4- आप सोच रखे थे कि वे आपके अभिन्न मित्र हैं लेकिन जब आप उनको बरतना चाहा तो आपकी सोच खरी न निकल सकी और आपको जहाँ खुश होना था , दुखी हो उठे ।
5- प्रभु सबको देख रहा है , यह बात सब जानते हैं पर इसे समझनें वाले दुर्लभ हैं ।
6- जीवन प्रकृति की ओर से रंगीन है उसे और रंगीन बनानें की कोशिस उसकी खूबसूरती को छीन लेता है।
7- देहके दर्द को तो कहा जा सकता है लेकिन दिल के दर्द को किससे और कैसे कहूँ ?
8- दूसरों की कमजोरियों को बता - बता कर जीवन गुजार दी पर अपनी कमजोरियों को किससे और कैसे कहूँ ?
9- औरों से जो मिला उसे तो सबको बता दिया पर अपनों से जो मिला उसे किससे और कैसे बताऊँ ? 10- संसार में सबकुछ कहा जा सकता है ,सबकुछ गाया जा सकता है लेकिन जो प्यार मिलता है उसे कैसे कहा या गाया जा सकता है ?
~~ रे मन कहीं और चल ~~