सांख्य दर्शन रहस्य भाग : 01
प्रकृति - पुरुष संयोग एवं सत्कार्यवाद
संदर्भ > कारिका : 3,22,20,11, 9+15, (06 कारिकायें)
पहले कारिकाओ को समझते है और अंत में इन 06
कारिकाओं के सार रूप में निष्कर्ष को देखेंगे …
🌹कारिका - 3
मूल प्रकृतिर विकृत्रर्महदाद्या : प्रकृतिविकृतयः सप्त।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ।। 3।।
“पुरुष - प्रकाश के प्रभाव में अविकृति मूल प्रकृति (तीन गुणों की साम्यावस्था ) से 07 कार्य - कारण (बुद्धि , अहंकार , 05 तन्मात्र ) और 16 केवल कार्य ( विकार > 11 इन्द्रियाँ + 05 महाभूत ) उत्पन्न होते हैं अर्थात विकृत प्रकृति से 23 त्रिगुणी - जड़ तत्त्वों की निष्पति होती है ।”
🌹कारिका : 22
प्रकृतिर्महास्ततः अहंकारस्त्माद् गुणश्च षोडशकः।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पंचभूतानि।।22।।
प्रकृति - पुरुष संयोग से महत् (बुद्धि ) की उत्पत्ति होती है । महत् से अहँकार की , अहँकार से 11 इंद्रियों की एवं 05 तन्मात्रों की उत्पत्ति होती है और तन्मात्रों से 05 महाभूतों की उत्पत्ति है ।
(यह कारिका , कारिका - 3 की सहयोगी कारिका है।)
🌹कारिका - 20
तस्मात् तत् संयोगात् अचेतन चेतनावत् इव लिङ्गं
गुण कर्तृत् इव अपि तथा कर्ता इव भवत् उदासीनः ।।20।।
(उदासीन > तटस्थ रहनेवाला पुरुष)
पुरुष ऊर्जा के कारण अचेतन प्रकृति और उसके विकृत से उत्पन्न अचेतन त्रिगुणी 23 तत्त्व चेतनवत दिखने लगते हैं ।
गुण ही गुण में बरत रहे हैं , पुरुष करता नहीं है उदासीन है लेकिन करता सा भाषने लगता है ।
💐 लिङ्ग उन्हें कहते हैं जिनका लय होता है अर्थात जो विनाशशील हैं / विकृत प्रकृति के 23 तत्त्वों को लिंग और विकृत प्रकृति की अलिंग कहते हैं। पुरुष न अलिंग है और न ही लिंग है।
👉 उदासीन पुरुष के गुण ही कर्ता हैं पुरुष केवल कर्ता जैसा प्रतीत होता है जैसे चोर के साथ पकड़ा गया अचोर चोर ही दिखता है वैसे कर्ता गुणों के साथ संयुक्त होने के कारण उदासीन पुरुष कर्ता की तरह भाषता है।
🌹कारिका - 11
त्रिगुणम् अविवेकी विषयः सामान्यम् अचेतनम् प्रसवधर्मि
व्यक्तं तथा प्रधानम् तत् विपरीतस्तथा च पुमान् ।।11।।
यह कारिका प्रकृति और उसके विकारों (व्यक्त) की समान विशेषताओं का वर्णन करती है तथा उन्हें पुरुष से अलग करती है। प्रकृति , त्रिगुणी ,अचेतन तथा प्रसव धर्मी है। उसके 23 तत्त्व भी अचेतन एवं त्रिगुणी हैं जबकि पुरुष शुद्ध चेतना एवं निर्गुणी है। यह पुरुष-प्रकृति के द्वैत को स्पष्ट करती है, जो सांख्य का मूल सिद्धांत है।
अब कारिका : 9 एवं कारिका : 15 को एक साथ देखते हैं …
कारिका 9+15 सत्कार्यवाद
🌹कारिका - 9
असदकरणात् उपादान ग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् ।
शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।।9।।
यह कारिका सत्कार्यवाद की स्थापना करती है, जो सांख्य दर्शन का मूल सिद्धांत है।
सत्कार्यवाद
सत्कार्यवाद कारण और कार्य का सिद्धांत है।किसी तत्त्व से उत्पन्न होने वाला तत्त्व , उस तत्व का कार्य कहलाता है और उत्पन्न करनेवाला तत्त्व कार्य तत्त्व का कारण तत्त्व होता है ।
कार्य (जैसे घड़ा, कपड़ा आदि) पहले से ही कारण (मिट्टी, धागे आदि) में सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है। उत्पत्ति केवल उसका व्यक्त (प्रकट) होना है, न कि सर्वथा नये का निर्माण।
सांख्य के अनुसार प्रकृति (मूल कारण) में समस्त विश्व पहले से ही अव्यक्त रूप में मौजूद है और सृष्टि में केवल उसका परिणाम (विकृति) होता है।
कारिका - 15
भेदानां परिमाणात् समानत्वात् च भिन्नत्वात् ।
औत्पत्तिकं च कारणं कार्यस्य सत्कार्यमिति ॥ १5॥
यह कारिका सांख्य के सत्कार्यवाद को और मजबूत करती है। सत्कार्यवाद का अर्थ है कि कार्य कारण में पहले से सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है; सृष्टि में कुछ भी “नया” नहीं बनता, केवल अव्यक्त का व्यक्त होना होता है।
यह विचार असत्कार्यवाद (न्याय-वैशेषिक मत, जिसमें कार्य पहले नहीं रहता) का खंडन करता है।
यह सत्कार्यवादसिद्धांत इस दर्शन की बुनियाद है, क्योंकि इससे प्रकृति को विश्व का एकमात्र उपादान कारण मानने में सहायता मिलती है।
कार्य , कारण में पहले से ही रहता है — यह सीमित भेद, समान गुण, शक्ति के अनुसार उत्पत्ति और कारण-कार्य की एकता से सिद्ध होता है। यही सत्कार्यवाद है।
निष्कर्ष
1- कारिका : 3 , 22 , 20 और 11 का सार देखते हैं …
प्रकृति और पुरुष , दो तत्त्वों के संयोग से 23 तत्त्वों की निष्पति होती है , जिनमें 07 कार्य -कारण तत्त्व होते हैं और 16 केवल कार्यतत्त्व होते हैं। तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति कहते हैं जो त्रिगुणी , अविवेकी ( जड़ ) , प्रसवधर्मी और सनातन तत्त्व है । मूल प्रकृति को अलिंग और अव्यक्त कहते हैं। पुरुष निर्गुणी , शुद्ध चेतन , सनातन और उदासीन है । यह न लिंग तत्त्व है और न ही अलिंग तत्त्व है। प्रकृति के 23 तत्त्व अविवेकी (जड़ ) एवं त्रिगुणी होते हैं ।
2- कारिका : 9+19 > सत्कार्यवाद
कार्य , कारण में पहले से ही रहता है — यह सीमित भेद, समान गुण, शक्ति के अनुसार उत्पत्ति और कारण-कार्य की एकता से सिद्ध होता है।
यही सत्कार्यवाद है।यह विचार असत्कार्यवाद (न्याय-वैशेषिक मत, जिसमें कार्य पहले नहीं रहता) का खंडन करता है।
~~ सांख्य दर्शन रहस्य भाग - 01 ~~