Sunday, January 29, 2012

जरा सोचना


जीवन दर्शन


भाग –01


जरा सोचो




  • आखिर कबतक किसी की उंगली पकड़ कर चलते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अपनें से दूर – दूर भागते रहोगे ?



  • आखिर कबतक औरों को सुनाते रहोगे ?



  • आखिर कबतक स्वयं को धोखा देते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अच्छा बनाते रहोगे ?



  • आकिर कबतक अपना गुणगान करते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अपनें माथे के पसीनें को पोछते रहोगे ?



  • आखिर कबतक मन का गुलाम बने रहोगे ?



  • आखिर कबतक भागते रहोगे ?



  • आखिर कबतक अहंकार की अग्नि में जलते रहगे ?


1 comment:

  1. बहुत सुन्दर सार्थक रचना। धन्यवाद।

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