सांख्य दर्शन मीमांसा
सांख्य दर्शन में लिंग - अलिंग तत्त्व ⤵️
लिंग अर्थात जिनकी पहचान संभव हो और जिनका लय होता हो , जो समयाधीन हों। अलिंग , जो सनातन हैं जिनके ऊपर समय का कोई प्रभाव नहीं होता और जिसकी सीधे पहचान करना संभव नहीं लेकिन उसके होने का आभास होता रहता है। विकृत प्रकृति के सभी 23 तत्त्व लिंग तत्त्व हैं और विकृत होने से पूर्व की प्रकृति अर्थात मूल प्रकृति अलिंग है।
सांख्य दर्शन में 25 तत्त्व हैं > पुरुष,प्रकृति, महत् या बुद्धि,अहंकार(सात्त्विक,राजस,तामस),मन,10इंद्रियां, पञ्च तन्मात्र और पञ्च महाभूत। इन तत्त्वों में मूल प्रकृतिअलिंग तत्त्व हैं जो सनातन हैं। तीन गुणों की साम्यावस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। मूल प्रकृति प्रसवधर्मी, त्रिगुणी,जड़ और सनातन है तथा अति सूक्ष्म तत्त्व है। पुरुष निर्गुणी , सनातन , अति सूक्ष्म और शुद्ध चेतन है। पुरुष को तत्त्व नहीं माना जाता , यह लिंग - अलिंग से परे माना गया है ।
सांख्य के 25 तत्त्वों की गणित निम्न प्रकार है…
1- मूल प्रकृति + पुरुष ~> महत् या बुद्धि ~>सात्त्विक अहंकार ~> 11 इंद्रियां और ….
2- तामस अहंकार ~> 05 तन्मात्र , इनसे ~> 05 महाभूत और..
3- राजस अहंकार से किसी भी तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती। यह सात्त्विक और तामस अहंकारों की मदद करता रहता है।
4- मूल प्रकृति , पुरुष ऊर्जा के प्रभाव में विकृत हो जाती है और महत् ( बुद्धि ) तत्त्व की निष्पति होती है। आगे की घटनाओं को ऊपर क्रम संख्या 1, 2 और 3 में पहले बताया जा चुका है
5- विकृत प्रकृति के 23 तत्त्व भी त्रिगुणी एवं जड़ तत्त्व होते हैं।
6- ये 23 तत्त्व लिंग तत्त्व हैं। इनमें 16 तत्त्व (11 इंद्रियां + 05 महाभूत ) कार्य हैं और शेष 07 ( बुद्धि +अहंकार + पञ्च तन्मात्र ) कारण एवं कार्य तत्त्व हैं। बुद्धि , अहंकार +मन+10 इंद्रियों को करण भी कहते हैं। करण अर्थात करनेवाला ।
7- ऊपर व्यक्त 23 तत्त्वों पञ्च महाभूतों को छोड़ शेष 18 तत्त्वों के समूह को लिंग शरीर या सुक्ष्म शरीर कहते हैं।
8- कैवल्य प्राप्त करने से पहले जब किसी की मृत्यु होती है तब यही लिंग शरीर पञ्च महाभूतों से निर्मित स्थूल देह को त्याग कर किसी नए शरीर को धारण करने के लिए भ्रमण करता रहता है।
9- प्रकृति , अपने में स्थित पुरुष को मोक्ष दिलाने हेतु तबतक आवागमन में रहती है जबतक पुरुष अपने मूल स्वरूप में नहीं आ जाता । तीन गुणों का प्रतिप्रसव होना तथा पुरुष का अपने मूल स्वरूप में स्थित होना ही तो कैवल्य है।
10- जब प्रकृति , पुरुष संयोग होता है तब प्रकृति के प्रारंभिक 03 तत्त्वों ( बुद्धि , अहंकार , मन ) जिनके समूह को चित्त कहते हैं । पुरुष चित्त केंद्रीय होतेभी चित्त स्वरूपाकार बन जाता है और त्रिगुणी भोगों का अनुभव प्राप्त करता है। जब भोग से उसे वैराग्य हो जाता है , तब वह प्रकृति से अलग हो कर अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसके फलस्वरूप सभी प्रकृति के 23 तत्त्वों का अपने - अपने कारण तत्त्वों में लय हो जाता है और अंततः बुद्धि मूल प्रकृति में लीन हो जाती है अर्थात विकृत प्रकृति भी अपने मूल स्वरूप अर्थात तीन गुणों की साम्यावस्था में आ जाती है। यही है , सांख्य की मूल मीमांसा।
~~सांख्य दर्शन 01~~
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