Wednesday, December 12, 2012

एक नज़र इस पर भी

कौन परमात्मा से नहीं मिलना चाहता ?
कौन परमात्मा की ओर पीठ करके रहना चाहता है ?
कौन शास्त्रों को नही पढ़ना चाहता ?
कौन शात्रों को अपनें  जीवन की डोर बनाना चाहता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को नक्कारता है ?
कौन गीता - उपनिषदों को अपनें जीवन में उतारना चाहता है ?
कौन झूठ बोलना चाहता है ?
कौन सत्य पर यकीन करता है ?
कौन किसी से सलाह नहीं लेता ?
यहाँ सलाह देनें वालों की कतारें खडी हैं लेकिन उनकी सलाह को लेनें वाले कितनें हैं ?
मंदिर में प्रसाद लेनें वालों की लंबी लाइन लगी दिखती है लेकिन प्रभु के प्रसाद - प्राप्ति के बाद भी वे अतृप्त क्यों दिखते हैं ?
कौन किसको और कब अपना समझता है ?
मंदिर - गुरुद्वारा  में जा रहे हैं और साथ में पेस्तौल लटकाए हैं , क्यों प्रभु पर विश्वास नही ?
कौन प्रभु पर और किस लिए विश्वास करता है ?
प्रभु पर हमारा  विश्वास कितना गहरा है ?
** मैं बहुत  से ऐसे  लोगों से मिल रहा  हूँ जो राधे - राधे , कृष्ण - कृष्ण , राम - राम कहते हुए अब जीवन के आखिरी पायदान पर जा पहुंचे हैं / मैं  उनसे एक सवाल करता हूँ , क्या आप कभीं स्वप्न में भी  राधा को , या कृष्ण को या राम को देखा ? सब का एक उत्तर मिलता है , जी नहींऔर वह भी  गुस्से में  पर  एक सज्जन ऐसे भी मिले जो बतानें से पूर्व रो पड़े  और बोले , यदि दिखे होते तो आज यहाँ गंगा किनारे क्यों बैठा होता ?
सत् की स्मृति यदि गहरी हो तो जीवन सत् में गुजरता है
 न कि ....
जीवन सत्य की खोज में गुजरता है / 
बश एक पल , मात्रा एक पलांश जब गहरी सोच की लहर ह्रदय में उठेगी तब वह  स्वप्न में ही नहीं वर्तमान में आप के सामनें दिखनें लगेगा 
और 
तब आप वही कहेंगे जो गीता कहता है -----
वह सबे बाहर , सबसे दूर , सब के समीप , सब के अंदर है 
और 
सभीं उसके फैलाव स्वरुप हैं 
==== ओम् ========

No comments:

Post a Comment