Sunday, May 4, 2014

चिरकुट लाल - 1

चिरकुट लाल को सम्मानित करनें के लिए देश - विदेशसे लोग आज गाँव में आनें वाले हैं । गाँवको एक नया रूप दिया जा रहा है लेकिन चिरकुटलालको इसका कोई इल्म नहीं ,वे मजे से दरवाजे पर अपनी टूटी खाट पर बैठे हुक्का पी रहे हैं । >> कौन चिरकुट लाल ? वही जो गाँव के दक्षिणी भाग में नीम के पेड़ के नीचे एक झोपड़ी में अकेले रहता है ? यह प्रश्न रमई काका का था जो उस ब्यक्ति से पूछ रहे थे जो ढोल बजा - बजा कर सारे गाँव में यह समाचार प्रसारित कर रहा था । >> वह चिरकुट लाल जिसे गाँव के लोग वास्तव में गाँव का चिरकुट ही समझते रहे , आज उसका नाम गाँव में गूँज रहा है ,यह बात वहाँ के लोगों को पच नहीं रही थी लेकिन आयोजन तो सरकार की ओर से हो रहा था लोग करते भी तो क्या करते ? >> कोई यह नहीं समझ पा रहा था कि वह चिरकुट लाल जिसे मुस्किल से रोटी नसीब हो पा रही थी , उसे सम्मानित किया जा रहा है ? बश ! यही प्रश्न गाँव के हर नुक्कड़ पर इकट्ठे हुए लोगों में रह -रह कर उठ रहा था ,पर इसका उत्तर न मिलनें से लोगों में बेचैनी साफ़ - साफ़ दिख रही थी। >> चिरकुट लाल अपना हुक्का दिवार से सटा कर रख दिया और उठायी अपनी डंडी और जा कर पास के अपनें एक बूढ़े ब्यक्ति से पूछ रहे थे कि भाई ! आज गाँव में यह सब क्या हो रहा है ? कोई बड़ा हाकिम आनें वाला है क्या ? अभीं चिरकुट लाल की बात पूरी भी न हो पायी थी कि पुलिश की एक जीप वहाँ रुकी और चिरकुट लाल को लेकर नौ दो इग्यारह हो गयी। सूरज डूबते -डूबते चिरकुट लालका गाँव जगमगा उठा ,गाँव के चौपाल पर एक बड़ा सामियाना लगा था , उसके नीचे हजारों लोग इकट्ठे थे ,सरकारकी ओर से मुख्या मंत्री जी सहित पूरा सरकारी तंत्र वहाँ इकठ्ठा हो चूका था और किसी का इन्तजार कर रहा था । >> कुछ ही पल में वहाँ एक हेलीकोप्टर उतरा , उसमें से कुछ लोग नीचे उतरे और आगये चौपाल पर जहाँ लोग उन सबका इन्तजार कर रहे थे । मुख्या मंत्री महोदय अपनें अल्प भाषण के बाद सामनें कुर्सी पर बैठे चिरकुट लाल की ओर इशारा करके बोले , आप लोग काका चिरकुट लाल को तो जानते ही होंगे । इसके साथ जो महोदय बैठे हैं वे हैं तो किसी और मुल्क के प्रधान मंत्री लेकिन इनका सीधा सम्बन्ध इस गाँव एवं चिरकुट लाल के खानदान से है। ये सज्जन आज हमाते अथिति हैं और हम इनका स्वागत करते हैं ।अब मैं इनसे गुजारिश करूँगा कि ये दो शब्द कहें । >> वहाँ आये अथिति महोदय कुछ बोल तो नहीं पाए लेकिन उनकी आँखों से टपकते आँसू सबकुछ कह रहे थे । > सैकड़ो साल बाद चिरकुट लाल के खानदान का कोई सदस्य अपनें पुर्बजों के गाँव को देखनें समुद्र पार के एक देशके प्रधान मंत्री की हैसियत से यहाँ आया हुआ है और गाँव एवं चिरकुट लाल के झोपड़े को देख कर यह अनुमान लगाकर रो रहा है की सैकड़ो साल पहले हमारे पूर्वज क्या रहे होंगे ? और वे यहाँ से क्यों गये थे ? >> लोग तो चले गए ,जलसा पूरा हो गया लेकिन चिरकुट लाल का क्या हुआ ? इस बात को हम देखेंगे अगले अंक में --- -- क्रमशः --

No comments:

Post a Comment