Sunday, September 4, 2011

वहा से यहाँ तक भाग एक

कितनें प्यारे दिन थे-----

मुझे अपना वह दिन तो याद नहीं लेकिन -------

गोदी में जब कोई बच्चा उठाता हूँ तब सोचता हूँ------

हो न हो मेरे भी प्रारंभिक दिन कुछ ऐसे ही रहे हों//


गोदी किसी की और बच्चे को छेडने वाले कोई और , आते जाते सभीं गोदी के बच्चे से अपना दिल बहलाते हैं / आप जब पूरी तरह उदासी में हो तो कहीं और नहीं किसी गोदी के बच्चे को ढूढें जबकि उदासी एकांत में ले जाना चाहती है / उदासी में ब्यक्ति सिकुड़ता है , रोशनी नहीं अँधेरा चाहता है , कमरे के एक कोर्नर में रहना पसंद करता है , वह चाहता है जहां वह है वहाँ और कोई न रहे लेकिन कहीं न कहीं अन्तः करण में किसी तलाश की एक किरण रहती जरुर है , कौन है वह ?


गोदी के बच्चे के ये सुहानें दिन कब और कैसे सरक जाते हैं कुछ पता नहीं और अब वही बच्चा अपनें दादा - दादी या माँ - पिता की उंगली पकड़ कर गलियों में दिखनें लगता है / आप कभी उस बच्चे को देखना , प्यार से देखना जिसकी उंगली पकड़ कर कोई चला रहा हो / बच्चा ठीक उनके आदेशों के बिपरीत चलना चाहता है जो उसे चला रहे होते हैं / बच्चे का यह बिरोधी भावना लगती तो बहुत सुहानी है लेकिन यह बच्चे की मनोबृत्ति आगे चल कर समाज की दिशा को बदल देती है /


इसके आगे अगले अंक में क्रमश:


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