Tuesday, September 13, 2011

अपने गम को दिशा दो

किसके खोनें का डर है?

क्या उसका जो अपना है ही नहीं ?

क्या उसका जो कभीं पराया हुआ ही नहीं ?

अब ज़रा सोचना------

वह जिसको हम अपना समझ रखे हैं, कितना अपना है?

और कबतक अपना रहेगा?

क्या मकान अपना है?क्या यह परिवार अपना है?क्या यह भोग अपना है जिसको हमनें अपनें पसीनें से सीच कर ऐसा बनाया है?


हमारे पड़ोस में एक मित्र थे चार दिन पहले गुजर गए आज उनकी अस्थियां इकट्ठी करने गए थे /

अस्थियों का कलश ले कर उनका बेटा जो अभी - अभी जवानी में कदम रखा है , सीधे अपनें घर में घुस आया , लोग उसे ऐसे बाहर भगानें लगे जैसे कोई अनजाना कुत्ता घर में आ गया हो / जोर – जोर से जब आवाज मैं सूना भागा - भागा अंदर गया , देखनें की क्या हो गया ? , क्योंकि मैं उस बच्चे को अंदर जाते देखा नहीं था / जब मैं अंदर पहुंचा तब असलियत का पता चला और असलियत को जाननें के बाद बहुत दुःख हुआ /


मैं उनको बचपन से जानता हूँ , मेरा और उनका बचपन साथ – साथ एक ही गली में गुजरा था / मैं यह भी जानता हूँ कि उस ब्यक्ति नें घर बनानें , परिवार को खडा करनें में कोई कसर न छोडी थी और तीन लड़कियों के बाद यह बच्चा पैदा हुआ था और अपनें पिता से बहुत प्यार था उसे / क्या हो गया यदि वह अपनें पिता की अस्थियों को घर के अंदर ले गया ? कल तक वही उस घर एवं उस परिवार का मालिक हुआ करता था , रात - दिन पसीना बहा कर यह घर तैयार किया था , यदि कुछ समय के लिए वह नहीं उसकी हड्डियां घर में पहुँच गयी तो कौन सी आफत आ गयी ? कल तक सभीं उसके इशारे पर चलते थे और आज वह उस परिवार एवं उस घर के लिए अशुभ हो गया , कैसी हैं ऎसी दो कौडी की हमारी मान्यताएं ? किसने बनायी होंगी ऎसी बेबुनियादी मान्यताओं को ? आज ढेर सारे प्रश्न हम सब के सामनें हैं और इसके पहले की हम भी अपनें घर के लिए अशुभ बन बैठे , हमें सोचना चाहिए कि ------------

यहाँ कौन है अपना ? हम क्यों न अपनों में उस अपनें को तलाशना शुरू करें जो तब भी अपना था जब कोई अपना न था , आज भी अपना है और कल भी वहीं एक मात्र अपना रहेगा भी //

कुछ समय संसार में तैरो …..

कुछ समय संसार के माझी को पहचाननें में भी लगाओ …..


====ओम====


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