Saturday, October 1, 2011

कौन है अपना और कौन है पराया

कौन है अपना और कौन है पराया

जब हम चाहें किसी को अपना बना लेते हैं और जब चाहें किसी अपनें को पराया करार दे देते हैं आखिर कौन है अपना और कौन है पराया?अपनें अंदर वह कौन है जो अपना-पराया की सोच पैदा करता है?

अभीं जिसको हम अपना बना रखे हैं वह आगे चल कर पराया हो जाता है और अभीं जिसको हम पराया समझ रखे हैं वह आगे चल कर अपना निकलता है , आखिर यह क्या है माजरा ?

कभीं-कभी ऐसा लगता है कि-------

वह जिसको हम अभीं अपना समझ रहे हैं वह पराया होनें का इन्तजार कर रहा है और अभीं जो अपना पराया है वह अपना होनें का इन्तजार कर रहा है , ज़रा दौडाओ अपनें दिमाक को इस बिषय पर /

यहाँ कोई पराया नहीं और कोई अपना नहीं , यहाँ सब का अपना - अपना स्पेस है और समय के आधार पर सबका स्पेस बदलता रहता है / जब हम दो किसी घडी एक स्पेस में होते हैं तब ऐसा लगनें लगता है कि हम एक दूसरे के अपनें हैं और जब समय हमारे स्पेस को बदल देता है तब वही हम अपनें एक दूसरे के पराये हो जाते हैं और यह क्रम चलता रहता है और हम अपनें - पराये की चक्की में पिसते रहते हैं / अपनें - पराये का भ्रम मन की सविकार ऊर्जा है जो मन को स्थिर होनें नहीं देती / यहाँ विज्ञान की दृष्टि में एक सब एटामिक कण से सूर्य जैसे विशाल ग्रह जैसे सभीं के अपनें - अपनें स्पेस हैं और मनुष्यों में सब के अपनें - अपने स्पेस हैं /

ध्यान एक ऐसा माध्यम है जो एक निश्चित गहराई में पहुंचनें पर ऐसे स्पेस में पहुंचाता है जहां अपने - पराये की सोच नहीं रहती वहाँ जो भी दिखता है सब अपना ही होता है / सहज ध्यान क्या है ? चलते - फिरते परायों में अपने को खोजो और अकेले में जब हो तब अपनें में परायों को तलाशो , यह है सहज ध्यान जो उस आयाम में पहुंचाता है जहाँ कोई पराया नहीं होता और संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक के फैलाव स्वरुप दिखता है और जहां मात्र वर्तमान होता है न भूत की स्मृति आती है न भविष्य की स्मृति दिखती है //


=====ओम======


2 comments:

  1. Wah Sharmaji Wah!
    Adbhut! I agree with your thoughts! I have shared something which is almost what you said. Please go through my blog, http://kuldeepplaheru.blogspot.in

    Thanks,
    Kuldeep Laheru

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