Wednesday, November 16, 2011

एक निगाह इधर भी

मां की गोदी----

पिता की उंगलियां-----

पत्नी का प्यार------

पुत्र – पुत्री के बड़े होने का इन्तजार----

और फिर … ..

पौत्र – पौत्री के बड़े होनें का इन्तजार----

यह है भ्रान्ति से भरी हुयी भोग आधारित सोच जिसके सहारे मनुष्य का जीवन परम के प्रकाश में भ्रान्ति के अँधेरे में न जानें कब , कैसे और कहाँ समाप्त हो जाता है ? इधर देह चलनें से इनकार करता है और गिर जाता है और उधर मन तडपता हुआ आत्मा के साथ उड़नें लगता है , खोजनेंलगता है किसी और नये देह को जिससे वह , वह कर सके जो अभीं नहीं कर पाया था या जिसको किया तो था लेकिन तृप्तता न मिल सकी थी / कैसा है यह भ्रान्ति का जीवन ? भ्रान्ति शब्द आप को उचित नहीं लग रहा है लेकिन मैं और कोई शब्द पाता भी तो नहीं ; भ्रान्ति की परिभाषा है – वहाँ जहां अनुमान अनुमान नहीं रह जाता अपितु अनुमान कर्ता को पूर्ण विश्वाश हो जाता है कि अमुक ऐसा ही है और जहां अनुमान अनुमान रहता है उसे संदेह कहते हैं / देखा आपनें जीवन का यह भोग आधारित समीकरण जहां सत्य के प्रकाश को असत्य का अन्धेरा कैसे घेर रखा है ? पुत्र के रूप में मां - पिता के सहारे की सोच में हमारा बचपन निकल गया , जवानी पत्नी ई सोच में गुजर गया और पता भी न चल पाया और जब बच्चे पहले चाचा फिर तौ फिर दादा कहने लगे तो विश्वास ही नहीं होता कि हमारी उम्र यहाँ पहुँच चुकी है और अंततः सभीं सहारे बेसहारे हो जाते हैं और , और सहारे की सोच के लिए वक्त भी नहीं रह जाता और इधर श्वास रुक - रुक के चलने लगाती है और वह घडी आ ही जाती है जब -----

कहाँ

कैसे

और कब यह श्वास रुक जाती है,कुछ नहीं पता लग पाता

यह है हम सब के जीवन की एक झलक


======ओम्=======


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