Saturday, November 10, 2012

मनुष्य और पशु

भोग से भोग में मनुष्य और पशु दोनों पैदा होते हैं 
भोग - भोजन की खोज में पशु आखिरी श्वास भरता है 
मनुष्य भोग में होश उठा कर परम गति प्राप्त करता है 
परम गति अर्थात जहाँ समय की छाया नहीं पड़ती 
जहाँ सूर्य - चन्द्र - अग्नि प्रकाश का श्रोत नहीं 
जो स्व प्रकाशित है 
पशु का मूल स्वभाव है भोग और ....
मनुष्य का मूल स्वभाव है अध्यात्म
गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं [ श्लोक - 8.3 ] .....
स्वभावः अध्यात्मं उच्यते 
पशु कभीं आकाश नहीं देखता और मनुष्य आकाश में भी घर बननें को सोच रहा है
वह जो काम को न समझा , वह जो कामना को नहीं समझा , वह जो क्रोध को नहीं समझा ...
वह जो मोह को नहीं समझा , वह जो अहँकार  को नहीं समझा .....
वह पशु है और वह भी भोग - भोजन की तलाश में कहीं मध्य मार्ग  के चौराहे पर दम तोड़ देगा और पुनः पशुवत योनि में पैदा हो कर भोग - भोजन में भागता रहेगा ,
 लेकिन ----
जो  काम से राम की यात्रा कर लिया , जो भोग में भगवान की छाया देख ली , वह आवागमन से मुक्त हो कर प्रभु में बसेरा बना  लेता है /
=== ओम् =====

1 comment:

  1. मनुष्य का मूल स्वभाव है अध्यात्म - true

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