Sunday, September 15, 2013

स्व चिंतन - 01

● स्वचिंतन ●
1- स्व दर्पण पर अपनें मूल चेहरे को देखो लेकिन इस दर्पण को साफ़ तो करना ही होगा जो ध्यानसे संभव है ।
2- अपनीं आँखोंसे मोहका चस्मा उतारो और निर्मोह आँखोंसे जो दिखे उस पर सोचो नहीं , उसे अपनें हृदय में पहुँचाओ , तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह तुम्हारे हृदय में पहले से है ।
3- जब सबमें तुम और तुममें सब दिखनें लगें तब आँखें स्वयं बंद हो जाती हैं ।
4- जो कल आपके साथ थे , उनमेंसे कुछ आज आपके साथ न होंगे , जो आज आपके साथ हैं उनमें से कुछ कल न होंगे और यह चक्र चलता ही रहेगा । आप कल भी चुक गए थे , देखना आज भी न चूक जाना , बार - बार चुकनें से जीवन सत्य से दूर होता जाता है । जो आप को आज मिला है , वह आपको कुछ दे रहा है लेकिन आप तो अपनीं मुट्ठी बंद किये और आँखें बंद किये उनकी ओर पीठ किये बैठे हो फिर इस स्थितिमें आपको क्या मिलेगा ? क्या बार - बार चुकते रहनें के लिए प्रभु आप को भेजा है ? जीवन भाग रहा है आगे की ओर और आप सरक रहे हैं पीछे की ओर फिर ऐसे में आपको एक बेहोशी भरी मौत के अलावा और क्या मिलेगा ? प्रभु आप से पूछेगा कि तुमको इतनें मौके मिले लेकिन तुम गवाते रहे , आखिर तुम मनुष्य योनि में रहते हुए पशु - जीवन गुजारा अतः अब तुमको वही मिल रहा है जो तुमको भाता रहा है , जाओ और अगला जीवन काम - भोजनकी तलाश में गुजार कर जब तृप्त हो जाना तब पुनः मेरे पास आना ।
5- जिनके कारण तुम सम्राट बन कर चल रहे हो , उनको धन्यबाद देना भी नहीं चाहते ? ज़रा अकेलेमें सोचना कि प्रभुके सामनें जब तुम और ओ आमानें सामनें होगे तब तुम्हारी स्थिति क्या होगी ?
6- अभी भी वक़्त है , अभी तुम इतनी ऊचाई पर नहीं पहुँचे जहाँ से नीचे गिरनें से तुम्हारा अस्तित्व खतरेमें पड़ जाय , जाओ और उनका नमन करो जिनके प्रसादसे तुम यहाँ तक का सफ़र किये हो ।
~~~~ ॐ ~~~~

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