Wednesday, March 18, 2015

कतरन - 10

* अपना -अपना करते -करते हम स्वयं, अपनों के मध्य पराये बन जाते हैं और जब सत्यका आभाष होता है तबतक़ बहुत देर हो चुकी होती है । 
* परायेको अपना और अपनेंको पराया बनानें की सोचमें जीवन सिमट कर रह जाता है और संसारकी हवा उस तरफ रुख भी नहीं होनें देती जहाँ न कोई अपना है न पराया । 
* जिस पल अपनें और परायेकी सोच बुद्धिसे निकल जाती 
है ,मनुष्य बेचैन हो उठता है। 
* वही बेचैनी होती है समत्व योगसे निर्विकार हुयी हमारी आँखेंमें ।
 * इन आँखों से टपकती रहती हैं ,  आँसूकी बूँदें जो एक तरफ परमसे जुडी रहती हैं और दूसरी तरफ पृथ्वी पर स्थित भोग तत्त्वोंको सूचित करती रहती हैं कि आ ! और देख उसे, जिससे तुम , हम और संसारका अन्य दृश्य वर्ग है । 
●~~~ ॐ ~~~●

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