Wednesday, June 1, 2011

कितनें प्यारे थे

वे लोग


भारत में गाँवों में कभीं जानें का मौक़ा मिले तो उसे हाँथ से न जानें देना/

वहाँ आप पायेंगे ----

पीपल के पेड़ या नीम के पेड़ के नीचे कुछ अनगढ़ पत्थरों को जिनमें कोई

ब्रह्म होगा,कोई लक्ष्मी,कोई शारदा होंगी तो कोई शिव/

कितनें प्यारे रहे होंगे

वे लोग जिनकी यह खोज है/


किसको अपना बनाएँ ? आखिर कोई तो ऐसा हो जो अपना हो , जिस पर पूरा एतबार हो सके

जो अंदर बह रही आंशू की धार को देख सके और अपनें को समझ सके /

एक अनगढ़ पत्तर का टुकड़ा जिसका न कोई रूप और न कोई रंग , जहां कोई भी आकर्षण नहीं

उसे ब्रह्म रूप में जो पहली बार देखा होगा वह स्वयं ब्रह्म मय रहा होगा /

जब बुद्ध बोले------

परमात्मा है , ऐसा कहना कुछ ठीक न होगा , परमात्मा हो रहा है यदि ऐसे कहें तो कुछ – कुछ

ठीक बात हो सकती है , पर इसका फल क्या हुआ ? लोग उनको नास्तिक बना दिया /


गाँव के जितनें भोले लोग हुआ करते थे , उनकी सोच भी उतनी सीधी होती थी /

एक बार प्रो.आइन्स्टाइन कहे थे …...

प्राचीनतम परम्पराओं में कुछ तो ऐसा जरुर है जिसको मन – बुद्धि से पकड़ना कठीन है और

गीता कहता है … ...

ब्रह्म की अनुभूति मन – बुद्धि से परे की है/


एक अनगढ़ पत्थर का टुकड़ा सही रूप में

ब्रह्म के निराकार स्वरूप को साकार रूप मे दिखाता है//


====ओम======




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