Thursday, May 10, 2012

जीवन दर्शन 48

  • बुद्धि से उपजी बात को प्रकट करनें के एक नहीं अनेक ढंग हैं

  • ह्रदय में उपज रही बात को प्रकट करनें का कोई ढंग नहीं

  • बुद्धि की बात को लोग सुनते से दिखते हैं और उसमें अपनें स्वार्थ की बात खोजते रहते हैं

  • ह्रदय की बात कहनें - सुननें की नहीं यह तो एक धारा है जो इसमें उतरा , बह गया

  • ह्रदय के भाव को जो भाषा में ढालना चाहा दुखी हुआ

  • मीरा को भी कहना ही पड़ा,अब मैं नाचैव बहुत गोपाल

  • आप मंदिर जा रहे हैं ? क्या कुछ देना है ? या कुछ लेना है ? इस बात को भी सोचना

  • जो आप देनें के लिए अपनें पास रखे हैं उसको देखना और जो पाना चाहते हैं उसको देखना

  • एक कौडी दे कर सम्राट बनना चाहते हो?

  • मनुष्य क्यों प्रभु को इतना बेवकूफ समझता है ?

  • मनुष्य प्रभु को भी क्यों धोखा देता रहता है?

  • इस पृथ्वी पर प्रभु के नाम का जितना फैला हुआ ब्यापार है उतना और किसी बस्तु का नहीं

  • पुरानें मंदिर पृथ्वी में समा रहे हैं और नये सर उठाये ऊपर उठ रहे हैं

  • नये मंदिर पुरानों को क्यों नही देखते?

  • एक तरफ लोग नयी मूर्तियों की रचना में लगे हैं और दूसरी तरफ लोग पुरानी मूर्तियों की तस्करी कर रहे हैं

  • एक तरफ कुछ लोग मंदिरों के आकार प्रकार को नया रूप दे रहे हैं और दूसरी तरफ कुछ लोग शास्त्रों को रूपांतरित करने में लगे हुए हैं

  • मनुष्य धर्म – कर्म सब को बदल रहा है लेकिंन स्वयं को?

  • ===== ओम् ======


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