Wednesday, October 31, 2012

आइये देखते हैं स्वयं को -------

जो मिला हुआ है वह आज नहीं तो कल टल ही जायेगा 
लेकिन ----
जो हमनें  स्वयं ले रखा है उसका क्या होगा ?

जो गट्ठर हमारी पीठ पर रखा गया है वह तो समझो उतर ही रहा है 
लेकिन -----
जो हमनें स्वयं रखा है उसका क्या होगा ?

हम चिंतित हैं क्यों ? 
इसलिए नहीं कि हमारे पास वह नहीं जिसे हम चाहते हैं 
लेकिन----
 इस लिए कि वह  उनके पास क्यों है ?

मनुष्य दूसरे की गलती पर स्वयं को ताडित करता है , क्यों ?
जैसे यदि कोई हमें गाली दे दे तो हमारा  खून खौलनें लगता है , ऐसा क्यों ?
 यदि वह गाली दे रहा है हम उसे ले क्यों रहे हैं ,
 उसे यदि न लिया जाए तो वह वापिस जा कर उस ब्यक्ति के सीनें में चोट मारेगा 
लेकिन----
 हम ऐसा करनें का अभ्यास नहीं करते 

==== ओम् =====

1 comment:

रविकर said...

बहुत बढ़िया नीतिवाक्य ।

आभार आदरणीय ।।



खोता रविकर ढोयगा, कब तक अपना बोझ ।

अब उतार कर रख चला, पीठ कर रहा सोझ ।

पीठ कर रहा सोझ, खोज अब कोई दूजा ।

होती चिक चिक रोज, करूँ नहिं तेरी पूजा ।

काटेगा इंसान, जिन्दगी में जो बोता ।

कहते हैं विद्वान, मजे में जीता खोता ।।