Tuesday, February 15, 2011

गंगा - जल को ले कर जाएँ

पांच चीजों को आप ले कर भारत से वापस जाएँ .......
ऎसी बात पिछले अंक में कही गयी थी , यदि आप प्रवाशी भारतीय हैं ॥
इन पांच वस्तुओं में से आज हम ले रहे हैं ----
गंगा - जल को जो .....
गंगोत्री से हरिद्वार के मध्य से लिया गया हो ॥
ऐसा क्यों ?
हिमालय एक परबत ही नहीं है , यह अपनें में अनेक तपश्वियों के निर्विकार उर्जाओं को धारण किये हुए है
जो कालान्तर में हिमालय को अपनी - अपनी साधनाओं का केंद्र बनाया था और ......
आज भी त्रेता - युग से ले कर आज तक के एक नहीं अनेक ऋषि - लोग इस तपोभूमि में हैं जो सामान्य
ब्यक्ति के लिए अदृश्य हैं लेकीन उस ब्यक्ति के लिए अदृश्य नहीं हैं जिसके तन , मन एवं बुद्धि में
बह रही ऊर्जा निर्विकार हो ।
गंगा एक सहज माध्यम हैं जो इस परम पवित्र उर्जा को अपनें में धारण करके गंगोत्री क्षेत्र से बंगाल की
खाड़ी तक की यात्रा मनुष्य के कल्याण के लिए करती हैं ॥
गंगा के क्षेत्र में रहना .....
गंगा जल को ग्रहण करना ......
गंगा में भ्रमण करना .....
यह सब तो एक माध्यम हैं उस ऊर्जा को अपनें में धारण करनें का जो गंगा, प्रसाद रूप में सब को
सम भाव से देना चाहती हैं ।
हरिद्वार से ऊपर के भाग से लिए गए गंगा जल में परम पवित्र ऊर्जा की सघनता बहुत अधिक होतीहै और
हम जैसे भोगी अंत: कर्ण वालो के लिए अधिक प्रभावी रहता है वैसे गंगा जल , गंगा जल है चाहे वह
पटना से लिया गया हो या हरिद्वार से ।
जब आप गंगा जल को अपनें साथ ले जाएँ तो
उसे ऎसी जगह रखें जहां लोगों का आना - जाना कम हो ।
गंगा जल के पात्र को पूर्णिमा की चांदनी में रखें ।
एक वर्ष तक यदि आप ऐसा नियमित रूप से करें तो वह गंगा - जल एक दवा में बदल जाता है ।
इस जल की पांचबूँदें लें , पीली सरसों के तेल में इसे मिलाएं और इसे देह के उस भाग में लेप करें
जहां ला इलाज दर्द रहता हो ।
पंद्रह दिन ऐसा करने से आप को आराम मिलना ही चाहिए ॥
कुछ और बातें अगले अंक में

===== ॐ =====

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