Thursday, January 20, 2011

साधन और साध्य




दोनों शब्द जानें पहचानें से हैं और
दोनों में गहरा रिश्ता भी है ॥
साधन का सम्बन्ध है वर्तमान से और
साध्य भविष्य का संबोधन है ।
साधन शब्द के साथ दिशा , गति और साध्य [ गंतब्य ] तीन आयाम [ coordinates ] हैं
और
साध्य जब आ जाता है तब साधन समाप्त हो जाता है :
ऐसे समझते हैं , इस बात को ......
गंगा हिमालय से गंगा सागर की ओर चलती हैं और जब गंगा सागर आजाता है तब गंगा स्वयं को
गंगा सागर में मिला कर अपनें अस्तित्व को खो कर गंगा सागर बन जाती हैं ।
गंगा की तरह
साधन भी साध्य तक पहुंचा कर स्वयं को समाप्त कर देता है ।
हम जाते हैं वैष्णो देवी ; सब के अपनें - अपनें साधन होते हैं
लेकीन सभी बाण गंगा पर इक्कठे हो जाते हैं और चढ़ाई
प्रारम्भ कर देते हैं और ज्योंही हम पहुँचते हैं दरबार में
उस समय कौन धन्यबाद करता है उस साधन का
जो भुवन तक पहुंचा कर स्वयं को समाप्त कर देता है ?
दरबार पर दो तरह के लोग है ; एक ऐसे हैं जो साधन को छोड़ना नहीं चाहते , बैठे हैं राह पर ब्यापार
कर रहे हैं न उनको साधन की सोच हैं और न साध्य का , उनकी नज़र है सब की जेब पर
और
दुसरे हैं - हम जैसे जिनको जल्दी पड़ी है - भाग रहे हैं , सोच रहे हैं
कब पहुंचे और कब वापिस आयें और पुनः
पहुंचें वहाँ जहा से आये हैं ।
एक और श्रेणी के लोग हैं जो किसी - किसी को दीखते हैं वह भी उनको
जिनको माँ का प्रसाद मिला हुआ होता है पर ऐसे लोग दुर्लभ हैं ।
ऐसे संत वे हैं जो
निराकार माँ के साकार रूप हैं लेकीन उनको कौन देखता है ?
ऐसे संत वे हैं जो वहाँ पहुँच कर साधन का धन्यबाद करके अपनें को भी साध्य में हवन कर दिया और
अब अपनें के लिए वे नहीं हैं , जो कुछ भी है वह सब माँ है ॥
साधन को साधन की तरह इस्तेमाल करें .....
साध्य तक पहुँच कर साधन को प्यार से धन्यबाद करें ....
और फिर साध्य में अपनें को ऐसे घुला दें जैसे ....
पानी में नमक का पुतला घुल कर स्वयं पानी कहलानें लगता है ॥

===== ॐ ========

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