Saturday, January 29, 2011

कभी इसे भी सोचना




दो किनारे हैं एक वह जहां से हम आये और
दूसरा वह जहां जा रहे हैं ॥
जहां से आये , वह अब्यक्त है , और
जहां धीरे - धीरे सरकते हुए जा रहे हैं , वह भी अब्यक्त ही है ॥
जिस रस्सी के दोनों किनारे अब्यक्त हों उस रस्सी की क्या स्थिति होती होगी ,
आप इस बात पर सोचना ।

एक और बात ----
जन्म का हाल हमें लोगों से कभी - कभी मिल जाता है और
जीवन का दूसरा किनारा है मौत जिसको भी अब्यक्त ही कहा जा सकत है क्योंकि ....
आज तक कोई ऐसा न हुआ जिसको मौत का अनुभव हो
और वह अपनें अनुभव को लोगों को बताया हो ।
कौन बता सकता है अपनें मौत को ?
कौन देख सकता है अपनें मौत को ?
और कौन समझ सकता है अपनें मौत को ?
मौत उनके लिए भय नहीं जो ....
अपनें सभी बंधनों को एक - एक करके स्वयं काट दिया हो ....
जो संसार का द्रष्टा बन चुका हो .....
जिसके लिए यह संसार एक रंगमंच सा दिखता हो ....
जो हर पल प्रभु एन रहता हो ॥
==== ॐ =====

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