Sunday, April 15, 2012

जीवन दर्शन 42

  • मुह से चुप होना अति सरल है और मन से चुप होना साधना है

  • मुह से चुप होते ही मन की रफ्तार तेज हो जाती है

  • मुह से मौन रहनें का अभ्यास मन से मौन रहनें की स्थिति में पहुंचा सकता है

  • मुह से चुप रहनें की आदत डालनें से मनोविज्ञान बदलता है

  • मनोविज्ञान में आ रहे बदलाव को गंभीरता से समझने की जरुरत होती है

  • यदि अहँकार मुह से मौन बना रहा हो तो इसे समझिए ; यह खतरनाक स्थिति में ले जा सकता है

  • लोग कभीं कभी मौन रहनें का व्रत लेते हैं , यह अभ्यास – योग का एक चरण है

  • जब आप मौन व्रत में हों तब स्वयं को निहारते रहिये

  • हठात इंद्रियों को रोकना अहंकारी बना सकता है

  • इंद्रियों की मित्रता परम सत्य का द्वार खोल सकती है

  • मौन होना अर्थात शब्द रहित होना

  • शब्द रहित होना अर्थात भाव रहित होना

  • और भावातीत की स्थिति ही ब्रह्म की स्थिति है

  • ब्रह्म की अनुभूति जब घटित होती है उस काल में वह साधक स्वयं ब्रह्म हो गया होता है

  • भावातीत की स्थिति में साधक समाधि में पहुंचा होता है

    और

  • वह संसार का द्रष्टा होता है

==== ओम्======




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