Wednesday, October 30, 2024

पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र 15 चित्त भेद के कारण वस्तु दिखती है

पतंजलिवकैवल्य पाद सूत्र : 15 


चित्तानुसार वस्तु दिखती हैं 


“ वस्तु साम्ये चित्त भेदात्  तयोः विभक्तः पंथा: “


वस्तु एक होती है पर चित्त भेद के कारण अलग - अलग दिखती है 

अर्थात वस्तु चित्तानुसार दिखती है ।


सूत्र की गंभीरता को विस्तार से समझते हैं ..

एक विषय पर लोगों की सोच अलग - अलग होती है , ऐसा क्यों ? क्योंकि सबके चित्त अलग - अलग होते हैं और चित्त भेद के कारण वस्तु एक होते हुए भी अलग - अलग दिखती है । 

अपने दैनिक सांसारिक जीवन में पतंजलि के इस सूत्र की झलक मिलती तो रहती है लेकिन हम  समझने की कोशिश नहीं करते । दो लोग जब एक विषय पर विचारों का आदान - प्रदान कर रहे होते हैं तब उनमें मत भेद स्पष्ट दिखता  है ; कुछ के मत एक से होते हैं और कुछ के भिन्न होते हैं।

मूलतः चित्त ( बुद्धि , अहंकार और मन का समूह ) जड़ और त्रिगुणी हैं अतः उसे स्वयं का पता नहीं होता के वह कौन है, फिर विषय के बारे में क्या जान सकता हैं । लेकिन शक्छ चेतन पुरुष की संगति चित्त विषय धारण करता है । चित्त त्रिगुणी प्रकृति का कार्य है और हर पल बदलते रहना गुणोंका धर्म है ।  गुणों में हो रहे बदलाव , कर्म होने का  कारण है । गुण और कर्म के इस संबंध को वेद गुण विभाग एवं कर्म विभाग कहते हैं ।

 जब दो लोग एक विषय पर विचार कर रहे होते हैं तब उस काल में उन दोनों के चित्तो के गुण समीकरण अगर एक जैसा हुआ , तो दोनों में मत भेद नहीं होगा अन्यथा , मत भेद होगा ही । ऐसी परिस्थिति में तत्त्व ज्ञानी विषय पर बहस नहीं करता ।

महर्षि पतंजलि कैवल्यपाद सूत्र - 15 में कह रहे हैं …

मत भेद चित्त भेद के कारण होता है अतः इस सत्य को समझते हुए तत्त्व ज्ञानी समभाव में रहते हैं । मूढ़ की बातों से तत्त्व ज्ञानी विचलित नहीं होते और अपनी सोच को मनवाना भी नहीं चाहते।

बुद्ध पुरुषों में मत भेद नहीं होता ।

~~ ॐ ~~

Wednesday, October 23, 2024

संसार की सारी सूचनाएं त्रिगुणी हैं और उनके धर्म भी त्रिगुणी होते हैं

पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र 13,14 

( सभीं धर्म परिवर्तनशील एवं त्रिगुणी होते है  )

कैवल्यपाद सूत्र - 13 (धर्म त्रिगुणी होते हैं )

  

धर्म चाहे  व्यक्त हो या सूक्ष्म , सभीं धर्म त्रिगुणी होते हैं ।

इस सूत्र में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक सा है कि धर्म त्रिगुणी क्यों होते है ? अतः इस संदेह के संदर्भ में कैवल्यपाद का अगला सूत्र : 14 को भी देखना होगा ..

कैवल्यपाद सूत्र - 14  


परिणामैकत्वाव्दस्तु तत्त्वम् 


“ परिणाम एक होने से वस्तु तत्त्व एक होता है “

अब ऊपर व्यक्त दोनों सूत्रों के भावार्थ को एक साथ देखते हैं ⤵️


प्रकृति त्रिगुणी है अतः प्रकृति निर्मित वस्तु त्रिगुणी ही होगी । गुणों के आधार पर कारण और कार्य एक समान होते हैं । संसार में जो भी था , जो भी है और आगे जो भी होने वाला है , वे सब ' पुरुष ' और ' प्रकृति ' , दो तत्त्वों के संयोग से थे , हैं और आगे भी होते रहेंगे । 

पुरुष और प्रकृति दोनों तत्त्व सनातन है और एक दूसरे के विपरीत गुणों वाले हैं । पुरुष शुद्ध चेतन तत्त्व है और प्रकृति

 (मूल प्रकृति) तीन गुणों की साम्यावस्था को कहते हैं और वह जड़ तत्त्व होते हुए  प्रसवधर्मी भी है । पुरुष ऊर्जा से प्रकृति की त्रिगुणी साम्यावस्था विकृत हो उठती है जिसके फलस्वरूप प्रकृति - पुरुष से उत्पन्न 23 तत्त्वों एवं प्रकृति - पुरुष से 14 प्रकार की सृष्टियों की निष्पति हुई है जिनमें एक मनुष्य भी है । प्रकृति एवं प्रकृति के कार्य रूप में उसके 23 तत्त्व त्रिगुणी एवं जड़ है और इन सभी के अपने - अपने त्रिगुणी धर्म भी होते हैं । गुणों का धर्म है हर पल बदलते रहना अतः इनसे निर्मित तत्त्वों के धर्म भी बदलते रहते होंगे क्योंकि हर कार्य में उसका कारण उपस्थित होता है अर्थात कार्य और कारण , दोनों का एक धर्म होता है।

संसार में व्यक्त सूचनाओं में मनुष्य एक मात्र ऐसा है जिसमें गुणातीत होने की संभावना होती है। योगाभ्यास के निरंतर अभ्यास के फलस्वरूप , कैवल्य है जिसमें पुरुषार्थ शून्य हो गया होता है और वह योगी गुणातीत होता है । गीता अध्याय - 14 में अर्जुन गुणातीत योगी के लक्षणों को जानने की जिज्ञासा भी दिखाते हैं । कैवल्य पाद के आखिरी सूत्रों में कैवल्य की बात बताई गई हैं , जिन्हें हम आगे चल कर देखेंगे।

~~ ॐ ~~

Saturday, October 19, 2024

पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र 12 वासनाओं का धर्म बदलता रहता है


कैवल्य पाद सूत्र :12 

अतीतानागतम्  स्वरूपतः अस्त्यध्वभेदात्  धर्माणाम् ।

 अतीत-अनागतम् - स्वरूपतः अस्ति-अध्व-भेदात्-धर्माणाम् 

सूत्र के शब्दों के अर्थ …

अतीत >  भूतकाल अनागतम् > भविष्यकाल 

स्वरूपत: >  पदार्थ या वस्तुएँ अपनें स्वरूप में  

अस्ति > है अध्व > काल भेदात् > भेद या अन्तर से धर्माणाम् > धर्मों का

कैवल्य पाद सूत्र : 12 का भावार्थ 

कैवल्य पाद सूत्र : 7,8,10 ,और सूत्र 11,कर्म एवं कर्म वासनाओं से संबंधित थे , जिनमें सूत्र - 10 में बताया गया कि मनुष्य कभी यह नहीं सोचता कि उसका जीवन सीमित है,उसकी इस सोच के कारण उसकी कर्म वासनाएं अनादि हैं ।  अब सूत्र 12 में महर्षि पतंजलि कह रहे हैं…

वासनाएं कभीं भी नष्ट नहीं होती , भूत में थी , वर्तमान में हैं और भविष्य में भी रहेंगी लेकिन काल भेद के कारण , उनके धर्म में परिवर्तन आता रहता है । अब यहां वासनाओं के धर्म को समझना होगा । इंद्रिय , मन , बुद्धि , अहंकार , तन्मात्र और महाभूत आदि सभी तत्त्वों के अपने - अपने धर्म होते हैं । धर्म शब्द धारणा से बना हुआ है जिसकी परिभाषा पतंजलि विभूति पाद सूत्र - 1 में कुछ निम्न प्रकार से दी गई है 🔽

<> देश बंध: चित्तस्य , धारणा <>

अर्थात चित्त को किसी आलंबन से बांधना, धारणा है । किसी तत्त्व का धर्म वह होता है जिससे वह बधा हुआ होता है अर्थात उसका वह अपरिवर्तनीय गुण जो उसे चलाता है , उसका धर्म होता है । यहां इस संदर्भ में विभूति पाद सूत्र - 14 को भी देखना चाहिए जो निम्न प्रकार है 🔽

शांतोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी 

शांत + उदित + अव्यपदेश + अनुपाती + धर्मी 

सूत्र शब्दार्थ 

 शांत (भूत काल )  , उदित (वर्तमान काल ) , अव्यपदेश्य (जिसके बारे में न कहा जा सके अर्थात भविष्य काल )धर्म अनुपाती , धर्मी  ।

सूत्र भावार्थ 

 धर्म के लिए धर्मी चाहिए जैसे शक्ति के लिए शक्तिमान चाहिए। भूत ,वर्तमान और भविष्य में जो रहता हो वह धर्मी है और तीन काल ( भूत , वर्तमान और भविष्य ) धर्म हैं । पतंजलि योग दर्शन की बुनियाद सांख्य दर्शन है , इसलिए यहाँ सांख्य के सत्कार्य बाद को अपनाया गया है । सत्कार्य बाद अर्थात कारण - कार्य बाद  बिना धर्मी ,धर्म की कोई सत्ता नहीं और बिना कारण किसी कार्य की कोई सत्ता नहीं होती ।हर कार्य में कारण विद्यमान रहता है ।

~~ ॐ ~~

Thursday, October 17, 2024

चाहे जन्म जिस योनि में हो लेकिन पिछले जन्म की स्मृति और संस्कार में कोई बदलाव नहीं होता


पतंजलि कैवल्यपाद सूत्र : 09 

 पिछले जन्म के संस्कार 

जाति देश काल व्यवहितानाम प्यानन्तर्यम्  स्मृतिसंस्कारयो: 

जाति , देश और काल का व्यवधान होने पर भी स्मृति एवं संस्कार में एक रूपता होने के कारण कोई व्यवधान नहीं होता । 

अर्थात 

अगला जन्म चाहे जिस योनि में हो , जिस जगह हो और जिस काल में हो पर पिछले जन्म की स्मृति और संस्कार में कोई परिवर्तन नहीं आता ।

सनातन , अचेतन और तीन गुणों की साम्यावस्था वाले जड़ प्रकृति तत्त्व तथा सनातन ,चेतन , निर्गुणी और स्थिर पुरुष संयोग से हम हैं। पुरुष तत्त्व प्रकृति तत्त्व को समझने के लिए उससे संयोग करता है । संयोग के फल स्वरूप प्रकृति की त्रिगुणी साम्यावस्था विकृत हो उठती हैं और प्रकृति कार्य रूप में उत्पन्न 23 तत्त्वों में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं । । चित्त केंद्रित होते ही अकरता पुरुष करता जैसा व्यवहार करने लगता है और प्रकृति को समझना चाहता है । पुरुष , प्रकृति को समझते ही अपने मूल स्वरूप में आ जाता है और उस योगी को दूसरा जन्म नहीं मिलता  वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है । यहां ध्यान रखना होगा कि पुरुष का पुनर्जन्म नहीं होता , प्रकृति आवागमन करती है , चित्त केंद्रित पुरुष को कैवल्य दिलाने हेतु ।

~~ॐ ~~

Tuesday, October 15, 2024

पतंजलि योग दर्शन में कर्म और कर्म वासना

पतंजलि योग सूत्र कैवल्य पाद में कर्म और कर्म वासना 

कैवल्य पाद सूत्र : 7 , 8 , 10 , 11


पतंजलि कैवल्य पाद सूत्र 7 , 8 , 10 और सूत्र 11 का संबंध कर्म और कर्म - वासना से है अतः सूत्रों में उतरने से पहले कर्म और वासना को समझ लेते हैं ।

 कोई भी जीवधारी पल भर के लिए भी कर्म मुक्त नहीं रहता। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार त्रिगुणी प्रकृति और निर्गुणी पुरुष के संयोग से हम सब दृश्य वर्ग हैं । प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणी 23 तत्त्व ( बुद्धि , अहंकार , 11 इंद्रियां , 5 तन्मात्र , 5 महाभूत ) में बुद्धि , अहंकार और मन के समूह को चित्त कहते हैं । निर्गुणी शुद्ध चेतन पुरुष सगुणी, जड़ चित्त केंद्रित होता है और इन 23 तथ्यों के माध्यम से त्रिगुणी पदार्थों को भोगता है । भोग फल रूप में मिलने वाले सुख और दुःख का भोक्ता भी पुरुष ही है । गुणों का हर पल बदलते रहना स्वभाव है । देह में हर पल गुणों में हो रहा बदलाव एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न करता है जिसे कर्मणकरणी की ऊर्जा कह सकते हैं । गुणों केन्परिवर्तन से सात्त्विक , राजसी और तामसी , तीन प्रकार के कर्म होते हैं । मूलतः सात्त्विक कर्म  ज्ञान केंद्रित, राजस कर्म भोग केंद्रित और तामस कर्म आलस्य , मोह और भ्रम केंद्रित होते हैं। सात्त्विक कर्म होने में अहंकार की अनुपस्थिति होती है , राजस कर्म में धनात्मक फैला हुआ अहंकार होता है जो दूर से दिखता है और तामस कर्म में सिकुड़ा हुआ अहंकार होता हैं , जिसे केवल सांख्य योगी पहचान पाते हैं। समयांतर में जब भी सिकुड़ा हुआ नकारात्मक अहंकार फैले हुए धनात्मक अहंकार में बदलता है तब राजसी कर्म होते हैं ।

कर्म वासना कर्म नशा है ; कर्म वासना में चित्त कर्म मुखी हो जाता है  और मनुष्य उस कर्म का गुलाम बन जाता है । अब पतंजलि कैवल्यपाद सूत्र - 7 , 8 , 10 और सूत्र - 11 को समझते हैं ।

कैवल्य पाद सूत्र - 07 ( कर्म के प्रकार )

“ कर्म अशुक्ल अकृष्ण योगिनस्त्रि विध मितरेषाम् “

योगी के कर्म अशुक्ल एवं अकृष्ण , दो प्रकार के होते हैं और 

अन्य लोगो के कर्म शुक्ल , कृष्ण और शुक्ल - कृष्ण मिश्रित , तीन प्रकार के होते हैं ।

 अशुक्ल एवं अकृष्ण कर्म निष्काम कर्म या निवृत्ति परक कर्म होते हैं और शुक्ल , कृष्ण एवं मिश्रित कर्म प्रवृत्ति परक कर्म होते हैं ।

कैवल्य पाद सूत्र : 08 ( कर्म वासनाएँ )

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेव 

अभिव्यक्ति: वासनानाम् 

ऊपर कैवल्य पाद सूत्र - 7 में बताए गए 03 प्रकार के कर्मों के फलानुसार उनकी अपनी - अपनी कर्म वासनाएं उत्पन्न होती हैं अर्थात कर्म से कर्म वासना की उत्पत्ति होती है , जैसा कर्मभोग , उसकी वैसी वासना ।

कैवल्य पाद सूत्र : 10 ( वासनाएँ अनादि हैं )

तासामनादित्वम् चाशिषो नित्यत्वात् 

प्राणियों में सदैव जीवित रहने की गहरी सोच के कारण , उनकी वासनाएं अनादि होती हैं ।

कैवल्य पाद सूत्र - 11 ( वासनाओं की संग्रह भूमियाँ )

हेतु फल आश्रय आलंबनै: संगृही तत्वादेषामभावे तदभावः ।।

ऊपर सूत्र में वासनाओं की निम्न 04 संग्रह भूमियाँ बताई गई हैं 🔽

हेतु ,फल ,आश्रय और आलंबन 

अब इन 04 वासना की संग्रह भूमियों को समझते हैं …

1- हेतु > वासनाओं के उठने के कारणों को हेतु कहते हैं और अविद्या कर्म वासनाओं की हेतु है । 

अविद्या क्या है ?

# अविद्या ,अस्मिता , राग , द्वेष और अभिनिवेष , 05 क्लेश हैं । इन पांच क्लेशों में अविद्या शेष 04 क्लेशों की जननी हैं ~साधन पाद सूत्र : 3~

# जबतक क्लेष निर्मूल नही होते , सुख - दुख मिलते रहेंगे और आवागमन से मुक्ति नहीं मिल सकती  ~साधन पाद सूत्र : 13+14~

# अनित्य को नित्य , अशुचि को शुचि , दुःख को सुख और अनात्म को आत्म समझना अविद्या है जिसे विपर्यय या अज्ञान भी कहते हैं ~ साधन पाद सूत्र : 5 ~

# अविद्या का अभाव , दुःख का अभाव है और यही कैवल्य है 

~ साधनपाद सूत्र - 25 ~

2 - फल > कर्म फल की सोच , वासनाओं की संग्रह भूमि है ।

3 - आश्रय > चित्त कर्म वासनाओं की संग्रह भूमि है और चित्त को कर्माशय भी कहते हैं ।

4 - आलंबन > तन्मात्र , वासनाओं के आलंबन हैं।

~~ ॐ ~~