Monday, October 7, 2013

ध्यान की आँखे

● ध्यान की आँखे ●
1- मनुष्य सोच कर और पशु सूंघ कर निर्णय लेते
हैं ।
2- स्थावरों में भोजन संचार नीचे से ऊपरकी ओर होता है ।
3- मनुष्यमें भोजन संचार ऊपरसे नीचे की ओर होता है ।
4- प्रकृति में जो सूचनाएं हैं वे सभी मनुष्य आश्रित हैं और मनुष्य प्रकृति आश्रित है। लेकिन मनुष्य इस बातको भूल रहा है ।
5- आप मुझे नीचा कर सकते हैं लेकिन कोई है जरुर जिसकी नज़र आप पर है , वह एक दिन आपको भी नीचे कर देगा ।
6- भाग लो तबतक जबतक श्वासे चल रही हैं , लेकिन इतनी बात अपनी सोच में रखना कि मिलेगा यहाँ वही जो प्रकृति देना चाहती है । हम दौड़ रहे हैं कुछ और पानें हेतु लेकिन इस लालच की दौड़ में कुछ हर पल खो भी रहे हैं जिसके प्रति हम बेहोशी में हैं। इतना तो सोचो ,जहांसे हम आये हैं ( प्रभु ) वहाँ किस चीज की कमी थी ? जब वहाँ सब है फिर यहाँ आयेही क्यों ? इस भिखारी संसार में । यहाँ बार - बार हमें हमारी भ्रमित चाह लाती रहती है , जिसे हम समझना नहीं चाहते और जिस दिन समझ गए , आनें - जानें से मुक्त हो जायेंगे ।
7- संसारमें पूर्णरूपसे डूबे ब्यक्तिकी आँखें सत्य को नहीं पकड़ पाती ।
8 - परम भोग ध्यानका प्रसाद है और इन्द्रिय भोग ध्यान की रुकावट ।
9- काम , कामना , क्रोध , लोभ और अहंकार में से किसी एक की समझ सबकी समझ होती है क्यों की ये तत्त्व राजस गुणके हैं ।
10- आलस्य , लोभ , अधिक निद्रा और मोह में से किसी एक की समझ सबकी समझ है क्योंकि ये तत्त्व तामस गुणके हैं ।
~~~ ॐ~~~

Monday, September 30, 2013

एक नज़र - 2

● एक नज़र - 2 ●
1- सब लोग शांतिकी खोज में हैं लेकिन शांति में कोई बसना नहीं चाहता क्योंकि शांति मौत के मार्ग को दिखाती है ।
2- परायेको अपना बनाते - बनाते अपनें पराये हो जाते हैं और भनक तक नहीं मिल पाती , है न मजे की बात ?
3- जो खुश हैं इस संसार में वे या तो ब्रह्म वित् हैं या पूरे मूढ़ , दूसरा खुश हो नहीं सकता ।
4- मन और मन नियंत्रित इन्द्रियोंसे प्यार हो नहीं सकता , प्यार तो उनको मिलता है जो प्रभुमें बसेरा करते हैं ।
5-पृथ्वी उन पर हसती है जो इसे अपना गुलाम रूप में देखते हैं , वह कहती है - देख अपनें गुलामके दिलको , तूँ जब भी पनाह के लिए परेशान होगा , कोई तेरे अपनें तुमको पनाह न देंगे तब तुम मेरे पास आना , ढाई गज जगह तेरेको तो मिलेगी ही ।
6- भिखारी हो या सम्राट सबको एक दिन इस मिटटी में मिल जाना है ।
7- क्यों इतनी तेज गतिसे सब भाग रहे हैं ? कुछ तो कारण होगा ही । सब लोग दुःख से दूर सुख में सर्वोपरि स्थान पर आखिरी श्वास भरना चाहते हैं लेकिन सच्चाई क्या है ?
8- जिसे हम अपना बनाते हैं वह पराया हो जाता है , क्या हममें कोई कमी है ?
9- जिस डाल को हम हिलाते हैं उस डाल से आम नही टपकता , टपकता कहीं और से है फिर हम
बार - बार क्यों डाल हिला रहे हैं ?
10- जिस पेड़पर फूल खिल रहे होते हैं उसके नीचे जमीन पर कल के खिले फूल आखिरी श्वास भर रहे होते हैं लेकिन अपनीं आगे की पीढ़ी की मुस्कान देख कर वे खुश रहते हैं ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, September 24, 2013

एक में अनेक

●● एकमें अनेक●●
1- दर्द की दवा है श्रद्धा , श्रद्धा भक्तकी उर्जा है , जिसका केंद्र है भगवान जहाँ दर्द आनंदका ही एक रूप होता है
2- है न कमाल ! उसे सभीं खोज रहे हैं , और वह सबको देख रहा है
3- वह जिसके रूप, रंग , गंध , स्पर्शका कोई इल्म नहीं उसे हम खोज रहे हैं
4- देखते हैं और रोज देखते हैं कि डूबता सूरज वही है जिसे उगते समय हम जल चढ़ाये थे लेकिन यह भूल जाते हैं कि जन्म जिस तख्ती पर लिखा है उसी पर दूसरी तरफ मौत भी लिखा है
5- मौतका भय उसके लिए है जिसके ह्रदयमें प्रभुके लिए कोई जगह नहीं
6- कुछ भी कर लो , कुछ भी बन जाओ लेकिन तबतक चैन न मिलेगा जबतक भक्ति की हवा नहीं लगती
7- कुछ दिन और , फिर देखना जैसे जंगलमें बीमार पशुका अंत होता है वैसा अंत निर्धन ब्यक्तियोंका राज पथों पर होगा
8- पहले सर दर्द - बदन दर्द होता था जिसके इलाजके लिए वक़्त मिल जाता था लेकिन अब तो हृदयदर्दके मरीज ज्यादा हो रहे हैं जहां इलाजके लिए वक़्तही नहीं मिल पाता
9- मुट्ठी भर लोग हैं जो अपनीं चादर से पृथ्वी को ढक रखा है , उनके ही मंदिर हैं , उनके ही ऋषि लोग हैं , उनके ही अदालते हैं और उनके ही राजा हैं लेकिन इस संसारमें प्रजाकी उंगली पाकड़ने वाला कोई नहीं है , अगर कोई होगा तो वह परमेश्वर ही होगा
10- शांति सभीं चाहते हैं पर शांत कोई नही रहता ~~~~ ॐ ~~~~

Tuesday, September 17, 2013

सिद्धोकी बस्ती - 1

¢ सिद्धो की बस्ती - ¢ 
" In the oriental conception , there is something that exists beyond the ordinary perception of things which is beyond the minds' reasoning . " 
~~ Einstein ~~ 
°° जो राग-द्वेषसे सम्मोहित हैं , उनके लिए एक संदेह भरी कल्पना है । 
°° जो तत्त्व योगीका बसेरा है । 
°° जो खोजिओं का लक्ष्य है ।
 ● उस सिद्ध लोगोंकी बस्तीकी एक झांकी आपको यहाँ दिखानेंका असफल प्रयास किया जा रहा है , आइये ! ध्यान -मार्गसे चलते हैं उस बस्तीकी ओर :----
 सन्दर्भ : भागवत : 9.12 , 9.22 , 11.15
 <> श्री रामके पुत्र कुशसे आगे 19वें बंसज मरू एवं कौरव -पाण्डव बंशमें शंतनुके बड़े भाई देवापि सिद्ध हैं ,दोनों आज कलाप गाँवमें रह रहे हैं । कहाँ हो सकता है यह कलाप गाँव ? ऐसी सिद्धों की तीन बस्तियाँ हैं जो आज भी रहस्य दर्शियों और खोजिओंके लिए रहस्य हैं - काशी , कूफा और कलाप ।
 ** कलियुगके अंतमें सूर्य -चन्द्र बंशी क्षत्रियोंका बंश जब समाप्त हो जायेगा तब ये दोनों - मरू एवं देवापि क्रमशः सूर्य बंश एवं चन्द्र बंशकी पुनः स्थापना करेंगे ,यह बात भागवतमें है । 
● क्या हैं यह सिद्धियाँ ? 
<> प्रभु श्री कृष्ण अपनी स्वधाम यात्राके समय अपनें मित्र उद्धवको उपदेश देते समय 18 प्रकार की सिद्धियोंको ब्यक्त कियाहै। सिद्धि साधनासे प्राप्त वह आयाम है जहाँ साधक अपनीं इन्द्रियोंसे वह करनें में सक्षम होता है जो एक सामान्य ब्यक्ति के लिए अचम्भा है । 
^^ कौन है सिद्ध ? 
सिद्धि प्राप्त योगी अभेद्य दीवारों , चट्टानों आदि से गुजर सकता
 है , अपनेंको मनकी गति से चला सकता है , अपनीं कल्पना करनें मात्र से बस्तुओंको प्राप्त कर सकता है , स्व इच्छासे अपनें रूप -रंगको बदल सकता है , दृश और अदृश्य दोनों मेंरह सकता है , भोजन ,वायु और पानी बिना रह सकता है और त्रिकाल दर्शी होता है । 
^^ सिद्धि क्या है ? 
 साधनाके पूर्ण होनें पर सिद्धिका आयाम मिलता है । सिद्धि प्राप्तिके बाद जो लोग सिद्धि का प्रयोग ब्यापार की तरह करनें लगते हैं और पुनः नियमित ध्यानको त्याग देते हैं ,वे धीरे -धीरे अपनीं विशुद्ध उर्जा खोनें लगते हैं और पुनः भोग में उतर आते हैं । सिद्धि प्राप्तिके बाद जो सिद्धिका प्रयोग नहीं करते और ध्यानका त्याग भी नहीं करते उनको परम गति मिलती है और वे आवागमन से मुक्त हो जाते हैं । 
<> सिद्ध पुरुष जो परमात्मामें अपना बसेरा बना रखा होता है उसे भोगी नहीं देख सकता। 
● भागवतमें ब्यक्त कलाप गाँव ठीक अल्कूफा गाँव जैसा है जो सिद्ध सूफी संतोंकी बस्ती है और जिसको फ़्रांसिसी खोजी पिछले पांच सौ सालसे खोज रहे हैं । अल कूफा गाँव इरान -ईराक के रेगिस्तान या सऊदी अरबके रेगिस्तानमें कहीं है लेकिन अभीं तक कोई ब्यक्ति ठीक तरहसे इस अदृश्य गाँवको पकड़ नहीं पाया है पर इसके होनें के कई प्रमाण मिल चुके हैं । 
<> बुद्ध मान्यतामें ऐसे सिद्धों को अरहन्त और जैन परम्परामें जिन कहते हैं । जो ध्यानकी उस परम गहराई को छूता है जहाँ से परम पदकी सीमा प्रारम्भ होती है , वह सिद्ध होता है । सिद्ध चाहे तो परम धाम जा सकता है और चाहे तो ध्यानियोंको मार्ग दिखानेंके लिए मृत्यु लोकमें रह सकता है । सिद्ध साकार और निराकार दोनों आकारोंमें भ्रमण करते हैं । 
<> ध्यानका पुजारी जो निर्विकार स्थिति में अपनें भ्रमण कालमें जब सिद्ध क्षेत्रसे गुजरता है तब वह क्षेत्र उसे खीचनें लगता है और उस क्षेत्रसे बाहर वह नहीं होना चाहता। 
 ● जहाँ जाने - अनजानें में पहुचनें पर बाहर की निर्विकार उर्जा नाभि मार्गसे देहमें भरनें लगे और देह रोमांचित हो उठे और ऐसा लगनें लगे कि हमें वह मिल गया है जिसकी हमें तलाश थी , तो वह क्षेत्र सिद्धों का क्षेत्र होता है ।वह जो वहाकं की ऊर्जा की तीब्रता को सहनें नें सक्षम हो कर वहाँ रुक जाता है ,वह उसे पा लेता है जिसके लिए वह कई जन्मों से भाग रहा है । 
● सिद्ध समयातीत होते हैं । सिद्ध भोगीको पहचानते हैं पर भोगी सिद्धको नहीं पहचानता। 
<> इजिप्तमें पिरामिडकी ख़ोज करनें वाले लोगों में कितनें ऐसे हैं जो सत्यको देखते ही आम लोगोंके लिए पागल सा दिखनें लगे क्योंकि वे जो देखे , उसे न औरोंको दिखा सके और न उसे ब्यक्त कर पाए अतः लोग उन्हें पागल की संज्ञा दे दिए । पिरामिडोंके अन्दर जानें पर ऐसे लोग , वैज्ञानिक थे लेकिन अन्दर जानेंके बाद उनकी उर्जा बदल गयी ,वे सत्य को देखनें में सफल हुए पर बाहर आ कर अपनें अनुभूति को ब्यक्त न कर पाए और उनके अपनें ही साथी पागल कहनें लगे। आज तक इस बात पर कोई अनुसंधान नहीं हुआ की आखिर ऐसे लोग क्यों अपनी स्मृति खो दी ? 
* अल्कूफाकी खोज करनें वालों में भी बहुतसे लोग पागल हो चुके हैं , आम लोगोंकी दृष्टिमें लेकिन वे पागल नहीं हैं , उनका मार्ग भर बदल गया है , वे सत्य को समझ गए हैं पर सत्य को ब्यक्त नहीं कर पाए । 
** सत्य भोग केन्द्रितके लिए एक भ्रम है और योगीके लिए भोग एक सहज मार्ग है जो सत्यमे पंहुचा सकता है । 
** भोग की सीमा जहां समाप्त होती है वहांसे ध्यान प्रारम्भ होता
 है । 
** ध्यानमें आँखे बंद होती हैं पर मार्ग स्पष्ट दीखता रहता है । 
** ध्यानके पीठ पीछे भोगका आयाम होता है और भोगकी ग्रेविटी बहुत शक्तिशाली है । 
** ध्यान वह चिराग है जो वह रोशनी देता है जिससे अब्यक्त ब्यक्त हो उठता है । 
** सिद्ध बस्तीमें ऐसा ब्यक्ति जो भोगके आखिरी सीमा पर खड़ा होता है , वहाँ का ऊर्जा क्षेत्र उसके अन्दर की ऊर्जा को रूपांतरित कर देता है और वे अपनें राग -द्वेष एवं अहंकारसे बनी स्मृति को खो कर अपनें मूल स्मृति में पहुँच जाते हैं । 
** ऐसे ब्यक्ति भोग संसार के लिए पागल होते हैं और साधनाके लिए सिद्ध योगी होते हैं। 
 ~~~ ॐ ~~~

Sunday, September 15, 2013

स्व चिंतन - 01

● स्वचिंतन ●
1- स्व दर्पण पर अपनें मूल चेहरे को देखो लेकिन इस दर्पण को साफ़ तो करना ही होगा जो ध्यानसे संभव है ।
2- अपनीं आँखोंसे मोहका चस्मा उतारो और निर्मोह आँखोंसे जो दिखे उस पर सोचो नहीं , उसे अपनें हृदय में पहुँचाओ , तुम्हें आश्चर्य होगा कि वह तुम्हारे हृदय में पहले से है ।
3- जब सबमें तुम और तुममें सब दिखनें लगें तब आँखें स्वयं बंद हो जाती हैं ।
4- जो कल आपके साथ थे , उनमेंसे कुछ आज आपके साथ न होंगे , जो आज आपके साथ हैं उनमें से कुछ कल न होंगे और यह चक्र चलता ही रहेगा । आप कल भी चुक गए थे , देखना आज भी न चूक जाना , बार - बार चुकनें से जीवन सत्य से दूर होता जाता है । जो आप को आज मिला है , वह आपको कुछ दे रहा है लेकिन आप तो अपनीं मुट्ठी बंद किये और आँखें बंद किये उनकी ओर पीठ किये बैठे हो फिर इस स्थितिमें आपको क्या मिलेगा ? क्या बार - बार चुकते रहनें के लिए प्रभु आप को भेजा है ? जीवन भाग रहा है आगे की ओर और आप सरक रहे हैं पीछे की ओर फिर ऐसे में आपको एक बेहोशी भरी मौत के अलावा और क्या मिलेगा ? प्रभु आप से पूछेगा कि तुमको इतनें मौके मिले लेकिन तुम गवाते रहे , आखिर तुम मनुष्य योनि में रहते हुए पशु - जीवन गुजारा अतः अब तुमको वही मिल रहा है जो तुमको भाता रहा है , जाओ और अगला जीवन काम - भोजनकी तलाश में गुजार कर जब तृप्त हो जाना तब पुनः मेरे पास आना ।
5- जिनके कारण तुम सम्राट बन कर चल रहे हो , उनको धन्यबाद देना भी नहीं चाहते ? ज़रा अकेलेमें सोचना कि प्रभुके सामनें जब तुम और ओ आमानें सामनें होगे तब तुम्हारी स्थिति क्या होगी ?
6- अभी भी वक़्त है , अभी तुम इतनी ऊचाई पर नहीं पहुँचे जहाँ से नीचे गिरनें से तुम्हारा अस्तित्व खतरेमें पड़ जाय , जाओ और उनका नमन करो जिनके प्रसादसे तुम यहाँ तक का सफ़र किये हो ।
~~~~ ॐ ~~~~

Monday, September 9, 2013

यह शरीर किसकी संपत्ति है ?

● यह शरीर किसकी संपत्ति है ? ● 
1- क्या उसकी जो इसका भरण -पोषण करता है ? 
 2- क्या उसकी जो अपना बीज देकर इसे पैदा किया है ?
 3- क्या उसकी जो इसे 09 माह अपनें गर्भमें रखी ? 
 4- क्या पत्नी/पतिकी जो इसका भोग करती/ करता है ?
 5- क्या नाना / नानीकी जो इसकी मूल हैं ? 
6- क्या उस अग्निकी जो इसे अंत में राख बना देती है ? 
 7- क्या उस धरतीकी जो इसके अस्तित्वको अपनें में मिला लेती है ? 
8- क्या उस प्रकृतिकी जिसमें यह रहता है ?
 9- क्या उस पशुकी जो इस आस में बैठा है कि कब मौका मिले और मैं उसे अपना भोजन बनाऊँ ? 
 10- क्या उस बंसजकी जो इससे हुआ है ?
 <> जी नहीं ---- 
°° यह शरीर माया निर्मित एक संकेत है जो उसे दिखानेंकी कोशिशमें अस्तित्वको खो देता है , जो इसमें रहता है ।
 °° यह शरीर एक माध्यम है , उस अब्यक्त अप्रमेय सनातन को समझननेंका जिससे यह है । 
°° यह एक ब्रिज है जो भोग -योगको सम्हालता है ।
 °° यह भक्त है उसका जो इसमें रहता है और जब वह निकलता है इसके बाहर, तब यह अपना अस्तित्त्व खो देता है ।
 ~~~ ॐ ~~~

Sunday, September 8, 2013

फिर वही

●● फिर वही ●●
1- भोग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण होता है और योग में जो होता है उसके पीछे कोई कारण नहीं होता ।
2-भोगकी यात्रा सुनितोजित यात्रा होती है और योगकी यात्रा एक घटना है जो कभीं भी किसीके साथ घट सकती है ।
3- विधि - विधान और तर्क आधारित यात्रा करनें वाले चूक जाते हैं और प्रकृति पर जो आश्रित हो कर सहज जीवन जीते हैं वे पहुँच जाते हैं ।
4- सुबहसे देर रात तक ब्यस्त जीवनसे आज आप को जो मिला क्या उससे आप संतुष्ट हैं ? यदि नहीं तो क्यों ? अपनीं असफलताके लिए अपनें परिवारके किसी कमजोर इकाईको बलिका बकरा न बना कर , आप स्वयं में झाँक कर देखें कि चूक कहाँ हुयी ।
5- जो आप प्राप्त करना चाहते हैं क्या वह आप को तृप्त कर देगा और यदि आप तृप्त हो भी जाते हैं तो कितनें समय के लिए ? तृप्तता क्षणिक क्यों होती है , कभीं क्या इस बिषय पर आप सोचते हैं ?
6- गुण प्रभावित मन - बुद्धिसे जो प्राप्त होता है उसकी तृप्तता क्षणिक ही होती है और जिस घडी बिना कामना - मोह या अहंकार से जो होता है उसका फल चाहे जो हो पर वह आप को पूर्ण तृप्त कर देगा । 7- ज्यादा नहीं केवल दो को जो अपनें जीवन में समझ लिया , वह योगी हो गया , वे दो तत्त्व हैं कामना और अहंकार ।
8- कामना - अहंकार की गांठें मृत्युके बाद भी वैसी बनी रहती हैं ।
9- मोह और भय का आपसी गहरा प्यार है , दोनों साथ - साथ रहते हैं ।
10- मोहका अहंकार मीठा जहर है और कामना का अहंकार दूर से दिखता है ।
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, September 3, 2013

कुछ

●● कुछ ●●
1- इस देहको धोते रहनें केलिए इसे ढ़ोते रहो जबतक यह स्वतः निर्विकारमें न मिल जाए ।
2- आपसे जो कुछ भी हो रहा है उसे प्रभुका
आदेश - पालन समझ कर करते रहो , उसका करना ही प्रभु की पूजा है ।
3- न किसीसे प्रभावित होओ न किसीको प्रभावित करो ।
4- स्वयंमें उस रोशनीको तलाशते रहो जो अन्धकारमें भी आप जो राह दिखाती है ।
5- जबतक प्रभुकी खोज भोग आधारित होगी प्रभु आपको अब्यक्त ही रहेगा ।
6- पहले इस बातको सोचो कि आप प्रभुसे क्यों जुड़ रहे हो ? प्रभु इस बातको समझता है और वह दिखाई नहीं देता ।
7- संसार धोखा देने - लेने की मंडी बन गया है लेकिन प्रभुको क्यों धोखा दे रहे हो ?
8- अपनेंको कुछ भी बना लो लेकिन उसके सामनें तो सर स्वतः झुक जाता है ।
9- आज जो हैं कल वे न होंगे और जो कल होंगे वे परसों लुप्त हो जायेंगे चाहे वे नदी हों , पहाड़ हों या और कुछ हों लेकिन प्रभु कालसे अप्रभावित वैसा ही रहेगा ।
10- जितना बाहर देखते हो उसका 1/10 भाग भी अगर अपनें अन्दर देखनें का अभ्यास करो तो वह दिखनें लगेगा ।
~~~~ ॐ ~~~~

Thursday, August 29, 2013

कभी कभी

●● कभीं कभीं ●●
1- संसारमें स्वकी और स्वमें प्रभु की खोज जीवनका केंद्र होना चाहिए ।
2 - संसारमें जिसे देखो चाहे वह गृहस्थ हो या
योगी , सबका रुख एक तरफ है , है न कमालका बिषय ; सभीं हर पल एक ही ओर देख रहे हैं और वह आजका परम है भोग ।
3 -प्रभु तो कोरे कागज़ जैसा जीवन दिया था , उसको रंगीन बनाते - बनाते हमनें उसे क्या बना दिया ?
4 - जीवन भर हम दूसरोंमें उसकी अच्छाई को भी बुराईकी शक्लमें देखते रहते और अपना खून जलाते रहे ,एक बार , केवल एक बार अकेलेमें ही सही , अपनें अन्दर हमें खोजना चाहिए की क्या हमारे अन्दर कोई खोट नहीं ।
5 -कितना ताज्जुब दिखता है की एक नोबेल पुरष्कार विजेताकी आलोचना 50 % अंक प्राप्त करता बड़े प्यारसे करता है , उसे पता नहीं कि वह क्या कर रहा है , बिचारा ....।
6 - नकली फूलको लोग इतनें प्यारसे अपनें ख़ास कमरेमें रखते हैं कि उनको शायद स्वप्नमें भी असली फूल की स्मृति नही आती होगी , लेकिन नकली असली कैसे बन सकता है ?
7 - इस समय लोग अन्दरसे सिकुड़ते जा रहे हैं , उन्हें भय है , कहीं मेरी असलियत लोगोंके सामनें न आ जाए और बाहर से फैलते जा रहे हैं जैसा दिखना चाहते हैं जिससे कोई उनके अन्दर न झाँक सके ।
8 - दूसरेकी रोशनीमें कबतक चलोगे , एक दिन वह अपनीं रोशनी वापिस खीच लेगा फिर क्या करोगे ?
9 - क्यों ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हो कि आगे चलना तो कठिन हो रहा है लेकिन पीछे लौटना भी संभव न हो सके ।
10 - प्यार जीने का सहज परम माध्य सबको एक सार मिला हुआ है लेकिन हम उसका भी ब्यापार करनें लगे और वह प्यार ब्यापार की वस्तु बनकर भी घट नहीं रहा ।
~~~ ॐ ~~~

Saturday, August 24, 2013

आस्था

आस्था
● आस्था जब टूटती है तब वह ब्यक्ति भी टूट जाता है लेकिन यह स्थिति मनुष्यको रूपांतरित कर सकती है ।
● कामना , क्रोध , लोभ , मोह , भय और अहंकार रहित टपकती आंसूकी बुँदे मनुष्यको परममें डुबो कर रखती है जिसे कोई हिला नहीं सकता ।
● जो हम कहते हैं , यदि वैसे करें भी तो अपनें को तृप्त रख सकते हैं ।
● जैसा हम करते हैं , यदि वैसा ही बन जाएँ तो हमारी सभीं समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
● अपनें और पराये का भाव यदि समाप्त हो जाए तो सिद्धि मिलनी कठिन नहीं ।
● कामना और अहंकार चलाते नहीं , घुमाते रहेते हैं । ● भोगसे भगवान की यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं , लेकिन मनुष्यके कई जन्म लगजाते हैं ।
● श्वास ध्यानमें जब नासिका से बाहर निकलती श्वास पूर्ण रूपसे दिखनें लगे तो वह ध्यान पूर्णता की ओर जा रहा होता है ।
°°° ॐ °°°

Tuesday, August 20, 2013

क्या करोगे सोचके

क्या करोगे सोचके ? देखना जरा अपनें जीवन की किताबके कुछ पन्नोंको जिनको आप कभीं नहीं
देखा :----
1- जीवनकी कुछ एक ऐसी घटनाएँ होती हैं जिनको जितना सोचोगे वे उतनी और जटिल हो जाती जाती
हैं ।
2- मन स्तर पर आप कुछ भी बन जाएँ लेकिन आपका मूल स्वभाव ठीक समय पर आपको अपनें प्रतिकूल न जाने देगा ।
3- कुछ ऐसे होते हैं जिनकी जगह आपके जीवनमें न के बराबर रही होती है लेकिन समय आनें पर वे आपके बहुत करीब आजाते हैं , आपकी मदद करते हैं और अपनें , दूर खड़े हो कर आपकी बजबूरीको और नंगा देखनेंके अवसरका इन्तजार करते होते हैं ।
4- जीवनमें जिनको हम पकड़ने केलिए , हम अपनी पूरी ऊर्जा लगा रखी थी , उनसे दूरी बढती गयी , ऐसे अनुभव रह - रह कर आपको चुभते रहते हैं । 5- क्या खोजा और क्या पाया ।
6- जो हम अपनें जीवनमें न कर सके , उसे अपनें पुत्रसे करवाना चाहते हैं और वहाँ भी हमें मायूसी ही मिलती है क्योंकि यहाँ जो आता है उसके पास उसका अपना संचित धन होता है और वह उसी केंद्र पर घूमता है ।
7- घरकी ऊब बाहर भगाती है और बाहर लोगोंका ब्यवहार पुनः घरमें कैद कर देता है । 8- दूसरों जैसे बनते - बनते हम स्वयंको भूल जाते है और हाँथ कुछ नहीं लगता ।
°°° ॐ °°°

Sunday, August 4, 2013

दो पल ही सही जरा सोचना


  • कौन छोट है , कौन बड़ा है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • कौन सुन्दर है , कौन कुरूप है , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • कौन अपना है , कौन पराया है  , यह सोच कहाँ से उठती है ?
  • अनुभवहीन ब्यक्तिकि ज्ञान की बातें रस रहित होती हैं , क्यों ?
  • कहते हैं नानक दुखिया सब संसार , लेकिन मौत के नाम पर सभीं सिकुड़ते हैं , क्यों ?
  • हम अपनें दुःख का कारण और को क्यों बनाते हैं ?
  • सभीं परेशान है स्वयं से नहीं औरों से , क्यों ?
  • आज नहीं तो कल ही सही कुछ पानें कि उम्मीद हमें एक दूसरे से जोड़ कर रखती है , क्यों ?
  • कामना टूटते ही क्रोध क्यों उठता है ?
  • कामना का अंत क्यों नहीं है ?
  • दुःख में सभीं सिकुड़ते हैं और सुख में फैलते ते हैं , क्यों ?

===== ओम्  =====



Monday, July 22, 2013

सोच

सोच सोच मनुष्यके जीवनका आधार है ।
सोचसे हम स्वयंको क्षणभरके लिए राजा समझ बैठते हैं और क्षणभरमें अपनेंको रंक समझनें लगते
हैं ,सोचसे कोई बचा नहीं है ।
सोचमें सभीं तैरते हैं लेकिन कोई इसमें दूबनेंकी कोशिश नहीं करता और बिना डूबे मोती पाना संभव नहीं ।
अगर आप मोतीके खोजी हैं तो सोचमें तैरनें की आदतको छोडो और सोच में दूबनेंका अभ्यास करो । सोचमें एक बार दूबनेंका रस मिल जाए तो वह ब्यक्ति सोचसे बाहर आनें पर एक दम भिन्न होगया होता है और समझ जाता है कि सच्चाई कहाँ पर है ।
सोच मनकी उपज है और मन तीन गुणोंकी उर्जासे संचालित है ।
मन कहीं रुकनें नहीं देता और न चैनसे सोच रहित होनें देता ।
मनका काम है भगाए रहना और हम बिना सोचे समझे रात और दिन भाग रहे हैं ।
भोगी आदमी की सोच दो जगह खोजती है ; एक धनके भण्डारको और दूसरीस्त्री प्रसंगको।
योगी सोचसे सोचके परे निकल कर सोचको धन्यबाद देता है और कहता है , सोच तेरा धन्यबाद , यदि तूँ न होती तो हमें ब्रह्म में कौन पहुँचाता ।
योगी सोचसे परे पूर्ण स्थिर प्रज्ञताकी अलमस्तीमें मस्त रहता है और भोगी सोच में उलझा एक नहीं अनेक तत्त्वों जैसे कमाना, क्रोध ,लोभ ,मोह,अहंकार और भय में उलझा हुआ स्वयंसे धीरे -धीरे दूर होता चला जाता है ।
भोगी मरना नहीं चाहता और योगी अपनी मौतका द्रष्टा होता है ।
भोगी मौतसे बचनेंके सारे बंदोबस्त कर रहा है और योगी मौतको एक भौतिक परिवर्तन का अवसर समझता है।
योगी मौत की तैयारी करता है और भोगी मौत की तरफ पीठ करके बेचैनी में रहता है ।
भोगी के माथे का पसीना कभीं नहीं सूखता और योगीके माथे पर कभीं पसीना नहीं आता ।
~~ ॐ ~~

Saturday, June 29, 2013

इसे समझो

1- सत्य में रहते हुए सत्य से इतना दूर क्यों ? 2- किसी को अपना सहारा बनानें की कोशिश को त्यागो , स्वयं किसी का सहारा बन कर देखो । 3- क्या कारण है की आलोचकों की उम्र छोटी होती है ? 4-जितना समय दूसरों में कमी खोजनें में लगाते हो उसका एक अंश ही सही अपनीं कमीं को समझनें में लगा कर देखो । 5-यदि देखना होशमय हो तो वहाँ सोच के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती और जहां देखनें पर सोच उठती है , वहाँ होश का होना संभव नहीं । 6- हम लोग भी अजीब हैं ; सुदूर स्थित तालाब को तीर्थ समझते हैं और पास बह रही गंगा में भैस नहलाते हैं । 7- शरीर गंगा में धोनें से मन निर्मल होगा , संदेहप्रद है । 8- संसार को जब तुम अपनें मन से देखते हो तब यह अपना रंग बदलता हुआ दिखता है । 9-चलो , खूब चलो लेकिन कामना के साथ नहीं , कामना का वज़न उठा कर चलनें का अभ्यास एक दिन कहीं गिरा देगा । 10-प्यार का गुण सभीं गाते हैं पर प्यार की खुशबू किसी - किसी को मिलपाती है । ~~~ ॐ ~~~

Wednesday, June 19, 2013

कौन नहीं चाहता ---


  • संगीत सुनना कौन नहीं चाहता ?
  • नृत्य देखना कौन नहीं चाहता ?
  • कौन प्रभु के समीप है ; कंश जो सोते - जागते हर पल कृष्ण को देखता रहता था
  •  या
  •  फिर वह जो अपनें को भक्त जैसा दिखाना तो चाहता है पर कभीं स्वप्न में भी कृष्ण को नहीं देखा ?
  • ऐसा कौन होगा जिसकी नजर राह के किनारे बनें गुरुद्वारा , मंदिर , मस्जिद एवं चर्च पर न  टिकती हों ?
  • ऐसा कौन होगा जिसके दिल की धडकन किसी मौत की खबर सुन कर न बढ़ती हो ?
  • ऐसा कौन होगा जो अपनें को अपनें दिल से किसी से  छोटा समझता हो ?
  • ऐसा कौन होगा जो अपनें बेटी - बेटे का गुण न गाता हो ?
  • ऐसा कौन बेटा होगा जो अपनी माँ के सामनें न झुकता हो ?
  • ऐसा कौन होगा जिसकी मूंछें उसकी पत्नी के सामनें आनें पर न झुकती हों ?
  • ऐसे कितनें होंगे जो प्रभु को कामना रहित मनोभाव से देखते हों ?
  • कोई खोनें को तैयार नहीं और पानें के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता , क्या यह संभव भी है ?
  • मनुष्य दो दुखों के बीच के अंतराल को सुख क्यों समझता है ?
  • ऐसे कितनें हो सकते हैं जिनके लिए  सुख - दुःख नाम की कोई गणित न हो ?

=== ओम् ========

Wednesday, June 12, 2013

गीता अध्याय -01 ( सार )

Title :गीता अध्याय - 01 Content: गीता - अध्याय - 01 श्लोकों की स्थिति : * ध्रिष्ट्र राष्ट्र ....... 01 * कृष्ण .......... 00 * अर्जुन ......... 27 * संजय ......... 19 ----------------- योग = 47 ----------------- इस अध्याय में दो बातें हैं : (क) श्लोक - 01 (ख) श्लोक - 1.26 से 1.47 तक * श्लोक -01 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवा : च एव किं अकुर्वत संजय ।। 1- श्लोक धृतराष्ट्र का है अतः धृत राष्ट्र कुरुक्षेत्र को धर्म क्षेत्र क्यों कह रहे हैं ? > आदि शंकर से गाँधी जी तक की गीता के इस सूत्र की ब्याख्या कुछ तर्क आधारित कमजोर दिखती हैं , इस सम्बन्ध में अब कुछ आगे :--- (क) कुछ लोग प्रभु श्री कृष्ण के वहाँ होने की वजह से धर्म क्षेत्र कहते हैं , और (ख) धर्म आधारित युद्ध हो रहा है इसलिए इसे धर्म क्षेत्र कहते हैं , लेकिन धृत राष्ट्र क्यों धर्म क्षेत्र कह रहे , उनके लिए न कृष्ण प्रभु हैं न यह युद्ध धर्म आधारित है ।अब कुरूक्षेत्र के संबंध कुछ और बातें :---- 1- वेद कुरुक्षेत्र को स्वर्ग में जो रहते हैं उनका तीर्थ कहते हैं । 2- 52 शक्तिपीठों में से एक, यहाँ शिव मंदिर में है । 3- यहाँ का शिव मंदिर कई बार मुस्लिमों के हाथों लूटा गया है जैसे मुहम्मद गज़नी ( 11वीं शताब्दी) 4- अर्जुन दोनों पक्षों के वीरों को युद्ध पूर्व देखना चाहते हैं , क्या उन्हें पता नहीं की इस युद्ध में कौन किसका साथ दे रहा है ? भागवत कहता है की कृष्ण बिपक्षी योद्धाओं की शक्ति क्षीण करने हेतु दोनों सेनाओं के मध्य अर्जुन के रथ को ले गए थे । 5- श्लोक - 1.26 से 1.47 तक को देखिये जहां दो बातें हैं ---- (अ) मोह की पहचान ( 1.28 - 1.30 तक ) के लक्षणों को बताया गया है । (ब) जाति धर्म और कुल धर्म की बातों का जिक्र है जो पूर्ण रूप से जेनेटिक्स से सम्बंधित है ।इस सम्बन्ध में अर्जुन की बातों का गीता में कोई जबाब नहीं है । : मोह के लक्षण : * अंगों का सिथिल होना.... * मुह सूखना ..... * शरीर में कम्पन ... * शरीर में रोमांच का होना .... * त्वचा में जलन ...... * भ्रमित मन ..... > अर्जुन की कुछ और बातें < + कुटुंब को मार कर मैं सुख से किस तरह रह पाऊंगा ? + जिनके लिए मुझे राज्य चाहिए वे सभीं यहाँ मरनें - मारनें को तौयार हैं , फिर क्या फायदा युद्ध से ? + कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी ... + वर्णसंकर उत्पन्न होंगे ... + वर्णसंकर कुल का नाश करेंगे >>>> ॐ <<<<

Tuesday, June 11, 2013

सरस्वती सरिता

Title :कुछ कथाएं भागवत से :--- Content: कुछ कथाएं भागवत से कलि युग के आगमन तक.... महाभारत युद्ध के समापन तक.... प्रभु श्री कृष्ण के परम धाम यात्रा तक... द्वारका का समुद्र में विलीन होने तक ... परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय तक.... हिमालय से चल कर प्रभास क्षेत्र में पश्चिम मुखी हो कर अरब सागर में अपनें को अर्पित करनें वाली परम पवित्र नदी सरस्वती एक निर्मल उर्जा क्षेत्र की जननी थी । सरस्वती के दोनों तटों पर द्वापर युग के लगभग सभीं परम सिद्ध योगियों के आश्रम हुआ करते थे । भागवत के आधार पर सरस्वती ब्रह्मावर्त क्षेत्र में पूर्व मुखी बहती थी । ब्रह्मावर्त महाराजा मनु का क्षेत्र था जो यमुना के तट पर शूरसेन एवं कुरुक्षेत्र (कुरुक्षेत्र नगर नहीं , क्षेत्र ) के मध्य का भाग था । ब्रह्मावर्त में प्रभु विष्णु भगवान वाराह अवतार में पृथ्वी को रसातल से निकाल कर लाया था । सूकर के रूप में पृथ्वी के भार से प्रभु की देह में कुछ कम्पन हुआ और फल स्वरुप उनके कुछ रोम झड गए थे जो कुश और काश के रूप में उगे । कुश का पयोग धार्मिक कार्यों में नकारात्मक शक्तितों से बचाव के लिए किया जाता है । ब्रह्मावर्त के सम्राट मनु अपनीं पुत्री देवहूति का ब्याह कर्मद ऋषि के किया जिसके गर्भ से विष्णु अवतार रूपमेंकपिलमुनिकाजन्महुआ।विन्दुसरोवर पर कर्मद ऋषि का आश्रम हुआ करता था । सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर जहाँ बेर का जंगल हुआ करता था , वहाँ शम्याप्रास आश्रम था जहां हर समय यज्ञ हुआ करते थे । शाम्याप्रास के साथ वेदव्यास जी का भी आश्रम था जहाँ भागवत की रचना हुयी और व्यास ही सर्वप्रथम भागवत की कथा अपने पुत्र शुकदेव जी को सुनाया था । कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के समय पांडवो की सेना सरस्वती के पश्चिमी तट पर रुकी थी अर्थात शम्याप्रास एवं जहाँ महाभारत युद्ध हुआ ( कुरुक्षेत्र ) दोनों जगह सरस्वती का रुख उत्तर से दक्षिण की ओर रहा होगा जब की ब्रह्मावर्त में इनका रुख पश्चिम से पूर्व की ओर था । जिस समय प्रभास क्षेत्र में ब्रिष्णी , भोज , अन्धक बंशीलोग वारुणी मदिरा पी कर आपस में लड़ रहे थे उस समय सूर्यास्त हो चला था और प्रभु सरस्वती नदी - तट पर मैत्रेय के साथ एक पीपल पेड़ के नीचे वैठे थे । :::: ॐ ::::::

Saturday, May 11, 2013

वह जहाँ सत्य बसता है

जानता था मैं उनको ....
आज से नहीं बचपन  से , हम एक दूसरे के काफी करीब रहे थे 
लेकिन इधर लगभग 20 सालों से हम एक दूसरे से दूर हो गए थे 
पर यह दूरी भौतिक दूरी थी  , हम दोनों का तन एक दूसरे से दूर तो थे 
लेकिन दिल एक दूसरे से बेहत करीब थे /

ही होगी उनकी उम्र लगभग 75 साल की 
मेरे से तकरीबन पांच साल तो बड़े रहे ही होंगे / जब मैं पढ़ाई प्रारम्भ की थी तब शायद ही कोई दिन रहा हो जिस दिन उनकी मुलाक़ात गाँव के मध्य में स्थित पीपल पेड़ के नीचे न होती रही हो , बड़े ही खुश दिल मिजाज के ब्यक्ति थे और जीवन भर अविवाहित रहे / 

आज न जानें मुझे क्या हुआ कि 20 साल बाद गाँव की याद आई और मैं उठाया थैला और चल पड़ा / गाँव पहुँच कर क्या देखता हूँ कि जिस पीपल पेड़ के नीचे अपनी एक भैस के साथ करीमन भाई लगभग एक दर्जन बच्चों के साथ अपनी महफ़िल लगाये हुए मिलते थे , आज उसी पेड़ के नीचे उनका जिस्म एक सफ़ेद चादर में लिपटा जमीन पर विश्राम कर रहा है और उनकी वह भैस उनके ही बगल में चुप चाप बैठी हुयी है / जब मैं उनको जमीन पर पडी देखा तो उनकी पिछली  सारी जिंदगी मेरी नज़र में उतर आयी और मैं महशूश करनें लगा कि वास्तवव में जिसके लिए हम जीवन को मशीन बना कर भाग रहे  हैं , वह सच्चाई नहीं है , सच्चाई तो यह है ----- /
करीमन भाई थे तो निहायत गरीब पर उनका दिन किसी बादशाह से कम न था / 
करीमन भाई को कभीं भी मैं नये कपड़ों में नहीं देखा था लेकिन आज उनकी लाश को नया वस्त्र मिल गया और उनकी आत्मा को भी नया देह मिल गया होगा /

क्या है प्रकृति की गणित ----

जीवन गुजरता है तन ढकने की कोशिश में 
जीवन गुजरता है , पेट की जरुरत को पूरी करनें में 
जीवन गुजरता है अपनों की जरुरत को पूरा करनें की कोशिश में 
जीवन गुजरता है अहँकार - कामना की खुराक इकट्ठा करने में 
और ...
धीरे - धीरे जीवन घटता जाता है और जरूरते बढ़ती जाती हैं 
और .
एक दिन वही मिलता है जो करीमन भाई को मिला //

=== ओम् =====



Tuesday, April 30, 2013

अँधेरे में तो कहीं हम नहीं चल रहे ?


  • ज़रा रुकना , कहीं आप भोजन तो नहीं कर रहे ?
  • क्या आप जानते हैं कि यह सब्जी कितनी पुरानी है ?
  • जी नहीं , आप भ्रम में हैं , आप की सोच गलत है ?
  • आप इतनी पुरानी सब्जी खा रहे हैं जिसकी  कल्पना आप की बुद्धि में कभी नहीं उठी /
  • आप की पत्नी को यह सब्जी बनानें की कला उनकी माँ से मिली /
  • पत्नी की माँ को यह बिरासत  में उनकी माँ से मिली थी /
  • और यह क्रम चलता रहा और चल रहा है /
  • लेकिन  इस बात पर हमनें कभीं सोचा भी नहीं /

कहते हैं , जबाना  बदल गया , क्या ख़ाक बदल गया ?
 जो हम ग्रहण कर रहे हैं , वह सब कितना प्राचीन है , कुछ कहना संभव नहीं /

लेकिन यह सब होते हुए भी एक बात है ......


  • आज का बैगन , आलू , चावल ,दूध आदि सब भोजन सामग्री की नश्ल बदल गयी है /
  • भोजन बनानें की टेक्नोलोजी लगभग प्राचीन है लेकिन भोजन का स्वाद बदला हुआ है /
  • हम लगभग अपनें बुजुर्गों की तरह दिखते हैं , लेकिन हमारी सोच बदल गयी है /
  • सभी जड़ी - बूटियाँ - बनस्पतियाँ सब बदल गयी हैं लेकिन आयुर्वेद वही है /
  • विद्यालय वहीं हैं लेकिन पढ़ाई बदल गयी है /
  • अध्यापक देखनें में वैसे हैं लेकिन उनका दिल बदल गया है /
  • किताबें हैं लेकिन उनका रंग बदल गया है /

यदि हम अपनें दैनिक जीवन में झांकते रहें तो उस का आभाष होनें लगता है जो इस बदलाव 
के पीछे है /
कहीं इस बदलाव की ऊर्जा उसी की तो उर्जा नहीं ....
जिसकी तलाश हमें कहीं टिकनें नहीं दे रही //

=== ओम् =====