Wednesday, September 28, 2011

धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्रे




धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र ------








गीता के प्रारंभिक सूत्र का एक अंश मात्र है धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे और आज हम महाभारत – युद्ध स्थल कुरुक्षेत्र के सम्बन्ध में कुछ सोचते जा रहे हैं / गीता पर भाष्य लिखनें वाले एक नहीं अनेक हैं औरसभीं लोग गीता में अपनें को देखनें का प्रयाश न करते हुए स्वयं में गीता को देखा है और जो जैसा है वह गीता के सूत्रों का वैसा भाव समझा है / जबतक हम जैसे हैं वैसे प्रकृति को देखते रहेंगे तबतक प्रकृति हमसे दूर रहेगी ही और जब प्रकृति जैसी है वैसी हम देखेंगे तब हम वह न होंगे जो अभीं हैं उस समय हम संदेह रहित होंगे और परम सत्य में द्रष्टा रूप में परम आनंद में होंगे /








दिल्ली से लगभग 160 किलो मीटर दूर नेसनल हाई वे - 01 परकरनाल एवं अम्बालाके मध्य पीपली नामक स्थान से बाएं हाँथ की ओर एक सड़क जाती है जो आगे जा कर कुरुक्षेत्र के बीचोबीच से गुजरती है / प्राचीनतम बौद्ध शास्त्रअंगुतारा निकाय [ Anguttara Nikaya ] में 16 महाजन पदोंकी बात कही गयी है और उनमें एक हैकुरु महाजनपद / कुरु महाजनपद की राजधानी आज के मेरठ से लगभग 37 किलो मीटर दूरहस्तिनापुरमें हुआ करती थी / महाजन पद का अर्थ है महाराज्य / कुरु महाजनपद तीन भागों में बिभाक्त था ; कुरु राष्ट्र , कुरु जंगल और कुरुक्षेत्र / हरियाणा में हिसार , कुरुक्षेत्र एवं उत्तर प्रदेश में मेरठ [ हस्तिनापुर ] को मिलानें से एक त्रिभुज की आकृति बनती है और एस क्षेत्र कोकुरु - राज्यके नाम से इतिहास कार लोग जानते हैं /








गंगा एवं यमुना के मध्य का भाग कुरु - राष्ट्र हुआ करता था , यमुना एवं सरस्वती नदियों के मध्य का भाग दो भागों में बिभक्त था - करू जंगल एवं कुरुक्षेत्र / कुरुक्षेत्र महाभारत के समय कोई बस्ती न थी यह एक क्षेत्र था और इस क्षेत्र का केन्द्र थास्थानेश्वर [ थानेश्वर ] जोहर्षबर्धन की राजधानीहुआ करती थी / वेदों में कुरुक्षेत्र को स्वर्ग में रहनें वालों के तीर्थ के रूप में देखा गया है और थानेश्वर को 51 शक्तिपीठों में एक शक्ति पीठ के रूप में बताया गया है /








// अगले अंक में कुछ और बातें होंगी //








======ओम===========


Saturday, September 24, 2011

आप की खोज किसकी हो सकती है

मनुष्य क्या चाहता है?

मनुष्य हर पल नया देखना चाहता है,हर पल नया सुनना चाहता है,हर पल नये को स्पर्श करना चाहता है,हर पल नये की संगति करना चाहता है,हमेशा नया घर चाहता है,नयी कार चाहता है,नये-नये धर्म गुरुओं को देखना चाहता है,नये-नये सपनें देखना चाहता है,नये-नये तीर्थ देखना चाहता है,नये-नये संगीत सुनना चाहता है और नये-नये कार – बाइक आदि को अपनें पास रखना चाहता है/मनुष्य नये की खोज में स्वयं बूढा हो रहा है,इसकी फ़िक्र उसे नहीं होती/आज जो है उसमें मनुष्य को रस नहीं मिलता वह सोचता है कल जो आएगा उसमें कुछ और रस होगा और यह उसकी सोच विज्ञान में उसे बनाए तो रखती है लेकिन उसे स्वयं से दूर रखती है,उससे उसका आज छीन लेती है और स्वयं से दूर रहना ही तनहाई है/


प्रकृति में जितनें भी प्रकार के जीव हैं उनमें वैज्ञानिक सबसे अधिक तनहा जीव है ; वह वैज्ञानिक हो नहीं सकता जबतक उसमें तनहाई न भरी हो / प्रो आइन्स्टाइनसे किसी ब्यक्ति नें पूछा , यदि मृत्यु के बाद दूसरा जन्म होता हो तो आप अगले जन्म में क्या बनना पसंद करेंगे ? आइन्स्टाइन तुरंत बोल पड़े , कमसे कम वैज्ञानिक तो मैं बनना नहीं चाहूँगा , वैज्ञानिक बननें से तो बेहतर होगा यदि मैं घरों में पानी के नलकों को ठीक करनें वाला मेकैनिक बन जाऊं / क्यों इतना बड़ा वैज्ञानिक इतना तनहा जीवन जी रहा है ? कामना दुस्पुर होती है , यह बातबुद्ध कहते हैं / दुस्पुर का अर्थ है वह जो कभीं तृप्तता को स्पर्श न करती हो / कामना विज्ञान का गर्भ है और कामना तनहाई का पिजड़ा भी है / पिजड़े में कैद पंछी कभी तनहाई से मुक्त नहीं हो सकता और बिना तनहाई मन – बुद्धि में वैज्ञानिक विचार आ नहीं सकते /

आधुनिक विज्ञान का जनकसर आइजक न्यूटनका जन्म उनके पिता के देहांत के तीन माह बाद हुआ/ जब वे तीन साल के हुए तब उनकी मां अपना ब्याह रचा लिया और न्यूटन अनाथ हो गए/

आप सोच सकते हैं कि इतना तनहा बच्चा किस प्रकार का मनोविज्ञान अपनें में रखा होगा ? स्कूल से निकाले गए और तनहाई में जब एक सेव के पेड़ के नीचे बैठे अपने विचारों में खोये रहे तब ऊपर से एक सेव उनके सामनें आ टपका / सेव के तपकनें की आवाज उनके लिए ब्रह्म की आवाज बन गयी और उनका तनहा मन एवं तनहाई से भारी हुयी बुद्धि की ऊर्जा एकाएक रूपांतरित हो उठी और वे गुरुत्वा कर्षण का वह सिद्धांत दिया जो आज तक किसी वैज्ञानिक से बदला न जा सका /


बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो तनहाई से प्रभावित न होते हों लेकिन ऐसे भी बहुत कम लोग हैं जिनको उनकी तनहाई उनको ऐतिहासिक पुरुष बना दिया/आप भी जब उदास हों तो अपनी उदासी को परम को पकडनें का साधन बना लेना,क्या पता यही आप की तनहाई आप को पूर्ण रूप से तृप्त कर दे//


=====ओम=====


Tuesday, September 20, 2011

भक्तों का आना


सोचै सोच न होवहीं


जो सोची लाख बार ….


नानक जी साहिब कह रहे हैं,चाहे लख बार सोचो लेकिन जब तक सोच मन – बुद्धि में है उसकी


[ मालिक ] की सोच उस मन – बुद्धि में नहीं आ सकती और अब आगे ----------




नानाक जी साहिब जब 19 साल के हुए तब इनका ब्याह हो गया और 30 साल की उम्र में इनको परम का बोध हुआ / श्री नानकजी साहिब एक अद्भुत योगी थे जिनको इतनी कम उम्र में ज्ञान की प्राप्ति


हुयी / श्री नानकजी साहिब मात्र दो बातें बार – बार कहते हैं जो इस प्रकार हैं ------


नाम जपो [ Naaam Japo ]


कीरत करो [ Kirat Karo ]


क्या है नाम उसका ?


उसका क्या नाम है ? वह कहाँ रहता है ? वह कैसा है ? उसकी आवाज कैसी है ? उसका रंग कैसा है ? ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्न हैं जिनका कोई उत्तर नहीं और वह जो उत्तर पा लेता है वह चुप हो जाता है क्योंकि उसे ब्यक्त कौन कर सकता है ? श्री नानक जी साहिब कहते हैं , एक ओंकार सत् नाम अर्थात


ओंकार का जप करना ही उसके नाम का जप करना है /


हमारे सामनें सब कुछ घटित होता रहता है और हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों को बंद करके रखते हैं फिर क्या होनें वाला है,अब देखिये इनको-------




  • मीरा जब २० साल की थी तब कबीर जी देह छोड़ गए थे



  • कबीरजी साहिब जब 29 साल के हुए तब नानक जी साहिब का जन्म हुआ



  • कबीरजी साहिब के जन्म के 10 साल बाद रबिदास जी साहिब पैदा हुए



  • श्री नानक जी साहिब के देह छोडनें के08साल बाद मीरा चल बसी



  • मीरा के जानें के ठीक एक साल बाद रसखान जी आये


आप इन सभीं बातों पर सोचें क्योंकि ------


सोचै सोचि न होवहीं


जो सोची लख बार


आप सोचते रहिये लेकिन भोग सोच में डूबे रहनें से जो मिलेगा वह क्षणिक सुख तो दे सकता है लेकिन परम सुख यदि आप चाहते हैं तो उस परम की सोच में डूबें जिसको श्री नानक जी साहिब कहते हैं ------


एक ओंकार सत् नाम




=====ओम=====




Saturday, September 17, 2011

कामना एक माध्यम है


सोचै सोच न होवई-----


जो सोची लख बार----




परम गुरु श्री नानकजी साहिब कह रहे हैं-----


सोचै सोच न होवई , जो सोचि लख बार


अर्थात


जबतक मन में सोच भरी है तबतक उसकी सोच उस मन में नहीं उभड़ सकती और -----


गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं-------


भोग – भगवान की ऊर्जा एक मन में एक साथ नहीं होती //




हाँ एक परा भक्त हैं जिनको सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक के फैलाव रूप में उस से एवं उसमें दिखता


रहता है,जो संसार की सभीं सूचनाओं में प्रभु के अलावा और कुछ देखता ही नहीं और दूसरे हैं पूर्णावतार श्री कृष्ण जो एक साख्य – परम योगी के रूप में गीता में हैं//


सोच क्या है ? क्या सोच कामना का एक और नाम तो नहीं ? कामना राजस गुण का एक मूल तत्त्व है और प्रकृति के तीन गुण ; सात्त्विक , राजस एवं तामस मनुष्य को तीन मार्ग के रूप में उपलब्ध हैं जिनमें से किसी एक को पकड़ कर वह परम में पहुँच सकता है लेकिन वह जिसकी यात्रा में कहीं रुकावट न आनें पाए //


वह जिसकी अनुभूति हो रही होती है अनुभूति करता उसे तो स्वीकारता है लेकिन जब वह उसे बताना चाहता है जिसको उसकी अनुभूति नहीं हुयी होती तब वह वहाँ चूक जाता है और अपनी अनभूति को शब्दों के माध्यम से उस तरह ब्यक्त नहीं कर पाता जैसी उसक अनुभूति हुयी होती है//यहाँ सभीं


संत,महापुरुष,आंशिक अवतार एवं पूर्णावतार श्री कृष्ण सभीं असफल हो कर गए हैं,संसार में जो भी सत्य को ब्यक्त करना चाहा वह फेल हुआ क्योंकि सत्य चेतना की अनुभूति है उसे मन – बुद्धि स्तर पर नहीं समझा जा सकता/


आदि गुरु श्री नानकजी साहिब कह रहे हैं -----


पहले अपनें मन को रिक्त करो,कैसे रिक्त करो?इस प्रश्न के सन्दर्भ में गुरु जी साहिब कहते हैं---


पंचा का गुरु एक धियानुअर्थात मनुष्य का एक गुरु है,ध्यान और कोई नहीं अर्थात ध्यान के माध्यम से अपनें मन – को रिक्त करो और जब मन रिक्त हो जाता है तब सत्य स्वयं उस रिक्त मन में भर जाता है//ध्यान मन के बंद द्वार को खोलता हैऔर जब द्वार खुल जाता है तब उस मन से भोग की सोच स्वतः बाहर निकल जाती है और जो बच रहता है वह और कुछ नहीं परम सत्य


ही होता है//




=====ओम=======


Tuesday, September 13, 2011

अपने गम को दिशा दो

किसके खोनें का डर है?

क्या उसका जो अपना है ही नहीं ?

क्या उसका जो कभीं पराया हुआ ही नहीं ?

अब ज़रा सोचना------

वह जिसको हम अपना समझ रखे हैं, कितना अपना है?

और कबतक अपना रहेगा?

क्या मकान अपना है?क्या यह परिवार अपना है?क्या यह भोग अपना है जिसको हमनें अपनें पसीनें से सीच कर ऐसा बनाया है?


हमारे पड़ोस में एक मित्र थे चार दिन पहले गुजर गए आज उनकी अस्थियां इकट्ठी करने गए थे /

अस्थियों का कलश ले कर उनका बेटा जो अभी - अभी जवानी में कदम रखा है , सीधे अपनें घर में घुस आया , लोग उसे ऐसे बाहर भगानें लगे जैसे कोई अनजाना कुत्ता घर में आ गया हो / जोर – जोर से जब आवाज मैं सूना भागा - भागा अंदर गया , देखनें की क्या हो गया ? , क्योंकि मैं उस बच्चे को अंदर जाते देखा नहीं था / जब मैं अंदर पहुंचा तब असलियत का पता चला और असलियत को जाननें के बाद बहुत दुःख हुआ /


मैं उनको बचपन से जानता हूँ , मेरा और उनका बचपन साथ – साथ एक ही गली में गुजरा था / मैं यह भी जानता हूँ कि उस ब्यक्ति नें घर बनानें , परिवार को खडा करनें में कोई कसर न छोडी थी और तीन लड़कियों के बाद यह बच्चा पैदा हुआ था और अपनें पिता से बहुत प्यार था उसे / क्या हो गया यदि वह अपनें पिता की अस्थियों को घर के अंदर ले गया ? कल तक वही उस घर एवं उस परिवार का मालिक हुआ करता था , रात - दिन पसीना बहा कर यह घर तैयार किया था , यदि कुछ समय के लिए वह नहीं उसकी हड्डियां घर में पहुँच गयी तो कौन सी आफत आ गयी ? कल तक सभीं उसके इशारे पर चलते थे और आज वह उस परिवार एवं उस घर के लिए अशुभ हो गया , कैसी हैं ऎसी दो कौडी की हमारी मान्यताएं ? किसने बनायी होंगी ऎसी बेबुनियादी मान्यताओं को ? आज ढेर सारे प्रश्न हम सब के सामनें हैं और इसके पहले की हम भी अपनें घर के लिए अशुभ बन बैठे , हमें सोचना चाहिए कि ------------

यहाँ कौन है अपना ? हम क्यों न अपनों में उस अपनें को तलाशना शुरू करें जो तब भी अपना था जब कोई अपना न था , आज भी अपना है और कल भी वहीं एक मात्र अपना रहेगा भी //

कुछ समय संसार में तैरो …..

कुछ समय संसार के माझी को पहचाननें में भी लगाओ …..


====ओम====


Thursday, September 8, 2011

कल आज और कल


कल आज और कल इनमें सिमटा हुआ यह मिटटी का पुतला इतना तनहा क्यों दिखता है?

वह जो नियम बनाता है,

वह जो राह बनाता है,

वह जो उस राह पर चलता है वही इतनी तनहाई में क्यों रहता है?

मनुष्य भोग के नये - नये साधन खोज रहा है , और कोई जीव नहीं ऐसा कर रहा , मनुष्य योग के नये - नये ढंग तलाश रहा है और कोई जीव ऐसा नहीं कर रहा , मनुष्य ऐसे - ऐसे योग दे रहा है जिसकी कल्पना तक बाबा गोरख नाथ एवं पतांजलि नहीं किये होगें और कोई जीव ऐसा नहीं कर

रहा , योग से ब्रह्म तक की यात्रा के एक नहीं अनेक उपाय दिखा रहा है और कोई जीव ऐसा नहीं कर रहा लेकिन फिरभी तनहाई की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि सभी उपाय विफल हो रहे हैं /

मनुष्यों का समुदाय एक ऐसा समुदाय है जहां भक्त – भगवान और दोनों के मध्य एक धर्म – गुरु होता है जबकी अन्य जीवों में उनके और परमात्मा के मध्य कोई और नहीं होता , क्या पता परमात्मा भी रहता है या नहीं और यदि रहता भी हो तो उनको इसका इल्म नहीं होता होगा / सृष्टि प्रारम्भ होने के बाद कुछ समय तक सभीं जीव जीनें की राह खोज नहीं रहे थे बना रहे थे और जब राह बन गयी तब से आज तक सभीं जीव उस अपनी - अपनी राह पर चल रहे हैंलेकिन मनुष्य क्या कर रहा है ?

मनुष्य संदेह के उजाले में जीता है और-------

संदेह के अँधेरे में मरता है//

संदेह ही जिसके जीवन की ऊर्जा हो वह कभी हंस नहीं सकता,वह तनहा ही रहेगा//

अब आगे ======

आज गुजरे हुए कल का प्रतिबिम्ब है …..

और----

आज आनें वाले कल की बुनियाँद है …...

आज के जीवन में गुजरे हुए कल को देख कर अपनी गलतियों को सुधारों जिससे आप के कल की बुनियाँद संदेह पर नहीं हकीकत पर रहे //

सच्चाई से भागो नहीं यह आप को कहीं भी चैन से नहीं रहनें देगी ----

सच्चाई को स्वीकारो //


=====ओम======


Sunday, September 4, 2011

वहा से यहाँ तक भाग एक

कितनें प्यारे दिन थे-----

मुझे अपना वह दिन तो याद नहीं लेकिन -------

गोदी में जब कोई बच्चा उठाता हूँ तब सोचता हूँ------

हो न हो मेरे भी प्रारंभिक दिन कुछ ऐसे ही रहे हों//


गोदी किसी की और बच्चे को छेडने वाले कोई और , आते जाते सभीं गोदी के बच्चे से अपना दिल बहलाते हैं / आप जब पूरी तरह उदासी में हो तो कहीं और नहीं किसी गोदी के बच्चे को ढूढें जबकि उदासी एकांत में ले जाना चाहती है / उदासी में ब्यक्ति सिकुड़ता है , रोशनी नहीं अँधेरा चाहता है , कमरे के एक कोर्नर में रहना पसंद करता है , वह चाहता है जहां वह है वहाँ और कोई न रहे लेकिन कहीं न कहीं अन्तः करण में किसी तलाश की एक किरण रहती जरुर है , कौन है वह ?


गोदी के बच्चे के ये सुहानें दिन कब और कैसे सरक जाते हैं कुछ पता नहीं और अब वही बच्चा अपनें दादा - दादी या माँ - पिता की उंगली पकड़ कर गलियों में दिखनें लगता है / आप कभी उस बच्चे को देखना , प्यार से देखना जिसकी उंगली पकड़ कर कोई चला रहा हो / बच्चा ठीक उनके आदेशों के बिपरीत चलना चाहता है जो उसे चला रहे होते हैं / बच्चे का यह बिरोधी भावना लगती तो बहुत सुहानी है लेकिन यह बच्चे की मनोबृत्ति आगे चल कर समाज की दिशा को बदल देती है /


इसके आगे अगले अंक में क्रमश:


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Wednesday, August 31, 2011

कहानियां भी कुछ कहती हैं

माँ - दादी की गोदी में कहानियां सुनते – सुनते बचपन कब और कैसे गुजर जाता है , कुछ पता नहीं चल पाता / माँ - दादी की कहानियों में दो बाते होती हैं ; एक राजा और एक रानी या परी / बचपन से जब जवानी में कदम पड़ते हैं तब राजा बननें की नशा और एक परी की तलाश में जवानी कब और कैसे गुजर जाती है , कुछ पता नहीं लग पाता / बेटा से भैया बनें , भैया से चाचा बने , चाचा से ताऊ बनें और ताऊ से कब और कैसे दादा बन गए कभीं पता नहीं चल पाता / जीवन पल – पल गुजरता है और वह जो अपनें हर पल का द्रष्टा होता है वह तो जीवन जीता है और वह जो स्वप्न में खोया रहता है वह बेहोशी में अपना जीवन गुजारता है /


वह कौन है जो मौत से लड़ता है?वह कौन है जिसके प्राण जल्दी नहीं निकलते?वह कौन है जो मौत से मैत्री स्थापित करता है?और वह कौन है जो स्व – इच्छा से अपनें जीता है और स्व – इच्छा से मरता भी है?

वह जो मौत से मैत्री युवावस्था में मित्रता स्थापित कर लिया वह गुणातीत योगी हो जाता है जो

स्व – इच्छा से जीता है और स्व – इच्छा से मरता भी है / वह जिसके जीवन का केंद्र परमात्मा होता है वह जीवन जीता है और परम आनंद में अपनें प्राण त्यागते हुए संसार को धन्यबाद देता है /

वह जिसके जीवन का केन्द्र राग – मोह – अहंकार रहा होता है वह कभीं नहीं समझ पाता कि उसे एक दिन जाना होगा और जब मौत सामनें खडी दिखती है तब वह मौत से भी लड़ता है क्योंकि उसका जीवन लड़ाई में ही गुजरा होता है , उसे लडनें का अच्छा अनुभव जो हुआ होता है /

जहां हो वहाँ से ऊपर उठो

जहां हो वहाँ से उसे देखो

जहां हो वहाँ से अपनें को देखो

और ऐसा देखनें का अभ्यास एक दिन उसे दिखा देगा जो जन्म , जीवन एवं मृत्यु भी है //


===== ओम =======


Wednesday, August 24, 2011

कितनें लंबे और कितनें छोटे


मनुष्य के हाँथ कित्तानें लंबे हैं और कितनें छोटे?


जेनेवा के पास भूमिगत एक टनेल का निर्माण हुआ/विश्व के सभीं अग्रणी देशों के वैग ्रानिकों का दिमाक और असीमीत धन के साथ प्रयोग प्रारंभ हुआ/आज के वैज्ञानिक स्वकल्पित बिग बैंग सिद्धांत के ऊपर खूब सोच रहे हैं/बिग बैंग सिद्धांत की बुनियाद इस बात पर आधारित है ….....

आज से लगभग14 billionसाल पहले कहीं किसी विशेष परिस्थिति में लगभग100 million light yearsक्षेत्रफल का एकhydrogen atomबना और उसमें विस्फोट हुआ,जिसके फल स्वरुप उस विस्फोट के टुकड़ों में से एक अति सूक्ष्म कण[एक प्रोटोन से भी छोटे कण]से ब्रह्माण्ड की रचना हुई और

उच्च तापक्रम एवं दबाब में कुछ ऐसा हुआ जिसके फल स्वरुप जीव पैदा करनें का कण भी बना/

इस प्रोजेक्ट पर अभीं तक इतना धन लग चुका है कि यदि इस धन को जन कल्याण कामों में लगाया जाता तो सम्पूर्ण जगत से गरीबी दूर हो सकती थी/


अब वैज्ञानिक यः कह रहे हैं कि इस प्रयोग से उन परिस्थितियों तक पहुँचना कठिन हो त=रहा है जिन परिस्थितियों में जीव – कण का निर्माण हुआ होगा/यः शोध जो चल रहा है उसका आधार है

quantum mechanics /क्वांटम विज्ञान की बुनियाद मैक्स प्लैंक के आविष्कार से पडी और मैक्स प्लैंक का कहना है …....

वैज्ञानिक शोध में जब कुछ दूरी तय कर लेता है तब समझता है की अब सीमा ज्यादा दूर नहीं,लेकिन जब अपनी वर्त्तमान स्थिति को देखता है तब उसे यह मह्शूश होता है कि वह तो पहले से भी दो कदम पीछे सरक चुका है/


विज्ञान का जेनेवा में चल रहा शोध मात्र परमात्मा रहित जीव पैदा करनें की ओर रखा एक कदम है लेकिन दुनिया का जब इतना अधिक धन लगा कर मात्र इतना सिद्ध करना कि परमात्मा नहीं है,कितनी बुद्धिमानी है?इस बात पर आप सोचना//



हमारी सोच तो इतनी लंबी है लेकिन हमें इतना भी पता नहीं कि हम अगली श्वास भी ले पायेंगे या नहीं/

मनुष्य के सोच की लम्बाई इतनी बड़ी है कि वह सोच में पैदा होता है और सोच में ही कहीं एक दिन चला जाता है वह भी बेहोशी में/हमारी नज़र दूसरों पर इतनी गहरी बैठ चुकी है कि स्वयं पर लौट कर् आती ही नहीं और हम तनहाई का जीवन जीते हुए तनहाई में सफर कर जाते हैं//

=====ओम=====




Thursday, August 11, 2011

यहाँ कौन है बेईमान

यहाँ कौन बेईमान है ?

राजा ?

प्रशासक ?

या …

फिर जनता //


प्रजा तंत्र में राजा की नियुक्ति प्रजा के हाँथ में है और भारत की जनता पिछले कई सालों से किसी एक दल को मौक़ा नहीं दे रही पूर्ण बहुमत वाली सरकार बननें के लिए लेकिन कई दल मिल कर सरकार बना ले रहे हैं / आज देश उनके हांथों में नहीं जिनके पास ज्यादा जन प्रतिनिधी हैं अपितु उनके हाथों में है जिनकी संख्या अल्प है लेकिन उनके अंदर इतनी शक्ति है कि वे जब चाहें सरकार को गिरा सकते हैं /


आज जहां भी देखो यही देखनें को मिल रहा है कि भारत भ्रष्टाचार की ऊर्जा से जीवित है ; क्या सरकार बदलनें से भारत में मुह में अमृत की बूँदें पड़ सकती हैं ? भारत की सरकारें बदलती रही हैं लेकिन सरकारों के बदलाव से भ्रष्टाचार मजबूत होता रहा , ऐसा क्यों ? भारतीय प्रजातंत्र के इतिहास में आज तक जितनें दल बनें हैं सब यह कह कर जनता के सामनें गए हैं कि मेरे को मौक़ा दो मैं भारत में राम राज्य ला कर दिखाऊंगा लेकिन पिछले साठ सालों में क्या हुआ , ज़रा देखो तो सही ?


कहीं धमाका हो जाए , मंत्री को कुर्सी छोडनी पड़ती है लेकिन वहाँ के IPS , IAS अधिकारियों की कुर्सी पर कोई असर नहीं पड़ता , ऐसा क्यों ? भारत को कौन चला रहा है ? जन प्रतिनिधी या IAS अफ़सर ?

सभीं सरकारी मोहकमों का उच्च अधिकारी IAS अफ़सर है और लगभग सभीं मुहकमें घाटे में चल रहे हैं पर जो भी सरकार आती है वह इस बात पर ध्यान नहीं देती की आखिर प्राइवेट कंपनियां जहां एक भी IAS नहीं होता , सब मुनाफे में चल रहीं हैं और सरकारी कंपनियां जो IAS के हांथों में हैं सभीं घाटे में चल रही हैं , आखिर क्या कारण है ? घाटे वाली सरकारी कंपनी का चेयरमन प्रोमोसन ले कर कहीं और चला जता है और सरकार आम आदमी का पैसा इन कंपनियों में बहा रही है /


क्या कोई ऎसी भी सरकार आयेगी जो जो भारत के मूल भूत प्रशासकीय ढाँचे को बदल सके?


भारत की सरकारें नहीं जनता बेईमान है जो कमजोर सरकार का वातावरण तैयार कर रही है//

भारत के रग – रग में बेईमानी भर दी गयी है जहां तरह-तरह के बेईमान दिखते हैं----

कोई साधू के वेश में

कोई नेता के रूप में

कोई जनता सेवक के रूप में,बिचारा लोकायुक्त क्या कर सकता है?


====ओम======


Sunday, August 7, 2011

सब कुछ उल्टा चल रहा है

वह कौन सी जगह है------

जहां सब कुछ उल्टा हो रहा है?


लगभग सभीं ग्रह अपनीं धुरी पर घडी की सूयी के विपरीत दिशा में घूमते हैं …

जब बच्चा चलनें लगता है तब उसके विपरीत दिशा में चलना चाहता है

जिधर बड़े उसे चलाना चाहते हैं …

आप इन बातों पर कभीं एकांत में बैठ कर सोचना पर अभीं इसे देखें---------


भारत अनेक देशों को मिला कर [ पहले देश होते थे अब उनको राज्य कहते हैं ] एक देश तो बना गया लेकिन बिना छिलके के संतरे जैसी इसकी स्थिति दिखती है / सब लोग राज्यों में , जातियों में .

गरीबी - अमीरी के नाम पर आपस में बाते हैं और जब कभीं आखें बंद करके अपनें देश की स्थिति के बारे में आप सोचेगें तो दुःख के अलावा और कुछ न मिलेगा /


भारत में राम राज्य की बातें जो करते हैं वे नाटक करते हैं , उनके पास कुछ नहीं वे आगे - पीछे से नंगे हैं और आप आदमी जिसके तन में दो - चार बूँदें खून की बची हैं उन्हें भी निकाल लेना

चाहते हैं / भारत में राम राज्य आ सकता है यदि निम्न बातों पर यहाँ की जनता ध्यान दे ----

  • देश में जितनें राज्य हैं उनके नामों को समाप्त कर दिया जाए

  • राज्यों के नाम भारत – एक , भारत – दो , भारत – तीन … ... ऐसे होनें चाहिए न कि -----

    गुजरात , महाराष्ट्र , उत्तर प्रदेश आदि

  • पढ़ाई और नौकरी में कोई आरक्षण जाती के नाम पर नहीं होना चाहिए , आरक्षण मात्र गरीबी

    के आधार पर होना चाहिए

  • जब पढ़ाई में आरक्षण हो तब नौकरी में नहीं होना चाहिए

  • जाति एवं धर्म पर जो लोग जनता को बाटना चाह रहे हों उनको चौराहों पर खडा करके गोली

    मार देनें की ब्यवस्था संबिधान में होना चाहिए

  • जिस पार्टी के 10% से कम MLA हों उसकी राज्य स्तर पर मान्यता समाप्त हो जानी चाहिए

  • जिस पार्टी के 10 % से कम MP [ elected ] हों उनको समाप्त कर देना चाहिए

  • भारत में दो प्रकार के डान हैं एक छोटी - छोटी पार्टियां बना कर अपनी कमाई कर रहे हैं

    और दूसरे वे हैं जो बिल्डरों / ब्यापारियों को बंदूख दिखा कर लूट रहे हैं . इन दोनों की सही ब्यवस्था होनी चाहिए //

  • हन्दू , मुसलमान . ईसाई . गिजराती , बंगाली , पंडित , दलित , क्षत्रिय . नाइ . धोबी आदि शब्दों को समाप्त कर देना चाहिए या इनको चलन से बाहर कर देनें की ब्यापक ब्यवस्था होनी चाहिए // भारत को शुद्ध करो , वोट के नाम पर अब इस से दुर्गन्ध आ रही है //


===== ओम ======




Saturday, July 30, 2011

यहाँ सब कुछ चल रहा है

एक इंशानियत को छोड़ कर …....

यहाँ सब कुछ चल रहा है//

भारत में आम आदमियों को मदद देनें वाली कितनी संस्थाएं हैं?

भारत में दुनिया में सबसे अधिक ट्रस्ट हैं और सबके सब गरीबी दूर करनें में लगे हैं;कोई बच्चों की भलाई में लगे हैं,कोई गर्भवती महिलाओं की भलाई में लगे हैं,कोई बुजुर्गों की सेवा में लगे हैं और कोई कोडियों की सेवा कर रहे हैं लेकिन देश के आइनें में इनकी तस्वीर कैसी दिखती है?

बिलगेट से लेकर चौधरी नानू तक सबके सब लोगों की सेवा में इतने ब्यस्त हैं की यह भी भूल गए हैं की वे क्या कर रहे हैं?


कोई स्वयं को बदलनें की बात नहीं सोचता सब दूसरों को बदलनें में लगे हैं लेकिन परिणाम क्या निकल रहा है?क्या ट्रस्टों का पैसा लोगों तक पहुँच भी पा रहा है?क्या भरे पुरे लोग दिल से कमजोर लोगों की भलाई करना चाहते हैं?भारत में ट्रस्टों की संख्या सारे संसार में सबसे अधिक है और कुछ देशों को छोड़कर भारत में भीखारियों की भी संख्या सबसे अधिक है,आखिर बात क्या है,क्यों जैसे-जैसे ट्रस्ट बढ़ रहे हैं वैसे-वैसे गरीबी भी बढ़ रही है?

हमें तो ऐसा लग रहा है की एक हाँथ के पैसे को दूसरे हाँथ में रखा जा रहा है और दूसरे हाँथ के पैसे को पहले वाले हाँथ में वापिस लाया जा रहा है और इस मेकैनिज्म का नाम है ट्रस्ट//


=====ओम=======


Monday, July 25, 2011

क्या ये वही हैं

चलते फिरते कभीं-कभीं ऐसा भी करें------

किसी मंदिर के एक किनारे में बैठ कर शांत होनें की कोशीश करें / मंदिर एक ऎसी जगह है जिसका आविष्कार हुआ ही है मन शांत करनें केलिए और मन शांत करनें का एक परम पवित्र स्थान मंदिर ही है / जब आप मंदिर के किसी किनारे में बैठे हों तब आप दो काम एक साथ करें ; पहला काम आप अपनें मन के साथ बनें रहें और मन जहां जहां जाता हो उसे वहाँ वहाँ से उठा कर अपनें साथ रखें / दूसरा काम आप का होना चाहिए उन लोगों को देखते रहना जो लोग मंदिर में प्रवेश कर रहे हों /

जब आप लोगों को देखनें का काम कर रहे हों तब आप के मन में उन लोगों के प्रति कोई विचार नहीं उठनें चाहिए / जब आप मंदिर से बाहर निकलें तब जिन लोगों को आप देखे हों उनमें से दो एक को चुन लें और सोचें , उनके बारे में की -------

क्या जिनको आप मंदिर के अंदर देखे थे वे वही हैं जिनको आप वर्षों से जानते हैं?

लोगों मंदिर में आते ही ऐसे क्यों हो जाते हैं जैसे अभीं-अभीं गंगा में स्वयं को रूपांतरित करके आये हों/क्या मंदिर लोगों को रूपांतरित कर देता है?यदि ऐसा होता तो लोग मंदिर से बाहर कदम रखते ही पुनः क्यों अपनें मूल रूपमें आ जाते हैं?

=====ओम=====




Friday, July 22, 2011

क्या होगा गंगा स्नान से

लोग कशी जाते है …..

लोग काशी में बाना चाहते हैं ….

लोग काशी में आखिरी श्वास भरना चाहते हैं …..

और कबीर जी साहिब कहते हैं-------

ज्यों कबीरा काशी मरे,रामहि कौन निहोर

और इतना कह के चले गए उस स्थान पर जहां मरने वाला गदहे की योनी में जन्म लेता है//

कबीर जी साहिब की सोच है की वह जहां हैं उनका राम उनके पास हैं और …...

नानकजी साहिब जब काबा में पहुंचे तब काबा के मुख्य प्रवेश द्वार की ओर अपना पैर

करके सो रहे थे और जब क़ाज़ी साहिब बोले की आप यह क्या कर रहे हैं?तब नानकजी साहिब का जबाब था,वह तो सर्वत्र है मैं किधर पैर करूँ?दोनों भक्त समकालीन थे,दोनों राम भक्त थे,दोनों के सभीं द्वार बंद थे और उनको जो भी दिखता था वह राम ही होता था//

लोग अपना पाप धोनें के लिए काशी गंगा स्नान करना चाहते हैं . क्या काशी में गंगा स्नान करनें से सभीं पाप धुल जाते हैं ? क्या होता है गंगा स्नान करनें से ?

गंगा स्नान से वे निर्मल होते हैं जो समझते हैं की मल क्या है और जिसको निर्मल की

पहचान होती है / गर्मी के मौसम में यदि कोई कम्बल ओढ़ कर बैठे तो उसे बैठना संभव नहीं रह जाता और कुछ समय बाद वह कम्बल को उतार देता है , ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि उसे मालूम है की वह पसीनें से तर क्यों हो रहा है , इसका कारण क्या है ? जिस तरह कम्बल धारी को कम्बल का पता होता है वैसे जब निर्मल अन्तः करण वाला मल से प्रभावित होता है तब उसे मल के भार का पता चल जाता है / वह जो गुणातीत मार्गपर है उसे जब गुण छूते हैं तब पता चल जाता है और गुणों का असर उसे बर्दास्त करना कठिन हो जाता है /

वह जो अहंकार में हैं और मनोरंजन के लिए गंगा स्नान करनें जा रहे हैं उनके लिए गंगा एक साधारण नदी हैऔर वे जो जग रहे हैं जो जगनें के लिए यत्नशील हैं उनके लिए गंगा परम धाम का का मार्ग हैं /

गंगा स्नान यदि होश में हो रहा हो तो देह के सभीं नौ द्वार बंद हो जाते हैं उर वह गुणाती योगी के रूप में भोग संसार में स्वयं को देखता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सभीं सूचनाओं में उसे ब्रह्म दिखता है और इस प्रकार उसे सभी पानी के श्रोत गंगा के रूप में दिखनें लगते हैं और वह नानकजी साहिब या कबीरजी साहिब की तरह निर्गुणी भक्त के रूप में हम सब के मध्य रहता है लेकिन हमलोग उनसे दूर ही रहते हैंपर जब वे नहीं रहते तब --------

हम सब के अंदर का निर्गुणी हमें चैन से नहीं रहनें देता और हम भागनें लगते हैं,कहीं गुरु द्वारा बनवाते हैं तो कहीं मंदिर लेकिन इस से होता क्या है?

====ओम====


Sunday, July 17, 2011

एक बार ऐसा हुआ

गुरुवर श्री रामकृष्ण परम हंसके एक मारवाणी मित्र मिलनें आये और गुरुवर से काशी - यात्रा की अनुमति मांगी / गुरुवर बोले , क्या बात है , काशी की याद एकदम कैसे आ गयी ? मित्र बोले , गुरूजी काशी गए दो साल हो गए हैं और इन दो सालों में मुझसे काफी पाप हुए होंगे , मैं सोच रहा हूँ की क्यों न काशी - गंगा स्नान करके पाप मुक्त हो जाऊं ? गुरुवर बोले , बात तो सही है लेकिन तुमको एक राज की बात बताता हूँ / तुम तो काशी जाते ही रहते हो और जब भी जाते हो गंगा स्नान भी करते हो लेकिन क्या तुमनें कभीं गंगा किनारे खड़े पेड़ों को देखा है ? सेठजी बोले , पेड़ों को ! मैं समझा नहीं आप क्या कहना चाहते हैं , कृपया साफ़ – साफ़ बताएं ? गुरुवर कहते हैं … ...

जब कोई गंगा में डूबकी लेता है तब उसके सारे पाप उसके सर से निकल कर उन पेड़ों पर लटक जाते हैं और जब उस का सर पानी से ऊपर उठता है तब पुनः उसके सारे पाप उसके सर में प्रवेश कर जाते हैं और परिणाम स्वरुप वह जैसा गया होता है वैसा ही वापिस आ जाता हैलेकिन ------

हजारों लोगों में कोई एकाध ऐसा भी होता है जो ….....

स्नान करते समय होश में रहता है और जब उसके सारे पाप पेड़ों पर लटक जाते है तब वह अपनें देह के सबहीं द्वारों को बंद कर के अपनें सर को गंगा से बाहर निकालता है /

अब तुम बताओ , तुम क्या करके वापिस आना चाहते हो ?

जाओ , प्यार से जाओ और एक बार गंगा स्नान करके हमेशा के लिए अपनें सबहीं द्वारों को बंद कर लो और तब तुम परम आनंद में रहनें लगोगे //

गीता में प्रभु श्री कृष्ण भी यही बात कहते हैं //


===== ओम =====


Friday, July 15, 2011

कौन है ऊपर

जहाँ कोई परमात्मा शब्द बोलता है लोगों का रंग बदलनें लगता है ; कोई कान को हाँथ लगाता है तो कोई ऊपर देखनें लगता है कोई इस शब्द के साथ टिकना नहीं चाहता सभीं चाहते हैं , किसी तरह परमात्मा - पिजड़े के बाहर रहना लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रभु में ही अपना बसेरा बना

रखा है /

गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं--------

हे अर्जुन ! बहुत से लोग मुझे चाहते हैं , किसी का कोई कारण होता है तो किसी का कोई , जो मुझसे जुड़ते हैं उनमें कुछ को सिद्धि मिल भी जाती है लेकिन सिद्ध - योगियों में कोई एकाध मुझे तत्त्व से समझ पाता है /

कौन परमात्मा को तत्त्व से समझता है?

  • सुख – दुःख,भय – मोह एवं आलस्य का आयाम …....

  • काम,कामना,क्रोध,लोभ अहंकार का आयाम ….

  • प्रभु के साथ जुड़े होनें के कारण मैं के गर्व का आयाम ….

जब कोई साधक इन तीन आयामों से अप् रभावित हो जाता है तब ------

सम्भव का आयाम आता है जहाँ टिके रहनें वाला योगी किसी भी क्षण कहीं भी धीरे से प्रभु के आयाम में सरक जाता है जिसको कहते हैं गुणातीत – योगी /

  • प्रभु से भाग कर कहाँ जाओगे?

  • प्रभु को धोखा देकर कहाँ रहोगे?

  • प्रभु को नज़र अंदाज़ करके कैसे जीवन गुजारोगे?

प्रभु की ओर पीठ करनें वाला कबतक भागता रहेगा ? वह कौन सी जगह है जहाँ प्रभु नहीं , आखिर

एक दिन तो तुमको जबाब देना ही होगा कि …...

मनुष्य जीवन में तुम किस तरह रहे हो?


=====ओम=========


Wednesday, July 13, 2011

क्या हम इसे समझते हैं


ज़रा आप इन बातों पर गौर करें------




  • मोहमद साहिब जब गर्भ में थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था … ....



  • मोहमद साहिब जब छः साल के थे तब उनकी माँ गुजर गयी थी … ...



  • मोहमद साहिब जब आठ साल के थे तब उनके दादा गुजर गए … .



  • मोहमद साहिब की पहली पत्नी जो यहूदी थी उनसे पन्द्रह साल उम्र में बड़ी थी … ..



  • मोहमद साहिब सन 610 में ज्ञान प्राप्त किया एक पहाडी के ऊपर



  • मोहमद साहिब को आकाश में गुजती एक आवाज सुनाई पडी ---



  • मोहमद तूँ बोल और मोहमद साहिब कापनें लगे और घर आते ही



  • उनको तेज बुखार हो गया … .



  • मोहमद साहिब सत् की खोज की यात्रा की अवधि सन 6.10 से सन 632 तक था … .



  • सन 618 में भारत के मालाबार के राजा चक्रवाती फरमास पहले ऐसे ब्यक्ति थे जिन्होंने इस्लाम धर्म को धारण किया … ..



  • मोहमद साहिब का भौतिक जीवन सन 570 से 632 के मध्य था … ..



  • कुरान शरीफ में 114 सुरा और 6236 आयतें हैं … ..



  • कुरान शरीफ में घर बनानें से ले कर गृहस्थ जीवन जीनें की सारी बातें दी गयी हैं … ..



  • कुरान शरीफ में खुदा के लिए सौ नामों की चर्चा है लेकिन गिनती करनें


    पर 99 नाम मिलते हैं ..



  • कुरान शरीफ में यह लिखा है कि जो नाम पहला है वही आखिरी भी है और -----



  • पहला नाम है,अल्लाह




====अल कबीर=======




Monday, July 11, 2011

हमलोग उस समय क्या कर रहे थे

सोमनाथ का मंदिर लूटा गया तब------

कुरुक्षेत्र का शिव मंदिर जब महमूद गजनी लूट रहा था तब----

काशी विश्वनाथ का मंदिर जब गिराया जा रहा था तब-----

अयोध्या का राम लला का मंदिर जब तोड़ा जा रहा था तब----

हम लोग क्या कर रहे थे ?

कह रहे हैं लोग की केरल के मंदिर में कमसे कम पांच लाख हजार करोड का माल दबा हुआ है और कई दिन तो हो गए लोगों को गणना करते हुए और कई हप्ते और लगनें की उम्मीद दिख रही है /

भारत का धन किस का धन है जो मंदिरों में या राज महलों में दबा हुआ है ?

राजस्थान के राजा सर्वसम्पन्न माने जाते थे …..

छत्तीस गढ़ नाम ही छत्तीस राजाओं के राज्यों के क्षेत्र के नाम पर रखा गया है …..

मिथिला और पाटलीपुत्र भारत का प्राचीनतम इतिहास की किताब हैं …...

मिथिला में यदि त्रेता युग मे माँ जानकी पैदा हुयी तो द्वापर में आ कर

कंश की पत्नी भी मिथिला की थी.....

राजाओं को धन कहाँ से मिलता था ?

गरीबों के खून को राजा लोग चूसते थे और वह धन या तो राज महलों में दबा हुआ है या भय के कारण मंदिरों में दबा हुआ है /

सरकार को चाहिए की प्राचीनतम मंदिरों एवं किलों में जमा धन का पता लगाए और उस धन को गरीब इलाकों के विकास में खर्च करे क्योंकि वह धन मात्र गरबों आ है //


====ओम=======


Wednesday, July 6, 2011

इसे भी समझो


क्या कभीं ऎसी बातें भी आप को अपनीं ओर खीचती हैं?


क्या कारण है कि--------


[]चंद्र गुप्त मौर्य चालिश साल की उम्र में जैन भिक्षुक बनगए?


[]तुलसी दास चालिश साल की उम्र के बाद रामचरितमानस की रचना की?


[]मोहमद साहिब को चालिश साल की उम्र के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ ?


[]बुद्ध को चालिश साल की उम्र के बाद निर्वाण मिला ?


[]हिंदी के कवि श्री जयशंकर प्रसाद चालिश साल की उम्र के बाद कामायनी जैसे


काब्य की रचना की ?


[]अल्बर्ट आइन्स्टाइन को चालिश साल की उम्र में नोबल पुरष्कार मिला ?




कभीं-कभीं ऎसी बातों को भी आप अपनें ध्यान का विषय बना सकते हैं /


चालिश साल की उम्र आते ही मनुष्य में क्यों ज्ञान की किरण निकलती है ?


कुछ दिन इस बिषय पर आप लगाएं,इसके बाद ऎसी कुछ और बातें आपको अगले अंक में भी मिलनें वाली हैं /




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